जीने की राह
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  • मृत्यु को आनंद में बदलने की कला
    ऋषि मुनियों को मृत्यु के आगमन और व्यक्ति के प्रस्थान पर गहरे चिंतन से यह पता लगा कि जीवन के अंत में मनुष्य खुद से ही प्रश्न पूछने लगता है। संभव है प्रश्न आत्मा शरीर से पूछ रही हो। इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मांगा जाता, पर पूछे इसलिए जाते हैं कि आप देख लें, जान लें और चल दें अनंत यात्रा पर। यदि हम इस परिकल्पना को जीवन में लागू करें तो मृत्यु आनंद में बदल जाएगी। कुछ सवाल जो हमसे अंतिम समय में हम ही पूछेंगे, उन्हें आज भी टटोला जा सकता है। श्रीकृष्ण को शिकारी का तीर लगने वाला था, तो उनके चिंतन में बहुत...
    01:42 AM
  • वृद्धावस्था में आत्मा पर ध्यान टिकाएं
    कई बार वृद्धावस्था में अचानक वासना प्रवेश कर जाती है और यदि उसे नहीं रोका गया, तो वह मृत्यु के क्षण में भी प्रभावशाली हो जाती है। इस जन्म की अंतिम वासना अगले जन्म में प्रभाव लेकर आएगी। जब-जब वासना के थपेड़े अधिक लगें तब-तब उससे सुरक्षा की तैयारी बढ़ा दें। वासनाएं युवावस्था ही नहीं, हर उम्र में प्रभाव डालती हैं। युवा अवस्था में शरीर पूरी ऊर्जा के साथ सक्रिय रहता है, इसलिए वासनाओं के साथ तालमेल बैठाने में उसे सुविधा मिल जाती है। वृद्धावस्था में शरीर मन का साथ नहीं देता, इसलिए दोहरा जीवन शुरू हो...
    December 24, 06:15 AM
  • पहली मुलाकात में सावधानी बरतें
    जीवन में जब अच्छे और प्रभावशाली लोगों से मिलने का अवसर आए, तो अपने व्यवहार में अतिरिक्त सावधानी रखिए। हम इस स्तंभ में हर मंगलवार को किष्किंधा कांड की चर्चा करते हैं। दृश्य चल रहा था श्रीराम, लक्ष्मण हनुमानजी के कंधे पर थे और दूर से राजा सुग्रीव ने उन्हें देखा। इस प्रसंग में सभी ने एक-दूसरे से जो व्यवहार किया वह सीखने लायक है। तुलसीदासजी ने चौपाई लिखी है, जब सुग्रीव राम कहुं देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा। जब सुग्रीव ने श्रीरामचंद्र को देखा तो अपने जन्म को धन्य समझा। सुग्रीव समझ चुके थे कि यदि...
    December 23, 06:13 AM
  • परिवार प्रपंच नहीं, प्रेम का स्वरूप है
    दुनिया में कई तरह के प्रपंच होते हैं। प्रपंच का मतलब है कुछ ऐसी बातों में उलझ जाना, जिन्हें हम पहले से जानते थे और फिर जानबूझकर उलझने के बाद निकलने का रास्ता न ढूंढ़ना। घर के बाहर की दुनिया हमारा मिलना-जुलना बाहर के लोगों से होता है। उन लोगों का अपना स्वार्थ काम कर रहा होता है। हम अपने निज हित की कामना से लगे हुए हैं और जब एक-दूसरे के हित टकराते हैं, तो झंझटें आना स्वाभाविक है। यह दुनिया का प्रपंच कहलाएगा, लेकिन जब घर-परिवार को भी प्रपंच कहा जाता है, तब थोड़ा सोचना चाहिए। परिवार प्रेम की शुद्ध अवस्था...
    December 22, 04:56 AM
  • संकट में निहित है समाधान की दिशा
    हर घर एक बंधी मुट्ठी होता है। कहते हैं जब तक बंद है तब तो लाख की और खुल जाए तो खाक की। इन दिनों बाहर से बहुत शांत, कुशल, मंगल और संपन्न दिखने वाले अधिकांश परिवार भीतर से उथल-पुथल में डूबे हैं, क्योंकि बाहर की दुनिया में कुछ और दिखाना पड़ता है तथा भीतर कुछ और चल रहा होता है। इसमें तालमेल न बैठाने के कारण कुछ परिवार बिखर जाते हैं। सबसे पहले यह समझ लें कि तनाव, बिखराव और भटकाव केवल हमारे यहां है ऐसा नहीं है। हर घर के कोने में ऐसा कचरा बिखरा हुआ है, लाख झाड़ू लगा लो। यदि कुएं का उदाहरण लें तो कितनी बार ऊपर से...
