नई संभावनाओं की राह
आज के अंक के गेस्ट एडिटर : नंदन नीलकेणी
जब से मैंने भारतीय विशिष्ट पहचाना प्राधिकरण के अध्यक्ष का काम संभाला है, मेरा एक अहम लक्ष्य यह रहा है कि बड़ी तादाद में लोग इस प्रोजेक्ट में शामिल हों, इसका हिस्सा बनें। यह बहुत जरूरी है कि देश भर में लोग इस पहल के मकसद को समझें ताकि प्राधिकरण भी इसे लागू करने से पहले उनकी चिंताओं और सवालों को समझ सकें। इसलिए जब मुझे दैनिक भास्कर का अतिथि संपादक बनने का अवसर मिला। मेरे दिमाग में सबसे पहले यह विचार आया कि भारत का सबसे बड़े समाचार समूह एक सही प्लेटफॉर्म होगा आम जनता को यूआईडी को समझाने के लिए। दैनिक भास्कर और उसके पत्रकारों ने 15 छोटे-बड़े शहरों में यूआईडी का सबसे व्यापक सर्वे किया गया। इसके अलावा इस विशेष अंक में आप विशेषज्ञों की राय और पिछड़ें इलाकों की ग्राउंड रिपोर्ट भी पढ़ेंगे।
विशिष्ट पहचान प्राधिकरण का बुनियादी मकसद सीधा-सादा है :
देश में रहने वाले हर नागरिक को एक विशिष्ट पहचान संख्या देना। यह संख्या ऐसी होगी, जो भरोसेमंद होगी, जिसकी नकल करना मुश्किल होगा और जिसकी सेवाएं प्रदान करने वाली संस्थाएं और एजेंसिया आसानी से पुष्टि कर सकेंगी।
हर वह व्यक्ति, जो बैंक खाता खुलवाने, मोबाइल नंबर लेने, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने या संपत्ति की रजिस्ट्री करवाने गया है, वह इस संख्या की उपयोगिता को आसानी से समझ सकेगा। हर काम में भारतीय नगरीक को पहचान की समस्या आती है। वे कौन हैं यह सिद्ध करने में उन्हें कई सारे दस्तावेज देने पड़ते हैं। ज्यादातर दस्तावेज न होने से उन्हें जरूरी सेवाओं से इनकार कर दिया जाता है। ऐसी एक स्पष्ट पहचान, जिससे इन सेवाओं तक पहुंच हो सके, आज भारत में विशेषाधिकार से कम नहीं है।
हमारे देश में मध्यवर्ग को प्राय: अपनी पहचान साबित करने के लिए ज्यादा कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता, क्योंकि उनके पास अपने जन्म और शिक्षा के प्रमाणपत्र, ड्राइविंग लाइसेंस और पैन कार्ड होता है। लेकिन गरीबों के लिए हालात बिल्कुल अलग हैं। वे अक्सर बुनियादी सेवाओं से वंचित रह जाते हैं क्योंकि उन्हें यह साबित करने में बहुत मुश्किलें आती हैं कि वे वही हैं जो अपने को बता रहे हैं। नतीजे की तौर पर हम पाते हैं कि भारत में जरूरी सेवाएं बहुत कम लोगों को मिल पाती हैं और उन्हें लोगों तक पहुंचाने की प्रणाली में तमाम खामियां हैं।
बैंकांे को गरीब नागरिकों का बैंक खाता खोलने में मुश्किल होती है, लिहाजा ये लोग धन की जरूरत पड़ने पर साहूकारं के पास जाने को मजबूर होते हैं, जो उनसे ऊंची दरों पर ब्याज वसूलता है। सरकार भी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ गरीबों तक असरदार ढंग से नहीं पहुंचा पा रही है, क्योंकि वह यह सुनिश्चित नहीं कर पा रही है कि पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) और नरेगा (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) जैसी योजनाओं के माध्यम से दिए जाने वाले लाभ गलत हाथों में पड़े बगैर सीधे गरीब लोगों तक पहुंचें। गरीब लोग जब काम की खातिर एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं, तब नियोक्ता, जमींदार या सेवा एजेंसी के सामने अपनी पहचान साबित करना उनके लिए और भी मुश्किल हो जाता है।
