जीने की राह
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  • संबंधों की समझ का त्योहार राखी
    यदि दो लोग मिल रहे हों, तो यह मान लेते हैं कि हम दो व्यक्ति हैं। दो मित्र हो सकते हैं, पति-पत्नी हो सकते हैं। किंतु जब भी दो लोग मिलेंगे तो वे दो नहीं छह लोग होते हैं। सुनने में अजीब लगेगा। दरअसल, हम शरीर, मन और आत्मा से बने हैं। जब हम केवल देह पर टिके होते हैं तब हम अलग व्यक्ति होते हैं। मन और आत्मा के स्तर पर अलग, लेकिन होते संयुक्त हैं। इसलिए जब दो व्यक्ति मिलते हैं तो वे दो नहीं छह होते हंैं। संभव है कि एक व्यक्ति आत्मा पर तो दूसरा शरीर पर टिका है। पति-पत्नी चूंकि सर्वाधिक निकट होते हैं तीनों ही...
    August 29, 03:11 AM
  • दूसरों की उपलब्धि से प्रेरणा लें
    कई बार ऐसा हो जाता है कि जो हमें नहीं मिला वह दूसरों को मिल जाता है। दूसरे यदि अपरिचित हों तब तो हमें इतनी दिक्कत नहीं होती। समस्या तब होती है जब हमें न मिले और हमारे परिचित को वह प्राप्त हो जाए। तुलना और बेचैनी शुरू हो जाती है और यदि परिपक्वता न दिखाई तो अनजाने में ही हम आलोचना पर उतर आते हैं। आपको नहीं मिला तो आपने आलोचना का सहारा ले लिया, जबकि होना यह चाहिए कि ऐसे समय हम विश्लेषण करें कि यदि उसे मिला है तो हमें क्यों नहीं मिला। सारा जोर इस पर लगाइए कि हमारे भीतर वे कौन-सी कमजोरियां थीं या हमारे...
    August 28, 04:06 AM
  • रिश्तों की गरिमा को समझें
    हमारे शास्त्रों मेें यह विचार अलग-अलग ढंग से आया है, लेकिन है बड़ा सुंदर और गहरा। विचार यह है कि जीवन ही जीवन को खाता है। हम जिन संसाधनों का उपयोग कर रहे होते हैं, उनके हम तक आते-आते कई जीवन नष्ट हुए हैं। भोजन कहीं न कहीं प्रकृति के किसी हिस्से को मारकर ही आया है। और तो और यह भी लिखा गया है, निज मन ही निज तन को खाए, तो हमारा मन ही हमारे तन को खा जाता है। किंतु जीवन में एक क्रिया ऐसी भी है जो जीवन को बढ़ाती है और वह है योग। पतंजलि के अष्टांग योग का सबसे सही उपयोग हनुमानजी ने अपनी जीवनशैली में किया है। जब...
    August 28, 03:34 AM
  • अतीत से सीख लें, उलझन में न पड़ें
    जो लोग सफलता को लेकर बहुत गंभीर होते हैं वे परिश्रम भी बहुत करते हैं। फिर परिश्रम नशा बन जाता हैै। अधिकांश परिश्रम भविष्य पर निगाह रखकर किया जाता है। हमें यह प्राप्त करना है, हमारा यह लक्ष्य है। ऐसा होना भी चाहिए। थोड़ा होश रखकर परिश्रम का एक हिस्सा अतीत के लिए भी बचाएं। अतीत की कुछ घटनाएं हमारे भीतर निगेटिविटी पैदा करती हैं और उसे मिटाने के लिए परिश्रम चाहिए, लेकिन हम परिश्रम की सारी ऊर्जा भविष्य के लिए झोंक चुके होते हैं। अपने ही अतीत की घटनाओं से दूर खड़े रहने के लिए मन को खींचना पड़ेगा।...
    August 26, 02:44 AM
  • आचरण की मर्यादा कभी न छोड़ें
    अधिकार या नेतृत्व जिनके हाथों में आ जाते हैं उनमें से अधिकतर सेवा और कर्तव्य की जगह निज हित, मौज-मस्ती में डूब जाते हैं। काम वही करते हैं, जिसमें उनकी बुरी नीयत पहले से बनी हुई थी। खूब सुख आ जाए या बहुत दुख आए तो मनुष्य अमर्यादित आचरण करने लगता है। सामान्य व्यक्ति ऐसा करे तो फिर भी ठीक है, लेकिन जिन्हें विशिष्ट कार्य का दायित्व सौंपा गया हो, उनका ऐसा करना निराशाजनक है। सीताजी के विरह के बाद भी श्रीराम का व्यवहार संतुलित था। उनके हाथों दुगुर्णों के विनाश के अभियान का बड़ा नेतृत्व सौंपा गया था।...
