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शब्दों में अंक नहीं अर्थ होते हैं

आंकड़ों का औसत लिया जा सकता है। उनमें अनुपात-प्रतिशत ढूंढ़े-देखे जा सकते हैं। पर शब्द? क्या किसी लेखक के लिखे शब्दों का समूह देखकर यह कहा जा सकता है कि उसने इस किस्म के लफ्ज ज्यादा इस्तेमाल किए हैं, इस प्रकार के शब्दों का उनमें प्राबल्य है और बहरहाल उसके लेखन की मानसिकता यूं-यूं बनती दिखती है? क्या यह कहा जा सकता है कि प्रेमचंदजी की शब्दावली में ऐसे शब्दों का अनुपात ‘यह’ है, और वैसे शब्दों का ‘वह’? मेरी समझ में हां। मुंशीजी के लेखन में हम हिंदुस्तानी लफ्ज सहज पाएंगे, जैसे कि इबारत, नसीहत, फजीहत। वे उर्दू के एग्जामिनर को सरलता से ‘मुम्ताहीं’ कहते हैं, अंधविश्वासी बकवास को...
 

आपके लिए कैसा होगा गुरु का राशि परिवर्तन

मंगल का प्रतीक है गुरु गुरु शुभ फल दाता ग्रह माना गया है। अगर आप अविवाहित हैं या संतान प्राप्ति की कामना है, तो...

अहंकार मन को कमजोर बनाता है

जीवन एक शब्द नहीं है। यह एक वाक्य है। कृपया इसे आजीवन कारावास मत बना लीजिए। जीवन जीने का अर्थ है जुड़ना, संबंधित...
 
 
 

यूरोप के असमंजस के मायने

चुनावों ने यूरोप और यूरो, और उसके साथ ही पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को एक और वैश्विक संकट की ओर धकेल दिया है।...

दलीय प्रवक्ता की त्रासदी

आपने कभी सोचा है कि कुछेक दिन छोटे परदे पर लगातार अवतरित होने के बाद हर राजनीतिक दल का बुद्धिमान, गंभीर और...
 
 

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  • May 7, 12:15
     
    किसी ने कहा है कि जिंदगी की शुरुआत चालीस की उम्र में होती है। हो सकता है। लेकिन मैंने यह भी पाया है कि पैंतालीस तक पहुंचते-पहुंचते जिंदगी लड़खड़ाने भी लगती है। मुझे वह सुबह अच्छी तरह याद है, जब मुझे पहले-पहल इसका आभास हुआ था। जब मैं जूतों के फीते बांधने के लिए नीचे झुका, तो मैंने पाया कि मुझे सांस लेने में तकलीफ हो रही है। लगा कि भीतर गई सांस भीतर ही रह गई है। इससे पहले मेरे साथ ऐसा कभी...
     

  • May 6, 12:34
     
    अमरनाथ यात्रा- अमरनाथ गुफा के बारे में पौराणिक कथाओं में वर्णित है कि एक बार मां पार्वती ने शिवजी से उनके गले में पड़ी मुंडमाला के बारे में पूछा। शिवजी ने बताया, देवी, ‘जब-जब तुम जन्म लेती हो, मैं मुंडमाला में मुंड की संख्या बढ़ाता जाता हूं।’ पार्वतीजी ने दुखित स्वर में कहा, ‘हे देव, मेरा शरीर तो नाशवान है और मुझे बार-बार मरना, जन्म लेना पड़ता है, जबकि आप अमर हैं। कृपया मुझे इस...
     

  • May 6, 12:33
     
    हमें किसी को अच्छा या बुरा नहीं कहना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति चेतना के निम्न स्तर से कार्य करता है, तो उसके कार्य उचित नहीं होंगे। इसे संस्कृत में तामसिक अवस्था कहते हैं। यदि व्यक्ति चेतना के उच्च स्तर से कार्य करता है, तो उसे सžव गुण कहते हैं। तब उसके कार्य भिन्न होंगे। गीता कहती है कि हमारी आंतरिक अवस्था लगातार बदलती रहती है। हमारी आंतरिक अवस्था हमारे कार्यो के साथ जुड़ी रहती है।...
     

