जीने की राह
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  • भावनाओं को ईश्वर के साथ जोड़ दें
    जीवन में कई तरह की दुर्घटनाएं होती रहती हैं। कुछ से शरीर, कुछ से मन तो कुछ में दिल टूट जाता है। हर दुर्घटना के पीछे मनुष्य की विशेष किस्म की लापरवाही काम कर रही होती है। मनुष्य का मतलब आप भी हैं और आपके सामने वाला भी। जैसे वाहन दुर्घटना में आप सावधान हैं, पर दूसरे की गलती आपको आहत कर जाएगी, इसलिए इतना प्रयास करें कि हम से हम ही आहत न हो जाएं। बहुत सारी दुर्घटनाएं भावनाओं पर नियंत्रण न होने के कारण भी होती हैं। अनियंत्रित भावनाएं मस्तिष्क पर दबाव डालती हैं। फिर मस्तिष्क तनाव पैदा करता है, जो क्रिया...
    06:08 AM
  • बच्चों की परवरिश में अहंकार न आने दें
    लालन पालन के दौर में क्या केवल बच्चे ही गलतियां करते हैं? लालन-पालन का अर्थ होता है बच्चों को गलत रास्ते से रोककर सही रास्ते पर डाला जाए। अगर गहराई से देखें तो लालन-पालन के दौरान सारी गलतियां केवल बच्चे करें ऐसा नहीं है। माता-पिता भी गलतियां कर जाते हैं, इसलिए उन्हें एक बात याद रखनी चाहिए कि बच्चे केवल अपनी गलतियों से बर्बाद नहीं होंगे। माता-पिता की भूलें भी उन्हें बर्बाद कर सकती हैं, इसलिए गलती हो जाए तो माता-पिता गलतियों का सामना गलत तरीके से न करें। अपनी गलती सही ढंग से स्वीकारें और दूर करें।...
    October 31, 06:20 AM
  • घर की ग्राहकी में विश्वास का कमाल
    पिछले दिनों बाजार अद्भुत रूप से गरम था। गरम इसलिए, क्योंकि इस पर किसी ने रोटी सेंकी तो किसी ने हाथ। किसी ने पूरा व्यक्तित्व ही झुलसा लिया। धन की गर्मी लेने और देने में पूरी तरह से काम कर रही थी। दिवाली का दौर होता ही ऐसा है। सब एक-दूसरे को सिर्फ ग्राहक समझ रहे थे। इस एक सप्ताह में मनुष्य के भीतर का ग्राहक निचोड़ लिया गया। खरीददारी की क्षमता ग्राहक का अहंकार बढ़ाती है। व्यापारी जानता है कि वस्तु की गुणवत्ता से अधिक ग्राहक के अहंकार पर काम करना है, इसीलिए दोनों के बीच विश्वास के लिए कोई जगह नहीं है।...
    October 30, 07:02 AM
  • पारिवारिक रिश्तों में मित्रता पैदा करें
    प्रत्येक व्यक्ति के भीतर योग्यता और कमजोरियां हैं। हमें बाहर से देखने वाले लोग तो वही समझेंगे, जो हम मेकअप करके उन्हें दिखाते हैं। कुछ ही रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनमें मनुष्य अपने आप को जैसा होता है, वैसा बता देता है। ऐसा ही एक रिश्ता होता है मित्रता का। लोग मित्रता करते ही इसलिए हैं कि वहां कुछ समय खुलकर जीने का मौका मिल जाता है, क्योंकि जब आप ओढ़ा हुआ आवरण हटा देते हैं तो बिल्कुल हल्के हो जाते हैं। पद-प्रतिष्ठा, दिखावे के बोझ में दबकर हम उदास रहने लगते हैं। शोहरत से नहीं, शांति मिलती है सहज होकर...
    October 29, 06:29 AM
  • करुणा को  भीतर से बाहर लाएं
    ऋषि मुनियों का संदेश है कि जीवन को जानना हो तो उसकी गति को पकड़ना पड़ता है। एक होती है बाहर से भीतर और दूसरी होती है भीतर से बाहर की गति। संसार बाहर से हमारे भीतर उतरता है व शुरू होती है अशांति। प्रेम और करुणा भीतर से बाहर बहती है तथा आती है शांति। जैसे बीज से वृक्ष निकलता है, ऐसे ही हमारे भीतर से अनेक पवित्र भावनाएं बाहर निकलने को तैयार हैं, उन्हें रोका न जाए। किष्किंधा कांड में हनुमानजी ने पहली मुलाकात में भगवान से कहा, आप स्वामी हैं, मैं सेवक हूं, आप मुझे क्यों भूल गए और भगवान श्रीराम ने उन्हें...
    October 28, 06:33 AM
  • निजी जीवन प्रेमपूर्ण होकर जिएं
    आजकल प्रबंधन के क्षेत्र में नए प्रबंधकों को यह सिखाया जाता है कि अपने काम से प्रेम करो। ऐसा करना भी चाहिए, लेकिन इसके पीछे के खतरे को न भूलें। काम से प्रेम करते-करते लोग प्रेम को भी काम बना लेते हैं, इसीलिए व्यवसाय में सफल लोग घरों में विफल होने लगते हैं, क्योंकि वहां व्यवसाय के तौर-तरीके नहीं चलते, वहां प्रेम, पूजा है। काम से प्रेम करने का अर्थ है ईमानदारी से परिश्रम करना और लेन-देन में सावधान रहना, लेकिन जब घर में प्रेम आता है, तो लेन-देन लुप्त हो जाता है। प्रेम सिर्फ देना जानता है। लेने का भाव आते...
