

भास्कर ब्लॉग. .वैसे एक फिजूल-सी सोच है ये, लगभग बकवास ही मान लें..एक पेड़ था, नन्हा-सा! आलीशान घरों की उस कॉलोनी में...
भास्कर ब्लॉग. . . इस धरती पर शायद ही कोई होगा जिसके मन में कोई सपना नहीं पलता हो। एक विचार तो यह भी कहता है कि होश...
भास्कर ब्लॉग.. पुलिस की दनदनाती पिकअप वैन, सायरन की आवाज, पड़ोसी का रुंधे गले से जोर-जोर से विलाप और एक ही शब्द को...
भास्कर ब्लॉग. . फेसबुक से बहुत-से लोग दुखी हैं। इसलिए कि इस बला ने उनके अपनों को वचरुअल दुनिया में उलझा दिया है। वे...
भास्कर ब्लॉग. . अक्सर विवाह के प्रस्ताव आने पर लड़के और लड़की के घरवाले उनकी कुंडलियों का मिलान करते हैं। जिसके भी 36 के आस-पास के गुण मिल जाते, उनकी जोड़ियों को पंडित की हरी झंडी मिल जाती और जिसके पूरे 36 गुण मिल जाते, उसे तो पंडितजी की तरफ से भगवान द्वारा बनाई गई श्रेष्ठ जोड़ी का खिताब ही मिल जाता। मगर क्या सचमुच कुंडली में मिलने वाले 36 गुण इस बात की पुष्टि करते हैं कि अमुक जोड़ी की...
भास्कर ब्लॉग. . ‘को खां, कां जा रिए हो, पिचान नईं रए क्या?’ कोई आपको दुनिया के किसी भी शहर में ऐसा कोई जुमला बोलता सुनाई दे, तो आप समझ जाएंगे कि वो भोपाली है। बंबइया सिनेमा की सर्वाधिक मकबूल और पॉपुलर फिल्म ‘शोले’ के कभी न भूलने वाले किरदारों में से एक सूरमा भोपाली आपको भी याद होंगे ही।
सिल्वर स्क्रीन पर कई-कई फिल्मों में अलग-अलग कैरेक्टरों की जुबान से सुनी जा चुकी भोपाली बोली इन...
भास्कर ब्लॉग. .जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो लोग उसके घर जाकर मातमपुर्सी करते हैं कि शोकाकुल परिजनों का दुख बंट जाए। खुशी, गम और भोजन बंटे तो सुख की अनुभूति होती है। बहुत कम लोग होते हैं, जो जीवन के हर पहलू को आनंद के साथ जीते हैं, चाहे वह दुख की ही घड़ी क्यों न हो। लेकिन ऐसा वाकया याद नहीं आता कि मौत के मातम को खुशी में तब्दील कर दिया गया हो।
ऐसा एक उदाहरण हिमाचल प्रदेश की...
भास्कर ब्लॉग. . एक मित्र एक प्रसिद्ध मंदिर में दर्शनार्थ गए। दर्शन-परिक्रमा के बाद जब वे प्रसाद लेने पुजारी के पास पहुंचे, तो पुजारी ने पूछा - आपके बच्चे कितने हैं? मित्र ने पास खड़ी दो बेटियों की ओर इशारा किया। पुजारी बोले - अच्छा, फिर तो भगवान से बेटे के लिए कामना कीजिए, आशीर्वाद लीजिए!
यहां मित्र की प्रतिक्रिया और पुजारी की राय पर बात करना जरूरी नहीं, क्योंकि यही है लड़की-लड़के को...
भास्कर ब्लॉग. . भारत का सिनेमा अपने सौवें बरस में प्रवेश कर चुका है, लेकिन हमारी सिनेमाई संस्कृति में पसरी लाभवाद की प्रवृत्ति को देखकर फिल्म निर्माण के हमारे एक सदी के अनुभव पर संदेह होता है। माना जाता है कि अनुभव में कच्चे होने के कारण हम छोटी उम्र में गलतियां करते हैं। बढ़ती उम्र के साथ परिपक्वता आती है, लेकिन भारतीय सिनेमा के इन गुजरे सालों को देखें तो मामला इससे उलट ही नजर आता...
भास्कर ब्लॉग. . हैं तो वे मूलत: हमारे पुराने मित्र। ऊपर से संवेदनशील हैं। स्वाभाविक है इंसान हैं तो होंगे ही.. जब-तब भावनाओं में बह जाते हैं। हर राष्ट्रीय मुद्दे पर उद्वेलित हो जाते हैं। कांपने लगते हैं। ज्यादा गुस्सा हो जाते हैं तो खांसने भी लगते हैं। ‘हैं जी! क्यों होगा जी! देश गर्त में न गिर जाए जी!’ टाइप की पितातुल्य बातें करते हैं।
फिर मुद्दों और समस्याओं को काफी गहराई में...
भास्कर ब्लॉग. . शमशेर की एक कविता है, ‘कब आएंगे हाथों के दिन’। आज हाथों के दिन तो हमारे करीब हों या न हों, पर मासूम हाथों के दिन अभी तक सवालिया निशानों से घिरे हैं। वे आज भी शिवाकाशी में पटाखों से झुलसते हैं, खड़िया मिट्टी का काम करते हुए अपने हाथों को गला रहे हैं, बीड़ी बनाते हुए तंबाकू की जहरीली गंध को अपने नथुनों में पाल रहे हैं या फिर नरम कालीन बनाते हुए अपने हाथों को कठोर कर रहे हैं।...
ऋषिकेश में आधी रात का चांद पहाड़ों की परछाइयों के बीच कैद था। दूर गंगोत्री से बहकर आ रही गंगा वसंत में भी थकी-थकी लग रही थी। रामझूला दिन की हलचल से मुक्त होकर फिलहाल अकेला था। मैं रोज रात को इस वक्त पुल पर कुछ देर उसका साथ देने चला आता था।
उस रात भी चारों तरफ खामोशी पसरी थी। बेठिकाने लोग गंगा तट की ठंडी और मादक हवा का आनंद लेते घाट किनारे सो रहे थे। इतनी रात गए सिर्फ आवारा कुत्ते और...