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Wednesday, Feb 10th, 2010, 11:26 am [IST]  

danik bhaskarपरदे के पीछे - चतुर रामलिंगम और दर्शक का मन

जयप्रकाश चौकसे

chaturदर्शक अलग-अलग किस्म की फिल्मों को अलग-अलग नजरिए से देखता है। उसके मानदंड बदलते रहते हैं। हॉरर फिल्म देखने वाले ने ‘प्यासा’ को भी सराहा है। ओमी वैद्य को ‘३ इडियट्स’ ने अत्यंत लोकप्रिय बना दिया है। ‘चतुर’ रामलिंगम की भूमिका में सफलता के पीछे भागने वाले पात्र को उसने इतने मनोरंजक ढंग से अभिनीत किया है कि उसे ‘चौथा इडियट’ मान लिया गया है। गोवा के इस मूल निवासी ने लॉस एंजिल्स में रहकर कुछ अमेरिकी सीरियल्स में छोटी भूमिकाएं अभिनीत कीं और अमेरिका में बसे ‘३ इडियट्स’ के पटकथा लेखक की सिफारिश पर निर्देशक राजकुमार हीरानी ने उसका काम देखा और पसंद किया।



ओमी वैद्य को हिंदी नहीं आती और शूटिंग के समय उसे हिंदी नहीं सीखने दी गई, ताकि अभिनय में विश्वसनीयता आए। उसे सचमुच ‘बलात्कार’ और ‘चमत्कार’ का अर्थ नहीं मालूम था। दर्शकों की पसंद के अनुरूप गढ़ी गई फिल्म में ‘चतुर’ की भूमिका को फिल्मकार की आशा से अधिक सराहा गया। शायद दर्शकों को वह ही असली इडियट लगा। फिल्मकार ने प्यारा सा लगने वाला खलनायक रचा। अव्वल आने के लिए वह अपने सहपाठियों के कमरों में वयस्क पत्रिकाएं डाल देता है। इस बुरे काम में शरारत के साथ बला की गुदगुदी है। वह शिक्षकों का प्रिय है, इसलिए जब उसकी हालत खस्ता होती है तब दर्शकों को अपने शिक्षकों का व्यवहार याद आता है और संतोष मिलता है।



सिनेमा में सत्ता का विफल होना हमेशा दर्शकों को पसंद आता है। दर्शक पात्रों मंे हमेशा अपना अनुभव या अपने पहचान के लोग नहीं ढूंढ़ता, वरन उसे चौंकाने वाले अजीबोगरीब पात्र भी अच्छे लगते हैं, क्योंकि हम अपने भीतर एक सनकी और अप्रत्याशित को दबाए होते हैं। यह शिक्षा और संस्कार हैं कि आप अपने भीतर छिपे वहशी का दमन करते हैं। फिल्म के विचार-विमर्श में यह लोकप्रिय मान्यता है कि दर्शक परदे पर अपने जाने-पहचाने या अवचेतन में छुपे के साथ ही भावनात्मक तादात्म्य स्थापित करता है। दर्शक के मन का कोई भी सरलीकरण उचित नहीं है, क्योंकि वह भूत-प्रेत की फिल्म में भी आनंद उठाता है, जो उसके जाने-पहचाने पात्र नहीं हैं।



पेरिस के बाद मॉस्को में लुमियर बंधुओं द्वारा फिल्म के पहले प्रदर्शन पर दर्शकों में महान लेखक मैक्सिम गोर्की मौजूद थे और अगले दिन उन्होंने अपने कॉलम में लिखा कि सिनेमा छायाओं का रहस्यमय संसार है और बगीचे मंे पानी देने के दृश्य में आपको भ्रम होता है कि बौछार आपके मुंह पर आ सकती है। फिल्म देखते समय आप स्थान और समय बोध से मुक्त हो जाते हैं। इस तरह फिल्म का पहला आलोचक एक महान लेखक था और उनकी टिप्पणी मंे दर्शक के मन की झलक मिलती है। वह इतना तल्लीन होता है कि स्थान-समय बोध से मुक्त हो जाता है।



दरअसल दर्शक की प्रतिक्रिया का विधिवत अध्ययन किया जाना चाहिए। इस तरह के शोध से बहुत लाभ हो सकता है। दर्शक अलग-अलग किस्म की फिल्मों को अलग-अलग नजरिए से देखता है। उसके मानदंड बदलते रहते हैं। हॉरर फिल्म देखने वाले ने ‘प्यासा’ को भी सराहा है। इतना ही नहीं, एक ही फिल्म में दर्शक का मूड कई बार बदल जाता है।



उसकी पसंद की सुई की नोक से तर्कहीनता का हाथी निकल जाता है और वह तर्कसम्मत पूंछ को रोक देता है। एक बार एक अघोरी ने चार प्लेट विष्ठा खाने के बाद डबल धन के वादे के बावजूद पांचवीं प्लेट मक्खी पड़ी होने के कारण अस्वीकृत कर दी। ज्ञातव्य है कि अघोरी लोग अपने विचित्र आराधना तंत्र के तहत घृणित को भी स्वीकार करते हैं। बहरहाल दर्शक मजनूं की तरह होता है और उसे लैला (फिल्म) में क्या पसंद है, यह वह भी नहीं बता पाता। एक मायने में पूरी फिल्म में ‘चतुर’ रामलिंगम की रैगिंग हो रही है और शायद इस कारण भी उसे सहानुभूति दी गई है।



गब्बर और मोगैंबो के प्रति भी कुछ लोगों को स्नेह रहा है, जिनको साथ खड़ा करने पर ‘चतुर’ बहुत मासूम नजर आता है। उसकी लोकप्रियता को समझने के प्रयास मंे उसकी प्रतिभा को अनदेखा किया जा रहा है। वह अच्छा कलाकार है।



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* 3 इडियट्स का चतुर भी और शोले का गब्बर भी
* थ्री इडियट्स का असली इडियट



* ओमी के बलात्कार का चमत्कार

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