  • May 3, 12:59
     
    सिनेमा का प्रथम प्रदर्शन पेरिस के ग्रैंड कैफे के इंडियन सेलून नामक कक्ष में 28 दिसंबर 1895 को हुआ था। वक्त था रात के ९ बजे। समय, तिथि, स्थान और साल के आधार पर विज्ञानजनित अभिव्यक्ति के इस माध्यम की कुंडली कंप्यूटर की मदद से बनाई जा सकती है, परंतु यह तय है कि सिनेमा की कुंडली में भारत नामक ग्रह सबसे प्रबल रहा, वरना क्या कारण है कि इतने बड़े होटल के अनेक कक्षों में ल्युमियर बंधुओं ने इंडियन...
     

  • May 1, 12:47
     
    पिछले हफ्ते वॉशिंगटन डीसी में भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु एक सच बात कह गए। उन्होंने वहां उपस्थित अपने श्रोताओं से कहा कि उनकी सरकार की निर्णय क्षमता पंगु हो चुकी है और २क्१४ के चुनावों तक किसी तरह के सुधारों की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। अलबत्ता, बाद में उन्होंने इस बयान का खंडन किया, क्योंकि इससे उन्हीं की सरकार की फजीहत हो रही थी, लेकिन सच्चाई तो यही है कि...
     

  • April 30, 01:11
     
    जैसे खबर ‘अब आई और अब गई’ होती है, वैसे ही अखबार भी आज का हो तो ताजा है, बीते कल का हो तो बासी है। कल का अखबार आज किसी व्यंजन को लपेटने, दराजों-अलमारियों में बिछाने, कांच की खिड़कियों को पोंछने के लिए उपयोगी होता है, बस। या महीने के खत्म होने पर अपने साथी ‘पुराने अखबारों’ के साथ एक ढेर बनकर कबाड़ीवाले को बेचने के लिए रह जाता है। उसमें छपी खबरें कितनी ही गंभीर, चिंतास्पद, मर्मस्पर्शी,...
     

  • April 29, 12:07
     
    भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के चुनाव के पच्चीस वर्ष बाद चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने लिखा था- ‘निस्संदेह बेहतर होता, यदि नेहरू को विदेश मंत्री तथा सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता। यदि पटेल कुछ दिन और जीवित रहते, तो वे प्रधानमंत्री के पद पर अवश्य पहुंचते, जिसके लिए संभवत: वे योग्य पात्र थे। तब भारत में कश्मीर, तिब्बत, चीन और अन्यान्य विवादों की कोई समस्या नहीं रहती।’ अब से 62...
     

  • April 29, 12:07
     
    एक बार भगवान बुद्ध ध्यान कर रहे थे। उन्हें ज्ञान के रास्ते से भटकाने के लिए उनके मन ने समस्याएं खड़ी करना शुरू कर दिया। उन्हें लगा जैसे सैकड़ों घोड़े एक साथ दौड़ रहे हों। बुद्ध फिर भी अडिग रहे। उन्होंने डर को पास नहीं आने दिया। उनके मन ने हजारों हाथियों का रूप धर लिया। लेकिन बुद्ध स्थिर बने रहे। वे मन के इस खेल के आर-पार देखते रहे। उनके मन ने हिरण का रूप धारण कर लिया। पर उनकी स्थिति...
     

  • April 29, 12:06
     
    जब मोह-माया वश मनुष्य अपने जीवन में अपूर्ण कर्मो को पूर्ण न कर सकने की लालसा लिए ही मृत्यु को प्राप्त कर लेता है, तो इस कारण उसकी पुनर्जन्म पाने की प्रबल इच्छा पैदा होती है और वह फिर से संसार में जन्म ले लेता है। संभवत: इसी कारण मनुष्य अपने जन्म के समय उसके पूर्व जन्म में संचित कर्मो का फल भाग्य के रूप में लेकर पैदा होता है। इसका भोग्य काल मनुष्य की स्वयं की कल्पना से कम अथवा ज्यादा...
     
 
 
 
 
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