विज्ञापन
 
 
 
 
 
<< Prev 1 2 3 4 5 6 7 8
 

  • August 9, 12:50
     
    कस्बे में कोई भी बात बहुत जल्दी फैल जाती है। फिर मामला यदि हत्या का हो तो समझो बच्चे-बच्चे को पता चलना ही है। बच्चों के मुंह से ही मुझे उस घटना का पता चला था। उस दिन शहर से घर पहुंचा ही था कि भैया की गुड़िया पिंकी को स्कूल छोड़ने का काम मेरे हिस्से में आ गया। स्कूल में...
     

  • August 8, 12:22
     
    पिछले महीने संस्था द्वारा आयोजित एक साप्ताहिक प्रशिक्षण कार्यक्रम में जाना हुआ। वहां पर एक दिन ‘टाइम रॉबर’ जैसे अनूठे टॉपिक पर चर्चा की गई। ‘टाइम रॉबर’ यानी समय के डकैत। जीवन में कहीं न कहीं हम सबका इनसे वास्ता पड़ता है। इनकी पहचान बहुत ही मुश्किल होती है। जिसने भी...
     

  • August 7, 06:28
     
    हमेशा से कहा जाता है, बेटी तो पराया धन है। ‘पराये’ शब्द पर हम क्यों इतना जोर डालते हैं। बार-बार दोहराते हैं तो बिना किसी चोट के असहनीय दर्द का अहसास होता है। हमें ही नहीं, बेटी के निर्मल-कोमल मन को भी ठेस पहुंचती है। परायापन-सा लगता है उसे। वह समझती है कि क्या मैं दया की...
     

  • August 6, 06:30
     
    सुबह शहर में मिली एक अज्ञात लाश। हाथ में लिखा था नाम - रामखिलावन। इस तरह उस (पार्थिव) शरीर को नाम मिला। फिर हुआ पोस्टमार्टम और जैसा कि होता है, शाम से पहले ही फूंक-फांक के नक्की कर दिया। कोई बड़ा आदमी होता तो धरे रहते लाश मुर्दाघर में। बस यही सस्पेंस रहा कि कौन था...
     

  • August 4, 01:40
     
    हमें चाहे कुछ और आता हो या नहीं, लेकिन ख्याली पुलाव पकाने में हम अव्वल हैं। हमारी यह खासियत सच्चे भारतीय होने के नाते खिलाड़ी भी जानते हैं और नेता तो उसमें विशेषज्ञ की भूमिका निभाने वाले हैं। ओलिंपिक खेल वैसे तो कहलाते ‘समर गेम्स’ हैं, लेकिन हमारे लिए ये अक्सर बरसात...
     

  • August 2, 01:16
     
    गांव के बस अड्डे से हमारे पुश्तैनी मकान की दूरी लगभग 2 किमी है। मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में मिलने वाले अधिकतर बिंब मुझे बस अड्डे से घर पहुंचते-पहुंचते गांव में मिल जाते थे। कुम्हार के चाक, लुहारों के हथौड़ों की सधी आवाजें, बैलगाड़ी की चर्र-मर्र, कुएं पर पनिहारिनों की...
     

  • August 1, 12:08
     
    हर बार औरतें ही दया की पात्र नहीं होतीं, कभी-कभी पुरुषों के हाल पर भी मन व्यथित हो जाता है। लंबे समय से मिस्टर परेशान (हमने उनका यही नाम रखा है) की गतिविधियों ने आखिरकार पुरुषों के लिए बंधी- बंधाई सोच को डगमगा दिया। जिस तरह पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं, उसी तरह महिला...
     

  • July 31, 06:34
     
    ऋतु वर्णन के कवियों के मुताबिक ऋतुएं अर्थात मौसम छह होते हैं - ग्रीष्म, पावस, शिशिर, शरद, हेमंत और वसंत; पर आम आदमी की बोली और मान्यता मंे तीन ही मौसम होते हैं- सर्दी, गर्मी तथा बरसात। अपनी-अपनी कहने और समझने की बात है। कोई चार मौसम मानता है- पतझड़, सावन, वसंत और बहार; यानी...
     

