जीने की राह

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Jeene Ki Rah

  • कम खाएं, दीर्घायु और स्वस्थ रहें
    अपने से जुड़े लोगों को लंबी उम्र की दुआ देना स्वाभाविक है। लेकिन, केवल लंबी उम्र से कुछ नहीं होता।इन दिनों मनुष्य को जैसे बीमारियां चिपक रही हैं उससे यह समझ में आने लगा है कि लंबी उम्र को जीने के मौके भी होने चाहिए। कोई बीमार हो जाए और उम्र लंबी हो तो वह बोझ ही है। इसलिए जब कभी किसी को आशीर्वाद दें, स्वस्थ और दीर्घायु होने का दें। एक आशीर्वाद कम यानी संतुलित खाने का भी दीजिए। भोजन का उम्र और बीमारी से सीधा संबंध है। कहा गया है कि कम खाने से उम्र बढ़ने की गति कम हो जाती है। ध्यान रखिए, खाने का संबंध...
    07:00 AM
  • जीवन खोकर कमाना, निर्धनता की तैयारी
    ध्यान रखिएगा, आपकी अमीरी कहीं किसी रूप में गरीब न बना दे। गरीबी को लेकर दुनिया की परिभाषा है, जिसके पास धन-दौलत, वैभव और भोग-विलास के साधन न हो वह गरीब। लेकिन अध्यात्म कहता है असल गरीब वह जिसके भीतर का रस सूख जाए। यदि आप बहुत धन कमा चुके हैं, अमीरों में गिने जाते हैं तो धन कमाते हुए अपने भीतर का रस न सूखने दें। देखा जाता है कि जब आदमी पैसा कमाने की दौड़ में शामिल हो जाता है तो धीरे-धीरे भीतर से सूखने लगता है। कठोर, कर्कश, स्वार्थी और अशांत होता जाता है। धन कमाने के लिए बाहर से तो मिलनसार, विनम्र और खुश...
    March 22, 07:50 AM
  • भीतर की अव्यवस्था दूर करना ही धर्म
    कभी किसी कबाड़ी की दुकान देखिएगा। लगेगा इस अटाले की रिसाइकलिंग होगी तब ही यह कुछ बनेगा या इसे नष्ट करने के लिए भी कोई क्रिया करनी पड़ेगी। अब अपने भीतर झांकिए। हमने जो भी व्यक्ति, विचार, स्थितियां भीतर इकट्ठी कर रखी हैं वे बिल्कुल उस कबाड़ी की दुकान जैसी अव्यवस्थित हैं। गौर से देखिएगा, सबकुछ अधूरा है। अभी एक व्यक्ति को देखा, बीच में दूसरा आ गया, फिर तीसरा दिखने लगा। कोई अपना हो गया, कोई पराया लगने लगा। कभी विचारों से बिल्कुल गिर गए तो कभी एकदम श्रेष्ठ हो गए। यह सब कबाड़े की दुकान की तरह है। इसे एक...
    March 21, 07:19 AM
  • जीवनसाथी को गुरुभाव से देखना शुरू करें
    बहुत कम लोग ऐसे भाग्यशाली होंगे जिनके जीवन में तब गुरु आ गए हों जब वे माता-पिता से कुछ सीख रहे होते हैं। अधिकतर के जीवन में गुरु तब आते हैं जब वे यौवन में प्रवेश कर चुके होते हैं या गृहस्थी बसा लेते हैं। आज उन लोगों की बात, जिनके जीवन में गृहस्थी उतर चुकी है। गृहस्थी के केंद्र में जीवनसाथी होता है। यदि आपके जीवन में कोई गुरु है तो भी और नहीं है तो भी एक प्रयोग कीजिए। जीवनसाथी के प्रति कभी-कभी गुरु का भाव रखिए। उसे केवल शरीर या उम्र के साथ चल रहा साथी न मानते हुए उसमें गुरुभाव देखना शुरू कर दें। गुरु...
    March 18, 06:36 AM
  • देवस्थान में नि:स्वार्थ भाव की गूंज सुनें
    आजकल तो लोग बिना हिसाब-किताब के कोई काम करते ही नहीं। मैं इतना करूंगा तो मुझे कितना मिलेगा, यह मनुष्य की सोच बन गई है। हिसाब-किताब और लेन-देन की इस मानसिकता के साथ जब जीवन जीना मजबूरी हो गया है तो क्यों न इसका एक प्रयोग मंदिर में भी कर लें। मंदिरों में जो भीड़ देखी जाती है उसमें ज्यादातर तो सौदागरों की ही होती है। श्रद्धा और भरोसा लेन-देन की वस्तुएं हो गइ हैं। हमने यह दिया है और इतना मिल जाए ऐसी बात भगवान से करने में सभी माहिर हैं। भले ही मामला स्वार्थ का हो पर भगवान से बातचीत तो की जा रही है और यह...
