जीने की राह

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Jeene Ki Rah

अपनी रुचि को दबाएं नहीं, ईश्वर से जोड़ें

अपनी रुचि को दबाएं नहीं, ईश्वर से जोड़ें
इस बात पर जरूर विचार कीजिएगा कि आपकी कुछ रुचियां ऐसी होती हैं, जिन्हें आप ही जानते हैं। बहुत निकट के लोग भी उन्हें नहीं जान पाते। हो सकता है आपने कभी प्रकट न की हों और ऐसा भी हुआ होगा कि प्रकट की हों पर दूसरों ने उस पर ध्यान नहीं दिया हो। आत्मरुचि के मामले में बहुत सावधान रहें। बहुत शालीनता से उसे अभिव्यक्त करें। दबाएंगे तो भीतर विचलन पैदा होगा। जब हमारी परवरिश हो रही होती है, जीवन दूसरों से निर्धारित होता है तब आत्मरुचि निखरती भी है, दबती भी है। फिर एक समय ऐसा आता है कि आप स्वतंत्र हो जाते हैं। उस...
April 27, 10:47 AM

किसी को दोष न दें, आत्मविश्लेषण करें

किसी को दोष न दें, आत्मविश्लेषण करें
पुनर्जन्म को लेकर दो मौकों पर व्यक्ति बहुत परेशान हो जाता है। पहली परेशानी तब आती है जब परिवार या परिचितों में से किसी का निधन हो जाए। उस समय ब्राह्मण लोग जो कर्मकांड कराते हैं उसमें अनेक क्रियाएं ऐसी होती हैं, जिनका संबंध पुनर्जन्म से बताया जाता है। दूसरी उस समय जब वह लगातार असफल हो रहा हो, संकटों में डूबा हो और समझाने वाले अंत में कहते हैं, ये सब प्रारब्ध का योग है। प्रारब्ध और पुनर्जन्म क्या होता है, यह बहस का विषय है। लेकिन, जिन दिनों आप परेशान होते हैं और लगता है कोई ऐसा मार्ग मिल जाए कि...
April 26, 08:30 AM

कामयाबी को अहंकार से बचाएं

कामयाबी को अहंकार से बचाएं
अहंकार से सदैव सावधान रहिए। वह जितना देता है उससे ज्यादा ले लेता है। इसी क्रम में एक चीज ऐसी छीन लेता है जिसके परिणाम बहुत बुरे आते हैं, वह है सोचने की शक्ति। भीतर की ऊर्जा, आत्मविश्वास और सोचने की ताकत ही किसी को सफलता के साथ शीर्ष तक पहुंचाती है। वहां सावधान न रहे तो अहंकार घेरकर हमारी सोच को परिवर्तित कर देता है। रावण के साथ ऐसा ही हो रहा था। सारी दुनिया को जीत लेना आसान नहीं था। अपनी पूरी क्षमता झोंककर वह विश्वविजेता बना था लेकिन, शिखर पर पहुंचते ही अहंकार में डूब गया। जैसे ही सूचना मिली कि राम...
April 25, 07:53 AM

आज धरती से सद्‌व्यवहार का संकल्प लें

आज धरती से सद्‌व्यवहार का संकल्प लें
मनुष्य की क्षमता का अंदाज लगा पाना बड़ा मुश्किल है। कोई इंसान कितना ताकतवर हो सकता है, क्या-क्या कर सकता है, यह हमारी कल्पना से बाहर है। ईश्वर ने मनुष्य को गजब की संभावना देकर धरती पर भेजा है। आज हम जितने अजूबे देख रहे हैं चाहे विज्ञान के हों या मनुष्य ने स्वयं निर्मित किए हों, सब मनुष्य की ताकत का ही परिणाम हैं। लेकिन, क्षमतावान व्यक्ति यदि स्वयं को नियंत्रित न करे तो एक रूप में खुद का बड़ा नुकसान कर बैठता है और वह है प्रकृति का दुरुपयोग। जिस मानव ने अपनी क्षमता, ताकत व योग्यता से आकाश में जहाज उड़ा...
April 22, 07:11 AM

