जीने की राह
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  • भीतर सरलता है तो नतीजे ठीक आएंगे
    अच्छे आदमी सदैव यह चाहते हैं कि हमारा भी हित हो और सामने वाले का अहित भी न हो। जब दो जरूरतमंद आमने-सामने हों, तब हित-अहित का मामला बहुत सूक्ष्म हो जाता है। मध्यस्थ को कैसे कदम फूंक-फूंककर रखने पड़ते हैं, हनुमानजी से सीखिए। श्रीरामजी को सीता की खोज करनी थी। सुग्रीव अपने भाई बाली से परेशान था। हनुमानजी दोनों की मदद करना चाहते थे। वे खुद के परिचय के बाद अपने राजा सुग्रीव का परिचय दे रहे थे। सुग्रीव का परिचय देते समयउन्होंने बताया कि उनका राजा समस्याग्रस्त है, लेकिन समर्थ भी है। समस्याग्रस्त है...
    November 25, 07:45 AM
  • गुरु के आश्रय में मिलती है निर्भयता
    अज्ञान मिटाने के लिए सभी लोग एक सहज प्रक्रिया अपनाते हैं और वह है ज्ञान प्राप्त करना, लेकिन यह भी सच है कि कितना ही ज्ञान प्राप्त कर लें, अज्ञान रहेगा ही। यह एक आवरण है, जो लौकिक ज्ञान से तो पूरी तरह नहीं हटेगा। ऋषि-मुनियों ने इसे हटाने के लिए जो व्यवस्था दी है उसका नाम गुरु है। कहते हैं गुरु के ज्ञान से अज्ञान नहीं जाता, गुरु की कृपा से अज्ञान का अंधकार हटता है। यह कृपा बड़ी महत्वपूर्ण है, इसलिए आप देखेंगे बड़े-बड़े ज्ञानियों के गुरु भी साधारण संत होते हैं, क्योंकि संतत्व का लौकिक ज्ञान से कोई...
    November 24, 07:21 AM
  • कामयाबी की कीमत पर भी गौर करें
    आजकल जीतने के बहुत तरीके सिखाए जाते हैं। सफलता के सूत्रों की बाढ़ आई हुई है। आधुनिक प्रबंधन जीत और सफलता के सारे तरीके बहुत व्यवस्थित तरीके सिखाता है, इसीलिए सारा जोर तरीकों और सूत्रों पर होता है। क्या-क्या किया जाए इसे कई उदाहरणों से गले उतारा जाता है। एक दिन हमें जीत के सारे तरीके मालूम पड़ जाते हैं और जीत भी जाते हैं। फिर अशांत क्यों रहते हैं। केवल बाहरी तरीकों से विजेता बना व्यक्ति, अकेले में उस जीत के पीछे की हार को भी चखता रहता है। प्रतिष्ठा के कारण किसी से बोल भी नहीं पाता। जीत और सफलता के...
    November 22, 07:15 AM
  • समाज से जुड़कर अकेलेपन से बचें
    मनुष्य जितना भीड़ से घिरा होता है उतना ही अकेलेपन का अहसास बढ़ता जाता है। अज्ञात भय सभी को डराता है। जिन क्षणों में खुद को असुरक्षित महसूस करें, तत्काल पता लगाइए कि इसकी जड़ में क्या है। वहां आप पाएंगे अकेलापन। जो लोग आसमान पर उड़ रहे हैं वे भी अकेले हैं और जो जमीन पर चल रहे हैं वे भी तन्हा हैं। अकेलेपन को ज्यादा अपने साथ न रखें। यह आपको दूसरों से कट जाने के लिए उकसाता है। भीतर यह विचार भर देता है कि दूसरे जो कर रहे हैं वैसा हम नहीं कर सकते। फिर हीन भावना आने लगती है। यह खतरनाक भाव भी जाग जाता है कि...
    November 21, 04:05 AM
  • जीवनसाथी को बदलने का प्रयास न करें
    जीवनसाथी के मामले में हर व्यक्ति का निजी स्वप्न होता है और इसी के आधार पर जीवनसाथी ढूंढ़ा जाता है। विवाह के बाद पत्नी चाहती है पति वैसा हो जाए जैसा मैंने सोचा था। पति अपनी कल्पना के अनुसार पत्नी को ढालना चाहता है। दोनों ने अपने मन में जीवनसाथी की आदर्श छवि बनाई हुई थी और दोनों जुट जाते हैं एक-दूसरे को उस आदर्श छवि की कार्बन कॉपी बनाने में। यह झंझटों को सीधा आमंत्रण है, क्योंकि हरेक के पास अपनी अपूर्णता है। सबके भीतर दोष हैं। पहले इन्हें स्वीकार किया जाए, फिर श्रेष्ठ उजागर होना चाहिए। जीवनसाथी को...
    November 20, 06:20 AM
  • फैसले लेने हों तो अपने भीतर उतरें
    हां और ना जीवन के दो ऐसे निर्णय होते हैं, जो आपको न चाहकर भी लेने पड़ते हैं। हां का अर्थ है स्वीकृति और ना का अर्थ है अस्वीकृति। जब हम बाहर की दुनिया में होते हैं तो हां और ना के प्रति बहुत अधिक फिक्र नहीं पालते, क्योंकि सारा मामला सांसारिक है। हर निर्णय के पीछे समीकरण चल रहा होता है। सारे संबंध भी सतही होते हैं , लेकिन जब हम अपने घर में हों, तब हां-ना का मतलब बिल्कुल बदल जाएगा। गलत बात के लिए आपकी हां पूरे परिवार के भविष्य को कलह में डाल सकती है। सही बात पर ना भी ऐसे ही परिणाम देगी। अपनों को अपेक्षा भी...
