

आमतौर पर मीडिया जिन्हें चढ़ाता है, उन्हें गिरा भी देता है। सीएनएन आईबीएन के इंडियन ऑफ द ईयर अवार्ड के दौरान अन्ना...
हम भारतीयों को वर्षगांठ मनाना बहुत भाता है। शायद, हमें लगता है कि सालाना जश्न मनाने के बाद सालभर की बाकी बातों को...
कई लोगों ने कहा था कि केंटुकी (केएफसी) ढाबों को चलन से बाहर कर देगी, लेकिन ढाबों ने केंटुकी को खदेड़ दिया। कोक और...
पिछले आठ माह से भारतीय क्रिकेट प्रशंसक सांसें थामकर उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जब उनके अन्यतम क्रिकेट आदर्श...
पिछले लगभग एक साल के अंतराल में देश में हुए दो बड़े खेल आयोजनों में भारत की दो अलग-अलग तस्वीरें नजर आईं। गत वर्ष अक्टूबर में हुए कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन पुराने भारत के नेता-बाबू गठबंधन द्वारा किया गया था। फॉर्मूला वन ग्रांप्री का आयोजन नए भारत द्वारा स्थानीय निजी उद्यमियों और वैश्विक व्यवसाय के सहर्ष संयोग से किया गया। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजन के...
मायावती के दलित स्मारकों पर बहस जारी है। ऐसे में यह कल्पना करना रोचक होगा कि वास्तविक दलित नायक डॉ बाबासाहेब आंबेडकर इस स्थिति में क्या करते। यह तो तय है कि उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री के विपरीत वे अपनी मूर्तियों के निर्माण का हुक्म नहीं देते। आंबेडकर धुर राष्ट्रवादी थे और वे किसी भी किस्म की राजनीतिक व्यक्ति-पूजा को पसंद नहीं करते थे। 1949 में संविधान सभा को संबोधित करते हुए...
आम धारणा यही रही है कि यूपीए में दो सत्ता केंद्र हैं, लेकिन वास्तव में सत्ता केंद्र दो नहीं तीन हैं। यूपीए की अध्यक्षा सोनिया गांधी सर्वोच्च नेत्री हैं, लेकिन उनके पास प्रशासनिक उत्तरदायित्व नहीं हैं। यह जिम्मेदारी वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को सौंपी गई थी और कैबिनेट का प्रमुख होने के साथ ही उन्हें एक सीईओ-नुमा भूमिका भी निभानी थी।
लेकिन इन दोनों के साथ ही यूपीए में...
यह विडंबनापूर्ण ही है कि जब टाइगर पटौदी की मृत्यु की खबर आई, तब क्रिकेट के एक और जलसे की शुरुआत हो रही थी। चैंपियंस लीग टी-20 का शुभारंभ समारोह नए दौर के अनुरूप था : एक कोलाहलपूर्ण मंचसम्मत तमाशा। यदि पटौदी यह जलसा देख रहे होते तो बहुत संभव है कि वे टीवी बंद कर देते। नवाब मंसूर अली खान पटौदी की दुनिया जहानत और नजाकत की दुनिया थी।
वे उस दौर के सुपर सितारे थे, जब टीवी चैनलों का उदय भी...
मणिपुर वूमेन गन सर्वायवर्स नेटवर्क की संस्थापक बीनालक्ष्मी नेप्राम ने मुझसे अपनी सुपरिचित व्यग्रता के साथ पूछा: ‘आप इरोम शर्मिला के एक दशक से चल रहे अनशन का कवरेज उतनी ही मुस्तैदी से क्यों नहीं करते, जैसा आपने अन्ना हजारे के तेरह दिन के अनशन का किया था?’ एक लाइव प्रोग्राम में स्टेज पर पूछे गए इस सवाल से बच निकलने की कोई गुंजाइश नहीं थी। मैंने एक कमजोर-सा जवाब दिया: ‘शायद इम्फाल की...
प्रिय अन्ना! मैं यह पत्र किसी खुशामदी चीयरलीडर या निराशावादी पत्रकार के रूप में नहीं, बल्कि आप ही की तरह गौरव की भावना से भरे एक भारतीय के रूप में लिख रहा हूं। सबसे पहले तो मैं इस बात के लिए आपकी सराहना करना चाहूंगा कि आप भ्रष्टाचार की समस्या को राष्ट्रीय मंच पर ले आए हैं।
आप महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए दो दशक से भी अधिक समय से अथक परिश्रम कर रहे हैं, लेकिन चूंकि...
पत्रकार प्रशिक्षित रूप से मीन-मेख निकालने वाले होते हैं। वे आधे भरे गिलास को आधा खाली गिलास कहना पसंद करते हैं। लेकिन यह केवल पत्रकारों का ही शगल नहीं है। ऐसा लगता है कि इन दिनों पूरे देश में नकारात्मकता की लहर दौड़ रही है, जो इस दृढ़ विश्वास से उपजी है कि हम एक भ्रष्ट और कुप्रशासन से ग्रस्त देश में रह रहे हैं और इसमें हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्यादा उम्मीदें नहीं की जा सकतीं।...
सियासी हलचलों के इस मानसून में किसी मंत्री को कब अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए? कुछ साल पहले मैंने यही सवाल तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव से एक टेलीविजन बहस में पूछा था। एक भीषण रेल हादसे के बाद लालू को यह सलाह दी जा रही थी कि वे अपने प्रतिष्ठित पूर्ववर्ती लाल बहादुर शास्त्री का अनुसरण करते हुए पद से इस्तीफा दे दें। लालू, जिनके पास कभी शब्दों का टोटा नहीं होता, ने पलटकर जवाब...
यदि राजनीति सेल्यूलाइड का आईना होती तो यकीनन हमारे नेता फ्रेम से बाहर नजर आते। एक पखवाड़ा पहले दो हिंदी फिल्में रिलीज हुई थीं: बुड्ढा होगा तेरा बाप और देल्ही बेली। पहली फिल्म में किंवदंती बन चुके अमिताभ बच्चन 1970 के दशक का जादू फिर से जगाने की कोशिश कर रहे थे, जबकि दूसरी फिल्म एक मल्टीप्लेक्स मूवी थी, जिसके युवा अभिनेता एमटीवी पीढ़ी के अनुरूप थे। व्यवसाय के आंकड़े बताते हैं कि...