  • July 30, 12:19
     
    एक सफर के दौरान जब रास्ते में हमारी बस रुकी तो चाय की बड़ी तलब हो रही थी। अखबार हाथ में लेकर कोने में रखी बेंच पर बैठकर मैं चाय की चुस्कियों के साथ मौसम का आनंद ले रहा था, तभी एक छोटे-से बच्चे की आवाज से मेरा ध्यान टूटा। उस बच्चे की मां उसे कुछ खिलाने की कोशिश कर रही थी और...
     

  • July 28, 12:16
     
    जिस बात का डर था, वही हुआ। अन्‍ना हजारे के आंदोलन से लोग विमुख होने लगे हैं। जंतर-मंतर से नदारद भीड़ तो यही इशारा कर रही है। आंदोलन से जुड़े लोग इसका सारा दोष मीडिया पर मढ़ रहे हैं। कहा जा रहा है कि मीडिया बिक चुका है, कॉपरेरेट के दबाव में है, इसलिए अन्‍ना के आंदोलन को कवर...
     

  • July 27, 01:06
     
    आधुनिकता की गलियों में भांति-भांति के सामान, कोलाहल, आपाधापी और चकाचौंध में जीवन कब और कहां खो जाता है, इसका आभास तक नहीं होता। हम अपनी मंजिल की ओर अंधाधुंध तरीके से दौड़ रहे हैं। जाहिर है तेज रफ्तार की कीमत भी चुकानी होती है। न हमें अपनी सुध है, न दूसरों की संवेदनाओं...
     

  • July 26, 12:08
     
    संसार में एक-एक कण का निर्माण किसी उद्देश्य को लेकर ही हुआ है। हम भी इसी निर्माण की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। हम यह कदापि न सोचें कि इस जीवन में हमारा कोई उद्देश्य ही नहीं है। ईश्वर ने जब हमें इस पृथ्वी पर भेजा है, तो हमें कुछ जिम्मेदारी भी सौंपी है। इस संसार में कभी भी कोई...
     

  • July 24, 01:03
     
    ‘आज भी अधिकांश कलयुगी भक्त ही आए’, प्रभु के सामने मन्नत के धागे वाले प्रभारी ने अरज किया। वैसे ऊंची पहाड़ी पर मंदिर है। बड़ी मान्यता है। मुरादें पूरी होती हैं। साल में जब मेला लगता है तो सैकड़ों लोग उमड़ आते हैं। रोजमर्रा में 20-25 लोग तो चले ही आते हैं। मंदिर के सामने...
     

  • July 22, 11:54
     
    वामपंथी अतिवादिता या कहें कि नक्सल/माओवादी हिंसा आज राष्ट्र के समक्ष एक बड़ी चुनौती है। इससे निपटने में हमें थोड़ी-बहुत सफलता तो मिली है, मगर अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है। देखा जाए तो नक्सलवाद ‘सुरक्षा’ के साथ-साथ ‘राजनीतिक’ और ‘विकास’ का भी मसला है। इस लड़ाई को हम...
     

  • July 21, 02:00
     
    नाक को आप तारीफ की हकदार कहेंगे या तमाम विवादों की कसूरवार? दरअसल, यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि दोनों ही मसलों से आए दिन हम सभी दो-चार होते रहते हैं। नाक को दूसरे अर्थो में आदमी की इज्जत और अकड़ से भी जोड़कर देखा जाता है। ऊंची नाक वाला यानी अकड़ रखने वाला। और नाक...
     
<< Prev 1 2 3 4 5 6 7 8
 
 
 
 
विज्ञापन
 
विज्ञापन
 

बड़ी खबरें

 

रोचक खबरें

 

बॉलीवुड

 

जीवन मंत्र

 

क्रिकेट

 

बिज़नेस

 

जोक्स

 

पसंदीदा खबरें