जीने की राह
Home >> Abhivyakti >> Jeene Ki Rah
  • आलसी होकर बैठना संतोष नहीं है
    कहा है कि संतोषी सदा सुखी। परंतु आज का युवा कहेगा कि यह तो जीवन ध्वस्त करने जैसी बात है। इस दौर में जिसने संतोष किया समझ लीजिए वह पिछड़ गया, इसलिए संतोष शब्द को ठीक से समझना होगा। मनुष्य के जीवन की खूबी यह है कि वह कुछ न कुछ देता रहता है, इसलिए हमारी अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। यहीं से असंतोष का जन्म होता है। इसका दूसरा नाम अशांति है, लेकिन कुछ लोगों ने इसे प्रगति नाम भी दिया है। जिससे मनुष्य आगे बढ़ता है, महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करता है वह असंतोष नहीं, अति आग्रह है। यह तो तय है कि संतोषी व्यक्ति सुखी...
    June 25, 03:04 AM
  • ज़िद को योग से जोड़ें, शुभ होगा
    आजकल ज्यादातर माता-पिता यह शिकायत करते हैं कि बच्चे बहुत ज़िद्दी हो गए हैं। हमें ज़िद शब्द की परिभाषा ठीक से समझनी चाहिए। बिना विवेक के जो मांग की जाती है और उसकी पूर्ति तत्काल हो जाए, जब यह अति आग्रह होता है तो वह ज़िद है। बच्चों में विवेक की कमी होती है और मांगी गई वस्तु उसी समय चाहते हैं। न मिले तो ज़िद अपने एक्टिव रूप उपद्रव में बदल जाती है, लेकिन ज़िद यदि विवेक से जुड़े तो वह संकल्प में बदलती है। जिस ज़िद से हम बड़े लक्ष्य प्राप्त करते हैं उसके नीचे संकल्प काम कर रहा होता है। तो अपरिपक्व संकल्प ज़िद...
    June 24, 06:28 AM
  • पति-पत्नी एेसे दूर करें कलह
    कामकाजी महिलाओं को जितनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है उतना पुरुषों को नहीं करना पड़ता यह तो तय है। एक पुरानी कहावत है, औरत घर से निकली समझो हाथ से निकली। यहां दो बातें हैं- हाथ और घर। कहावत बनाने वाला घर को स्त्री के लिए सबसे सुरक्षित स्थान मानता होगा। हाथ का मतलब है नियंत्रण। इसी हाथ के नियंत्रण ने पुरुष को शोषक बनाया और स्त्री शोषित होती रहे ऐसी व्यवस्था दी। शिक्षा का विस्तार हुआ और महिलाएं कामकाज के लिए घर से निकलने लगीं तब उनके जीवन में कुछ कलह के केंद्र बने। वैसे तो संसार की सबसे पहली...
    June 23, 05:22 AM
  • हर घटना को साक्षी भाव से देखें
    दूसरों के मामले में कई बार हम वे बातें सोच लेते हैं, जिनका उस व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं होता। हम किसी को फोन करें और व्यस्तता के कारण वह न उठाए तो हम मन ही मन सोचने लगते हैं कि यह इतना बड़ा हो गया कि हमें अवॉइड कर रहा है। अपने बच्चों, जीवनसाथी के भी फोन नहीं उठाने पर भी उनके लिए हमारे विचार ऐसे ही होते हैं। कभी सार्वजनिक रूप से किसी ने ठीक से हमसे चर्चा न की हो तो हमारा मन उसको आलोचना में घेर लेता है। हम काफी समय ऐसे ही चिंतन में लगा देते हैं, जबकि घटना वैसी नहीं होती। इससे ऊर्जा भी नष्ट होती है और...
    June 22, 03:54 AM
  • हनुमानजी के जरिये योग से जुड़ें
    हनुमानजी से बड़ा कोई योगी नहीं। यह कोई दावा नहीं, मान्यता-सी है। सच तो यह है कि योग सबके लिए है। इसे किसी धर्म से जोड़ना नादानी होगी। किंतु यदि किसी को जानना है कि योग देता क्या है तो उसे हनुमानजी से परिचय जरूर करना चाहिए। श्रीराम ने हनुमानजी को साथ इसीलिए रखा, क्योंकि वे जानते थे कि जो बहुत बड़ा अभियान मुझे पूरा करना है उसमें आने वाली बाधाएं कोई योगी ही पार करा सकता है। हम भी ध्यान रखें हमारा लक्ष्य श्रीराम जैसा ही है। रावण चारों तरफ मौजूद हैं। रावण मतलब सफलता की ऊंचाइयों पर बैठा हुआ व्यक्ति, जो अब...
