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Tuesday, Mar 16th, 2010, 1:10 am [IST]  

danik bhaskarकचरा प्रबंधन है आधुनिक समय की मांग

भास्कर न्यूज& सोनीपत

डीसी अजीत जोशी ने प्लास्टिक इंजीनियरिंग व टेक्नोलाजी से जुड़े सभी वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों, अन्वेषकों तथा संबंधित स्वैच्छिक संगठनों का आहवान किया है कि वे प्लास्टिक बैगस कल्चर का सही विकल्प तैयार करें ताकि पोलिमोर प्लास्टिक के कारण भूमि की उर्वरा शक्ति पर कुप्रभाव न पड़े तथा पोलीथिन की थैलियों के कारण ड्रैनेज प्रणाली को अवरूद्ध होने से भी रोका जा सके।

डीसी जोशी सोमवार को दीनबंधु छोटूराम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मुरथल में प्लास्टिक्स रीसाईकलिंग तथा वेस्ट मैनेजमेंट इन द कन्ट्री नामक सेमिनार को विशेष अतिथि के रूप में सम्बोधित कर रहे थे। इस सेमिनार का आयोजना सीपेट द्वारा प्लास्टिक की री-साइकिलिंग तथा वेस्ट मैनेजमेंट को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया था। जोशी ने कहा कि अनेक प्रकार के ठोस कचरों का प्रारूप बदलने के लिये कुशल प्रबंधन बेहद जरूरी है। इसके लिये ठोस प्रकार के कचरे का वर्गीकरण करके उसे अलग-अलग करके पुन: सदुपयोग में लाने के लिये उच्च क्षमता तथा क्वालिटी की तकनीक का विकास तथा उसे लागू किया जाना बेहद जरूरी है।

सीपेट के महानिदेशक प्रोफेसर डा. एसके नायक ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक्स की री-साइकिलिंग तथा वेस्ट मैटीरियल के कुशल प्रबंधन के लिये सेन्ट्रल इंस्टीटयूट ऑफ प्लास्टिकस इंजीनियरिंग एंड टेकनोलॉजी (सीपेट) द्वारा गोहाटी में 7.9 करोड़ रुपये की लागत से एक प्लास्टिक्स वेस्ट मैकेनिकल रीसाईकलिंग प्लांट की स्थापना की गई है। जिसमें लगभग 40 विद्यार्थी इस समय प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। सीपेट के महानिदेशक प्रोफेसर नायक ने कहा कि सीपेट द्वारा निकट भविष्य में प्लास्टिक्स की प्रोसेसिंग तथा रीसाइकिलिंग के अनेक प्लांट स्थापित करने की योजना विचाराधीन है। हम पोलिमोर प्लास्टिक के बहुआयामी लाभों की तरफ ध्यान दें तो आज भारत में 6 मिलियन टन पोलिमोर की खपत है, जबकि वैश्विक स्तर पर खपत का कुल स्तर 200 मिलियन टन है।

सीपेट महानिदेशक प्रोफेसर नायक ने पोलिमोर प्लास्टिक तथा इससे संबंधित उत्पादों की महत्ता पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डालते हुए यह चिंता भी व्यक्त की कि दिन-प्रतिदिन प्लास्टिक पोलिमोर के मानव जीवन में उपयोग के दृष्टिगत प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट की तरफ ध्यान देना समय की ज्वलंत मांग है।

सीपेट महानिदेशक प्रोफेसर नायक ने सेमिनार में यह भी रहस्योदघाटन किया कि देश में जितना भी शहरी ठोस कचरे का उत्पादन होता है उसमें से शहरी क्षेत्रों में प्लास्टिक वेस्ट केवल 4 प्रतिशत के लगभग है। प्रोफेसर नायक ने विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक्स के सदुपयोग की वकालत करते हुए यह भी कहा कि यद्यपि गलास पेपर, लकड़ी तथा धातु जैसी अनेक वस्तुएं प्लास्टिक्स के विकल्प के रूप में मौजूद हैं लेकिन यह भी ध्यान में रखना होगा कि एक टन कागज के उत्पादन के लिये औसतन 10 से 17 वृक्षों का कटान करना पड़ता है जोकि पर्यावरण की दृष्टि से बेहद हानिकारक है।

दीनबंधु छोटूराम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मुरथल के वाइस चांसलर एचएस चहल ने कहा कि हरियाणा सरकार ने इस वर्ष सीपेट के हरियाणा स्थित सिवाह संस्थान का वार्षिक बजट 10 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 18.25 करोड़ रुपए करके प्रांत में प्लास्टिक्स इंजीनियरिंग तथा टेक्नॉलाजी को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है। इतना ही नहीं, विश्वविद्यालय परिसर में सीपेट के संस्थान की स्थापना के लिए

अलग से 10 एकड भूमि का प्रावधान किया गया है।

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