विधायक से कम सांसद का फंड
चंडीगढ़. संसद में नौ विधानसभा हलकों के बराबर एरिया का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसदों को पंजाब के विधायकों से ढाई गुणा कम डवलपमेंट फंड मिलता है। यही नहीं, अपने फंड का मनमर्जी से इस्तेमाल करने वाले विधायक सांसदों के ऐच्छिक फंड पर ‘बाज निगाह’ भी रखते हैं। वह अपनी पसंद के एरिया और नेताओं को पैसे दिलाने के लिए सांसदों पर दबाव भी बनाते हैं।
पंजाब में विधायकों को उनके विधानसभा हलके के विकास के लिए फंड देने का कोटा निश्चित नहीं है। अकाली-भाजपा गठबंधन के सत्ता में आने के बाद पहले साल विधायकों को दो-दो करोड़ रुपए मिले थे जिसे अगले साल तीन-तीन करोड़ रुपए कर दिया गया। चालू वित्त वर्ष में उन्हें अपने क्षेत्र के विकास के लिए चार—चार करोड़ रुपए दिए गए और अगले वित्त वर्ष में इसे बढ़ाकर पांच करोड़ रुपए करने की तैयारी चल रही है।
चूंकि सरकारी खजाने की हालत ऐसी नहीं है कि वहां से विधायकों को इतनी रकम दी जा सके, इसलिए मंडी बोर्ड पर दबाव बनाया जा रहा है कि वह विधायकों के डवलपमंेट फंड के लिए पैसे दे। मजेदार बात ये है कि सरकार के फंड ले लेने की वजह से मंडी बोर्ड को अपने विकास कार्यो के लिए लोन लेना पड़ रहा है।
विपक्षी विधायकों से भेदभाव
एक और बात, सांसदों को ऐच्छिक कोटा जारी करते समय केंद्र सरकार उनसे कोई पक्षपात नहीं करती लेकिन पंजाब सरकार इतनी ‘उदार’ नहीं है। यहां जो दल सत्ता में रहता है, उसके विधानसभा चुनाव में हार चुके नेताओं को भी ऐच्छिक कोटा मिल जाता है जबकि जीतने वाले विपक्ष के विधायक मुंह ताकते रह जाते हैं। अगर कोई निर्दलीय विधायक भी विपक्ष से ‘दोस्ती’ निभाता है तो उसके साथ भी यही बर्ताव होता है। सत्तारूढ़ अकाली-भाजपा गठबंधन इस ‘परंपरा’ का पालन बखूबी कर रहा है। इस भेदभाव पर निहालसिंह वाला हलके से विधायक अजीत सिंह शांत कहते हैं, ‘यह लोकतंत्र नहीं है। यहां जनता द्वारा रिजेक्ट किए जा चुके नेता विपक्ष के जीते हुए विधायकों से ज्यादा ताकतवर हैं। हारे हुए नेताओं को सरकार हलका इंचार्ज बनाकर उनसे डवलपमेंट स्कीमों के चेक बंटवा रही है।’
सांसद से करते हैं डिमांड, न देने पर गिनवाते हैं काम
सांसदों को मिलने वाली दो करोड़ रुपए की ऐच्छिक निधि पर भी विधायकों की नजर रहती है। एक अकाली सांसद इस बात से खासे खफा हैं कि उनके हलके से संबंध रखने वाले ज्यादातर अकाली-भाजपा विधायक अपनी पसंद की जगह पैसा लगाने के लिए उनसे ऐच्छिक कोटे की राशि मांगते रहते हैं। अगर वह टालमटोल करें तो चुनाव में किए गए काम गिनवाने लगते हैं। समझ में नहीं आता कि सांसद अपनी मर्जी से कुछ खर्च कर पाएंगे कि नहीं?