अहंकार से बचाता है परिश्रम में सेवाभाव

अहंकार से बचाता है परिश्रम में सेवाभाव
प्रतिष्ठित, बड़े पदों पर बैठे या बहुत समृद्ध लोगों के माथे पर यदि अहंकार चढ़ जाए तो एक समय बाद वे भी गलत निर्णय लेने लगते हैं। कुछ ऐसी मूर्खताएं करने लगते हैं कि शिखर से शून्य की यात्रा शुरू हो जाती है। आदमी का पतन उसका दुर्भाग्य नहीं कराता। अधिकतर मौकों पर अपनी मूर्खता के कारण ही वह स्वयं के पतन को निमंत्रित करता है। मूर्खता का प्रवेश अहंकार के दरवाजे से होता है। इस समय जब हर आदमी ऊंचा उठना चाह रहा हो, ज्यादा से ज्यादा धन, पद-प्रतिष्ठा कमाने में लगा हो तो अहंकार से कैसे बचा रहेगा? इसके लिए दो काम...
April 21, 06:37 AM

तीन गलतियां न हों तो दांपत्य वैकुंठ

तीन गलतियां न हों तो दांपत्य वैकुंठ
कई लोगों ने अपने-अपने ढंग से विवाह की व्याख्या की है। एक महत्वपूर्ण संस्कार तो यह है ही, शास्त्रों में इसे यज्ञ की तरह भी माना गया है। यज्ञ में यजमान जब आहुति देता है तो स्वाहा बोलता है। इसका अर्थ होता है कि मैं अपने हिस्से का उस देवता को अर्पित कर रहा हूं, जिसके लिए मंत्रोच्चार किया गया। जब उस देवता को अपना हिस्सा प्राप्त हो जाता है तो वह तथास्तु कहता है, जिसका मतलब होता है तुम्हें इसका फल प्राप्त हो। यह यज्ञ की साधारण-सी क्रिया है। विवाह को यज्ञ इसलिए कहा जा रहा है कि यज्ञ के लिए एक व्यवस्था करनी...
April 20, 09:34 AM

बुरी आदत परेशान करे तो पैदल घूमें

बुरी आदत परेशान करे तो पैदल घूमें
बुरी आदतें आजकल बड़ी आसानी से चिपक जाती हैं। पहले दूषित वातावरण के मौके कम हुआ करते थे, आज तो घर से बाहर मानो दुर्गुणों की आंधियां चल रही हैं। कई थपेड़े तो ऐसे आते हैं कि हर उम्र को प्रभावित कर जाते हैं और ऐसे दुर्गुण लोग घर तक ले आते हैं। कभी-कभी तो लगता है, लोग घर में भी सलामत नहीं रहे। कुमति, कुसंग, दुर्गुण चारों ओर फैल चुके हैं, जो आदमी के भीतर बुरी और गलत आदतें भर देते हैं। एक दिन वह गलत इतना हावी हो जाता है कि छोड़ना मुश्किल लगने लगता है। जिन्हें बुरी आदतें छोड़ना हों, उन्हें दो स्तर पर काम करना...
April 19, 07:41 AM

मातृत्व भाव के साथ नेतृत्व करें

मातृत्व भाव के साथ नेतृत्व करें
नेतृत्व में यदि मातृत्व का हल्का-सा छींटा भी लग जाए तो परिणाम पर सीधा असर पड़ता है। आजकल तो नेतृत्व करने वाले निजहित में लगे होकर अहंकार में डूबे रहते हैं। ये आगे जाकर अशांत रहते हैं, अपयश भी झेलना पड़ सकता है और जिस दिन पद-प्रतिष्ठा से नीचे उतरना पड़े, अवसाद में डूब जाते हैं। सदैव सत्ता किसी की नहीं रही, इसलिए जिनके पास नेतृत्व हो वे मातृत्व को जरूर समझें। मां के नेतृत्व में कहीं अहंकार नहीं होता। नेतृत्व में मातृत्व समझाने के लिए लंका कांड में भगवान राम एक लीला करते हैं। वानर सेना सेतु के...
April 18, 08:09 AM

परिश्रम में बाहर सेवा और भीतर योग हो

परिश्रम में बाहर सेवा और भीतर योग हो
अब समय आ गया है कि बिना मेहनत की कमाई हराम की ही मानी जाएगी। धीरे-धीरे लोगों को समझ में आने लगा है कि सम्मान से रहना हो तो परिश्रम करना ही पड़ेगा। हरामखोरी अपराध बनने जा रही है यह सुखद संकेत है। हर ईमानदार, परिश्रमी व्यक्ति को ऐसे समय का इंतजार है। यह तय होने और दिखने भी लगा है कि आने वाले समय में हरामखोर व अकर्मण्य लोग हाशिये पर पटक दिए जाएंगे, इधर-उधर भटकते रहेंगे। परिश्रम पूजा की तरह नज़र आएगा। यह भौतिक दृष्टि है। परिश्रम की एक आध्यात्मिक दृष्टि भी है। इस रास्ते से चलेंगे तो पता लगेगा परिश्रमी...
April 15, 09:16 AM

