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  • हमारे घरों में मौजूद असमानता का भारत
    हमारे शहरी मध्यवर्गीय घरों में एक असमानता का शिकार भारत मौजूद है। यही पर परिवार के बच्चे असमानता का सबक सीखते हैं। घरों में काम करने वाले एकमात्र ऐसे वयस्क हैं जिन पर वे हुकुम चला सकते हैं और उन्हें नाम लेकर पुकार सकते हैं। एक असाधारण उपन्यास हेल्प ने मेरा दिल छू लिया है। इसे कैथरीन स्टाकेट ने लिखा है और यह 1962 के अमेरिकी राज्य मिसिसीपी के एक छोटे शहर में घरों में काम करने वाली महिला के बारे में है। नस्लीय भेदभाव और अलगाव खत्म करने के लिए अमेरिका को हिला देने वाले आंदोलन ने तब तक दक्षिण की इस...
    July 19, 06:32 AM
  • जुल्म की एक दास्तान जो भुला दी गई
    कश्मीर में सेना की एक टुकड़ी के जवानों ने महिलाओं से ज्यादती की, लेकिन अब तक किसी को दंड नहीं मिला। स्वतंत्र भारत के संभवतया इस पहले सबसे बड़े सामूहिक हिंसक यौन शोषण के मामले में अगले 11 साल तक कुछ नहीं हुआ। सरकारें आईं और गईं। लेकिन किसी बड़े राजनेता को इन पीड़ित लोगों तक पहुंचने का समय नहीं मिला। २३ फरवरी 1991 की रात, कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में हिमाच्छादित गांव कुनन पोशपारा में लोग घरों के भीतर, कांगड़ियों से खुद को गर्म रख रहे थे या रजाइयों में दुबके थे। शांत रात का सन्नाटा अचानक दरवाजे पर...
    July 3, 07:59 AM
  • घृणा और हिंसा के बीच सद्भाव की आवाज
    इंजीनियर को भारत में समाज सुधारकों की एक लंबी परंपरा विरासत में मिली थी, जिनमें गांधी और मौलाना आजाद भी शामिल थे। वे भीतर से एक साथ गहन धार्मिक और पक्के धर्मनिरपेक्ष भी थे। देश एक बार फिर साम्प्रदायिक रूप से विभाजनकारी सार्वजनिक बहस की ओर बढ़ रहा है। अगले साल आम चुनाव तक ऐसी बहस चलती रहेगी। ऐसे समय में, हमें समाज सुधारक और विद्वान असगर अली इंजीनियर की शांत और सौम्य आवाज याद आती है, जो कुछ समय पहले हमें छोड़ गए। कई दशकों तक संघर्ष और व्यापक हिंसा के समय में उनकी संवेदना और तर्कभरी सधी हुई आवाज...
    June 19, 07:22 AM
  • कानून के शासन से ही लोकतंत्र बचेगा
    सांप्रदायिक दंगों के मामलों में राजनेताओं सहित सभी दोषियों को दंड मिलने से हिंसा रुकने का रास्ता खुलेगा। न्याय पाने की उम्मीद भी लुटा चुकेलोगों की सारी नजरें अब कुछ बड़े दिग्गज परीक्षण मामलों पर टिकी हैं, जिनमें सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर जैसे वरिष्ठ राजनेता शामिल हैं। लोग मानते हैं कि इन्होंने नरसंहार करने वाली भीड़ का नेतृत्व किया था। जिला जज आर्यन ने जैसे ही कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को बरी करने का फैसला सुनाया, कोर्ट केभीतर बुरी तरह रोने की आवाजें आने लगीं, जो बाहर के लोगों में...
    June 7, 08:45 AM
  • सेवा और दान की जीवंत परंपरा
    भारतीय मध्यम वर्ग और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लोग आज अपने आसपास बढ़ रहे अन्याय और दुख-दर्द से बेपरवाह होते बढ़ रहे हैं। वे देने के पुराने तरीके भूल चुके हैं और उन्होंने नए तरीके अभी तक सीखे नहीं हैं। मीरा प्रसाद दीवान ने अपनी नई फिल्म गुर प्रसाद : द ग्रेस ऑफ फूड में लयबद्ध सौंदर्य और विवरण की समृद्ध बुनावट के साथ ग्रामीण पंजाब में समुदाय द्वारा देने की एक जीवंत परंपरा को रिकॉर्ड किया है। यह सौम्य फिल्म अभी भी हममें से प्रत्येक को चुनौती दे रही है, अपने भीतर छिपी देने और देखभाल करने की...
    May 29, 12:10 AM
  • बच्चों, बेसहारा लोगों की अनदेखी
    प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक लागू होने के बाद देश में सदियों से चली आ रही भुखमरी खत्म होने में मदद मिलेगी। किसी भी कानून को बनाते समय सब कुछ उसके प्रावधानों के दस्तावेजी स्वरूप पर निर्भर करता है। गरीब बच्चों, महिलाओं की भलाई के लिए कानून निर्माताओं को इस तथ्य का ध्यान रखना होगा। यह दुख की बात है कि बजट सत्र के दौरान संसद में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक पर बहस नहीं हो सकी और उसे पारित नहीं किया जा सका। एक देश जहां सदियों से भीषण अकाल पड़ते रहे हों, जहां २क् करोड़ से अधिक व्यक्ति भुखमरी...
