Wednesday, Mar 10th, 2010, 7:06 am [IST]  
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danik bhaskarप्राण संकट में डाल उसने लोगों की बचाई जान

पं. विजयशंकर मेहता

जीवन दर्शन एक वर्ष भीषण बारिश हुई। मध्यप्रदेश की एक नदी में बाढ़ आ गई। वहां के सारे गांव और बस्ती खाली हो गए, लेकिन एक स्थान ऐसा था जहां कुछ लोग बाढ़ से तो बच गए, किंतु पानी से घिर गए। उनके चारों ओर पानी ही पानी था। खाने-पीने का कोई सामान नहीं और सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी।



अब करें तो क्या करें? नदी के किनारे एक झोपड़ी थी जिसमें एक मल्लाह रहता था। उसकी तेरह वर्षीय बालिका थी सरस्वती। उसने जब लोगों को पानी के बीच घिरे देखा तो उससे रहा नहीं गया। उसने अपने पिता से कहा- बापू! नदी के उस पार कुछ लोग रह गए हैं। तुम नदी में नाव उतारकर उन्हें यहां ले आओ।



बेटी के दुस्साहस को देखकर मल्लाह ने कहा- तू पागल हो गई है क्या? तू चाहती है कि मैं मौत के मुंह में चला जाऊं? सरस्वती बोली- बापू! मौत और जिंदगी तो भगवान के हाथ में है, मगर भलाई करना आदमी के हाथ में है। मल्लाह, बेटी की बातें सुनकर हैरान रह गया, किंतु उसकी बात उसने नहीं मानी।



तब जिद करके सरस्वती स्वयं नाव लेकर नदी में उतर पड़ी। उफनती नदी में नाव खेते हुए सरस्वती ने इस पार से उस पार तक कई चक्कर लगाए और कई लोगों के प्राण बचा लिए। अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों का जीवन बचाने वाली उस साहसी लड़की की झोली लोगों ने दुआओं से भर दी।



सरकार ने भी उसे वीरता पुरस्कार से नवाजा, वहीं समाज के लोगों ने भी कई सम्मान समारोह आयोजित किए। सरस्वती इतिहास में अमर हो गई। दरअसल, असली संपन्नता धन-दौलत से नहीं, जनसेवा से प्राप्त यश से आती है। वही सच्चे अर्थो में मानव है, जो दूसरों का हित चिंतन करता है।

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