जीने की राह

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  • शक्ति के सदुपयोग के नौ दिन
    दुनिया में कई चीजें बिखरी हुई हैं। कुछ लोग कुछ विशेष वस्तु चाहते हैं और उसके लिए बावले हो जाते हैं। जो ज्यादा दीवाने हैं वे पूरी दुनिया चाहते हैं। ऊपर वाला भी कमाल करता है। इस दुनिया में सबको सब नहीं देता। कुछ लोग जो चाहते हैं वह नहीं देता और जिसे अपेक्षा न हो उसे जरूर दे देता है। उस नीली छतरी वाले का यह अजीब समीकरण लोगों को आज तक समझ में नहीं आया। किंतु कमाल देखिए, संसार में एक चीज भगवान ने सबको दी है। वह है समस्या। संसार में शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसके जीवन में प्रॉब्लम नहीं है। समस्या देने के...
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  • पितरों से जुड़ना यानी ऊर्जा एकाग्र करना
    प्रबंधन की भाषा में समझाया जाता है कि जब लक्ष्य महान हो, उद्देश्य हटकर हो और अभियान विराट हो तो पूरी ताकत झोंकनी पड़ती है। पूरी ताकत लगाने का मतलब है शरीर में जो ऊर्जा है उसे एक जगह इकट्ठा करके झोंक दें। बाहर की एकाग्रता तो अनुशासन से, नियम से, दबाव में इकट्ठी की जा सकती है। बाहर की एकाग्रता तो लोभी को पैसे गिनने में और कामी को भोगते हुए आ जाती है। किंतु इस एकाग्रता से स्थायी सफलता नहीं मिलती। भीतर एकाग्र होने के लिए ऊर्जा को एक जगह इकट्ठा करके झोंकना पड़ेगा। ध्यान रखिएगा चिमटे का मुंह जलाना पड़ता...
    September 30, 02:56 AM
  • जीवन जानना है तो योग से गुजरना होगा
    जीवन को जानना और जीवन के बारे में जानना, ये दो अलग-अलग बातें हैं। सामान्य तौर पर अधिकतर लोग जीवन के बारे में जानकारी रखते हैं। कब जन्म हुआ, कहां हुआ, कैसे पढ़े-बढ़े, कहां काम किया और कैसे इस संसार से चले गए। क्या मनुष्य का जीवन केवल जानकारी पर टिका है। यह सतही मामला है, पर जीवन को जानना हो तो प्यास जगानी पड़ती है। हमारे यहां शास्त्रों में साधु-संतों की वाणी से एक बात बार-बार प्रकट होती है कि कोई सत्संग सुने, कोई शास्त्र पढ़े, तो उसे प्यास की दृष्टि से लेना। प्यास कैसी भी हो, बुझानी पड़ती है, इसीलिए कथाओं...
    September 29, 04:07 AM
  • पाने के प्रयास में खुद को न खो देना
    सब खो जाए पर खुद को मत खो देना। इसे संत-फकीरों ने अपने-अपने ढंग से समझाया है। हम जीवन-यात्रा में कई चीजें पा लेते हैं और उनमें इतने मग्न हो जाते हैं कि भूल जाते हैं कि बहुत कुछ खो भी दिया है। वैसे बिना कुछ खोए पाया भी नहीं जा सकता, लेकिन यह तय करने में हम चूक जाते हैं कि जो पाया वह महत्वपूर्ण है या जो खोया वह जरूरी था। कई लोगों को जीवनभर समझ में नहीं आता कि जो खो दिया वह कितना मूल्यवान था। संबंध खो दिए तब सफलता हाथ लगती है। ऋषि-मुनियों ने कहा है खोना तो पड़ेगा, लेकिन सब खोने के बाद भी खुद को मत खो देना।...
    September 28, 04:57 AM
  • भीतर शांति पा लें तो दुखी नहीं होंगे
    आसक्त मन अशांत हो यह बात तो समझ में आती है, लेकिन कभी-कभी विरक्त मन भी परेशान होता है। जिन्हें वस्तुओं के प्रति आसक्ति होती है, उन्हें वे न मिलें तो अशांत होने लगते हैं। ऐसे ही विरक्ति का मतलब लोग अभाव समझ लेते हैं। तुलसीदासजी ने अब किष्किंधा कांड में दो पात्रों की चर्चा की है। संपाति ने सूचना दी। गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका। तहं रह रावन सहज असंका।। तहं असोक उपबन जहं रहई। सीता बैठि सोच रत अहई।। त्रिकूट पर्वत पर लंका बसी हुई है। वहां स्वभाव ही से निडर रावण रहता है। वहां अशोक नाम का उपवन (बगीचा) है,...