    May 21, 08:39 AM
  • पंजाब में एक हताश पीढ़ी का भटकाव
    वह महज बीस साल की है : पतली-दुबली, पीली, भावशून्य और विचारहीन आंखें, छोटी सी दुखभरी जिंदगी के अंत या उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती। जब वह बच्ची थी उसके पिता नशे की भेंट चढ़ गए। उसकी मां को पिता के छोटे भाई के साथ शादी करने को मजबूर कर दिया गया। वह भी नशे का आदी हुआ और कुछ साल बाद चल बसा। उसका भाई उससे कुछ ही साल बड़ा था। वह किशोर होने से पहले ही बाप की तरह व्यवहार करने लगा था। उसकी मां ने 17 की होते ही उसकी शादी कर दी। लेकिन जल्द ही इस लड़की को पता चल गया कि उसका पति भी नशा करता है। अमृतसर शहर के मकबूलपुरा...
    May 11, 07:55 AM
  • गरीबी और भुखमरी का कुटीर उद्योग
    भारत सहित दुनियाभर में गरीबी और भुखमरी पर अर्थशास्त्री, पोषण विशेषज्ञ और जनयोजनाकार अथक मेहनत से लंबी-चौड़ी बहस करते हैं। जिनसे पन्ने के पन्ने भर जाते हैं। लेकिन मैं समझता हूं कि गरीबी और भुखमरी से संघर्ष कर रही जनता से इनका दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता। वह इनकी गहन, जटिल, तीखी, कभी कभी अपारदर्शी गणना वाली, धारणा, बहस और निष्कर्ष को बमुश्किल समझ पाती है। वह इनमें दुनियाभर में छंटनीग्रस्त लोगों के प्रति अन्याय व वंचितों के संघर्ष की सही झलक नहीं पाती। उनके और प्रियजनों के रहने, खाने का इंतजाम...
    April 25, 08:12 AM
  • नौकरशाही के इस्पाती ढांचे में जंग लगी
    स्वतंत्रता के ठीक बाद के दशकों में जबकि आदर्शवादिता का प्रभाव बरकरार था, सिविल सेवा की ईमानदारी और राजनीतिक निष्पक्षता में लोगों का विश्वास भी काफी हद तक बरकरार था। लोक सेवा में उच्च पदों पर आसीन लोगों का सामाजिक चरित्र संभ्रांतवादी था, लेकिन उन्हें अल्पसंख्यकों और गरीबों के प्रति सहिष्णु माना जाता था। विकासवादी गतिविधियों में उनकी सहभागिता कम थी, लेकिन सांप्रदायिक हिंसा जैसे हालात और भूमि सुधार जैसे समानतावादी कानूनों के क्रियान्वयन में आमतौर पर उनकी भूमिका काफी हद तक निष्पक्ष होती...
    April 2, 02:18 AM
  • सभी बेबस गरीब पेंशन के हकदार
    मैं देश के हर हिस्से में स्थित गांवों में जाता हूं और पूछता हूं कि सबसे ज्यादा गरीब और असुरक्षित कौन है तो जवाब हर बार एक जैसा ही मिलता है। हर जगह वृद्ध, अकेली महिला और उन पर निर्भर परिवार के सदस्य तथा शारीरिकरूप से अक्षम लोगों का नाम सामने आता है। ये वे समूह हैं जो हर समय भुखमरी की कगार पर होते हैं। शहरी इलाकों की झुग्गियों में भी इन्हीं समूहों के नाम सामने आते हैं, हालांकि यहां बेघर और बिना अभिभावक के बच्चों का परिवार भी इस सूची में शामिल हो जाता है। उन लोगों के लिए जीवन और भी मुश्किल होता है, जो एक...
    March 23, 02:19 AM
  • बदहाल गांव और शहरों में बढ़ती भीड़
    अभी चार साल भी नहीं हुए जब मेरा दोस्त नरेन ब्रेन ट्यूमर के चलते दुनिया को अलविदा कह गया, लेकिन जीते जी ही नहीं, मृत्यु में भी वह मुझे मानवीय अच्छाइयों की शिक्षा देकर गया। करीब पच्चीस साल पहले की बात है जब बैंक की नौकरी से इस्तीफा देकर नरेन अपनी पत्नी उमा शंकरी और दो बेटियों के साथ आंध्र प्रदेश के चित्तूर में स्थित अपने गांव वेंकटरामापुरम लौट आया था। उसने किसान के रूप में अपनी नई जिंदगी शुरू की। उसके खेती के तरीके में हर चीज के तालमेल का ध्यान रखा गया था- पृथ्वी और पानी, फसल और पेड़, उसके मजदूर और...
    March 16, 01:10 AM
  • हिंसा के बीच फूटती प्यार की कोंपलें
    यह आम लोगों केरोष प्रदर्शन का मौसम है, भारत में यह ठंड प्रतिशोध की है। एक के बाद एक दो लोगों को गंभीर आतंकी वारदातों के चलते फांसी दे दी गई। बाकी जिनमें जंगली डकैत, हत्यारे और सीरियल किलर्स शामिल हैं, अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जहां तक दिल्ली में बस में एक छात्रा के साथ दुष्कर्म और हत्या के आरोपियों की बात है, तो ऐसा नहीं लगता कि लोगों की भावनाएं उनके लिए फांसी से कम किसी सजा से संतुष्ट होंगी। देश में फिलहाल न्याय को प्रतिशोध के रूप में देखने की भावना बलवती है। हालांकि, रोषपूर्ण आक्रोश के...
    March 9, 02:28 AM
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