Home >> Abhivyakti >> Hamare Columnists >> Ved Pratap Vaidik
  • कथा कठपुतली प्रधानमंत्री की
    मुझे याद नहीं पड़ता कि किसी प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए उसके किसी पूर्व सलाहकार ने उसके बारे में कोई किताब लिखी हो। डॉ. संजय बारू ने लिख दी और उसका नाम क्या दिया? एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर! अंग्रेजी के इस शब्द एक्सीडेंट के दो अर्थ हैं। एक तो संयोग और दूसरा दुर्घटना। बारू उन्हें संयोगवश प्रधानमंत्री कहना चाहते हैं, लेकिन वे भारत और कांग्रेस के लिए दुर्घटना सिद्ध हो रहे हैं। संयोगवश प्रधानमंत्री या अचानक प्रधानमंत्री तो कई हुए हैं, जैसे लालबहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, चरणसिंह, राजीव...
    April 19, 02:53 AM
  • अगला प्रधानमंत्री कैसा होगा?
    अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा, यह दावे से कौन कह सकता है, लेकिन सभी दलों के नेता जिस एक आदमी के पीछे हाथ धोकर पिल पड़े हैं, उसका नाम है- नरेंद्र मोदी। मोदी का बुखार सब पर सवार है। कोई कहता है मोदी तो राष्ट्रीय विपत्ति सिद्ध होगा, कोई मानता है कि वह टुकड़े-टुकड़े कर देगा, कोई उसे भावी हिटलर बता रहा है और कोई कह रहा है कि बस, उसे एक बार सत्ता में आने दो, फिर देखना देश में दंगों के पटाखों की लडिय़ां फूटने लगेंगी। भविष्य की ये सब आशंकाएं कितनी खरी हैं, इन पर हम आगे विचार करेंगे, लेकिन उक्त कथनों का एक अर्थ तो...
    April 12, 05:03 AM
  • विकास को लेकर लचीलापन और व्यावहारिकता दिखाई है
    डॉ. वेदप्रताप वैदिक यदि अब तक जारी विभिन्न दलों के घोषणा-पत्रों को देखें तो मुझे भाजपा का घोषणा-पत्र सबसे अधिक लोकलुभावन नजर आता है। भारत की जनता इस समय जिन समस्याओं से ग्रस्त हैं और जिनसे मुक्ति के लिए समाधान चाहती है, उन सब का जिक्र इस 54 पृष्ठ के घोषणा-पत्र में है। जिन मुद्दों को लेकर भाजपा पर अनवरत आक्रमण होता है और जिनके कारण उसे संकीर्ण राष्ट्रवादी पार्टी कहा जाता है उन मुद्दों पर भाजपा ने काफी लचीलापन दिखाया है। इन मुद्दों पर उसने यही कहा है कि संविधान के दायरे में रहकर जो भी किया जा सकता...
    April 8, 03:57 AM
  • काबुल में करजई के बाद कौन?
    भारत के लोकसभा चुनावों में हम इतने व्यस्त हैं कि हमें यह पता ही नहीं कि हमारे पड़ोसी देश अफगानिस्तान में आज राष्ट्रपति चुनाव हो रहा है। अफगान राष्ट्रपति, भारतीय राष्ट्रपति की तरह ध्वज-मात्र नहीं होता बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह लगभग सर्वशक्तिमान होता है। राज्य की शक्तियों और नीतियों का वही मूल स्रोत होता है। इस पद पर लगातार 13 साल से हामिद करजई जमे रहे हैं। वे दो बार जीते हैं, लेकिन कोई भी व्यक्ति लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन सकता है। इसीलिए वे चुनाव से बाहर हैं, लेकिन मेरी राय में...
    April 5, 04:38 AM
  • मजबूरी का नाम नरेंद्र मोदी
    इस समय नरेंद्र मोदी एक मजबूरी बन गए हैं। जो लोग मोदी से नफरत करते हैं, वे भी मानने लगे हैं कि मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनने से कोई ताकत रोक नहीं सकती। जो लोग मोदी को कभी मौत का सौदागर बोलने में गर्व का अनुभव करते थे, वे अब उस मुहावरे का इस्तेमाल नहीं करते। इस मुहावरे से उन्हें परहेज हो गया है। जो अफसर मोदी के विरुद्ध झूठी-सच्ची गवाहियां देने को उतावले रहते थे, अब उनकी भी कोई आवाज सुनाई नहीं पड़ती। इन लोगों की राय में इतना फर्क कैसे आ गया? ऐसा क्या हुआ है कि मोदी-विरोधी सभी ताकतें ठंडी पड़ती जा रही...
    March 29, 03:14 AM
  • भाजपा में बुजुर्गों की उपेक्षा क्यों?
    राजनीति बड़ी जादूगरनी है। यह अच्छों-अच्छों को बड़ा नाच नचा देती है। इस समय भाजपा इस तरह सज-संवर रही है, जैसे कि 16वीं लोकसभा चुनाव का तोरण वही मारेगी। इसमें भी शक नहीं कि जनता में उसका समर्थन बढ़ता जा रहा है और उसके विरोधी दलों की हिम्मत दिनोंदिन पस्त होती जा रही है। लेकिन खुद इस पार्टी का हाल क्या है? यह पार्टी अपने जिस कार्यकर्ता को देश का नेता बनाना चाहती है, उसे वह खुद ही जाने-अनजाने सवालों के घेरे में धकेल देती है। रह-रहकर सवाल उठता है कि नरेंद्र मोदी को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अभी तक दिल से...