मृत्यु को भी संदेश बना देते हैं महापुरुष

मृत्यु को भी संदेश बना देते हैं महापुरुष
महापुरुष मृत्यु को भी संदेश बना जाते हैं। सदकार्य करते हुए कुछ लोग प्रेरणा के स्रोत बन जाते हैं लेकिन, वे सचमुच महान होते हैं जो संसार से जाते-जाते भी बहुत कुछ सिखा जाते हैं। आज ईसा मसीह को सलीब पर चढ़ाए जाने का दिन है। गुड फ्राइडे अपने आप में उत्सव है,क्योंकि एक फकीर दुनिया को बहुत कुछ देकर विदा हुआ था। मृत्यु सभी की होना है। हम सब मृत्यु के पहले और उसके बाद की तैयारी जरूर करते हैं। वृद्धावस्था से पहले मनुष्य धन, रहन-सहन आदि की व्यवस्था इस तरह से जुटा लेता है कि कहता है मरें तो संतोष से मरें। यह मौत...
April 14, 09:11 AM

अपने व्यक्तित्व को सकारात्मक बनाइए

अपने व्यक्तित्व को सकारात्मक बनाइए
हमारे साथ कोई कदम से कदम मिलाकर क्यों चले? इस सवाल के जवाब में तीन बातें सामने आएंगी- किसी व्यवस्था का दबाव, अपनापन या कोई मजबूरी। हम किसी व्यवस्था का हिस्सा हों, कहीं नौकरी या कोई व्यवसाय कर रहे हों तो कुछ लोगों के साथ चलना पड़ेगा या कुछ हमारे साथ चलेंगे। यह व्यवस्था का हिस्सा है। इसकी बहुत अधिक व्याख्या नहीं हो सकती। चूंकि साथ काम करना है तो चलना भी पड़ेगा। दूसरी बात है अपनापन। लोग अपनेपन के कारण भी साथ चलते हैं। तीसरा कारण बनता है मजबूरी। कोई ऐसी मजबूरी आ जाती है कि हमें किसी के साथ या किसी को...
April 13, 08:28 AM

अपनी आत्मा से जुड़ेंगे तो अशांत नहीं होंगे

अपनी आत्मा से जुड़ेंगे तो अशांत नहीं होंगे
वस्तुओं का इस्तेमाल करने की अक्ल और अधिकार केवल मनुष्य को है। पशुओं के भाग्य में यह नहीं होता। समझदार मनुष्य यदि कोई चीज खरीदकर लाता है या उसे प्राप्त होती है तो वह उसका उपयोग जानता है। यहां गाड़ियों का उदाहरण लिया जा सकता है। यदि आपके पास एक से अधिक गाड़ियां हैं तो आपको मालूम होता है कि कब किस गाड़ी का उपयोग करना है। लंबे समय तक यदि किसी वाहन का उपयोग न करें तो पड़े-पड़े ही उसकी बैटरी खराब हो जाएगी और जिस दिन उसका उपयोग करना चाहेंगे, वह सही काम नहीं करेगी, इसलिए गाड़ियों को काम में लेते रहिए ताकि...
April 12, 10:12 AM

हनुमानजी की ये चार बातें जीवन में उतारें

हनुमानजी की ये चार बातें जीवन में उतारें
जिसका भी जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी होगी ही। जन्म और मृत्यु के बीच जो महत्वपूर्ण घटना घटती है वह है जीवन। अधिकतर लोग जान ही नहीं पाते कि जीवन को जीवन बनाया कैसे जाए? वो जन्म और मृत्यु को ही जीवन का हिस्सा समझ लेते हैं। जीते तो पशु भी हैं लेकिन, जीवन को जानने की संभावना ईश्वर ने सिर्फ मनुष्य को दी है। जन्म-मृत्यु के बीच में जीवन कैसा तैयार किया जाता है, इसका जीता-जागता उदाहरण है हनुमानजी। जिस-जिस धर्म में जो-जो भी संदेश हैं वे समूचे व्यक्तित्व यानी हनुमानजी में उतरे हैं। आज उनकी जयंती है। अपने जन्म के...
April 11, 08:18 AM

