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  • हम कैसे राष्ट्र में बदलते जा रहे हैं?
    चुनावी गहमागहमी के बीच दो किताबों ने हंगामा मचा दिया। ये किताबें हैं संजय बारू की द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और पीसी पारख की फ्राम क्रुसेडर टू कांस्पिरेटर। दोनों यूपीए सरकार के 2004-09 के पहले कार्यकाल में वरिष्ठ सरकारी पदों पर थे। बारू प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार का संवेदनशील पद संभालते हुए सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय में काम कर रहे थे। वे रोज प्रधानमंत्री के सतत संपर्क में रहते थे। प्रधानमंत्री कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों तक उनकी पहुंच थी। पारख कोयला सचिव थे। दोनों किताबों को...
    03:36 AM
  • यदि आपको मोदी से बहुत बड़ी उम्मीद है तो धक्का पहुंचेगा
    रुकावटें होंगी। संदेह होंगे। भूलें होंगी। आशाएं होंगी। अपेक्षाएं होंगी। आकांक्षाएं होंगी। संघर्ष की कहां कोई सीमा है? - अज्ञात मोदी आ रहे हैं। उनके बनते ही सबकुछ एकदम अच्छा हो जाएगा, कहते हुए उस युवा मैनेजमेंट प्रोफेशनल की आंखों में अलग ही चमक दिखी। मैं उसे काफी समय से जानता हूं। धीर-गंभीर। आज का काम आज ही पूरा करना। काम की ही बात करना। किन्तु वह इन दिनों मोदी की खूब बातें कर रहा है। इकोनॉमी देखिएगा, कैसे ठीक होती है। खूब उम्मीद है उसे। हर कंपनी में आपको उसकी तरह के युवा मिल जाएंगे। इन्हें...
    April 19, 08:38 AM
  • मोदी की लहर के बीच आप
    भारतीय राजनीति का एक सिरा भूतनाथ रिटर्न्स से जुड़ता है तो दूसरा सिरा कामेडी नाइट्स विद कपिल तक जाता है। इन दोनों के बीच जनता, चुनाव आयोग और तमाम राजनीतिक दलों के अपने-अपने किरदार हैं। वे कभी डराते हैं, कभी हंसाते हैं, कभी दिखाई पड़ते हैं तो कभी गायब हो जाते हैं। कामेडी नाइट्स विद कपिल में अरविंद केजरीवाल के जाने को चुनाव आयोग के नियमों ने रोक दिया, क्योंकि नियम कहता है कि चुनाव के 48 घंटे पहले किसी नेता और उसकी विचारधारा को सार्वजनिक मंचों पर प्रदर्शित करने से मतदान की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती...
    April 16, 02:05 AM
  • बारू के बहाने वंशवाद की चर्चा
    प्रधानमंत्री के पूर्व सलाहकार संजय बारू की किताब ने इन दिनों कांग्रेस विरोधी खेमे को संप्रग सरकार की कार्यशैली की बाबत काफी बारूद मुहैया करा दी है। मजा यह है कि विवादास्पद तथ्यों में से कोई भी ऐसा नहीं, जिसे प्रतिपक्ष ने पिछले सालों में संसद से सड़क तक लगातार न उछाला हो। पहला मुद्दा यह कि मनमोहन सिंह 10 जनपथ के हाथों में थमे रिमोट पर निर्भर थे। माना कि थे, पर यह बात हर कोई जानता है कि देश के दोनों बड़े दलों में राजगद्दी पर कौन? तय कराने वाली शक्तिपीठ कोई और ही होती है। यह उनकी कमजोरी के साथ उनकी सबसे...
    April 15, 02:29 AM
  • बहुत अहम नहीं हैं युवा वोटर
    इस बात पर तो कोई विवाद नहीं है कि इस बार के आम चुनाव में युवा मतदाताओं (18 से 25 वर्ष आयु) की संख्या बहुत ज्यादा है। हाल के अनुमानों के मुताबिक युवा मतदाताओं की संख्या 2009 में हुए पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिले कुल वोटों की तुलना में बहुत ज्यादा है। यह वाकई बहुत बड़ा फर्क है। युवा मतदाताओं की संख्या को ध्यान में रखते हुए इस चुनाव में लगभग सभी राजनीतिक दल इन्हें अपने पक्ष में करने के लिए पसीना बहा रहे हैं। सोशल मीडिया से लेकर हर उस मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो युवाओं को आकर्षित कर सकते हैं।...
    April 14, 03:32 AM
  • निकृष्ट समझे जाने वाले नेताओं से मिल सकती हैं 9 उत्कृष्ट सीख
    सांप तुम सभ्य तो हुए नहीं, नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया। एक बात पूछूं? उत्तर दोगे? तब कहां सीखा डसना? विष कहां पाया? - अज्ञेय विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक चुनाव में प्रत्याशी बनकर लड़ रहे नेताओं के अनछुए पहलू पर इस बार का कॉलम वे घृणा के पात्र हैं। उपहास का केंद्र हैं। क्रोध के शिकार हैं। कुंठा के कारण हैं। पतन के प्रतीक हैं। अलग-अलग शब्दों में कुछ ऐसा ही कहा-माना जाता है नेताओं को। चुनाव, वह भी देश का - लोकसभा - चुनाव लड़ रहे - लड़वा रहे नेताओं को तो और भी बुरी तरह कोसा जा रहा है। भ्रष्ट। दागी।...
