

महज चंद दिनों में तीन महाद्वीपों की यात्रा करना रोमांचक था। लेकिन यात्रा के रोमांच के साथ ही यह देखना भी काफी...
हर भारतवासी की तरह मैं भी मनोरंजन को पसंद करता हूं। मैं कई बार मनोरंजन उद्योग द्वारा प्रस्तावित विभिन्न...
हम आखिरकार वही बन जाते हैं, जिस रूप में हम अपने आपको देखते हैं। यदि हम अपने आपको बदमाश, ठग या टैक्स चोरी करने वाले...
यह सच है कि वंशवादी और परिवारवादी राजनीति का भारत में एक महत्वपूर्ण मुकाम है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सफल...
हमारी संस्कृति की अनेक खूबियों में से एक है उसका उदारवाद। हमारे ग्रंथों ने हमें सभी लैंगिक समूहों और उनकी यौन अभिरुचियों का सम्मान करने की सीख भी दी है, फिर चाहे वे हमसे भिन्न ही क्यों न हों। लेकिन इसके बावजूद आज भी हम भिन्न यौन अभिरुचियों वाले व्यक्तियों के प्रति पर्याप्त उदार और सहिष्णु नहीं हो पाते।
उभयलिंगियों को तो हमने हाशिये का उपेक्षित समुदाय बना डाला है। बर्बर देशों...
सच कहूं तो मैंने ईमेल को कभी पसंद नहीं किया। और अब, जब वे धीरे-धीरे सभी के लिए अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं, मैं उन्हें और भी नापसंद करने लगा हूं। हाथ से लिखे जाने वाले पत्रों और संदेशों की मृत्यु होने में अनेक सदियां लग गई थीं, लेकिन ईमेल डेढ़ दशक में ही दम तोड़ने लगे हैं। ईमेल के अंत की घोषणा करने वाला मैं अकेला नहीं हूं।
मार्क जकरबर्ग ने भी गत नवंबर में कुछ इसी तरह की बातें कही...
ममता बैनर्जी ने इंदिरा भवन का नाम बदल दिया तो बड़ा हंगामा मच गया। यह भवन कभी ज्योति बसु का आधिकारिक निवास हुआ करता था। ममता ने अब इसका नाम इंदिरा भवन के स्थान पर नजरुल भवन कर दिया है और वे यहां कवि नजरुल इस्लाम की स्मृति में एक संग्रहालय खोलना चाहती हैं।
मुझे लगता है यह एक अच्छा विचार है, क्योंकि आखिरकार नाम परिवर्तन की एक ऐसी कवायद हो रही है, जिसमें किसी तरह की कोई तुक है। नजरुल...
मेरी सबसे बड़ी नाकामी यह है कि मैं ‘ना’ नहीं कह पाता। इस साल मैं अपनी इस खामी को सुधारना चाहता हूं। मैंने तय किया है कि जब भी मेरी इनकार करने की इच्छा होगी तो मैं बगैर किसी लागलपेट के सीधे ‘ना’ कह दूंगा। कोई कदाचित या किंचित नहीं; सीधा दो-टूक ‘ना’।
हालांकि मेरे जैसे इंसान के लिए यह करना आसान नहीं है। हमें बचपन से ही यह सिखाया गया कि ‘ना’ कहना अभद्रता और गुस्ताखी की निशानी है और...
चाहें तो इसे संघर्ष कह लें, या टकराव, या फिर इसे विकास की द्वंद्वात्मकता कहकर पुकारें। शायद सच यही है कि दुनिया संघर्षो और टकरावों के सहारे ही आगे बढ़ती है। हम शांति और स्थायित्व के बारे में चाहे जितनी बातें कर लें, लेकिन निरंतरता बड़ी क्रूर होती है। जो भी चीज बदलाव लाती है और नए विचारों, नए बाजारों, नए अवसरों का पथ प्रशस्त करती है, वह हमेशा संघर्षपरक और द्वंद्वात्मक ही होती है। इसी...
मैं कलकत्ते की संकरी गलियों में पलकर बड़ा हुआ। तब इस शहर की बात ही कुछ और हुआ करती थी। यह जादू और रोमांच से भरा-पूरा एक शहर था। स्कूल के दिनों में हमें कई चीजें रोमांचित और आकर्षित करती थीं। इन्हीं में शामिल थीं हिंदी फिल्में, जिन्हें मैं अपनी टिफिन मनी के दो आने बचाकर देखता था।
हमारे सबसे बड़े स्टार्स थे दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद। सभी के प्रशंसकों का एक वर्ग था। ये प्रशंसक...
राजनीति हमारे जीवन से अलग-थलग कोई चीज नहीं है, इसलिए यह जाहिर ही है कि जो चीजें हमारे जीवन का एक अहम आयाम हैं, वे राजनीति की दुनिया का भी अहम आयाम हों। राजनेताओं से जुड़े सेक्स स्कैंडल्स को भी हमें इसी तरह देखना चाहिए। यह जरूर है कि आजकल ऐसे स्कैंडल्स की तादाद बढ़ी है और वे ज्यादा खुलकर सामने आ रहे हैं। इटली के सिल्वियो बर्लुस्कोनी इसकी एक मिसाल हैं। कुछ केस ऐसे भी होते हैं, जिनकी...
कई सालों से हमारे राजनेता नियम-कायदों को धता बताते आ रहे थे, फिर भले ही वे नियम कानून की किताबों में दर्ज हों या न हों। जहां एक तरफ वे ऐसे कानून बनाने में व्यस्त थे, जिनका पालन करना हमारे लिए अनिवार्य था, वहीं वे यह भी सुनिश्चित करना चाहते थे कि ऐसे हर कानून में कम से कम इतनी पतली गलियां तो हों ही कि वे और उनके संगी-साथी आराम से उसमें से बचकर निकल जाएं।
वे कर चुकाने से कन्नी काटते रहे।...
स्टीव जॉब्स की मृत्यु की खबर दुखद थी, लेकिन इस खबर का एक रोचक परिणाम जरूर रहा। ऐसा लगा जैसे एक अरसे के बाद हमारे अखबारों के पन्ने और हमारी खबरिया चैनलों के बुलेटिनों की सुर्खियों में धोखेबाजों, घपलेबाजों, चोरों के स्थान पर कोई महान व्यक्ति जगह पाने में कामयाब हो पाया है।
आमतौर पर हमारी खबरों की सुर्खियां घपलेबाजों और धोखेबाजों के लिए ही स्थायी रूप से आरक्षित रहती हैं। जॉब्स एक...