    August 25, 02:49 AM
  • भीतर उतरकर रिश्ते ताजा करें
    यदि ध्यान से सुनें तो हमारे भीतर बीती उम्र की आवाजें सुनाई देंगी। और गहरे उतरें तो कुछ लोगों के चेहरे दिख जाएंगे जो आपको संबोधित कर रहे होंगेे। आधुनिक जीवनशैली में रिश्तों को पकड़कर जीने में किसी की रुचि नहीं है। लोग माता-पिता तक से संबंध छोड़ने को तैयार हैं। ऐसे में अन्य रिश्ते गंभीरता से कौन निभाएगा? इसलिए हम कुछ समय अपने भीतर उतरें और स्वयं को पहचानें, क्योंकि भीतर से आप खुद को नहीं जोड़ेंगे तो आप धीरे-धीरे कमजोर होते जाएंगे। कमजोर लोग किसी भी रिश्ते के साथ न्याय नहीं कर सकते। जब आप छोटे थे...
    August 22, 02:49 AM
  • अपने परिवार को सत्संग से जोड़ें
    संसार में रहते हुए हम स्वयं कुछ बातों से प्रेरित होते हैं और दूसरों को भी प्रेरित करते हैं। हम शिक्षा, व्यवसाय, प्रतिष्ठा अर्जित करने जैसे कई बातों के लिए प्रेरित करते हैं। इसके साथ जब भी अवसर मिले, अपने लोगों को सत्संग के लिए जरूर प्रेरित करें। इसे केवल कथा-प्रवचन न समझ लिया जाए। जहां भी अच्छे विचार मिलें, जीवन ऊपर उठाने के लिए जो भी सिद्धांत मिलें वह सत्संग है। हम सुखी जीवन के लिए, जितने सूत्र दूसरों को देते हैं यदि उसमें सत्संग शामिल नहीं हुआ तो बुद्धि, बल, शिक्षा यह सब घातक भी हो सकते हैं,...
    August 21, 04:02 AM
  • विनम्रता से आती है शांति
    प्रयास कीजिएगा कि दिनभर में जितने भी लोग मिलें उनको कुछ न कुछ जरूर दीजिए। कोई ऐसी चीज दीजिए, जिसमें आपको आर्थिक दबाव न हो और सामने वाले की स्मृति में स्थायी रूप से टिक जाए। ऐसी ही एक चीज है विनम्रता। कहते हैं विनम्रता भक्त का गहना होती है। आपका किसी भी धर्म से संबंध हो, लेकिन भक्ति में विनम्रता जरूर उतारिए। छोटे व्यक्ति से मिलें या बड़े से, विनम्रता मत खोइए। हममें से अधिकांश लोगों का कभी रेलवे स्टेशन पर कुली या ऑटो वाले से झगड़ा जरूर हुअा होगा। ये भले लोगों के बीच चलने वाली स्थायी लड़ाइयां हैं।...
    August 20, 08:12 AM
  • भीतर के विष का विसर्जन करें
    जब भी नाग का नाम आता है उसे विष के साथ ही जोड़ा जाता है। सर्पदंश मतलब मौत की दस्तक। परंतु भारतीय संस्कृति ने तो पेड़-पौधे और प्राणियों को अपने ढंग से प्रतीक मानकर पूजा है। भगवान शंकर का आभूषण है सर्प। कथा है कि समुद्र मंथन से निकले विष का जब शिवजी पान कर रहे थे तो विष की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिर गई। जिन जीव-जंतुओं ने उसे पी लिया वे विषैले हो गए, इसलिए वे निर्दोष हैं। विषैला होने के कारण जंतु को मार डाला जाए, यह अपराध है। विष की बात करें तो बहुत सारा विष आधुनिक मनुष्य ने भी निर्मित किया है, जो...
    August 19, 02:57 AM
  • अध्यात्म में संसार का समाधान
    जीवन और संसार दोनों गतिशील हैं। बदलते संसार को भौतिकता से पकड़िए। नित, नए हो रहे जीवन को आध्यात्मिकता से जानिए। स्थितियां चाहे निराशाजनक हों, प्रतिकूल हों इन दोनों से समझौता मत कीजिए। किष्किंधा कांड में हनुमानजी के माध्यम से सुग्रीव को राज्य मिल गया। श्रीराम ने कहा, चार मास के लिए मैं वन में जाता हूं, आप राज करो और उसके बाद सीताजी को ढूंढ़ेंगेे। उनके जीवन का सर्वाधिक विपरीत काल चल रहा था। कोई और होता तो निराशा में टूट जाता, लेकिन श्रीराम हमें समझा रहे हैं कि हमारे पास सबसे बड़ी पूंजी हमारे होने...
