ससुर ने बहू को दी किडनी
जयपुर
ससुर ने अपनी बहू को किडनी देकर प्रदेश में रिश्तों को नया जन्म दिया है। अब तक बेटी की किडनी खराब होने पर माता-पिता ही पहल करते थे, लेकिन यह संभवत: पहला मौका है, जब ससुर ने बहू को नई जिंदगी दी है। ट्रांसप्लांट आफ ह्यूमन आर्गन एक्ट (१९९४) में संशोधन के बाद भी ऐसा पहली बार हो रहा है, जब किसी नजदीकी रिश्तेदार ने अपने संबंधी को किडनी दान की है। यह मामला इसलिए भी थोड़ा अलग है, क्योंकि किडनी ट्रांसप्लांटेशन के अधिकांश मामलों में महिलाएं ही आगे आती हैं, पुरुषों की संख्या कम होती है।
तीजा (सांगानेर) निवासी रोडवेज ड्राइवर छीतरमल शर्मा की बहू बीना के गुर्दे सूजन से सिकुड़ गए थे। उसे जयपुर के मोनीलेक हॉस्पिटल के नेफ्रोलॉजी विभाग में भर्ती कराया गया। बीना के माता-पिता ने किडनी देने से मना कर दिया। पति का ब्लड ग्रुप मैच नहीं किया और सास भी किडनी नहीं दे सकती थी। ऐसे में ससुर ने किडनी देने का फैसला किया।
मोनीलेक हॉस्पिटल के डॉ. एके शर्मा ने बताया कि जयपुर में ऐसा पहली बार हो रहा है जब किसी ससुर ने बहू को किडनी दान की है।
हर साल 5 हजार किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत
एसएमएस अस्पताल के नेफ्रोलाजी डिपार्टमेंट के हेड एलसी शर्मा ने बताया कि प्रदेश में हर साल पांच हजार लोगों के किडनी ट्रांसप्लांट किए जाने की जरूरत होती है, लेकिन डोनर नहीं मिलने के कारण पचास से ज्यादा लोगों की किडनी ट्रांसप्लांट नहीं हो पाती है।
कानून में संशोधन के बाद बढ़ा दायरा
ट्रांसप्लांट आफ ह्यूमन आर्गन एक्ट (१९९४) में संशोधन के बाद अब दादा, दादी, पोते, पोतियां, चाचा और चाची भी किडनी दान कर सकती हैं। इससे पहले केवल माता-पिता, भाई-बहन और पति-पत्नी ही किडनी दान कर सकते थे। नए संशोधन के बाद अब अंगों की अदला-बदली (क्रास मेचिंग) भी की जा सकती है। अंगों की अवैध रूप से बिक्री के कारण १९९४ के बाद से नजदीकी रिश्तेदारों के अलावा किसी ओर के अंग दान करने पर रोक लगा दी गई थी।



