जीतने वाला जनप्रतिनिधि या बाजारू
सोमवार का दिन फिर कुछ करने जा रहा है। देखना यह है कि इतिहास दोहराया जाएगा या फिर जनप्रतिनिधि जनता से किए वादे याद रखेंगे।
पूरा जिला एक बार फिर से याद कर रहा है पुराने जिला प्रमुख के चुनावों को। मतगणना हुई तो परिणाम कुछ और था और जिला प्रमुख का चुनाव हुआ तो परिणाम बदल गया। आंकड़े बताते हैं कि जिला परिषद के परिणाम में कुल 20 पार्षद कांग्रेस से जीते थे और 17 भाजपा के। उसके बाद भी कुछ जनप्रतिनिधियों ने अपनी नैतिकता और जनता से किए वादों को भूलकर चंद लालच में पार्टी के खिलाफ मत दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस के बहुमत में होने के बाद भी जिला प्रमुख का पद भाजपा के खाते में चला गया। इतिहास कहता है कि नगर परिषद के पिछले चुनाव में आंकड़ों का गणित तो नहीं बदला पर पद की दौड़ में नैतिकता को कई कदम पीछे छोड़ दिया गया।
अब फिर चुनाव हो गए, जिला परिषद और पंचायत समिति के डायरेक्टर पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ें हैं। फिर भी पार्टी के नेता ही उन्हें परिणाम आने से पहले ही अज्ञात स्थानों पर ले गए। किससे डर है, पार्टी को अपने ही उन लोगों पर भरोसा क्यों नहीं है, जिन्हें इसी शहर के सर्किट हाउस में गिड़गिड़ाते हुए टिकट दिया था। पहले टिकट के लिए वे दौड़ लगा रहे थे, अब उनके पीछे पार्टी के नेता दौड़ रहे हैं। अर्थ साफ है कि किसी को किसी पर भी भरोसा नहीं है इसलिए ही रातों-रात अज्ञातवास हो जाता है और कुछ ही मिनटों में पार्टी बदल जाती है।
टिकट लेकर जब नेताजी मैदान में गए तो लोगों से क्या कहा, किसी ने कहा राज्य सरकार के साथ चलो ताकि विकास हो, किसी ने कहा राज्य सरकार ने राजस्थान को फिर से बीमारू बना दिया, इसलिए इससे बचो। मतदाताओं ने भी अपने विवेक से वोट दिया और परिणाम सोमवार को सामने होगा, पर इसी परिणाम की कुछ लोग खुले में धगिायां उड़ाने को तैयार बैठे हैं, हो सकता है राज्य सरकार के विकास की बात करने वाले लोग प्रदेश को बीमारू मानने लग जाएं और बीमारू बताने वाले लोग विकास की बात करने लग जाएं।
आखिर ऐसा परिवर्तन कैसा आता है, क्या परिणाम देखकर याद आता है कि हमने फलां पार्टी से चुनाव लड़कर गलती की। ऐसा नहीं है, जनता सब जानती है, मतदाता भी कहता है कि जब सरपंच नरेगा के भरोसे लाखों रुपए खर्च कर चुका है तो ऐसे लोग जिन्हें दो दिन के बाद केवल मीटिंगों में अपनी सहभागिता निभानी है। उन्हें तो जो करना है वह अभी करना है, इसलिए वे दो दिन के लिए इस बात को भूल जाते हैं कि वे किस पार्टी से चुनाव लड़े थे और उन्हें क्या करना चाहिए।
एक बात जीतने वाले दोस्तों के लिए
दोस्तों, हो सकता है कि फिर ऐसा समय आए जो आपको अपने रास्ते से अलग करने का प्रयास करे, हर तरह का लालच आपके द्वारा जनता को दिए विश्वास के साथ चोट करना चाहेगा पर यदि आप जनप्रतिनिधि हैं तो जन के ही बने रहें, यदि बाजारू बन गए तो जनता की नजर में आपका भी वही स्थान बनेगा जो बाजारू का होता है।