    March 22, 05:58 AM
  • नेता तो कई हैं, नीति कोई नहीं
    लोकसभा का चुनाव-प्रचार जोरों से शुरू हो गया है। नेतागण अपनी पार्टियां और चुनाव-क्षेत्र बदल रहे हैं। चुनाव-सर्वेक्षण किसी पार्टी की जीत और किसी की हार की भविष्यवाणियां कर रहे हैं। चुनाव अब मुश्किल से सिर्फ एक माह दूर हैं, लेकिन अभी तक देश के 81 करोड़ मतदाताओं को यह पता नहीं चल पाया है कि किस पार्टी या किस नेता को वे वोट दें तो क्यों दें? सभी पार्टियां और प्रधानमंत्री पद के सभी घोषित और अघोषित उम्मीदवार आजकल प्रचार-माध्यमों को जैसी बातें कह रहे हैं या अपनी-अपनी जन-सभाओं में जिन मुद्दों पर रोशनी डाल...
    March 15, 06:37 AM
  • 'आप' के लिए तो नौटंकी ही भली
    आम आदमी पार्टी का आचरण क्या आम आदमी जैसा है? यह बुनियादी प्रश्न उनके नेताओं ने पहले दिन से ही स्वयं खड़ा कर रखा है। अब गुजरात और दिल्ली की ताजा घटनाओं ने यह सिद्ध किया है कि आप के नेताओं और उसके कार्यकर्ताओं ने अपनी पिछली विफलताओं से कोई सबक नहीं सीखा है। खिड़की गांव में अफ्रीकी महिलाओं के साथ धींगामुश्ती करना और फिर रेल भवन के सामने धरना देकर सीनाजोरी करना आखिर किस बात का प्रतीक था? यह सुशासन तो लेश-मात्र भी नहीं था। हां, उससे आंदोलनकारी की छवि जरूर उभरती है, लेकिन आंदोलनकारी भी कैसे? जिम्मेदार,...
    March 8, 04:09 AM
  • नौसेनाध्यक्ष का ही इस्तीफा क्यों?
    हमारी नौसेना के प्रमुख एडमिरल देवेंद्र कुमार जोशी के इस्तीफे ने पूरे देश को भौंचक कर दिया है। यही इस्तीफा यदि रक्षामंत्री एके एंटनी का होता तो किसी को भी आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में यही होता है। जब कभी कोई असाधारण दुर्घटना सरकार के किसी भी विभाग में होती है तो उसकी जिम्मेदारी उस विभाग का मंत्री लेता है या प्रधानमंत्री लेता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन विभागों में जब भी कोई अच्छा काम होता है तो उसका सेहरा मंत्री या प्रधानमंत्री के सिर पर बंधता है। क्या हमें...
    March 1, 04:59 AM
  • स्वार्थ के आगे राष्ट्रहित की बलि
    जरा सोचिए कि सर्वोच्च न्यायालय ने रोक न लगाई होती तो कितना बड़ा अनर्थ हो गया होता। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सभी सातों हत्यारों को आज तमिलनाडु सरकार रिहा कर देती। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता का दुस्साहस तो देखिए कि उन्होंने अदालत के फैसले का दुरुपयोग कितनी जल्दी कर लिया। इधर अदालत ने तीन अपराधियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला नहीं कि उधर जयललिता सरकार ने उसी दिन उन तीनों को रिहा करने का फैसला कर लिया। इतना ही नहीं, अन्य चार हत्यारे जो तमिलनाडु की जेल में उम्र कैद काट रहे...
    February 22, 05:10 AM
  • लिखने की आजादी का अर्थ यह नहीं
    वेंडी डॉनिगर की किताब, द हिंदूज : एन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री को लेकर भारत के अंग्रेजी अखबारों में जबर्दस्त हाय-तौबा मची हुई है। शायद ही कोई अंग्रेजी अखबार ऐसा हो, जिसने उक्त पुस्तक या उसकी लेखिका के पक्ष में आंसू न बहाए हों। इस पुस्तक को अंतरराष्ट्रीय ख्याति के प्रकाशक पेंगुइन ने छापा था और अब उसने इसे रद्द करके बेचने से मनाकर दिया है। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि दिल्ली की एक संस्था शिक्षा बचाओ समिति ने इस पुस्तक के विरुद्ध मुकदमा चला रखा था। वेंडी डॉनिगर की किताब का फैसला सामने आता, उसके पहले ही...
    February 14, 05:44 AM
  • संसद संप्रभु पर राजनीति महाप्रभु
    यह 15वीं लोकसभा भी क्या लोकसभा है? ऐसी लोकसभा तो चीनी हमले के बाद या आपातकाल और बोफोर्स घोटाला उजागर होने के दौरान भी नहीं रही। इस यूपीए-2 सरकार में शासन करने की इच्छा इतनी क्षीण हो गई है कि उसके अपने सांसदों ने इस सत्र में उसकी लू उतार दी है। क्या आपने कभी यह सुना है कि सत्तारूढ़ दल के सांसद अपनी सरकार के विरुद्ध ही नारे लगा रहे हों। इतना ही नहीं, अपनी ही सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव भी ला रहे हों। संसद के इस अंतिम सत्र की जो दुर्गति हो रही है, उसे पूरा देश देख रहा है। यह कैसी सरकार है, जिसने...
    February 8, 05:15 AM
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