    August 18, 03:32 AM
  • प्रतियोगिता के साथ प्रेम सिखाएं
    आजकल जीवन में जितनी बातें सिखाई जाती हैं उनमें से एक है प्रतियोगिता। तीन बातों का अंतर ठीक से समझ लें - प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्द्धा और प्रतिद्वंद्विता। बच्चों की पढ़ाई शुरू होते ही प्रतियोगिता का भाव उनके भीतर पैदा कर दिया जाता है। विद्यालय में प्रवेश से प्रतियोगिता शुरू हो जाती है। बच्चा समझ जाता है कि जहां प्रवेश में ही प्रतियोगिता है वहां पढ़ाई में क्या होगा? धीरे-धीरे प्रतियोगिता से भरा यह व्यक्तित्व बड़ा होने लगता है। जीवन के क्षेत्र बदलने पर यही प्रतियोगिता प्रतिस्पर्द्धा में बदल...
    August 14, 03:21 AM
  • ऐसे जानें अपना मूल व्यक्तित्व
    हमारे व्यक्तित्व का बड़ा हिस्सा दूसरों द्वारा तैयार किया गया है। माता-पिता के लालन-पालन से एक हिस्सा तैयार हुआ। फिर जीवन में मित्र आए, अच्छे और बुरे दोनों किस्म के लोग हमें मिले। सबने अपनी छाप छोड़ी और व्यक्तित्व का नया हिस्सा तैयार हो गया। ऐसे में अपना मूल व्यक्तित्व जानना हो तो यह प्रयोग करें। कुछ भजन तो ऐसे होते हैं कि यदि उन्हें ठीक से सुन लिया जाए तो रूपांतरण आसानी से घट सकता है। जब भजन सुनें तो जैसे तीन अंतरे का भजन हो तो पहले अंतरे के शब्दों को आंख बंद करके एक कान से भीतर लाएं और दूसरे से...
    August 13, 06:15 AM
  • मध्यस्थता में तटस्थ होना जरूरी
    यदि आप किसी बड़े पद पर हैं, आपके निर्णय को लोग मान्य करें और किसी विवाद में लोग आपकी मध्यस्थता चाह रहे हों तो ऐसे समय यदि आप सावधान नहीं हैं तो पक्षपात कर सकते हैं। लोगों की अपेक्षा है कि आप तटस्थ होकर काम करें। तटस्थ रहने के लिए अध्यात्म की जरूरत है। आधुनिक प्रबंधन आपको किसी को निपटाना, कोई आपको न निपटाए इससे बचना सिखा सकता है, लेकिन तटस्थता आत्मा के निकट होने पर सधती हैै। आप जितना शरीर पर टिकेंगे आक्रामक होने की उतनी संभावना रहेगी। षड्यंत्र की सूझ-बूझ आपके भीतर हो सकती है, लेकिन मध्यस्थता में...
    August 12, 03:49 AM
  • उचित हों लक्ष्य प्राप्ति के साधन
    हम खाली कभी नहीं बैठते। कुछ न कुछ काम हर समय चलता रहता है। सोते वक्त नींद अपना काम कर रही होती है, जिससे जागने के बाद किए काम प्रभावित होते हैं। साधकों व भक्तों को सिखाया जाता है कि कोई भी काम जागरूक रहकर, होश में करें। इससे हम उद्देश्य प्राप्ति के लिए गलत साधन उपयोग में नहीं लाएंगे। लक्ष्य तक पहुंचने के लिए साधन तो सही हों, लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्णर यह है कि जब आप अपने लक्ष्य पर पहुंच जाएं तब भी जिन साधनों का उपयोग कर रहे हैं वे सही होने चाहिए। देखा जाता है कि लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सही...
    August 11, 03:05 AM
  • आत्म परीक्षण से क्रोध काबू करें
    क्रोध करने वाले लगभग सभी लोग यह चाहते हैं कि उनका क्रोध करना छूट जाए। गुस्सैल से गुस्सैल आदमी भी इसे अपनी कमजोरी मानता है। कई लोग तो क्रोध करने के बाद उदासी में भी डूब जाते हैं। क्रोध समाप्त हो इसके लिए एक छोटी-सी सोच अपनी जीवनशैली में जरूर उतारें। जब कभी खाली बैठे हों व ऐसी स्थिति न हो कि क्रोध आने वाला है, तो थोड़ा अपने जीवन में पीछे जाइए। यदि आप 40 साल के हैं तो आयु को तीन भागों में बांट लें। फिर देखिए कि आपके जीवन में ऐसी कौन-सी घटनाएं घटी थीं। हर उम्र के पड़ाव की जड़ में जाकर आप निश्चित रूप से...