    June 21, 03:25 AM
  • योग-ध्यान से अहंकार पर काबू पाएं
    हर मनुष्य के शरीर में कुछ बातें ऐसी हैं, जो उसे खूब परेशान करती हैं। परेशान व दुखी होने के लिए जरूरी नहीं है कि आक्रमण बाहर से हो। हमारे भीतर भी कुछ ऐसा होता है, जिसके कारण हम खुद बहुत दिक्कत में आ जाते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि हमारे शरीर में सबसे ज्यादा परेशान करने वाली चीज है हमारा अहंकार और सबसे ज्यादा न परेशान करने वाली चीज है हमारी सरलता। अहंकार हमें बात-बात पर परेशान करता है, क्योंकि तुलना से अहंकार को बहुत बेचैनी होती है। दूसरे के पास यदि कार है तो हमारा अहंकार अंगड़ाई लेने लगेगा। हमारे...
    June 18, 02:53 AM
  • सफलता से प्रभावित न हो जीवनशैली
    सफलता ऐसी होनी चाहिए जो जीवनशैली को नहीं, जीवन को प्रभावित करे। जब हम सफल होते हैं, तो सबसे ज्यादा प्रभावित होती है हमारी जीवनशैली।कार, बंगला, अच्छे कपड़े, अच्छे स्थानों पर घूमने जाना, महंगे शौक, ये सब जीवनशैली में आते हैं। ज्यादातर लोग सफलता को जीवनशैली से जोड़ते हैं और इसीलिए अशांत भी हो जाते हैं। सफलता जीवन को प्रभावित करने वाली होनी चाहिए, क्योंकि जीवन भीतर होता है। जीवन गहराई है, समग्र है और जीवनशैली एक छोटी-सी घटना। जब जीवन में उतरते हैं तो आप अहंकार शून्य होते हैं। अपने अलावा दूसरों को भी...
    June 16, 04:13 AM
  • विचारों की सफाई भी आवश्यक
    यह बहुत सीधी-सी बात है कि भीड़ में सही और गलत को छांटना मुश्किल हो जाता है। भीड़ में जो लोग होते हैं उनका अपना कोई विवेक नहीं होता और इसीलिए जब-जब आप भीड़ से घिरे हुए होंगे, अपने आप को अशांत पाएंगे। किसी की योग्यता टटोलना हो, कोई जिम्मेदारी सौंपनी हो तो उसे भीड़ से निकालकर अकेले में लाना पड़ता है। मनुष्य अकेला हो तो आप उसकी जिम्मेदारी तय कर सकते हैं। मनुष्यों की भीड़ की कहानी तो स्पष्ट है ही, लेकिन विचारों की भीड़ भी यही परिणाम देती है। हमारे भीतर जो विचार भीड़ की तरह आ जाते हैं, लगातार आने लगते हैं,...
    June 15, 02:43 AM
  • धैर्य से नेतृत्व का भरोसा जीतें
    हम कितने योग्य हैं इस बात को चार लोग समझते हैं। एक हैँ संसारी लोग, जिनसे हमारा बहुत गहरा नाता नहीं है। ये संसारी लोग हमारी योग्यता को थोड़ा-बहुत समझते हैं। दूसरा वर्ग होता है हमारे निकट के लोगों का। इनमें हमारे माता-पिता, भाई, बहन, जीवन साथी और रिश्तेदार हो सकते हैं। तीसरे हम खुद जो अपनी योग्यता से भली-भांति परिचित होते हैं। इन तीनों से सबसे ऊपर होता है भगवान। वह जानता है कि हम कितने सक्षम हैं और क्या कर सकते हैं। बाकी तीन जगह आप बड़ी-बड़ी बातें हांक सकते हैं परंतु ईश्वर के सामने सबकुछ साफ होता है।...
    June 14, 03:02 AM
  • भीतर से तैयारी देगी स्थायी खुशी
    आजकल खुश रहने की खूब बातेें की जाती हैं। यह बात सबको समझ में आ चुकी है कि 15-20 साल बाद खुशी जिंदगी के बाजार का सबसे महंगा प्रोडक्ट होगी। जिन्हें खुशी को स्थायी बनाना है, उन्हें शांति का मतलब समझना होगा वरना अस्थायी खुशी तो आसानी से मिलती रहेगी। हमारे ऋषि-मुनियों ने बड़ी सुंदर बात कही है कि खुश रहना है तो बहुत अधिक उठापटक न करते हुए बस, दो काम करो। पहला जब-जो करो, जमकर करो। खुद को शत-प्रतिशत उसमें झोंक दो। यदि नौकरी कर रहे हों तो जमकर सेवक बन जाओ। घर में माता-पिता हों तो शत-प्रतिशत माता-पिता बने रहो।...
