Friday, Mar 12th, 2010, 2:24 am [IST]  
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danik bhaskarनशे से दूर रहते हैं नीमगांव के लोग

Matrix News

महेश भंवरे & हरदा



लोगों में तेजी से बढ़ती नशे की लत के चलते किसी कोई गांव पूरी तरह से नशे जैसी बुराई से अछूता हो तो यह बात आसानी से गले नहीं उतरती। मगर यह सौ फीसदी सच है। जिले का विश्नोई बहुल ग्राम नीमगांव ऐसा ही एक गांव है, जहां लोग किसी भी प्रकार के नशे से कोसों दूर हैं।

कई और खूबियों के कारण यह गांव अपने आप में विशिष्ट है। यहां प्रत्येक घर में रोज अग्निहोत्र होता है। कोई भी व्यक्ति नील का किसी काम में उपयोग नहीं करता। गांव की बसाहट से लेकर अभी तक यहां अन्य पेड़ों की तुलना में नीम के पेड़ अधिक है इसलिए भी इसका नाम नीमगांव पड़ा ऐसा कहा जाता है। गांव के बुजुर्ग ऐसा बताते हैं कि करीब २५० साल पहले विश्नोई समाज के लोग राजस्थान से यहां आकर बसे थे। १९१४ में जम्भेश्वर मंदिर निर्माण का शिलान्यास हुआ। १९२६ में यह बनकर तैयार हुआ। १९५९ में भोपाल संभाग में इस गांंव को आदर्श गांव घोषित किया गया। १९६५ में यहां पहला नसबंदी शिविर लगा। क्षेत्र में व्यापक पैमाने पर पौधरोपण किया गया। पलासनेर के पास नहरों निर्माण तथा सड़क के लिए लोगों ने श्रमदान किया।

क्या है खास

करीब १३०० की जनसंख्या वाले नीमगांव में ८० विश्नोई परिवार हैं। ये लोग खुद तो दुव्र्यसनों से दूर हैं साथ ही इन परिवारों के खेतों मेें काम करने वाले मजदूर भी इस बुराई से दूर हैं। यहां का डे्रनेज सिस्टम लोगों ने इस तरह मेंटेन किया है कि घरों का पानी सामने सड़क पर या नाली से बाहर नहीं बहता है। बरसात शुरू होने से पहले सभी लोग कीचड़ से बचाव के लिए भी अपने, अपने स्तर पर इंतजाम कर लेते हैं। नील का उपयोग घरों की पुताई और कपड़ों पर करना भी वर्जित है। हर घर में नियमित अग्निहोत्र एक परंपरा बन चुकी है। अमावस्या पर यहां के जम्भेश्वर मंदिर में सामूहिक रूप से हवन किया जाता है। गांव की परिधि में अभी विभिन्न प्रजातियों के पेड़ लगे हैं। इनमें सबसे अधिक संख्या नीम केेपेड़़ोंं की हैै। इस मामले में स्थिति यह है कि वैसे तो हर घर में नीम जरूर दिखाई देगा। कुछ घरों में नीम के बजाय दूसरे पेड़ हैं तो पड़ोस के ही घर में दो से तीन नीम आसानी से देखे जा सकते हैं। यहां के लोग पर्यावरण के प्रति बेहर गंभीर हैं। पौधरोपण के समय नीम के पौधों को प्राथमिकता दी जाती है।

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