78 लाख में खरीदे 220 कम्प्यूटर
सागर. डॉ.हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय ने 200 कम्प्यूटर की खरीदी में एक नया कीर्तिमान बनाया है । विवि प्रशासन ने कंपनी द्वारा कम्प्यूटर बनाने से पहले ही उन्हें खरीद लिया। मजेदार बात तो यह है कि जिस दिन खरीदी के ऑर्डर दिए उसी दिन संबंधित कंपनी को 78 लाख रुपए से अधिक का भुगतान भी कर दिया गया। जबकि नियमानुसार बिना इंस्टालेशन के भुगतान नहीं किया जा सकता ।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 31 मार्च 2009 को विवि की जवाहरलाल नेहरू लाइब्रेरी के लिए 200 कम्प्यूटर एवं 200 सीडी राइटर खरीदने का ऑर्डर गुड़गांव स्थित एक कंपनी को दिया गया। इन कम्प्यूटरों की कीमत 78 लाख 46 हजार 690 रुपए थी।
यह ऑर्डर पूरा करने के लिए कंपनी ने भोपाल के एक डीलर को अधिकृत किया। यहां भी मजेदार बात यह है कि 31 मार्च को ही खरीदी के ऑर्डर दिए गए और 31 मार्च को ही कंपनी ने डीलर को अधिकृत कर दिया। यानी एक ही तारीख को सारे कार्य हुए, जो व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हैं।
बिल और डिलेवरी भी एक साथ
कंपनी द्वारा इनवाइस बिल 31 मार्च को दिए गए और डिलेवरी भी 31 मार्च को हुई। जबकि खरीदे गए मॉनीटर पर विनिर्माण तारीख जून-2009 लिखी है। यह धांधली उस समय उजागर हुई जब भ्रष्टाचार निवारण एवं जनकल्याण मंच को भौतिक सत्यापन के बाद लाइब्रेरी प्रशासन द्वारा एक पत्र दिया गया।
29 दिसंबर 09 को जारी इस पत्र के बिंदू क्रमांक एक से तीन तक उल्लेख है कि खरीदे गए कम्प्यूटर में से आवश्यकतानुसार 80 कंप्यूटर सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है एवं शेष सील बंद पैकिंग में हैं। जो 80 कम्प्यूटर खोले गए उनके टीएफटी मॉनीटर में निर्माण वर्ष जून 2009 अंकित है।
अनियमितता की शिकायत
विवि प्रशासन द्वारा इस खरीदी में अपनाई गई प्रक्रिया को लेकर भ्रष्टाचार निवारण एवं जन कल्याण मंच द्वारा आर्थिक अनियमितता का आरोप लगाते हुए पुलिस अधीक्षक एवं आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो से जांच की मांग की गई है।
शिकायत में बताया है कि यह खरीदी डीजीएसएंडडी के नियमों के अनुसार नहीं हुई है। डीव्हीडी राइटर का रेट 350 रुपए है, जबकि बिलिंग सीडी राइटर की हुई है। सीडी राइटर की कीमत डीव्हीडी राइटर से लगभग आधी होती है।
कोई नहीं था लाइब्रेरी इंचार्ज
अक्टूबर-नवंबर 2008 से 31 मार्च 2009 के बीच प्रोफेसर इंचार्ज लाइब्रेरी के पद पर कोई भी प्रोफेसर कार्यरत नहीं था। लिहाजा इस मामले में कोई भी बोलने को तैयार नहीं। तत्कालीन कुलसचिव डॉ. परीक्षित सिंह थे, जिनका तबादला हो चुका है।
गौरतलब है कि ई-लाइब्रेरी के ढाई करोड़ रुपए में से ज्यादातर राशि 31 मार्च को लैप्स होने वाली थी। इसी कारण आनन-फानन में 200 कम्प्यूटर खरीदे गए। हालांकि विवि प्रशासन के सूत्रों के मुताबिक संबंधित कंपनी से एक करोड़ रुपए की बैंक गारंटी ली गई थी, इसी के बाद ऑर्डर दिए गए थे।