    June 11, 03:16 AM
  • सत्संग बनकर दूसरों को सुख दें
    दार्शनिक क्षेत्र में प्राय: कहा जाता है कि यह कभी न भूलो कि जीवन के अंत में मौत के साथ क्या जाएगा? सिकंदर जब इस दुनिया से गया तो उसके दोनों हाथ खाली थे। यह बात सुनने में बिल्कुल सीधी लगती है। यदि इस संवाद के पीछे के दर्शन को ठीक से समझा जाए तो जीते-जी बहुत बड़ी उपलब्धि हाथ लग जाएगी। यह तय है कि अंत समय दुनिया ने जो आपको दिया होगा वह आप नहीं ले जा सकते, लेकिन जो आपने दुनिया को दिया होगा वह आपके साथ जरूर जाएगा। मृत व्यक्ति के साथ जाती हुईं चीजें दिखती नहीं, लेकिन स्मृति में होती हैं, चर्चा में होती हैं,...
    June 9, 03:16 AM
  • प्रशंसा व्यक्ति के काम की अधिक हो
    भाषा का अपना द्वंद्व होता है। इसका सीधा संबंध शब्दों से होता है। मनुष्य जीवन में शब्दों का बड़ा प्यारा प्रयोग है - प्रशंसा और आलोचना। कोई कितना ही मौन साधे इन दो स्थितियों से बच नहीं सकता। हमारी भाषा कैसी हो यह एक कला है। सार्वजनिक जीवन में तो ठीक है, लेकिन परिवार में भाषा और शब्द, कलह और प्रेम का कारण बन जाते हैं। जब किसी की प्रशंसा करनी हो तो सबके सामने करिए और आलोचना करनी हो तो एकांत में करिए। आइए, पहले प्रशंसा को समझ लें। प्रशंसा में दो गड़बड़ हो सकती है। सामने वाला भ्रम में डूब सकता है, अहंकार...
    June 8, 02:23 AM
  • कर्तव्य की स्पष्टता प्रमुख गुण
    जीवन में जो भी काम करें, स्वेच्छा से करें। स्वेच्छा यानी मनमर्जी नहीं, उस काम को करने के लिए अपने आप में स्पष्ट होकर पूरे व्यक्तित्व को स्वीकृति देना। तब जो भी काम करेंगे वह गलत नहीं होगा और सफलता के काफी निकट होगा। प्रसंग चल रहा है किष्किंधा कांड का। सीताजी की खोज के लिए दक्षिण दिशा में भेजे वानरों के दल का नेतृत्व अंगद कर रहे थे। सुग्रीव दल को समझाइश दे रहे थे। इसे अपने जीवन में लागू करने में फायदा ही होगा। तुलसीदासजी ने लिखा है-तजि माया सेइअ परलोका। मिटहिं सकल भवसंभव सोका।। माया (विषयों की...
    June 7, 04:22 AM
  • माला जपने से मिलती है भीतरी ऊर्जा
    पिछले दिनों सफर करते हुए एयरपोर्ट पर जब मैं माला जप रहा था तो एक बहुत पढ़े-लिखे युवक ने मुझे पूछा, मैं जानना चाहता हूं कि माला जपने से क्या होता है? मैं जानता था यदि मैं कहूंगा परमात्मा मिलेंगे, यह एक पूजा है तो यह उत्तर इसके किसी काम का नहीं है। तब मैंने उससे कहा, इससे शक्ति मिलती है। जाहिर है उसका अगला सवाल था कि इससे शक्ति कैसे मिल सकती है? यदि ऐसा है तो मैं भी माला जपूंगा, लेकिन साबित कीजिए। मैंने साबित किया और उस युवक ने आजकल माला रखनी शुरू कर दी है। जब हम मानसिक जप करते हैं तो हमारे भीतर घर्षण...
    June 4, 05:43 AM
  • वर्तमान के अभाव का आनंद उठाएं
    दुनिया जो हमारा मूल्यांकन करती है वह अधूरा ही होगा, लेकिन जब हम अपना मूल्यांकन स्वयं करें तब हमारा मूल्यांकन पूरा होगा। इसे आज की भाषा में यूं भी कह सकते हैं कि संसार ने जो हमारे ऊपर टैग लगाया है उसको यदि सही ढंग से पहना है, तो हमें अपना टैग भी लगाना पड़ेगा। हमारे अलावा हमें अच्छी तरह कोई नहीं जान सकता। इसे तब और लागू करें जब आप अपने वर्तमान में जो अभाव आपके सामने है, उसे सोच-सोचकर निराश हो रहे हों। बहुत सारे लोगों के पास वे सारी चीजें नहीं होतीं जो दूसरों के पास हैं, तब हम परेशान होते हैं कि हमारे पास...
