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खुशवंत सिंह

मौसम का पहला आम खाने का मौका मुझे अप्रैल के आखिरी दिन मिला। वह एक शानदार अल्फांसो आम था और उसकी मिठास अब भी मेरी...

एक बड़ी मशहूर कहावत है : भेंट में मिले घोड़े के दांत नहीं देखना चाहिए। इसका मतलब यह है कि घोड़े के दांतों का मुआयना...

संयोग, करिश्मा या कुछ और?

एक कलाकार ने मुझे गुरु गोबिंद सिंह का एक खूबसूरत पोट्र्रेट भेंट किया, जिसे मैंने अपने रीडिंग रूम में लगा लिया।...

जिंदादिली से दी उम्र को मात

कोलकाता से छपने वाले अखबार ‘द टेलीग्राफ’ की स्मिता वर्मा ने एक बेहतरीन प्रोजेक्ट के लिए मुझे याद किया। वे नब्बे...
 

कूची से कलम तक कला

काठमांडू के इंडियन कल्चरल सेंटर की मौजूदा निदेशिका गीति सेन हैं। गीति आधुनिक भारतीय कला की विशेषज्ञ हैं और इस...

आंसू नसीब नहीं बदल सकते

अंग्रेजी में लिखने वाले भारतीयों में शिव के. कुमार का विशिष्ट स्थान है। मेरे मन में उनके समग्र कृतित्व के प्रति...
 

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  • March 24, 12:49
     
    मेरे सगे-संबंधियों, नाते-रिश्तेदारों में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो विदेश में जा बसे हैं। इनमें से सबसे ज्यादा लोग इंग्लैंड में हैं। इसके बाद नंबर आता है इटली, फ्रांस, जमर्नी, कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों का। इनमें से अनेक खासे संपन्न हैं और उनकी जेब उन्हें इस बात की इजाजत देती है कि वे जब-तब भारत में अपने पुश्तैनी घर की सैर करने चले आएं। आज मैं अक्सर सोच में...
     

  • March 17, 12:18
     
    आठ मार्च, दो हजार बारह, गुरुवार की सुबह जब मेरी बेटी मुझे गुड मॉर्निग कहने आई तो मैंने उससे पूछा : ‘होली कब है?’ मेरे इस सवाल से वह कुछ इस तरह भौचक रह गई, मानो मैंने कोई बहुत ही ऊटपटांग बात कह दी हो। खैर, वह पूरी तरह गलत भी नहीं थी। मैंने वाकई एक बेकार का सवाल पूछा था। थोड़ी देर बाद उसने जवाब दिया : ‘आज ही तो होली है।’ एक जमाना था, जब मुझे इस तरह के बेवकूफी भरे सवाल पूछने की जरूरत नहीं हुआ...
     

  • March 3, 12:07
     
    एक जमाना था, जब कपिल सिब्बल शाम के समय नियमित रूप से मुझसे मिलने आया करते थे। वे तभी से अंग्रेजी में कविताएं लिख रहे हैं। वे मुझसे अपनी कविताओं की स्वीकृति चाहते थे। मैंने उनकी कविताएं पढ़ीं और उन्हें सराहा। वे बहुत खुश हुए और चेहरे पर मुस्कराहट लिए घर लौटे। हाल ही में उनकी कविताओं का एक संकलन छपा है। रोली बुक्स द्वारा प्रकाशित इस किताब का शीर्षक है ‘माय वर्ल्ड विदिन’। मैं यहां...
     

  • February 25, 12:06
     
    एक जमाना था, जब मुझे फिट्जेरल्ड द्वारा अंग्रेजी में अनूदित उमर खैयाम की ढेरों फारसी रुबाइयां मुंह जुबानी याद थीं। इसके बाद मुझ पर उर्दू शायरी और खासतौर पर गालिब का खुमार चढ़ा और वे सभी रुबाइयां मेरी याददाश्त के दायरे से बेदखल हो गईं। लेकिन एक रुबाई मुझे आज भी याद है, क्योंकि वह उन तमाम बातों का सार है, जो मैं जिंदगी से चाहता हूं : दरख्त की शाख के नीचे कविताओं की किताब। रोटी का एक...
     

  • February 18, 12:07
     
    सूरजकुंड शिल्प मेला अब 26 साल का हो चुका है और देश के सालाना सांस्कृतिक कैलेंडर पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुका है। यह मेला बड़ी तादाद में देशी-विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकृष्ट करता है, जो यह देखकर हैरान रह जाते हैं कि किस तरह सीधे-सादे और अर्धशिक्षित शिल्पकारों द्वारा बांस और अन्य लकड़ियों से भांति-भांति की शिल्पकृतियां रची जाती हैं। लेकिन इस वर्ष मेले में कद्रदानों ने...
     

  • February 11, 12:07
     
    विगत सत्ताईस जनवरी की दोपहर को मैंने जैसे ही टीवी चालू किया, एक बुरे अंदेशे ने मुझे घेर लिया। टीवी पर करतार सिंह दुग्गल को अपनी बुकशेल्फ से कुछ किताबें निकालते दिखाया जा रहा था। मैंने अनुमान लगाया कि उनकी मृत्यु हो गई होगी और टीवी वाले उन्हें आदरांजलि देने के लिए उन पर यह कार्यक्रम दिखा रहे हैं। मेरा अंदेशा सही निकला। करतार सिंह की मृत्यु के साथ ही 72 साल से चली आ रही हमारी दोस्ती का...
     

  • February 4, 12:10
     
    यदि किन्हीं दो व्यक्तियों का वैवाहिक संबंध टूटने के लिए बाध्य और नियत था तो वे मीनू मसानी और शकुंतला श्रीवास्तव थे। यह विडंबना ही है कि उन्होंने प्रेम विवाह किया था। मीनू पारसी थे और शकुंतला हिंदू कायस्थ, लेकिन उनके अलग-अलग धर्म उनकी राह में रोड़ा न बन सके। उनकी राह में अगर कोई चीज रोड़ा बनकर आई तो वे खुद उनके भिन्न-भिन्न व्यक्तित्व थे। वास्तव में विवाह होते ही उनका संबंध विघटन...
     

  • January 28, 12:13
     
    मैं यह बात कई बार दोहरा चुका हूं कि अपने जीवन में मेरी जितने भी लोगों से भेंट हुई, उनमें से केवल एक ही ऐसे हैं, जिन्हें सही मायनों में जीनियस कहा जा सकता है। वे हैं विक्रम सेठ। पहले मुझे लगता था कि उनके माता-पिता पंजाबी हैं, लेकिन मैं गलत था। उनके माता-पिता उत्तर प्रदेश से हैं। खैर, इस बात में विश्वास करने के पर्याप्त कारण हैं कि विक्रम को अपनी विलक्षण मेधा का कुछ अंश अपनी मां लीला सेठ...
     

  • January 21, 12:16
     
    उन्नीस सौ सैंतालीस का साल आज भी याद आता है। उस साल अगस्त के पहले हफ्ते के अंत में मैंने लाहौर को अलविदा कह दिया था। मैं लॉरेंस गार्डन के समीप एक संभ्रांत रिहायशी इलाके में रहता था। सही समय पर वहां से निकल जाने वाला मैं आखिरी सिख था। मैं रात की गाड़ी पकड़कर कालका पहुंचा और फिर वहां से एक टैक्सी लेकर कसौली चला गया, जहां मेरा परिवार रहता था। मुझे पता नहीं था कि मेरा भविष्य क्या होगा। फिर...
     
 
 
 
 
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