विशिष्ट पहचान संख्या (यूआईडी) के माध्यम से नागरिक अपनी पहचान बताकर और संभवत: अपनी बायोमैट्रिक्स पहचान देकर आसानी से साबित कर सकेंगे कि वे कौन हैं और कहां-कहां रहे हैं। एजेंसियां भी ऑनलाइन सेंट्रल यूआईडी डाटाबेस से संपर्क करके नागरिकों की पहचान की तस्दीक कर सकेंगी। वह भी कुछ सेकेंड में। सेंट्रल यूआईडी डाटाबेस देश में राष्ट्रीय स्तर पर सभी भारतीय नागरिकों की जानकारियों का पहला संग्रह होगा। इसकी कोई नकल नहीं होगी। जब भी भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) किसी नागरिक को विशिष्ट पहचान संख्या जारी करेगा तो सबसे पहले वह उस व्यक्ति की बायोमैट्रिक पहचान के जरिए यह सुनिश्चित करेगी कि वह व्यक्ति यूआईडी संख्या के लिए पहले से ही रजिस्टर तो नहीं है।
पहचान की ऑनलाइन पुष्टि, सभी देशवासियों का एकमात्र डाटाबेस, ये कदम भारत में सरकारी और निजी दोनों एजेंसियों द्वारा दी जाने वाली सेवाओं का चेहरा बदल सकते हैं। इससे वे सारी सुविधाएं गरीबों की पहुंच में होंगी, जो अभी सिर्फ मध्यवर्गीय लोगों को ही सुलभ हैं। मिसाल के लिए बैंक आसानी से खाता खोल सकेंगे जो उस नागरिक की विशिष्ट पहचान संख्या से जुड़ा होगा। ऑनलाइन होने की वजह से नागरिक कहीं से भी अपनी पहचान साबित कर सकेंगे।
सरकार को उन गरीब लोगों तक सहायता पहुंचाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जिनकी जरूरतें थीं रोटी, कपड़ा और मकान। १९९क् में आर्थिक विकास के उड़ान भरते ही देशभर में गरीबों ने पाया कि उनकी बुनियादी जरूरतें पूरी हो रही थीं। अब वे उस बुनियादी ढांचे के निर्माण की अपेक्षा करने लगे, जिनका ग्रामीण इलाकों में अभाव था। अब उनकी मांग थी - बिजली, सड़क, पानी। आज फिर लोगों की आकांक्षाएं बदल गई हैं। आज मांग है - ‘मोबाइल, बैंक खाता और पहचान’।
विशिष्ट पहचान संख्या के बल पर नागरिक अपनी आकांक्षाएं पूरी करने में समर्थ होंगे। सरकारें लोगों की जरूरतों के हिसाब से कार्यक्रम बना सकेंगी। फिर चाहे वह गरीब किसान हो जिसे खाद की जरूरत है, या गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाला परिवार जिसे खाना चाहिए। या फिर छोटा बच्च हो जिसे अच्छी शिक्षा की तलाश है।
विशिष्ठ पहचान संख्या से जुड़ी सेवाओं के जरिए सरकार अपने नागरिकों के साथ ज्यादा कारगर रिश्ते कायम कर सकती है। वहीं नागरिक भी इसके जरिए जरूरी और उपयोगी कार्यक्रमों व योजनाओं तक पहुंच सकते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार के साथ नागरिकों का आदान-प्रदान परिस्थितियों व जरूरतों के मुताबिक अलग-अलग होगा। हो सकता है कि एक छोटे बच्चे को उसकी विशिष्ट पहचान से जुड़े बैंक खाते में सरकार की ओर से धन प्राप्त हो, जिसके साथ कुछ शर्ते जुड़ी हों। मसलन पूरे टीके लगवाने पर इतना धन मिलेगा या स्कूल में हाजिरी पूरी होने पर इतना धन मिलेगा। इस तरह सरकार ज्यादा असरदार तरीके से जरूरतमंद नागरिकों की आकांक्षाएं पूरी कर पाएगी।
विशिष्ट पहचान संख्या हमारे सामने नई संभावना खोल देती है। मानव पूंजी के निर्माण में इसकी संभावनाएं हमारी अर्थव्यवस्था के लिए वरदान साबित होंगी। पिछले एक दशक में भारत ने बाजारों, कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक निवेश को बेहतर बनाने के लिए काम किया है। विशिष्ट पहचान संख्या हमें इस दिशा में एक ऊंची छलांग लगाने का अवसर देती है।
नंदन नीलकेणी, चेयरमैन, यूआईडीएआई