    March 16, 07:05 AM
  • सवाल पूछते रहें और श्रद्धा से उत्तर सुनें
    आप सवाल पूछने में संकोची तो नहीं हैं? यदि ऐसा है तो अपना यह व्यवहार बदल लें और सवाल पूछने में देर न करें। यह आदत व्यावसायिक क्षेत्र के साथ पारिवारिक जीवन में भी बड़ी काम आएगी। किसी काम या बात की पूरी जानकारी निकालने के बाद भी जीवन में कुछ प्रश्न ऐसे खड़े होते हैं, जिनके उत्तर समय रहते दूसरों से ले लेने चाहिए। यदि आप माता या पिता हैं तो बच्चों की भलाई के लिए उनसे कोई सवाल जरूर पूछते रहें। कुछ सवाल तो जीवनसाथी से भी होते रहने चाहिए। सवाल पूछने में बुराई नहीं है लेकिन, सवाल पूछने का भी तरीका होता है।...
    March 15, 07:44 AM
  • त्योहार पर आप जो हैं उसे व्यक्त होने दें
    भारत जैसे उत्सव-त्योहार दुनिया में शायद ही कहीं होते हैं। यहां हर उत्सव के पीछे आनंद का संदेश और अनुशासन का मकसद है। ऐसा ही त्योहार है होली। पहले इसकी विशेषता थी कि जल और रंग के रूप में लोग एक-दूसरे में घुलमिल जाते थे। धीरे-धीरे इसका स्वरूप विकृत होता गया। बाद में आने वाली पीढ़ियों को एेसे घुलना-मिलना पसंद नहीं रहा। जल-संकट भी सामने आया। सूखी होली का आह्वान होने लगा। फिर भी इस त्योहार में एक-दूसरे की निकटता का भाव और बोध बना रहा। किंतु आने वाले वर्षों में शायद धीरे-धीरे यह भी समाप्त हो जाएगा।...
    March 11, 02:53 AM
  • अपने भीतर के बच्चे को बचाकर रखें
    लिखे और समझदार लोग भी कुसंग क्यों कर जाते हैं? हम सभी के भीतर एक नासमझ, नादान बच्चा होता है जिसका उम्र बढ़ने से कोई लेना-देना नहीं। आप युवा, प्रौढ़ और वृद्ध हो सकते हैं पर भीतर का बच्चा हमेशा बच्चा ही रहता है और सही-गलत का निर्णय नहीं ले पाता। कुल-मिलाकर आप बाहर से किसी भी उम्र में हों, भीतर का बच्चा गड़बड़ कर सकता है। इसके प्रति होश में रहिए। उसे जिंदा रखिए और बचाइए भी। जिनके भीतर का बच्चा जीवित रहता है, वे दुनियादारी के सारे काम करते हुए भी शांत और प्रसन्न रहते हैं। बच्चों की विशेषता होती है स्वभाव...
    March 10, 06:45 AM
  • धन, प्रतिष्ठा के साथ आदर जरूर कमाएं
    सभी लोग कुछ न कुछ कमाने निकले हैं। कमाना भी चाहिए। जीवन में धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा सब जरूरी है। कुछ लोग बहुत अधिक कमा लेते हैं तो कुछ सामान्य या उससे भी कम अर्जित कर पाते हैं। किंतु हर एक के पास कुछ न कुछ कमाई है। आदमी कमाता क्यों है? इसलिए कि जीवन का आनंद उठा सके और जरूरत पड़ने पर वह कमाई काम आ जाए। यदि कमाने निकल चुके हैं या कमा चुके हैं तो एक चीज जरूर हासिल कीजिए, वह है इज्जत। मान, आदर, कीर्ति, प्रतिष्ठा ये सब भी कमाई के रूप हैं। धन-दौलत और उससे मिलने वाले सुख को तो हम भोग लेते हैं पर बहुत कम लोग होते...
    March 9, 06:17 AM
  • भीतर उतरने पर मिलेगी कल्याण शांति
    किसी दार्शनिक ने कहा था- मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है। स्वतंत्रता उसकी पहली पसंद है, इसलिए यहीं से उसके जीवन में चुनाव शुरू हो जाता है। हम एक चीज चुनते हैं, दूसरी ठुकराते हैं। फिर तीसरी पकड़ते हैं, चौथी हाथ से निकल जाती है। चुनते-चुनते इतनी चिंता में डूब जाते हैं कि एक दिन जो पाना चाहते हैं वह मिल तो जाता है लेकिन, जीवन से शांति चली जाती है। लंका कांड में भगवान राम ने रावण से युद्ध से पहले शिवलिंग की स्थापना की और जो कहा उसे तुलसीदासजी ने ऐसे लिखा, संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।...