    November 19, 06:21 AM
  • विचारों के अंतराल में डूबना ध्यान है
    काम के समय मस्तिष्क में विचार बहुत तेजी से दौड़ रहे होते हैं और यदि उन्हें नियंत्रित न करें, तो इसका असर कर्म पर भी पड़ता है। कहा जाता है कि विचारों के बीच में गैप होता है। जब उस शून्य पर टिक जाएं, तो हम अपने आप में डूबने लगते हैं। यहां डूबने का अर्थ है तन्मय हो जाना। फिर जब कोई काम होता है, तो उसके नतीजे बहुत अच्छे होते हैं। विचारों के बीच के गैप में डूबना ही ध्यान है। इस दौरान हम शांत भी होते हैं और प्रसन्न भी। यह ऊर्जा लेकर फिर काम में जुट जाएं तो आप परिश्रम करने के बाद भी थकेंगे नहीं। किष्किंधा कांड...
    November 18, 06:51 AM
  • व्यक्तित्व के अनुसार परवरिश  हो
    यह वैरायटी का युग है। लोगों की मानसिकता बन गई है कि हर वस्तु में लंबी रेंज होनी चाहिए, ताकि उन्हें चयन के अच्छे अवसर मिल सकें। इस सोच का असर पालन-पोषण पर पड़ने से एक ही मां-बाप के बच्चों में बहुत अंतर दिखने लगा है। समझदार मां-बाप स्वभाव के अनुसार उनके लालन-पालन के तरीके में अंतर करते हैं, जो काफी हद तक जरूरी भी है, लेकिन कुछ माता-पिता यहां चूक जाते हैं। वे लालन-पालन में भेद करते-करते बच्चों में ही भेद करने लगते हैं। यह भेद जब बेटे-बेटी में होने लगे तो और भी खतरनाक हो जाता है। पुत्र-पुत्री के अस्तित्व में...
    November 17, 06:16 AM
  • खुद को अलग करके गलती को देखें
    आपने गलती की और आप गलत हैं। ये दो अलग-अलग बातें हैं। जब भी जीवन में कोई भूल हो जाए तो थोड़ा अपने आप को अलग करके घटना का विश्लेषण करिए। गलती होने पर हम मान बैठते हैं कि यह हमने ही की है और नतीजन हम गलत हैं, इसलिए इन दो भागों को अलग रखकर देखिए। गलती हुई और हम गलत हैं। हम, हम हैं और गलती होना अलग बात है। यदि हम अपने अस्तित्व को ठीक से समझकर चलेंगे, तो गलती को समय पर सुधार लेंगे और भविष्य में होने वाली गलतियों की संख्या कम भी कर लेंगे। मैं गलत हूं यह मानना व्यक्तित्व है तथा गलती होना और मेरा अलग होना अस्तित्व...
    November 15, 06:33 AM
  • विसर्जन से होती है मन की सफाई
    मैली वस्तुओं को धोया जाता है या फिर फेंक दिया जाता है। शरीर में सबसे ज्यादा मैला क्या होता है? मन प्रतिपल गंदा होता रहता है। मन इतनी तेजी से गंदगी की परत अपने ऊपर चढ़ाता जाता है कि एक ऐसी अवस्था आती है कि धोने से काम नहीं चलता। जब किसी वस्तु के साथ ऐसा हो तो हम उसे फेंक देते हैं। ऐसे ही मन को फेंकना पड़ेगा, जिसे कहते हैं विसर्जन। शाब्दिक रूप से तो फेंकना और विसर्जन करना लगभग समान है, लेकिन बारीक, आध्यात्मिक अंतर है। फेंकने के बाद कुछ नहीं बचता है। विसर्जन यानी वस्तु चली गई, अनुभूति रह गई। मन विसर्जित...
    November 13, 06:03 AM
  • सफलता-विफलता में ध्यान जरूरी
    सफलता और असफलता दोनों ही अपने-अपने ढंग केे रोग हैं। दोनों के इलाज भी अलग-अलग हैं। ज्यादातर लोग सफलता नामक रोग को प्राप्त करने के लिए खूब प्रयास करते हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि इसका करना क्या है। चिकित्सा विज्ञान शुरुआत लक्षणों से करता है, फिर परीक्षण और अंत में इलाज होता है। हम चाहें तो उक्त दो रोगों का लक्षणों के आधार पर ही इलाज कर सकते हैं। इनके परीक्षण के लिए कोई पैथोलॉजी या लैब नहीं होती। ये रोग दो ही तरीके के डॉक्टर ठीक कर सकते हैं। एक स्वयं हम और दूसरे यदि जीवन में सद्गुरु हों, तो वे। जब हम...
    November 12, 06:01 AM
  • पूरे समर्पण के बाद होती है कृपा
    हर खेल के कुछ साधन होते हैं। क्रिकेट में बल्ला और गेंद होगी, हॉकी में स्टिक होगी, लेकिन पुराने समय में जो लोग साधन-संपन्न नहीं थे, उन्होंने खेल में अपने शरीर को ही वस्तु बनाया। जैसे कबड्डी, खो-खो। ऐसा ही खेल गुरु और शिष्य के बीच चलता रहता है। परमात्मा को स्वामी माना गया है। भक्त ने खुद को सेवक कहा है। स्वामी और सेवक के बीच भी खेल चलता है। भगवान यानी स्वामी अपने भक्त के धैर्य और श्रद्धा की परीक्षा लेते रहते हैं। भक्त अपने स्वामी की कृपा की परीक्षा लेता है। इस प्यारे खेल की विशेषता यह है कि इसमें हारने...
    November 11, 06:12 AM
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