    September 27, 04:05 AM
  • ध्यान व कर्मकांड एक-दूसरे के पूरक
    बहुत अधिक कर्मकांड करने वाले लोगों का ध्यान नहीं लगता और जो लोग मेडिटेशन से जुड़ते हैं उन्हें कर्मकांड अच्छा नहीं लगता। दोनों ही धारणाएं अधूरी हैं। कर्मकांड एक अनुशासन है। इसमें शरीर की प्रधानता होती है। मन थोड़ा स्वतंत्र होता है और आत्मा तक पहुंचने की संभावना कम होती है। ध्यान में शरीर अनुपस्थित-सा हो जाता है, मन नियंत्रित हो जाता है और आत्मा का स्पर्श सरल हो जाता है। इसीलिए ध्यानी कर्मकांड को स्वीकार नहीं करते। कर्मकांड में पूजा-पाठ की पद्धति तो है ही, लेकिन आज हवन से इस बात को समझें कि...
    September 24, 04:05 AM
  • ईश्वर को कर्ता समझें, मिलेगी शांति
    इस दौर में जिस तेजी से दुनिया बदल रही है, शायद पहले नहीं बदली। जिन्हें कल देखा था वे आज वैसे नहीं हैं और जिन्हें देख रहे हैं वे कब बदल जाएं पता नहीं। यदि हमारा जुड़ाव उस परमशक्ति से ऐसे हो कि जो कुछ भी नया हो रहा है वह कमाल का है और आप कर रहे हैं तो हमारा मैं यानी अहंकार गिर जाएगा। पिछले दिनों हवाई सफर में जैसे ही प्लेन टेक-ऑफ करने लगा, मैंने हाथ जोड़कर परमात्मा का स्मरण किया। पास बैठे पढ़े-लिखे व समझदार युवक ने मुझसे पूछा, आपको डर लग रहा है? मैंने कहा, नहीं। वह बोला,हाथ क्यों जोड़ रहे हैं? मैंने कहा, भगवान...
    September 23, 03:15 AM
  • दुर्गुणों को समझ लेना ही उनका विनाश
    मनुष्य के जीवन में दुर्गुण एक ही स्थिति में दो अलग-अलग परिणाम देते हैं। हम काम और क्रोध की ही बात करें, क्योंकि ये दोनों दुर्गुणों के नेता है। इनके पीछे अहंकार, लोभ व दुर्गुणों की पूरी फौज चलती है। दुर्गुणों को एकांत प्रिय है, इसीलिए अकेले में अच्छे-अच्छे लोग गलत काम कर जाते हैं। किंतु दुर्गुण यह भी जानते हैं कि यदि एकांत में हमारा मालिक होश में आ गया तो फिर हमें जाना पड़ेगा। थोड़ी बहुत उठापटक के बाद दुर्गुण चले जाते हैं। जीवन में दुर्गुणों के साथ चार स्थितियां आएंगी। हमें इसे समझना होगा। पहली...
    September 22, 03:29 AM
  • संयम का होश के साथ प्रयोग हो
    हमने जीवन में कई बातों को ठीक से नहीं समझा और इसीलिए उन्हें अपनाते समय चूक जाते हैं। जैसे संयम को गलत ढंग से लिया तो इसका वांछित परिणाम नहीं मिलता। इसी तरह सामान्य अनुशासन है कि दूसरों को आदर दें। वाणी से भी और व्यवहार से भी। हमने संयम और आदर दोनों का दुरुपयोग किया। संयम को बुरी भावनाओं के दमन का साधन माना गया। इसीलिए संयमी घोषणा करते मिलते हैं कि हमने यह छोड़ दिया, वह त्याग दिया। वे भावनाओं का दमन करने लगते हैं। संयम का अर्थ ऐसा हो, जैसा शास्त्रों में महामृत्युंजय मंत्र के लिए लिखा है- सूखा...
    September 21, 03:02 AM
  • भीतर के परमात्मा से संबंध जोड़ें
    हम सबके भीतर जन्म से ही तीन व्यक्तित्व आए हैं- परमात्मा, महात्मा और आत्मा। महात्मा का मतलब जो सबके प्रति करुणामयी हो, हितकारी हो और परमात्मा को पाने के मार्ग पर चल चुका हो। हम धीरे-धीरे बड़े होते हैं और हमारे भीतर संसार प्रवेश करने लगता है। जिन लोगों ने हमारा लालन-पालन किया है उनका दायित्व है कि वे संसार के साथ ये जो तीन उपहार मिले हैं उन्हें बचाकर रखें। कहने का मतलब है संसार भी रहे और परमात्मा, महात्मा व आत्मा भी रहे। अधिकतर लोग चूक जाते हैं, संसार हावी हो जाता है और ये तीन मूल, नैसर्गिक व्यक्तित्व...