    December 20, 01:16 AM
  • ईश्वर के हाथों की मशीन बनें
    विज्ञान के इस युग में मशीनों का उपयोग इतना बढ़ता जा रहा है कि लोग भूल ही जाते हैं कि इन्हें चलाने वाला तो इंसान ही है। मशीन चलाते-चलाते इंसान का भी मशीनीकरण होता जा रहा है। इसी कारण हर आदमी जल्दी में है। तेजी से परिणाम की अपेक्षा है। अपने नीचे काम करने वाले लोगों को मशीन मान लिया जाता है। कई बार तो नेतृत्व करने वाले बड़े गर्व के साथ कहते हैं हम भी मशीन की तरह काम कर रहे हैं और आप भी करिए। आदमी स्वेच्छा से मशीन बनने को तैयार हो गया है। मशीन का केवल तन होता है, मन और आत्मा नहीं होती। आदमी जब मशीन बनता है...
    December 19, 05:11 AM
  • स्वहित से किसी को दु:ख न पहुंचे
    पढ़े लिखे होने का अर्थ यह नहीं कि जीवन जीने की समझ आ गई, व्यवसाय में सफल हो जाएंगे, परिवार चला लेंगे। यह तो बिना पढ़े-लिखे भी किया जा सकता है। शिक्षा से केवल ज्ञान व जानकारी मिल सकती है, समझ और चतुराई नहीं। परिस्थितियों को गहराई और दूरदर्शिता से देखकर व्यवहार करना समझ तथा चतुराई है। इन्हें जानने का सबसे अच्छा तरीका प्रकृति से लिया जा सकता है। परिस्थिति के अनुसार आदमी को व्यवहार व कार्यशैली के प्रति सजग रहना चाहिए। विपरीत समय में अधिकतर लोगों की समझ काम करना बंद कर देती है। यहीं से डिप्रेशन शुरू...
    December 18, 04:44 AM
  • सफलता के लिए उत्साह जरूरी
    ऊंचे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य के भीतर ललक के साथ उत्साह आवश्यक है। ललक सब में होती है, लेकिन उत्साह के अभाव में अधिकांश लोग उलझ जाते हैं। सफलता के लिए किए जा रहे परिश्रम को ठीक से क्रियान्वित करना हो तो ललक के साथ उत्साह बनाए रखिए। लगन और उत्साह का लाभ समय प्रबंधन में मिलता है। सभी बड़ी हस्तियां समय प्रबंधन को साधकर ही सफलता की ऊंचाई तक पहुंची हैं। कार्य कितना महत्वपूर्ण है और उसे किस समय पर पूरा करना है, यह निर्धारित करना बहुत आवश्यक है। अधिकांश लोग ये दोनों बातें निर्धारित ही नहीं कर...
    December 17, 04:29 AM
  • ईश्वर का अनुग्रह सदैव रहता है
    भारतीय संस्कृति में कुछ अनूठे शब्द आए हैं। ऐसा ही एक शब्द है अनुग्रह। शाब्दिक अर्थ है, अनु मतलब बाद में, ग्रह यानी पकड़ना। भक्तों ने माना है कि ईश्वर बहुत दयालु हैं, इसलिए किसी भी हालत में उसके अनुग्रह को न भूला जाए। जब कभी जीवन में हम असहाय हो जाएं, भरोसा रखिए वह आएगा। किष्किंधा कांड में ऐसे ही अनुग्रह का दृश्य है। हनुमानजी श्रीराम और लक्ष्मण को अपने कंधे पर बैठा चुके थे। जैसे ही हनुमानजी खड़े होते हैं दोनों डगमगा जाते हैं। श्रीराम कहते हैं, हनुमान, हम गिर रहे हैं और हनुमानजी का उत्तर था, आप मेरा...
    December 16, 06:22 AM
  • ऊंचे विचारों से आते हैं प्रभावी शब्द
    विचार हमारे आस-पास के वातावरण के प्रभाव का क्रिएशन होते हैं। देखने-सुनने से ही विचार बनने का सिलसिला शुरू हो जाता है। व्यस्त आदमी यह भूल ही जाता है कि क्या सोचा जा रहा है, किन बातों का समावेश मस्तिष्क में किया जा रहा है। जब पारिवारिक, सामाजिक एवं व्यावसायिक जीवन में वार्तालाप किया जाता है तब ये विचार ही शब्द बनकर बाहर आते हैं। बुद्धि इसमें अपनी भूमिका निभाती है। महत्वपूर्ण यह नहीं कि आपमें बुद्धि कितनी है, बल्कि अहम यह है कि आपके पास जो है आप उसका किस तरह उपयोग करते हैं। आपकी बुद्धि को दिशा देने...
