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प्रितिश नंदी

सच कहूं तो मैंने ईमेल को कभी पसंद नहीं किया। और अब, जब वे धीरे-धीरे सभी के लिए अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं, मैं...

ममता बैनर्जी ने इंदिरा भवन का नाम बदल दिया तो बड़ा हंगामा मच गया। यह भवन कभी ज्योति बसु का आधिकारिक निवास हुआ करता...

बहुत फायदे हैं एक छोटी-सी ‘ना’ के

मेरी सबसे बड़ी नाकामी यह है कि मैं ‘ना’ नहीं कह पाता। इस साल मैं अपनी इस खामी को सुधारना चाहता हूं। मैंने तय किया...

टकराव हैं तो बदलाव हैं

चाहें तो इसे संघर्ष कह लें, या टकराव, या फिर इसे विकास की द्वंद्वात्मकता कहकर पुकारें। शायद सच यही है कि दुनिया...
 

नश्वरता से लड़ता नायक

मैं कलकत्ते की संकरी गलियों में पलकर बड़ा हुआ। तब इस शहर की बात ही कुछ और हुआ करती थी। यह जादू और रोमांच से भरा-पूरा...

असल मुद्दा कुछ और ही है

राजनीति हमारे जीवन से अलग-थलग कोई चीज नहीं है, इसलिए यह जाहिर ही है कि जो चीजें हमारे जीवन का एक अहम आयाम हैं, वे...
 

और खबरें

 
 
 

  • November 10, 12:24
     
    कई सालों से हमारे राजनेता नियम-कायदों को धता बताते आ रहे थे, फिर भले ही वे नियम कानून की किताबों में दर्ज हों या न हों। जहां एक तरफ वे ऐसे कानून बनाने में व्यस्त थे, जिनका पालन करना हमारे लिए अनिवार्य था, वहीं वे यह भी सुनिश्चित करना चाहते थे कि ऐसे हर कानून में कम से कम इतनी पतली गलियां तो हों ही कि वे और उनके संगी-साथी आराम से उसमें से बचकर निकल जाएं। वे कर चुकाने से कन्नी काटते रहे।...
     

  • October 13, 12:34
     
    स्टीव जॉब्स की मृत्यु की खबर दुखद थी, लेकिन इस खबर का एक रोचक परिणाम जरूर रहा। ऐसा लगा जैसे एक अरसे के बाद हमारे अखबारों के पन्ने और हमारी खबरिया चैनलों के बुलेटिनों की सुर्खियों में धोखेबाजों, घपलेबाजों, चोरों के स्थान पर कोई महान व्यक्ति जगह पाने में कामयाब हो पाया है। आमतौर पर हमारी खबरों की सुर्खियां घपलेबाजों और धोखेबाजों के लिए ही स्थायी रूप से आरक्षित रहती हैं। जॉब्स एक...
     

  • September 30, 12:14
     
    पिछले सप्ताहांत मैंने इशिता से पुणो की एक जगह के बारे में जानना चाहा। उसने मुझे बताया कि वह जगह कयानी बेकरी के करीब है। मैंने पूछा : ‘और कयानी बेकरी कहां है?’ उसने फौरन जवाब दिया : ‘अरे वहीं, जहां बम धमाका हुआ था!’ मैंने विनम्रतापूर्वक उसकी गलती को सुधारते हुए कहा कि बम धमाका कयानी बेकरी पर नहीं, जर्मन बेकरी पर हुआ था। लेकिन जिस एक चीज ने मेरा ध्यान खींचा, वह यह थी कि हमारे द्वारा चीजों...
     

  • September 15, 12:06
     
    क्या हम कभी घपलों, घोटालों और विपदाओं की खबरों से ऊबते हैं? या क्या हम इन खबरों के आदी हो जाते हैं और एक सीमा के बाद हमें किसी भी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता? एक थ्योरी कहती है कि एक समय के बाद हम बुराई पर ध्यान देना बंद कर देते हैं और किन्हीं दूसरी चीजों पर अपना ध्यान केंद्रित करने लग जाते हैं। हम फुकुशिमा को भुला चुके हैं और भारत में और परमाणु प्लांट बनाने की तैयारी कर रहे हैं, जबकि...
     

  • September 1, 12:17
     
    अब जब हम यह सोचने लगे हैं कि हमने भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में जीत हासिल कर ली है, हमारे लिए बेहतर होगा कि हम थोड़ा रुकें और खुद से पूछें कि आखिर भ्रष्टाचार होता क्या है। क्या मायने हैं भ्रष्टाचार के? जंग की जरूरत के नाम पर लड़ाइयां लड़ीं और जीती जाती रही हैं। जिस तरह हम अपने अविश्वास को स्थगित किए बिना किसी फिल्म का मजा नहीं ले सकते, ठीक उसी तरह हम कोई लड़ाई इस तरह नहीं लड़ सकते...
     

  • August 18, 12:06
     
    सरकार के तौर-तरीके मुझे हमेशा हैरान कर देते हैं। जब महंगाई की मार पड़ती है तब या तो सरकार इसे नजरअंदाज कर देती है या वह ऐसे मूर्खतापूर्ण स्पष्टीकरण देती है कि उसकी स्वयं की स्थिति हास्यास्पद हो जाती है। सरकार बहुत कम अंतराल में ग्यारह बार ईंधन की कीमतें बढ़ाती है और इससे हम सबके लिए हालात और बदतर हो जाते हैं। जब समाज में भ्रष्टाचार का घुन लग जाता है और वह उस लोकतंत्र की बुनियाद को...
     

  • August 4, 12:08
     
    सवाल महज अन्ना हजारे का नहीं है। सवाल वास्तव में जन लोकपाल आंदोलन का भी नहीं है। सवाल यह है कि हमारी बुनियादी समस्याएं क्या हैं। सरकार और हम आम नागरिकों के बीच जिन मसलों पर लड़ाई लड़ी जा रही है, उन पर एक नजर डालें। उसके बाद हम सभी यह तय करें कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हम कहां खड़े होना चाहते हैं। पहला सवाल यह है कि क्या हम भ्रष्टाचार और घूसखोरी से तंग आ चुके हैं? क्या हमें ये चीजें...
     

  • July 21, 12:38
     
    लगता है कि मौजूदा सरकार हमारी अब तक की सबसे अनाड़ी और भ्रष्ट सरकारों में से एक है। लेकिन क्या यह सरकार वाकई इतनी ही खराब है या बात केवल इतनी ही है कि उसे यह बिल्कुल नहीं पता कि संकट के क्षणों में क्या किया जाए और क्या कहा जाए? जब भी कोई संकट की घड़ी आती है (जैसा पिछले हफ्ते मुंबई में हुआ) तो देश अपने नेताओं की मूर्खतापूर्ण हरकतों को असहाय होकर देखता रहता है। मैं पिछले तीन दशकों से...
     

  • July 7, 12:09
     
    वर्ष 1959 में हुई कत्ल की एक वारदात ने पूरे भारत का ध्यान अपनी ओर खींचा था। इस घटना ने कई सार्वजनिक बहसों को भी जन्म दिया था। बहस इस संबंध में नहीं की जा रही थी कि कातिल को कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए या नहीं। बहस इस बारे में हो रही थी कि क्या उसे सम्मान के साथ बरी कर दिया जाना चाहिए। विवाद के केंद्र में था एक नौसेना अधिकारी (कुछ-कुछ एमिल जेरोम की ही तरह, लेकिन उससे कहीं अधिक उम्रदराज। वह...
     
 
 
 
 
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