    September 20, 02:16 AM
  • भावना के जरिये परिवार से जुड़ें
    धीरे-धीरे यह तय होता जा रहा है कि पैसा कमाने के लिए बुद्धिमान होना पड़ेगा। कम पढ़े-लिखे लोग अब बहुत अधिक सर्वाइव नहीं कर पाएंगे। सारा वातावरण बुद्धिप्रधान होता जा रहा है। बुद्धि का सारा ध्यान संतुष्टि की ओर रहता है, इसीलिए जो लोग बुद्धि से चलते हैं, वे सामने वाले की संतुष्टि पर काम करते हैं। जैसे प्रबंधन में सिखाते हैं कि कस्टमर सेटिस्फेक्शन को सबसे ऊपर रखें। उसे संतुष्ट करेंगे तो धंधा ठीक से चलेगा। बाहर की दुनिया संतुष्टि से चल सकती है, लेकिन घर तृप्ति से चलता है। बुद्धि संतुष्टि पर टिकती...
    September 17, 03:15 AM
  • काम ऊर्जा को रचनात्मक दिशा दें
    कामुक व्यक्ति सारे संबंध ताक पर रख देता है। जब किसी के सिर पर काम नाचता है तो कम से कम भीतर तो वह बर्बाद ही हो चुका होता है। हम सब अपने को बाहर से बचाने और अच्छा दिखाने में माहिर होते हैं, इसलिए अंदर जागी हुई काम ऊर्जा हमें अलग ढंग से नुकसान पहुंचाती है। यह शरीर को भड़काती है। इसीलिए आज काम को लेकर जो दृश्य सामने आ रहे हैं, जैसे बयान दिए रहे हैं वे मानव जीवन के लिए खतरनाक संकेत है। 80 वर्ष का बूढ़ा गोद ली हुई बच्चियों से दुराचार कर जाए, एक प्रतिष्ठित मंत्री अपने दुराचार को स्वाभाविक बताए। ये काम...
    September 16, 04:05 AM
  • क्रोध से परिजनों का आनंद भंग न हो
    क्रोध के लिए फकीरों ने कहा है कि यह गरजता ही नहीं, सरकता भी है। बड़े-बड़े संत-महात्माओं को भी क्रोध आ सकता है। क्रोध की तीन स्थितियां बनती हैं। उसे आप दबा लें, उसे कहीं ओर सरका दें और या उसे निकाल बाहर फेंकें। आजकल सभी को जरा-जरा सी बात पर क्रोध आ जाता है। भले ही आप किसी और पर क्रोध कर रहे हैं, लेकिन शरीर से जो निगेटिव वाइब्रेशन निकलते हैं वे आपके आसपास के लोगों को भी परेशान कर सकते हैं। पिछले दिनों मैं और मेरी पत्नी शिमला के एक प्रमुख कैफेटेरिया में बैठे थे। उसी समय एक युगल अपनी छोटी बच्ची के साथ...
    September 15, 03:38 AM
  • आचरण को नीति के अनुसार रखें
    राजनीति को लाख गाली दे लें, लेकिन यह सबको पसंद भी है और नापसंद होने पर इससे गुजरना भी पड़ता है। चूंकि देश में लोकतंत्र है, तो जो भी काम किए जाएंगे हर मोड़ पर नेता जरूर मिलेगा, हर पड़ाव पर राजनीति दिखेगी। अब तो घर में भी राजनीति उतर आई है। जब आप कोई नौकरी करते हैं तो जिनकी नौकरी कर रहे होते हैं उन्हें, आपके घर वालों को और स्वयं आपको उम्मीद पैदा होती है कि इस नौकरी से मुझे यह मिल जाएगा। नौकरी में अच्छे काम के बाद भी संतुष्टि को जो सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है वह है राजनीति। कॉर्पोरेट सेक्टर में...
    September 14, 03:52 AM
  • सहायता करें तो उसमें अहंकार न हो
    जीवन में दूसरों की सहायता करनी और लेनी पड़ती है। श्रीरामचरितमानस केे एक प्रसंग में संपाति वानरों को देखकर खाने के लिए तैयार हो जाता है और अंगद उन्हें समझाते हैं। जब संपाति ने सुना कि मेरे भाई जटायु ने सीताजी की रक्षा यानी श्रीराम के कार्य के लिए अपने प्राण दे दिए तो सोचा मैं भी इनकी मदद करूं। तुलसीदासजी लिखते हैं, मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि। बचन सहाइ करबि मैं पैहहु खोजहु जाहि।। अर्थात मुझे समुद्र के किनारे ले चलो, मैं जटायु को तिलांजलि दे दूं। इस सेवा के बदले मैं तुम्हारी वचन से...