    December 15, 03:46 AM
  • वाणी का दान सोच-समझकर करें
    चौबीस घंटे में हम जो भी काम करते हैं उसमें से एक काम है अनवरत बोलना। किसी के प्रश्न पूछने पर उत्तर दें तब भी, किसी से प्रश्न पूछें उस समय भी आप वक्ता रहते हैं। चलने में पैरों की सावधानी रखनी पड़ती है और हम रखते भी हैं। चलते समय हम हाथों का उपयोग भी सावधानी से करते हैं। आंखों के प्रति भी सजग रहते हैं। चूंकि जिह्वा मुंह में सुरक्षित है, इसलिए इसके उपयोग के मामले में हम घोर लापरवाह होते हैं। यदि आप अच्छे वक्ता हैं, तो यह बात आपके व्यक्तित्व को निखारेगी। अत: जब भी बोलें, तैयारी से बोलें। मुझसे प्राय: यह...
    December 13, 06:38 AM
  • जीवन की हर घटना में भविष्य देखें
    हम अपने अतीत से जुड़े रहते हैं, क्योंकि हम गुजरे समय के साक्षी थे। उस बारे में हमें बहुत कुछ मालूम है। तटस्थ रहकर सोचेंगे तो यह भी पता लग जाएगा कि आप थे क्या। थे से हैं तक की यात्रा, अतीत से वर्तमान तक की यात्रा है। क्या हैं इस पर भी हमारा चिंतन चलता रहता है। अभी मैं क्या कर रहा हूं, आज मुझे क्या करना चाहिए, ऐसे अनेक सवाल हम चौबीसों घंटे अपनी छाती पर लटकाए घूमते रहते हैं। दिनभर में इस पर थोड़ा समय जरूर गुजारिए कि आने वाले वक्त में आप क्या होंगे, क्योंकि जो आप थे वो अब आप हैं नहीं। जो अब आप हैं वैसे आप...
    December 12, 05:48 AM
  • संवाद है सुखी दाम्पत्य की कुंजी
    मुझे इससे कोई लेना-देना नहीं है, तुम जानो, ​तुम्हारा काम जाने, मुझे बेकार में डिस्टर्ब मत किया करो। ऐसे संवाद हम अपने जीवन में दूसरों को बोल चुके होते हैं। ये संवाद ध्वनि देते हैं कि हमें आपकी परेशानियों से कोई लेना-देना नहीं है। बात सही भी है। दुनिया में किस-किस की मुसीबत आप मोल लेंगे। हालांकि, जब ऐसे संवाद पति-पत्नी के बीच चलने लगे, तो यह अनैतिक ही होगा। कई जीवनसाथी एक-दूसरे से इस तरह के संवाद बोलते हैं, जो उनके दाम्पत्य के लिए बहुत घातक है। ध्यान दीजिए, जीवनसाथी में से किसी एक के ऊपर भी यदि समस्या...
    December 11, 05:33 AM
  • हर काम में सीखने की वृत्ति रखें
    हम किसी भी उम्र के व्यक्ति हों, जब भी कोई काम करें तो उसमें सीखने की वृत्ति जरूर रखें। यह वृत्ति यदि हमारे भीतर बनी रहे, तो हर काम में से हम उस जानकारी को निकाल लेंगे, जो हमें नहीं थी। कुदरत ने हर वस्तु में नवीनता छिपा रखी है, पर ढूंढ़ने वाला चाहिए। इस रहस्य को पाने की चाह में लोग दार्शनिक बन गए, भक्त हो गए, वैज्ञानिक और कलाकार बन गए। सीखने की वृत्ति रखने के साथ, जो सीखा है उसे तराशकर सुझाव में बदलें। आज भी लोगों को सुझाव की बहुत जरूरत है। लोग इतनी जल्दी में हैं कि खुद कोई होमवर्क करना नहीं चाहते। फिर...
    December 10, 05:30 AM
  • हर जगह सम्मान पाती है योग्यता
    वे सौभाग्यशाली होते हैं, जिन्हें अच्छे काम करने का मौका मिल जाता है। काम अच्छा हो, हमारे भीतर जिम्मेदारी निभाने की इच्छा हो तो जब परिणाम आता है उसका आनंद ही अलग है। इस मामले में हनुमानजी बहुत सौभाग्यशाली थे। यूं तो उन्होंने जो भी काम किए हैं कमाल के ही किए हैं, लेकिन किष्किंधा कांड में उन्होंने जो किया, संभवत: और कोई नहीं कर पाया होगा। श्रीराम और लक्ष्मण को उन्होंने कंधे पर बैठा लिया था। पहली मुलाकात में सारी बातें होने के बाद हनुमानजी ने श्रीराम को प्रस्ताव रखा, आप दोनों भाई मेरे कंधे पर बैठिए,...