    October 27, 05:51 AM
  • भक्ति जगाकर परिवार को बचाएं
    संसार में अधिकांश लोग घर-गृहस्थी को समझौते के आधार पर चला रहे हैं। जो जीवनसाथी मिला है, उसे बोझ मानकर ढो रहे हैं। जरा विचार करिए, हम परिवार में अन्य सदस्यों का मान रखने के लिए समझौता क्यों करें, क्योंकि समझौता लंबे समय में बोझ बन जाता है। ऐसा परिवार भीतर कलह की लहरें लेकर चलेगा। आज का दबाया हुए कलह का भविष्य में विस्फोट होना तय है। जिन्हें समझौते की गृहस्थी नहीं जीना हो, वे एक प्रयोग करें। हमारी संस्कृति के अनुसार भक्त हर जगह भगवान देखता है। जब यह विचार परिपक्व होता है तो वह सभी में परमात्मा...
    October 25, 06:48 AM
  • बांटने से बढ़ती है संपदा रूपी लक्ष्मी
    समुद्र मंथन में चौदह रत्न प्राप्त हुए थे। कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, अप्सराएं, मदिरा, पारिजात, चंद्रमा, शारंग धनुष, लक्ष्मीजी, धन्वंतरि और अमृत आदि। आठवें क्रम पर लक्ष्मीजी प्रकट हुई थीं। उस समय ऋषि-मुनि, देवताओं ने लक्ष्मीजी की कामना की, लेकिन उन्होंने नारायण का वरण किया था। यह साधारण-सी कथा, असाधारण अर्थ लिए हुए है। लक्ष्मीजी के प्रकट होने पर एक श्लोक लिखा गया है- रूपौदार्य वयोवर्ण महिमा क्षिप्त चेतस:। जब वे समुद्र से प्रकट हुईं तो उनके सौंदर्य, औदार्य, यौवन, रूप-रंग और महिमा से सबका चित्त खिंच...
    October 23, 06:13 AM
  • मस्तिष्क से कमाएं, दय से बचाएं
    हम धीरे-धीरे दिवाली की ओर बढ़ रहे हैं। यह एकमात्र त्यौहार है, जो जीवन की सबसे बड़ी आशा धन यानी लक्ष्मी लेकर आता है। कहते हैं धन मस्तिष्क से कमाया जाए और हृदय से बचाया जाए। धन की कमाई, बचत और खर्च तीनों में प्रकाश होना चाहिए, इसीलिए दिवाली में प्रकाश का महत्व है कि जागकर धन कमाना, होश में बचाना और शुद्धी से खर्च करना। मस्तिष्क की विशेषता है कि वह विश्वास में काम करता है। यदि आप विश्वास कर ही लें कि यह आपको उपलब्ध होना ही है, तो मस्तिष्क उस दिशा में चल पड़ेगा, इसीलिए कहते हैं असंभव शब्द सोए हुए दिमाग...
    October 22, 06:50 AM
  • ईश्वर से संसार नहीं, उन्हीं को मांगें
    कभी आपने सोचा है कि हम भगवान को क्यों याद करते हैं। चलिए, आज हनुमानजी के माध्यम से समझते हैं। बहुत सारे लोग परंपरा के कारण परमात्मा को याद करते हैं। कुछ लोग स्वार्थ-पूर्ति के लिए कर रहे हैं और शेष डर के कारण। बहुत कम लोग परमात्मा को इसलिए याद करते हैं कि उनमें कुछ ऐसी बात है जो संसार में कहीं नहीं है। सच्चा भक्त उनसे इसलिए जुड़ता है कि उसे सिर्फ भगवान चाहिए। हमारी चर्चा चल रही है किष्किंधा कांड में श्रीराम और हनुमानजी की पहली भेंट के प्रसंग की। हनुमानजी श्रीरामजी से कह रहे हैं और तुलसीदासजी लिखते...
    October 21, 06:03 AM
  • संसार के केंद्र में ईश्वर होना चाहिए
    यह चीज हमारी है, ऐसा दावा करते ही जिंदगी के सारे समीकरण बदलने लगते हैं। फिर आज की जीवनशैली में तो सारे प्रयास इसी के लिए होते हैं। हमारी हो जाए या हमें मिल जाए, इस आकांक्षा में ही अशांति छिपी है। जिन्हें शांति की खोज करनी हो, वे इस इच्छा को थोड़ा सा आध्यात्मिक मोड़ दे दें। जो चीज ज्यादा समय साथ रहती है, उससे मोह हो जाता है। बरसों साथ रहकर बिछड़ जाए तो वह आपकी तो नहीं हुई। परमहंस संत रामसुखदासजी कहा करते थे, आपकी न उत्पत्ति होती है, न विनाश होता है, न आरंभ होता है, न अंत होता है। फिर उत्पन्न और नष्ट होने...
    October 20, 06:41 AM
  • लक्ष्य केंद्रित जीवन में है सार्थकता
    बिना लक्ष्य का जीवन वैसा ही है जैसे बिना धड़कन का हृदय यानी मृत्यु। आज प्रतिस्पर्द्धा का जैसा माहौल है उसमें सालों और महीनों के लक्ष्य नहीं, दिन और उसमें भी हर घंटे के लक्ष्य तय करने पड़ेंगे। आप लक्ष्य आधारित जीवन जीते हैं तो फालतू बातों से खुद को बचा लेते हैं। लक्ष्य केंद्रित लोग बहस में नहीं पड़ते। बेकार के निदानों के चक्कर में नहीं उलझते। उन्हें शार्ट कर्ट भी ज्यादा पसंद नहीं आते। वे तो यह देखते हैं कि अपनी क्षमता का अधिकतम उपयोग कैसे करें। उनकी रुचि दूसरों को नीचा दिखाने से ज्यादा खुद को आगे...
    October 18, 07:15 AM
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