    June 2, 03:24 AM
  • सफलता के लिए चाहिए प्रयोगधर्मिता
    जब काम आपकी हैसियत से बड़ा हो तो मन का एक हिस्सा कहता है ऐसा न करो, असफल हो जाओगे। देखिए, किसी भी काम को करने के लिए पहले सृजनधर्मिता यानी क्रिएटिविटी चाहिए। फिर उसके साथ प्रयोगधर्मिता भी चाहिए। यह सिखाएगी कि असफलता से निराश न होते हुए दूसरा प्रयास करें। एक बार मैंने गांव में कुआं खोदने वालों के साथ एक व्यक्ति देखा, जो तंत्र-मंत्र करके जमीन के नीचे कहां पानी है, बता देता था। किंतु वह दस जगह बताता, जिसमें से आठ पर पानी नहीं मिलता। उसने मुझसे कहा, हम निराश नहीं होते, लगातार लगे रहते हैं। उसने एक बात...
    June 1, 05:02 AM
  • मन, वचन व कर्म से एक होना जरूरी
    जब हमें कोई महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा जाए, वह तब पूरा होगा जब हमारे पास उसे करने का तरीका निराला होगा। चर्चा चल रही है किष्किंधा कांड के उस प्रसंग की जब वानरों को सीताजी की खोज का बड़ा दायित्व सौंपा गया था। सुग्रीव के मुंह से जो आदेश निकल रहे थे वे आज प्रबंधन के युग में किसी बड़ी जिम्मेदारी को पूरा करने के सबक हैं। तुलसीदासजी ने चौपाई लिखी, मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु संवारेहु।। भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी।। मन, वचन तथा कर्म से उसी का (सीताजी का पता लगाने का)...
    May 31, 02:58 AM
  • भीतरी संतुलन से क्रोध पर काबू पाएं
    आजकल अधिकतर लोगों के जीवन में क्रोध ने स्थायी ठिकाना बना लिया है। फर्क यही है कि कुछ थोड़ी देर गुस्सा करते हैं और कुछ ज्यादा देर तक गुस्सा रहते हैं। किंतु जीवन को एक आशा अभी भी है, क्योंकि गुस्सा करने वाले लोग बाद में पछताते हैं। यही पछतावा गुस्से से बाहर ले जा सकता है। मालूम पड़ जाता है कि किस परिस्थिति में हमें गुस्सा आने वाला है। ऐसे समय गुस्सा करने से पहले आंखें बंद कर खुद को संतुलित कर लें। असंतुलित व्यक्ति को क्रोध जल्दी जकड़ लेता है। व्यक्तित्व भीतर से संतुलित होगा तो क्रोध उससे टकराकर...
    May 28, 04:21 AM
  • अपने भीतर उतरें, बलशाली हो जाएंगे
    जीवन में जब कभी भी विपरीत परिस्थिति आए तो जरूर सोचिएगा कि विपरीत परिस्थिति सूर्यास्त जैसी हैं। क्योंकि सूर्यास्त का एक अर्थ यह होता है कि जिस समय आप सूर्य को डूबता देख रहे होते हैं, उस समय वह कहीं उग भी रहा होता है। इसलिए जब हालात खराब हो तो ठीक होने की संभावना बनी रहती है। जब लगे कि चीजें बिगड़ गई हैं तो थोड़ा एकांत साधिए। अपने आस-पास के लोगों से एक दूरी बना लीजिए। इसका यह मतलब नहीं है कि आप उदासी में डूब जाएं। इस दूरी को अलगाव जैसा न बनाएं। अलगाव का मतलब लोगों से कट जाना और दूरी का मतलब है एक...
    May 25, 04:26 AM
  • आदेश में भी विनम्रता का भाव हो
    दूसरों से काम लेना हो तो तीन तरीके अपनाए जा सकते हैं। येे किष्किंधा कांड में सुग्रीव ने बड़े अच्छे ढंग से पूरे किए थे। सीताजी की खोज में वानरों को भेजने के उनके आदेश में तीन स्तर थे- सबसे पहले समझाया, फिर निवेदन किया और फिर डराया। तुलसीदासजी ने लिखा- ठाढ़े जहं तहं आयसु पाई, कह सुग्रीव सबहि समुझाई। राम काजु अरु मोर निहोरा, बानर जूथ जाहु चहुं ओरा।। जनकसुता कहुं खोजहु जाई, मास दिवस महं आएहु भाई। अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाए, आवइ बनिहि सो मोहि मराएं।। अर्थात यह श्रीरामजी का काम है और मेरा अनुरोध है तुम...
    May 24, 04:20 AM