    December 9, 06:11 AM
  • निरर्थक छोड़ना, सार्थक को अपनाना
    आदमी को हिसाब-किताब में माहिर होना चाहिए। फिर इस अर्थ-प्रधान युग में तो हानि-लाभ का बारीक मुआयना किया जाता है। धीरे-धीरे हम हर बात में हिसाब-किताब के आदी हो जाते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। बुरा यह है कि हम उन बातों का हिसाब लगान लगें, जिनकी जीवन में कोई जरूरत नहीं और उन बातों का हिसाब नहीं लगाएं जिनकी जरूरत है। थोड़ा सजग होकर इस बात का बही-खाता बना लें कि जो सार्थक है वही किया जाएगा और निरर्थक को हटा दिया जाएगा। हमें यह मालूम होना चाहिए कि हमारे शरीर में सबसे निरर्थक काम कौन करता है। यूं तो हमारे...
    December 8, 06:09 AM
  • प्रेम हर दौर में रिश्ते को देता है ताजगी
    रिश्तों की भी उम्र होती है। कुछ रिश्ते बच्चों की तरह होते हैं। फिर वे जवान होते हैं, एक दिन हमउम्र होते हैं और फिर बूढ़े हो जाते हैं। जाहिर है रिश्तों की मृत्यु भी होती है। अपने पारिवारिक जीवन में जब रिश्ते निभा रहे हों तो उनकी उम्र पर जरूर ध्यान दीजिए। एक उम्र के रिश्ते दूसरे उम्र के प्रति लापरवाह न हो जाएं। इसे ऐसे समझे कि बच्चों का लालन-पालन करते समय हम माता-पिता का रिश्ता निभा रहे होते हैं। हम उन पर बहुत ध्यान देते हैं, समय भी देते हैं। ऐसे वक्त कुछ लोग अपने जीवनसाथी के प्रति लापरवाह हो जाते...
    December 6, 08:27 AM
  • दूसरे से पहले खुद पर भरोसा होना आवश्यक
    किस पर भरोसा करें। इन दिनों यह प्रश्न ज्यादातर लोगों के मन में उठता रहता है। कुछ लोग तो जीवन में इतने धोखे खा चुके होते हैं कि पूरे समय अविश्वास में जीने लगते हैं। सफर में कोई सहयात्री हमें कुछ खाने को देता है तो संदेह होता है, क्योंकि हमने बेहोशी की दवा देकर सामान लूटने की खबरें पढ़ी हैं। ऐसी घटनाएं अविश्वास को जन्म देती हैं। धीरे-धीरे इसका विस्तार होता है और हमें अपने नजदीक के लोगों पर भी भरोसा नहीं रहता। वे भी हम पर संदेह करने लगते हैं। अविश्वास परमात्मा से मनुष्य तक सक्रिय रहता है। भक्त के...
    December 5, 07:43 AM
  • हमें मशीन बनने से बचाता है संतोष
    व्यस्त जीवन मनुष्य को कब मशीन बना देता है पता नहीं चलता। मशीन बने लोग कब अपने साथियों के प्रति उपेक्षा का व्यवहार करने लगते हैं यह भी पता नहीं चलता। सफलता की यात्रा के शुरुआती साथी, राह में छूटने लगते हैं। शीर्ष पर तो आप बिल्कुल अकेले हो जाते हैं, क्योंकि मशीन अपने कलपुर्जों से सिर्फ इतना संबंध रखती है कि वह चलती रहे। कलपुर्जा बदला जा रहा है या जंग खा रहा है, इससे मशीन को कोई लेना-देना नहीं होता। मनुष्य जब मशीन बनता है तो वह ऐसा व्यवहार करने लगता है कि या तो मेरे साथ मेरे लिए चलो और नहीं तो बदल दिए...
    December 4, 06:35 AM
  • किसी से मिलें तो उसे महत्वपूर्ण मानें
    मन का मूल स्वभाव है महत्व पाना। जब उसे इंपोर्टेंस नहीं मिलता, तो वह बेचैन होने लगता है। आइए, आज इस पर विचार करें कि महत्वपूर्ण होना होता क्या है। एक प्रयोग करते रहें। आप जब भी किसी व्यक्ति से मिलें सामने वाले को महत्वपूर्ण मानें। भले ही आपको उसकी प्रतिष्ठा-योग्यता की पर्याप्त जानकारी न हो, लेकिन फिर भी उसके व्यक्तित्व की अज्ञात खूबियों को सहज स्वीकार करके उसके साथ ऐसा व्यवहार करें कि उसे लगे कि आपने उसे महत्वपूर्ण व्यक्ति मान लिया है। ऐसा करने के दो फायदे हैं। एक तो इससे किसी को संतोष मिलता है...
    December 3, 08:04 AM
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