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  • September 3, 01:56
     
    कहीं-कहीं, थोड़ी-घणी अब धूप दिखाई देती है। लंबी बारिशी मुश्किलों के बाद टुकड़ा-टुकड़ा ही सही, धूप अच्छी लगती है। अच्छा लगता है शहर के एक कोने में पालथी मारे बैठा वो टीला। दिन में जाने कितने रूप बदलता है। सुबह धूप माथे पर पड़ती है तो तिलकधारी साधू। धूप ढले फिर लगता है-...
     

  • September 3, 12:15
     
    जिंदगी कहीं पहुंचकर खत्म नहीं होती। जिंदगी थमती भी नहीं है। हां, यह निरंतर बदलती रहती है। हम गौर करें तो पाएंगे कि रोजाना असंख्य लोग मरते और पैदा होते हैं। न किसी के आने से, न किसी के जाने से दुनिया का कार्य-व्यापार रुकता है। यदि हमारा कोई करीबी चला जाता है, तो हमें दुख...
     

  • September 1, 04:55
     
    वह गणित में अक्सर शून्य नंबर लाता था। मेरा दोस्त। पर अब पकी उम्र में उसका जोड़-बाकी पक्का हो गया लगता है। पिछले दिनों उसने एक हिसाब समझाया। मैं चकरा गया। बोला- ‘घर में भी पिता पर हजार रुपए से ज्यादा ही खर्च हो जाते थे। वृद्धाश्रम में भी इतना ही दान देना पड़ रहा है।...
     

  • August 31, 02:00
     
    भरपूर उफनते इस बांध को 1981 में ही देखा था। उसके बाद भी कई बार रामगढ़ बांध की पाल से पानी के विस्तारित रूप को देखने के अवसर मिले। तब भी, जब एशियाड की नौकायन प्रतियोगिता के लिए इसका चयन किया गया था और खेलों के माध्यम से रामगढ़ बांध को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली थी। मेरे मन...
     

  • August 30, 12:09
     
    जीवन को लोग अपनी तरह से परिभाषित करते रहते हैं। कोई इसे एक चुनौती मानता है, तो कोई खेल। किसी के लिए जीवन इतना दूभर होता है कि वह इसे जीना ही नहीं चाहता, तो कोई जीवन के आनंद में इतना अधिक रम जाता है कि उसे जीने के सिवाय और कुछ सूझता ही नहीं। वास्तव में जीवन जितना अधिक सरल...
     

  • August 29, 05:45
     
    फैज अहमद फैज के अल्फाज- बोल के लब आजाद हैं तेरे, बोल जबां अब तक तेरी है- हर उस शख्‍स को ताकत देते हैं, जो बोलने की आजादी पर यकीन रखता है, जो लोकतंत्र पर विश्‍वास रखता है। लेकिन इन दिनों यही लब जहर उगल रहे हैं। नफरत की बाढ़ में खास समुदायों को निशाने पर लिया जा रहा है। कुछ...
     

  • August 28, 05:56
     
    यह तेरा है। यह मेरा। चल मिट्टी खोद..ध्यान से..चारों ओर से। जड़ से उखाड़ना। बुद्धिप्रकाश ने कृष्णबिहारी से कहा। उत्तर में कृष्ण ने कहा कि हां भई, इस बात का ध्यान तो रखना ही होगा, नहीं तो यह पौधा नई जगह पर जम कैसे पाएगा! बुद्धि ने बीच में टोकते हुए पूछा, ‘इसे लगाने के लिए...
     

  • August 27, 12:42
     
    विनम्र आलोचक नए लेखक की तरह सादर समालोचना करता है, जो कुछ इस तरह हो सकती है-महोदय, आपकी बेहद रचनात्मक स्तरहीन और सपाट रचना को पढ़कर मेरा मन उत्साह से भर उठा। आप कह सकते हैं कि झूमने वगैरह भी लगा। उत्साह से इसलिए भरा कि आपकी इस अकेली रचना ने ही लेखन का सपना देखने वाले...
     

  • August 22, 12:08
     
    बिजली संकट को लेकर हाल ही में देश ने जबरदस्त हायतौबा देखी। ऐसा लगता है कि इसकी जड़ विद्युत उत्पादन, पारेषण व वितरण व्यवस्था में है। इस लिहाज से गुजरात की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में काफी अलग है। विद्युत उत्पादन, पारेषण एवं वितरण तीनों मोर्चो पर प्रशासनिक एवं...
     

  • August 17, 02:10
     
    राजस्थान के एक सुदूर गांव का एक लड़का बीबीसी सुना करता था। पूरी दुनिया के देशों के नाम उसकी जुबान पर रहते थे। जब बाकी लोग कोलकाता, मुंबई या दिल्ली देखने की बात करते थे, वह टोक्यो या लंदन घूमने के इरादे जताया करता था। दोस्त देखते और हंसते। दसवीं कक्षा में वह जिला...
     

  • August 15, 12:10
     
    गांव के एक काका की याद आ रही है। रिश्तेदारी का ख्याल नहीं। शायद पुरखों की पट्टीदारी का कोई छोर जुड़ता होगा उनसे, पर हम सब उन्हें काका, यानी बड़े चाचा के बतौर ही जानते-पहचानते और मान देते। काका का असल नाम भी याद नहीं पड़ता। बच्चे-बड़े सब उन्हें मनमौजी कहते। मनमौजी का...
     

  • August 14, 06:26
     
    गांव छोटा था। सब एक-दूसरे को जानते थे। मनोरंजन के साधन इतने सीमित थे कि कभी-कभी बिजली के तारों के जरिए भी मनोरंजन करना पड़ता। यानी जले हुए ट्रांसफॉर्मर से तार निकालना और उनसे कुछ बनाना। सबकुछ आनंद के लिए। बुद्धू बक्से के नाम पर महज पटवारी का टीवी। दोस्ती करो तो...
     

  • August 13, 12:56
     
    तुम कहां चले गए? इतना ढूंढ़ा मैंने तुम्हें, लेकिन तुम मिले ही नहीं। यह आसमान बहुत विशाल है। शायद तुम मुझसे लुका-छिपी खेल रहे हो। बड़ा मजा आता है न तुम्हें मुझे परेशान करने में! आज भी घटा बहुत है। लगता है बादल तो आज फिर जमकर बरसेंगे। लेकिन अब तो बस रौद्र रूप वाले गहरे काले...
     

  • August 11, 12:03
     
    आजकल घर-परिवार के किस्से आम हो रहे हैं। किस्से तो किस्से, झगड़े भी नहीं छुप रहे हैं। पहले ऐसा नहीं होता था। घर की बात घर में ही रहती थी। पड़ोसियों के यहां पहले भी ताकाझांकी होती थी, लेकिन मजाल कि कोई राज पता चल जाए। इज्जत का लिहाज होता था। शर्मो-हया भी कोई चीज थी। एक...
     

  • August 10, 12:31
     
    बारिश के दिनों में पुल की रैलिंग को ध्वस्त कर बहता पानी, किसी बस्ती में हाहाकार मचाता जल प्रलय.. यह वही पुल है, जिससे गर्मियों में नीचे की ओर झांकने पर बस सूरज की रोशनी में चमचमाती रेत ही नजर आती है। यह वही बस्ती है, जहां पानी की चंद बूंदों की खातिर अक्सर खून की नदियां बह...
     
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