मशहूर शायर इंदौरी की नजर में मुशायरे हुए कमर्शियल
भोपाल. मुशायरों में अब तहजीब रिवायत कितनी बची है इसे तलाश करना मुश्किल है। कवि सम्मेलन और मुशायरे अब कमर्शियल हो गए हैं। क्लास की चीज अब मुशायरों में कम ही देखने को मिल रही है। यह कहना है ख्याति प्राप्त शायर डॉ. राहत इंदौरी का। मप्र उर्दू अकादमी द्वारा बुधवार को आयोजित अखिल भारतीय मुशायरे में शिरकत करने भोपाल आए डॉ. इंदौरी ने विशेष बातचीत की। डॉ. इंदौरी ने इश्क, जानम, आरजू, याराना, चेहरा, दरार, मर्डर, मुन्नाभाई एमबीबीएस, मिशन कश्मीर, जुर्म सहित कई मशहूर फिल्मों में गीत लिखे हैं। वर्तमान में वे प्रख्यात चित्रकार एमएफ हुसैन द्वारा निर्देशित फिल्म माजरा के गीत लिख रहे हैं।
नए कलाम जो लिखे जा रहे है उनके ट्रेंड में कोई बदलाव आया है?
-उर्दू शायरी दरबारों और किलों में होने वाली महफिलों में कैद रही है, लेकिन अब यह बाजारों और सड़कों पर आ गई है। गजलों, कलामों, नज्मों में तेवर, शब्दावली, मिजाज और लहजा बदला है। गालिब के जमाने की जबान में अब बदलाव हो रहा है और वहीं जबान अब हिन्दुस्तान की उर्दू जबान हो गई है। हालात को देखकर कलामों के टे्रंड में भी बदलाव हुए हैं।
मुशायरे कुछ शहरों में ही सिमट कर रह गए हैं?
-ऐसा नहीं है, मुशायरों का आयोजन जिस तरह से पहले होता रहा है आज भी उसका मिजाज वैसा ही बना हुआ है। दिल्ली, अलीगढ़, लखनऊ, भोपाल सहित हिंदुस्तान के अन्य शहरों में मुशायरों की महफिलें सज रही है। इसके अलावा मुखतलिफ मुल्कों में भी उर्दू जबान ने नई आबादी बनाई है। अकेले हिंदुस्तान में ही लगभग 700 जगहों पर बेपनाह मुशायरे हो रहे हंैं। हिंदुस्तान की तहजीब में मुशायरा समां गया है।
युवाओं के बीच से गायब होती शायरी का क्या कारण हैं?
-शायरी एक ऐसी चीज है जिसे जवान ही महसूस कर सकता है। शायरी को युवाओं ने ही संभाल रखा है। सुनने वालों में युवाओं की तदाद ही सबसे ज्यादा होती है। शायरी सुनते ही हमसब जवान हो जाते हैं। युवा चाहे कितने ही आधुनिक हो जाए उसके जहन में शायरी आज भी जिंदा है।
एक चित्रकार होने का नाते क्या आपकी शायरी कैनवास पर भी होती है?
-मैं चित्रकार रहा हूं और आज भी पेंटिंग का शौक रखता हूं। पेंटिंग एक अलग मीडियम है इजहार करने का। चाहे कागज-कमल हो या फिर रंग-ब्रश दोनों ही तरीके है अपनी बात को कहने के। कई बार मैं शायरी को कैनवास पर दिखाता हूं तो कई बार पेंटिंग में मेरी शायरी सुनाई देती है।
कवि सम्मेलनों में बढ़ती फुहड़ता से मुशायरे कितने बचे हुए है?
-मुशायरों में तहजीब रिवायत कितनी रही है उसे तलाश करना मुश्किल है। कवि सम्मेलनों के हालात काफी खराब हो चुके है लेकिन मुशायरों के अभी हालात काफी ठीक है। देखा जाए तो दोनों ही अब कमर्शियल हो गए है। बाजार दोनों पर हावी हो गया है। मुशायरों की जो महफिलें कभी हुआ करती थी अब वैसी कम ही देखने को मिल रही है।










