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प्रितिश नंदी

हर मनुष्य की आस्था और सच अलग-अलग होते हैं। जीवन के अनुभव हमें अपने सच के नजदीक ले जाते हैं। बीमारी, भूख या...

भारतीय फिल्में जिंदगी की खूबसूरत तस्वीर पेश करती हैं। वे हमें सच, न्याय, समानता और प्रेम जैसे मूल्यों से जुड़ना...

जीवन के कई मोड़ हैरत में डालते हैं

मैं अपने जीवन से कई बार खुद ही आश्चर्यचकित हो जाता हूं। इसकी शुरुआत शायद मेरे बचपन में ही हो गई थी। मैं एक अच्छे...

ताकत की नई धुरी बना सोशल मीडिया

बीते दो सालों में विचारवान नेताओं का एक नया समूह सामने आया है। पुराने नेताओं की तरह इनमें से कुछ लोग सेमिनारों...
 

डिजिटल दुनिया का शोरगुल

हम अचानक ही डिजिटल दुनिया की अंतहीन बड़बड़ाहट से रूबरू हैं। हमें इसके वजूद के बारे में पहले भी पता था, लेकिन हम...

नैतिक उलझनों और संदेहों का दौर

मैं निश्चितताओं के दौर में पला-बढ़ा हूं। हमें स्पष्ट पता होता था कि गलत क्या है और सही क्या। जब कभी हम सत्ता की...
 

और खबरें

 
 
 

  • February 14, 06:47
     
    अधिकांश  भारत की तरह मीडिया भी यही मानकर चल रहा है कि 2014 का चुनावी मुकाबला राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के बीच होगा और मौजूदा हालात में मोदी निश्चित रूप से बढ़त की हालत में नजर आ रहे हैं। इस मुकाबले को कई बार दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच टकराव के रूप में देखने की गलती की...
     

  • January 31, 12:08
     
    कुछ  दिन पूर्व जयपुर में हुए कांग्रेस के चिंतन शिविर में राहुल गांधी की ताजपोशी को देख मैं अचंभित रह गया। राहुल गांधी को कांग्रेस का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने पर भले ही जयपुर से दिल्ली तक आतिशबाजी की गूंज रही और टीवी चैनलों पर इसके बारे में बहस की श्रंखला चल...
     

  • January 17, 01:32
     
    मुझे  समझ में नहीं आता कि लोग रेप करते क्यों हैं? इसमें न सेक्स होता है, न तो प्यार होता है और न ही किसी तरह की आनंद की अनुभूति होती है। यह सिर्फ एक ही चीज देता है- बेइंतहा दर्द। इसमें किसी तरह के गर्व का भाव भी नहीं होता।   यह आपको किसी तरह से सशक्त भी नहीं बनाता, क्योंकि...
     

  • January 3, 01:09
     
    सीधे मुद्दे की बात करें। मैं खुद को उन 90 फीसदी लोगों में शामिल पाता हूं, जिन्हें कुछ दिन पूर्व जस्टिस मरकडेय काटजू ने ‘इडियट’ की तरह वर्णित किया था।   इसके साथ-साथ मेरा यह भी कहना है कि मैं जस्टिस काटजू को पसंद करता हूं। वह बेझिझक अपने मन की बात कहते हैं और उन्हें...
     

  • December 20, 12:03
     
    लोगों के पास जब विचारों का टोटा होता है तो वे दूसरी चीजों का सहारा लेने लगते हैं। इनमें सबसे पहले आता है 'पैसा', जिसका लोग बेवकूफों की तरह अक्सर सहारा लेते हैं। जिन लोगों को अपने आत्मसम्मान का ख्याल नहीं होता, उनका पहला तर्क अमूमन यही होता है- यदि मेरे पास ढेर सारा धन...
     

  • December 6, 01:19
     
    मेरे पिताजी बचपन में मुझे अपने बचपन के उस भारत के किस्से सुनाया करते थे, जब लोगों के बीच वर्गभेद इतना गहरा नहीं था। हर कोई हर तरह के पर्व मनाया करता था। हिंदू अपने मुस्लिम साथियों के साथ ईद के जश्न में पूरे उत्साह से शामिल होते और उनके घरों में पके लजीज पकवानों का साथ...
     
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