हिटलर फिर बहस के केंद्र में
हिटलर की आत्मकथा मेन काम्फ का 70 साल का कॉपीराइट वर्ष 2015 में जर्मनी में खत्म हो जाएगा। इसका कॉपीराइट बैवेरियन सरकार के पास है और नाजी विचारधारा पर हिटलर की इस किताब का प्रकाशन जर्मनी में प्रतिबंधित है। इतिहास के सबसे घृणित व्यक्ति के रूप में जाने जानेवाले हिटलर ने 1923 में मेन काम्फ तब लिखी थी, जब वह बैवेरियन की जेल में बंद था।
यह किताब दुनिया के कई देशों में उपलब्ध है। इतिहास के विद्वानों के लिए यह उस बात का मूल्यांकन करने का अच्छा स्रोत है कि ‘राष्ट्रीय समाजवाद’ और उसके विस्तारित रूप फासीवाद का विकास कैसे हुआ। जर्मनी में सेंट्रल काउंसिल फॉर ज्यूस का तर्क है कि चूंकि हिटलर की मेन काम्फ इंटरनेट पर और अन्य देशों में पहले से ही उपलब्ध है, तो क्यों नहीं जर्मनी में भी इसके आधिकारिक संस्करण को मुहैया करवाया जाए ताकि हिटलर के शब्दों व विचारों को उनके मूल संदर्भ के साथ प्रस्तुत किया जा सके? यह बहस अभिव्यक्ति की आजादी के मूलभूत सवाल को उठाती है, लेकिन इस किताब पर प्रतिबंध का मसला काफी संवेदनशील है।
छह लाख से भी अधिक यहूदियों को नाजी शिविरों में मौत के घाट उतार दिया गया था। इसके लिए जर्मनी माफी मांग चुका है और पश्चाताप के रूप में नाजियों से संबंधित सभी सामग्री पर प्रतिबंध लगा चुका है। लेकिन विचारों का दमन भी अपने आप में फासीवाद का ही एक रूप है, भले ही उसका मकसद कितना भी अच्छा क्यों न हो।
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