    March 7, 07:06 AM
  • इंद्रियों का सदुपयोग ही संयम है
    स्वतंत्रता नियंत्रित नहीं हुई तो स्वछंदता में बदल जाती है। स्वतंत्रता कहती है सब अपना-अपना काम करें और मैं भी अपने ढंग से अपना काम करूं। स्वछंदता कहती है मैं जब अपने ढंग से काम करूं तो कोई मुझे रोके-टोके नहीं। मैं किसी अनुशासन में बंधना नहीं चाहती। अनुशासन में यदि निजी स्वतंत्रता न रहे तो वह दबाव लगने लगता है। आज जब किसी व्यवस्था का अनुशासन लादा जाता है या कहें कि स्वेच्छा से उस अनुशासन से बंधना पड़े तो थोड़े दिन में लोग विद्रोह करने लगते हैं। लंबे समय यदि मन को मारकर नियम को पालना पड़े तो फिर...
    March 4, 05:13 AM
  • इन चार लोगों के करीब जरूर रहें
    कुछ अच्छा सीखने की तमन्ना हो तो जीवन को चार लोगों से जरूर गुजारिए। साइन्स और टेक्नोलॉजी तेजी से विकसित होती दुनिया की जानकारी दे देगी। जिस भी विषय में दक्षता चाहें उसकी जानकारियां जुटाना भी कठिन नहीं रहा। अब तो शोध भी टेक्नोलॉजी के साथ किया जा सकता है। इसमें शारीरिक और मानसिक श्रम के ढंग बदल जाते हैं लेकिन, एक चीज सदियों से जिस ढंग से सीखी जा सकती है, आज जिसकी जरूरत है और भविष्य में भी शायद उसमें बदलाव न आए, वह है जीवन की कला। इसे न तो कोई विज्ञान समझा सकता है न कोई तकनीक। यह स्वयं ही सीखनी है और...
    March 3, 05:34 AM
  • सोशल मीडिया के नशे से परिवार बचाएं
    नशा इनसान की फितरत में शामिल है। हर किसी के पास एक नशा है। रूप का, बल का, धन का और एक होता है खुद को भूल जाने का नशा। बाकी सारे नशे फिर भी चल सकते हैं पर जिस दिन इनसान खुद को भूलने के लिए कोई नशा करता है वह बहुत खतरनाक हो जाता है। हमारे देश में पुराने लोग गांजा, अफीम, शराब आदि का सीमित नशा करते थे। धीरे-धीरे ये बढ़ते गए और नशे की लत ने विकराल रूप ले लिया। कोकीन, चरस जैसी चीजें आ गईं, नशा जहर बनकर कई भारतीयों के रक्त में घुल गया। युवा पीढ़ी ने मस्ती के नाम पर नशे को अपना लिया। इनके दुष्परिणामों से बचने के...
    March 2, 06:24 AM
  • परिजनों के साथ भी आचरण उत्तम रखें
    हम छोटी-छोटी बातों को छोटा मानने की बड़ी भूल कर जाते हैं। दिनचर्या में कुछ काम ऐसे होते हैं, जिन्हें हम मशीन की तरह करते हैं और उन पर ध्यान नहीं देते। जैसे हमारा उठना, बैठना, भोजन करना, किसी से बात करना, अजनबी के साथ सफर करना, कार्यक्षेत्र में साथियों के साथ फुरसत का समय या जीवनसाथी के साथ बिताया जाने वाला एकांत। इन सब छोटी-छोटी बातों में ध्यान नहीं रहता कि हमारा आचरण कैसा होना चाहिए। हम आम काम की ही तरह ये सब भी करने लगते हैं। हमारे शास्त्रों में गृत्समद ऋषि का वर्णन आया है। वे कवि, वैज्ञानिक और...
    March 1, 06:07 AM
  • परमशक्ति हमेशा सत्य के साथ रहती है
    मनुष्य को खाना, पीना, सोना और विषय का भोग कैसे करना ये बातें सिखानी नहीं पड़ती। लालन-पालन में बचपन से कुछ चीजें जुड़ती चली जाती हैं और आदमी को समझ में आ जाता है कि खूब धन कमाओ, दूसरों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ो। धर्म मनुष्य की इस जन्मजात वृत्ति को मर्यादित बनाता है। दुनियादारी में आदमी अमर्यादित हो जाए तो समझ में आता है लेकिन, कभी-कभी धर्म निभाते हुए वह कुटिल हो जाता है और परमात्मा को पाने में षड्यंत्र करने लगता है। धर्म के संसार में भी अमर्यादित आचरण करने लगता है, इसीलिए संत लोग मनुष्यों को तीन...
