Tuesday, Feb 9th, 2010, 5:46 am [IST]  
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danik bhaskarबसें हुईं ‘बेबस’

केडी इसरानी

जोधपुर. जोधपुर का रोडवेज डिपो घाटे का घर बना हुआ है। रोजाना औसतन दो लाख रुपए से अधिक का घाटा हो रहा है। इस घाटे के कारणों में से एक बूढ़ी होती पुरानी एवं खस्ताहाल बसें हैं, जिनमें कोई एक बार यात्रा कर ले तो दुबारा यात्रा करने की नहीं सोचता। यही वजह है कि लोग बिना बीमा भी चमचमाती एवं टिप टॉप निजी बसों में यात्रा पसंद करते हैं।



राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम के जोधपुर आगार के पास कुल 108 बसें हैं। इनमें से 23 बसें तो ऐसी हैं जिन्हें कायदे से दो से तीन वर्ष पहले ही कंडम घोषित कर देना चाहिए था। लेकिन निर्धारित 8 साल और 8 लाख किलोमीटर यात्रा तय करने के बाद भी ये रोडवेज के बेड़े में हैं।



इन बसों की टूटी सीटें, टूटे हुए शीशों से सर्दी में आती ठंडी हवा, बरसात में पानी और आंधी तूफान में मिट्टी और धूप परेशानी का सबब बनी हुई है। इन बसों में घड़घड़ाहट के कारण यात्री दुबारा यात्रा नहीं करना चाहता। ऐसी जर्जर हाल बसें संचालित करने में रोडवेज को प्रत्येक माह लाखों रुपए इनकी मरम्मत के नाम पर खर्च करने पड़ रहे हैं।



वहीं सुविधाएं मुहैया नहीं करा पाने के कारण यात्री भार भी 50 से 60 प्रतिशत ही मिल पाता है। रोडवेज प्रशासन की माने तो जोधपुर आगार को 2008 के बाद एक भी बस नई नहीं मिली है। ऐसे में उदयपुर, सूरत, भीलवाड़ा, प्रतापगढ़, चितौड़, गंगानगर, अहमदाबाद, जयपुर, वाया मेडता जयपुर जैसे बड़े रूट पर खटारा अर्थात कंडम बसें संचालित हो रही हैं।



नई बसें मांगी हैं



जोधपुर डिपो को रोजाना औसतन दो लाख रुपए का घाटा होता है। प्रत्येक माह पुरानी दो तीन बसें मरम्मत करवाकर चलाई जा रही है। हमने घाटा कम करने एवं यात्री भार बढ़ाने के लिए 36 नई बसें मांगी हैं ताकि निजी संचालकों के साथ प्रतिस्पर्धा में खड़े हो सकें तथा यात्रियों को आधुनिक नई आराम दायक बसें यात्रा के लिए मुहैया कराई जा सके। - महावीर प्रसाद दाधीच, मुख्य प्रबंधक, जोधपुर आगार

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