    September 13, 03:29 AM
  • विचारों के उपवास से मिलेगी शांति
    अधिक बोलने से सच दूर और शांति भंग हो जाती है। जो लोग बहुत ज्यादा बोलेंगे वे तथ्य से दूर होंगे ही, क्योंकि जिस भी घटना पर वे बोल रहे होंगे या जिस व्यक्ति पर चर्चा कर रहे होंगे हो सकता है उसके लिए दस शब्द ही उसके सच को बयान करने के लिए काफी हों। लेकिन जब कभी आप अधिक बोलेंगे तो उस अतिरिक्त में आपका अहंकार हो सकता है और गप भी हो सकती हैं। ऐसे ही जब हम अधिक सोचने लगते हैं तो भी जो विचार जरूरी नहीं हैं वे भी भीतर प्रवेश कर हमारी शांति को भंग कर देते हैं। नाम और शैली में फर्क हो सकता है, लेकिन सभी धर्मों ने उपवास...
    September 10, 03:18 AM
  • ज्ञान-भक्ति के मेल से मिलता है प्रेम
    परमात्मा तक पहुंचने के लिए फकीरों ने दो रास्ते बताए और बनाए हैं। एक है ज्ञान और दूसरा भक्ति का। जो मस्तिष्क केंद्रित लोग, जिनके लिए विचार प्रधान हैं वे ज्ञान से ईश्वर को प्राप्त करेंगे। जिनके लिए मस्तिष्क से अधिक दिल का मूल्य है वे भक्ति से चलेंगे। उनके लिए ज्ञान बहुत बड़ी कोशिश है, भक्ति सहज व सरल है। भक्तिमार्गी ज्ञान मार्ग से परमात्मा तक नहीं पहुंच पाएगा। ऐसे ही यदि ज्ञानी भक्ति का रास्ता पकड़े तो भी दिक्कत आ जाएगी। भक्त धीरे-धीरे ध्यान को आसानी से उपलब्ध होगा, ज्ञानी को ध्यान में भी परेशानी...
    September 9, 03:08 AM
  • ईश्वर का अनुग्रह है वैवाहिक जीवन
    सच किफायत से बरतने की चीज है, इसे जिंदगी में ठीक से अपनाएं। सत्य शब्द आता है तो अधिकतर मौकों पर लोग इसे सच बोलने से जोड़ लेते हैं, लेकिन हमारे जीवन में कुछ घटनाएं, कुछ स्थितियां सच का स्वरूप लेकर आती हैं। हमें सच की ही तरह इन घटनाओं को बहुत बारीकी से बचाकर चलना चाहिए। मनुष्य के लिए जीवन-मृत्यु दो ऐसे सच हैं, जिन्हें वह कभी बदल नहीं सकता। एेसा ही सत्य है विवाह। स्त्री हो या पुरुष यह ऐसी स्थिति है जिसके निर्वाह में लोग पूरी ताकत लगा देते हैं, लेकिन फिर भी जो सच है वह सामने आता ही है। इस सच को भी बहुत...
    September 8, 03:23 AM
  • दुर्गुणों से मुक्ति के लिए स्वयं पर टिकें
    जो लोग शांति की तलाश में हों उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वयं पर टिके बिना शांति नहीं मिल सकती। मानवीय संबंधों के कारण जीवन में तेरा-मेरा बहुत अधिक उतर आता है। उसने ऐसा कर दिया, मैं ऐसा करूंगा, हमारी ऊर्जा इस तेरे-मेरे में ही उलझ जाती है। चाहते हम शांति हैं पर सारे काम करते अशांति के हैं, इसलिए स्वयं पर टिकने को समझना होगा। इसमें बाधा पहुंचाने वाले तत्वों में प्रमुख होते हैं दुर्गुण। दुर्गुण बिल्कुल माफिया की तरह हैं। माफिया की दुनिया का कायदा है कि यहां सिंहासन कभी खाली नहीं रहता। बड़े से...
    September 7, 04:23 AM
  • अच्छी बातों के उपयोग में देर न करें
    एक कायदा है कि यदि आपने कोई सबक सीखा है और उसे ठीक से याद रखना चाहें तो दूसरों को तुरंत सिखाएं। इसमें दो बातें हैं- पहली यह कि आपने सीखा और दूसरी किसी दूसरे को सिखा दिया। प्रबंधन की भाषा में इसे रियल लर्निंग कहेंगे। जो ज्ञान आपको प्राप्त हुआ है उसे अपने भीतर रोकें नहीं, तुरंत उसका प्रयोग करके देखें। इसे इस दृष्टांत से समझा जा सकता है। किष्किंधा कांड में जामवंतजी ने अंगद को कई कथाएं सुनाईं, क्योंकि अंगद अवसाद में डूब चुके थे। थोड़ी देर बाद संपाती नाम का गिद्ध वानरों को देखता है तो मन ही मन कहता...
    September 6, 06:24 AM