    April 12, 07:03 AM
  • वादे तो खूब, जवाबदेही नदारद
    सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2013 में कहा था कि विभिन्न राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्रों में मुफ्त सुविधाओं के वादे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ें हिला देते हैं। कोर्ट ने चुनाव आयोग को घोषणा-पत्रों की सामग्री को मर्यादित रखने के लिए दिशा-निर्देश बनाने को कहा था। इसके बाद आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत गाइडलाइन जारी की। इसके पहले उसने राजनीतिक दलों से भी विचार-विमर्श किया। इस गाइडलाइन में रेखांकित किया गया कि, पारदर्शिता, दलों के लिए अवसरों की समानता और वादों की विश्वसनीयता के लिए यह अपेक्षित...
    April 11, 04:51 AM
  • जनमत संग्रहों की खुलती पोल
    मेरी राय में जनमत संग्रह यानी ओपिनियन पोल को ओपिनियन अबाउट पोल यानी मतदान के बारे में राय कहना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि केवल निहित स्वार्थ और व्यक्तिगत राय को जनमत के रूप में पेश किया जाता है। हाल के एक जनमत संग्रह में, एनडीटीवी चैनल ने न सिर्फ एनडीए के लिए 230 सीटों का अनुमान व्यक्त किया बल्कि एनडीए के लिए चुनाव बाद के सहयोगी खुद ही चुनकर सीटों की संख्या 280 तक बढ़ा दी और प्रधानमंत्री पद पर नरेंद्र मोदी का राजतिलक भी कर दिया। यह जनमत संग्रह किसी भी पार्टी द्वारा उम्मीदवारों की घोषणा के कई दिनों...
    April 10, 03:30 AM
  • पत्थर वे ही फेंकें  जो कभी विफल न हुए हों
    युवराज सिंह को किसी तरह की सहानुभूति की आवश्यकता नहीं है। किन्तु क्या हम इतने बेदर्द हो चुके हैं कि एक हार पर ऐसे बरस पड़ें? पत्थर बरसाने लगें? नौजवानों के जोश और जुनून सब ख़त्म हो जाएंगे यदि हम विफलता के सामने इतने क्रोध से भर उठेंगे कि धैर्य और विवेक दोनों खो देंगे। दोनों तरह के पत्थर ग़लत हैं। एक तरह के पत्थर सोशल मीडिया से बरसाए जा रहे हैं। इनमें मर्यादा चूर-चूर हो गई। और दूसरे पत्थर तो पत्थर ही हैं। हर सफलता के पीछे अनेक विफलताएं हैं। यदि श्रीलंका को ही एक उदाहरण के रूप में लें तो उसने चार बार...
    April 8, 02:53 AM
  • कल्‍पेश याग्निक: शाही इमाम को तो उनके भाई ने खारिज कर दिया; मुसलमान क्यों सुनेंगे?
    किसी की अपील सुनकर वोट मत दीजिए। सबसे सरल तरीका तो यह है कि उसे चुन लीजिए जो सबसे कम वादे कर रहा हो ; क्योंकि वह सबसे कम धक्का पहुंचाएगा। -अज्ञात शाही इमाम ने आखिरकार नरेंद्र मोदी को फायदा पहुंचाने वाली बात कर ही डाली! कांग्रेस को जिताने की हिदायत तमाम मुसलमानों से करते वक्त इमाम सैयद अहमद बुखारी बेखबर तो नहीं ही होंगे। इतने ऊंचे तख़्त पर बैठे हैं। इतनी गहरी सियासत जानते हैं। बखूबी वाकिफ़ ही होंगे कि ऐसी अपील से क्या-क्या हो सकता है: * ग़ज़ब का हंगामा बरपेगा * मज़हबी सियासत का जुर्म मढ़ा जाएगा *...
    April 5, 11:14 AM
  • लोकतंत्र मजबूत, नेतृत्व  कमजोर
    दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक शो के लिए अब कुछ ही दिन शेष हैं। विश्व का सबसे बड़ा, जीवंत, गतिशील और ऊर्जा से भरपूर लोकतंत्र होने के भारत के दावे से इनकार करना बहुत कठिन है। दुर्भाग्य से इस प्रक्रिया में गंभीरता की बजाय तमाशा ज्यादा है। किंतु मैं इसके लिए मतदाताओं को दोष नहीं देता। वे अपनी भूमिका पूरी आस्था से निभाते हैं। समस्या यह है कि उनका संदेश उन लोगों तक नहीं पहुंचता जो देश को चलाते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान खूब तमाशा देखने को मिलता है। बड़ी-बड़ी रैलियां, भड़कीले रंगों के पोस्टर।...
    April 2, 02:01 AM
  • पागलपन और नफरत की धुंध
    वैसे तो हर आम चुनाव के अंतिम पड़ाव तक आते-आते प्रत्याशियों के सुर तीखे और प्रतिपक्षी के खिलाफ आरोप लगातार तेजाबी और हैरतअंगेज बनते जाते हैं, फिर भी इस बार के चुनावों में जिस तरह से और जैसा माहौल बनाया जा रहा है, उसने इस चुनावी प्रतिस्पर्धा को लगभग गृहयुद्ध की शक्ल दे दी है। कई नासमझ अपने निजी हिसाब बराबर करने या ट्विटर पर मजाक भेजकर इस पागलपंथी नफरत की धुंध से भरे माहौल को और हवा दे रहे हैं। सोशल मीडिया इसमें और योगदान दे रहा है। जबकि मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी का यह दुरुपयोग तमाम समझदार...
    April 1, 05:32 AM
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