पट्ïटे बचाने की जुगत
अफीम की फसल में सिंचाई के पाने की किल्लत के चलते काश्तकार को टैंकरों से पानी ला-लाकर सिंचाई करवाना भारी पड़कर 'सोना बीच गड़ाई मुंगीÓ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।
अफीम की फसल को लेकर इसके उत्पादक किसान इसके उत्पादन को लेकर काफी उत्साहित रहते हैं। इस दौरान उनको दी गई हर सलाह को पूरी करने में रहते हैं। जिसमें अधिकतर अफीम के डोडों में दूध बढ़ाने वाली दवाईयों से लेकर मौसमी मक्की रोगों के बचाव के लिए दवाईयों पर खुलकर पैसा खर्च करते आए हैं। वहीं इस बार पानी की कमी होने से इनकी मुसीबत दुगुनी हो गई है। ये काश्तकार मात्र पानी की कमी से अफीम उत्पादन में घाटा नहीं उठाते हुए अपने पट्ïटे को भी बचाने की जुगत में हैं, जिसके चलते क्षेत्र के कुछ अफीम उत्पादक किसान टैंकरों से पानी मंगवाकर अपनी फसल को सींच रहे हैं।
अफीम की फसल में लगभग छह से सात सिंचाई की जरूरत पड़ती है। फसल की शुरुआत में तो दो-तीन सिंचाई तक तो इन्होंने अपने ट्ïयूबवैल, कुएं से काम चला लिया। लेकिन जलस्तर नीचे जाने के साथ ही टैंरों से पानी मंगवाकर सिंचाई करवानी पड़ रही है। क्षेत्र के गांव भट्ïटों का बामनिया, खाखरियाखेड़ा, केसरीखेड़ी, बुद्धाखेड़ा, बालारड़ा, भीमगढ़, चटावटी आदि क्षेत्रों में टैंकरों से पानी मंगाकर सिंचाई की जा रही है। इधर, इन टैंकरों वालों की दिन-रात भीड़ लगी रहती है। ऐसे ट्ïयूबवैल मालिक एक टैंकर पानी भरने का 40 से 50 रूपए वसूल रहे हैं।
बालारड़ा निवासी मोहन पुत्र नारायण चमार के अनुसार उसके तीस आरी अफीम फसल में वो अब तक दो बार टैंकरों के पानी से सिंचाई कर चुका है। एक बार की सिंचाई में लगभग 25 से तीस टैंकर पानी मंगवाया गया। एक टैंकर पानी का खर्च औसतन 250 रुपए तक आता है। कम दूरी से पानी लाने पर 200 से अधिक दूरी पर लाने पर 250 से अधिक का खर्च प्रति टैंकर आता है। उसने बताया कि इस खर्च के अलावा दवाईयां पर भी भारी खर्च होता तथा ऊपर से रोजड़ों के बचाव के लिए फसल के चारों ओर तारों की बाड़ लगाने पर भी अतिरिक्त खर्च करना पड़ा इतना बताते हुए वो बोल पड़ा 'होना बी गड़ाई मुंगी पड़ री हैÓ।
खाखरियाखेड़ा निवासी मुरलीगिरी ने बताया कि उसने अपनी फसल को दो बार टैकरों में पानी से सींचा है। जिसमें लगभग 18-20 हजार का खर्च आ चुका है। वहीं अब एक से दो बार की सिंचाई बाकी है। उसने बताया कि तीन हजार रुपए दवाईयों पर खर्च कर चुका है।