    February 28, 06:29 AM
  • साक्षी भाव से उपलब्ध होती है शांति
    परमात्मा विचार से ज्यादा भाव का विषय है। कम ही लोग होंगे, जिन्होंने विचार की यात्रा से परमशक्ति को प्राप्त किया, किंतु बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो भाव के स्तर पर भगवान को पा गए। संत-फकीरों को भगवान भाव के स्तर पर ही मिला है। हमें उस भगवान को पाने के लिए नहीं दौड़ना है जो मंदिर में बैठाए गए हैं, जिनके चित्र बनाए गए हैं या जिनकी छवि हमारे भीतर बसी है। हमें उस परमात्मा को पाना है, जो शांति प्रदान करे। हमारे पास शरीर है जिससे श्रम करना है और कर भी रहे हैं। मन विचारों में उलझा हुआ है मतलब उसे भी काम के...
    February 25, 05:02 AM
  • शिव-पार्वती से सीखें संतान के प्रति दायित्व
    समझदार लोग बीज देखकर पेड़ का भविष्य बता देते हैं और जो उनसे भी ज्यादा समझदार होंगे वो पेड़ देखकर बीज कैसा रहा होगा, यह भी व्यक्त कर सकते हैं। दोनों बातें संतानों से जोड़ी जा सकती लेकिन, इसके लिए विशेष दृष्टि चाहिए। बाहर की स्थिति देखकर न तो बच्चों के लिए माता-पिता तय करें और न ही माता-पिता के लिए बच्चों का मूल्यांकन किया जाए। आजकल तो सब अभिनय में माहिर हैं, इसलिए पता नहीं लगता कि मुखौटे के पीछे असली चेहरा क्या है? मौजूदा भारत में जितनी समस्याएं हैं उनमें एक है परिवारों का टूटना और उसके पीछे का...
    February 24, 07:20 AM
  • पूर्वग्रह टकराने से होते हैं दंपती में झगड़े
    पति-पत्नी लड़ते क्यों हैं, इसे लेकर मनोवैज्ञानिकों का शोध बढ़ता जा रहा है। कमाल तो यह है कि जितना शोध, जितनी चिकित्सा हो रही है, समस्या उतनी ही बढ़ती जा रही है। पति-पत्नी के बीच तनाव का एक बड़ा कारण होता है दोनों के सपने, जो उन्होंने विवाह से पहले देखे थे। भारतीय दृष्टि वैवाहिक जीवन को तीन भागों में बांटकर चलती है। पहला महिला-पुरुष, दूसरा पति-पत्नी तथा तीसरा माता-पिता। तीनों ही स्थितियों में इनके सपने लगातार काम कर रहे होते हैं। विवाह से पहले जब ये महिला-पुरुष होते हैं उस समय उनके विचार स्वतंत्र...
    February 23, 05:32 AM
  • भक्ति की तैयारी यानी प्रेम का पूरा स्वाद
    जिंदगी के दरवाजे खुले रखो तो प्रेम प्रवेश करता है और यदि स्वयं को खुला रखें तो फिर परमात्मा का प्रवेश हो जाता है। इसी को भक्ति कहते हैं। प्रेम यानी आप सबकुछ खोने को तैयार हैं और भक्ति का मतलब है सृष्टि की सबसे बड़ी हस्ती परमात्मा को पाने की तैयारी। आज के दौर में प्रेम पर बात करने वाले लोग धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं और प्रेम कब वासना में बदल गया, पता ही नहीं चला। अब तो प्रेम का मतलब देह का सुख रह गया है। जो अनुभूति का विषय था वह विलास की वस्तु हो गया। ऐसे में जो लोग प्रेम बचाना चाहते हैं उन्हें...
    February 22, 05:40 AM
  • बड़ा काम करना हो तो शुभ संकल्प जरूर लें
    किसी बड़े अभियान पर निकलने से पहले कोई शुभ संकल्प जरूर लें। इससे सफलता की संभावना बढ़ सकती है। उस अभियान में हमसे जुड़े लोगों का हित कैसे हो, समाज व राष्ट्र की सेवा तथा परिवार के हितार्थ लगातार चिंतन चलता रहे ये शुभ संकल्प है। व्यावसायिक जीवन में जब लोग बड़े अभियान पर निकलते हैं तो सिर्फ इस बात का ध्यान रखते हैं कि लाभ के साथ हमारे लक्ष्य पूरे होने चाहिए। वे भूल जाते हैं कि इसकी भेंट कितने ही लोग चढ़ रहे होंगे। कभी-कभी तो आप खुद भी चढ़ जाते हैं। यह तो याद रहता है कि आपने क्या प्राप्त कर लिया पर यह...
    February 21, 06:14 AM
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