    August 8, 02:56 AM
  • बच्चों को बाग में जरूर ले जाएं
    बहुत से युवा माता-पिता अपनी भूमिका के मामले में अपरिपक्व होते हैं। कुछ तो अब भी उसी पुरानी दुनिया में डूबे रहते हैं। वे माता-पिता बनने के बाद भी विवाह पहले की मौज-मस्ती छोड़ना नहीं चाहते। आप जैसे ही माता-पिता बनते हैं सबसे पहले आपको दिनचर्या में परिवर्तन लाना पड़ेगा। फिर सोच में परिवर्तन लाएं। अगर मां-बाप ठीक से नहीं जुड़ते हैं, तो इसकी कीमत बच्चा चुकाएगा। इसलिए जैसे ही आप मां-बाप बनें आपको अपने पुराने संबंधों, पुरानी जीवनशैली में परिवर्तन करना ही होगा। कई मां-बाप इसमें चिढ़ जाते हैं। ऐसे में...
    August 7, 04:46 AM
  • स्वीकृति से खत्म करें तनाव
    जब भी आप किसी को बदलने का प्रयास करेंगे, तो वह दबाव में आएगा और झगड़े शुरू हो जाएंगे। पति-पत्नी के बीच मतभेद और झगड़े के जितने कारण हैं उनमें बड़ा कारण है एक-दूसरे को बदलने में जुटे रहना। पति चाहता है मेरे हिसाब से चले और पत्नी के अपने आग्रह होते हैं। दोनों एक-दूसरे का व्यक्तित्व बदलते-बदलते सीमाएं लांघ जाते हैं और अस्तित्व बदलने का प्रयास करने लगते हैं। जब बात अस्तित्व पर आती है, तो फिर विद्रोह अपने-अपने ढंग से होने लगता है। दोनों में से जो भी दबे वह डिप्रेशन में डूब जाता है। यदि दोनों ईमानदारी से...
    August 6, 06:13 AM
  • उपकार में अहंकार मौजूद न हो
    उन अवसरों को तलाश करते रहिए, जिनमें हम दूसरों के लिए मददगार साबित हो जाएं। चाहे व्यक्ति समर्थ हो या असमर्थ। लोगों को यह अहसास दिलाना कि हम उनके हैं या उनके हो सकते हैं, अपने आप में एक बहुत बड़ी पूजा है। हमारा प्रभाव और स्वभाव दोनों ही दूसरों के काम आ सकें तो यह हमारी उपलब्धि होगी। जो असमर्थ हैं, कमजोर हैं वह तो मदद पाने के लिए बेताब रहते ही हैं। हम इतने योग्य हो जाएं कि समर्थ लोग भी उस मौके की तलाश में रहें, जिसमें हम उनके लिए मददगार बन सकें। सहयोग, मदद और एहसान इन तीनों में जो भी अंतर है वह अहंकार का...
    August 5, 03:01 AM
  • हम से इस प्रकार मिलते हैं भगवान
    भगवान अपने भक्तों से किस ढंग से मिलते हैं यदि यह जानना हो, तो उनकी कथाओं को पढ़ना चाहिए। श्रीराम केवट से मिले हों, श्रीकृष्ण ने सुदामा से क्या व्यवहार किया? बुद्ध से उनके भिक्षु जब सवाल-जवाब करते थे तो किस प्रकार होते थे? महावीर और नानक के निकट जाकर लोग कैसा महसूस करते थे? मोहम्मद साहब के खास लोगों ने उनमें क्या देखा? ये सब ईश्वर के रूप हैं, उनके प्रतिनिधि हैं। यदि हम इनको ठीक से समझ लें, तो हम जान जाएंगे परमात्मा अपने भक्तों से किस तरह मिलता है। किष्किंधा कांड के संबंध में शंकरजी पार्वतीजी को कथा...
    August 4, 03:45 AM
  • सावन में क्रोध, अहंकार मिटा दें
    हम परिवार में दो ढंग से जी सकते हैं। पसंद के आधार पर या प्रेम के आधार पर। पसंद-नापसंद को घर के बाहर रखें। संसार में पसंद-नापसंद के साथ रहना व्यावहारिक घटना है, ऐसा करना भी चाहिए। परंतु परिवार में यदि हम कहें कि यह रिश्ता हमें पसंद है, यह पसंद नहीं है तो परिवार बोझ बन जाएगा और टूट भी सकता है। परिवार में सिर्फ प्रेम रखिए। जहां प्रेम है वहां पसंद-नापसंद का सवाल ही नहीं उठता। परिवार दो कारणों से टूटते हैं - अहंकार और क्रोध। पसंद-नापसंद की वृत्ति इन्हें जन्म देती है, लेकिन प्रेम दोनों को गला देता है।...
    August 1, 03:07 AM