शास्त्रों के दृष्टांतों में हर समस्या का हल

शास्त्रों के दृष्टांतों में हर समस्या का हल
कल्पना की क्रियाशील अभिव्यक्ति का नाम प्रबंधन है। इस दौर में जिस तरह से विज्ञान और तकनीक ने हमारे जीवन को प्रभावित किया है, यदि प्रबंधन ठीक नहीं हुआ तो इन दोनों का नुकसान ही उठाएंगे। भारत में प्रबंधन के अर्थ पूरी दुनिया से थोड़े अलग हो जाते हैं, क्योंकि हमारी जड़ें मूल रूप से धर्म से जुड़ी हैं। धर्म-अध्यात्म को लेकर भारत के ऋषि-मुनियों ने हमें जो चिंतन परम्परा दी ऐसी दुनिया में किसी और देश के पास है भी नहीं, इसलिए यहां प्रबंधन को थोड़ा शास्त्रों और ऋषि-मुनियों के चिंतन से जोड़ दिया जाए तो शायद...
April 6, 10:25 AM

आज बढ़ाएं चार कदम शांति की ओर...

आज बढ़ाएं चार कदम शांति की ओर...
यह बिल्कुल जरूरी नहीं कि जिसको सुख मिल जाए उसे शांति भी प्राप्त हो जाए। आज के दौर में सुख प्राप्त कर लेना ज्यादा मुश्किल नहीं है। थोड़े पढ़े-लिखे हों, दुनियादारी आती हो, उठापटक में माहिर हों तो सुख हासिल किया जा सकता है। लेकिन शांति मिल जाना इतना आसान नहीं है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने खुशहाली की रिपोर्ट में 150 देशों में भारत को 122वें क्रम पर बताया। इसके पहले वाले साल में हम 118वें पर थे। यानी भारत में विकास हुआ पर खुशहाली में नीचे खिसक गया। खुशहाली शब्द को शांति से भी जोड़ा जाना चाहिए। शांति...
April 5, 07:32 AM

ईश कृपा से सफलता आसान हो जाती है

ईश कृपा से सफलता आसान हो जाती है
मेहनतकश को हरि कृपा मिल जाए तो सफलता और आसान हो जाती है। कोई कठिन काम भी करने निकलें तो वह पूरा तो कठिनाई से ही होगा लेकिन, उसे करने में आनंद आने लगेगा। यह आनंद इस बात का आभास कराएगा कि मुश्किलें दूर हो गईं। अपने से ऊपर की परमशक्ति कैसे हमसे जुड़ जाती है और फिर हमें क्या लाभ होता है इसका दृश्य लंका कांड में देखने को मिलता है। जब नल और नील ने पत्थरों का सेतु बना दिया तब यह बात सामने आई कि वानर सेना ज्यादा है और सेतु की चौड़ाई कम। ऐसे में सभी उस पर से कैसे गुजर पाएंगे? उसी समय श्रीराम समुद्र के किनारे...
April 4, 06:36 AM

खुद को जानने के ये तीन दर्पण

खुद को जानने के ये तीन दर्पण
हम लोग जीवनभर जो होते हैं वह दिखने नहीं देते। कुछ जान-बूझकर ऐसा करते हैं, कुछ अनजाने में। मनुष्य अपने आपको पूरी तरह प्रकट होने ही नहीं देता। भीतर से हम क्या हैं और बाहर से क्या हो जाते हैं इसका अंतर समझाता है अध्यात्म। यदि जानना चाहें कि भीतर से क्या हैं और जो कर रहे हैं वह ठीक है या नहीं तो इसके लिए अध्यात्म ने तीन दर्पण दिए हैं। इनमें चेहरा देखेंगे तो आप जो हैं, जान जाएंगे। दुनिया आपको क्या समझती है यह अलग बात है लेकिन, कम से कम मनुष्य शरीर में रहते हुए यह जानना जरूरी है कि हम हैं क्या। बाहर की देह...
April 1, 07:27 AM

प्रौढ़ अवस्था में विद्यार्थी होने का अर्थ

प्रौढ़ अवस्था में विद्यार्थी होने का अर्थ
उम्र और विद्यार्थी होना एक साथ चलता रहता है। हमें लगता है उम्र के एक पड़ाव तक पढ़ लिए तब तक ही विद्यार्थी थे। उसके बाद रोजी-रोटी, घर-परिवार में लग गए और विद्यार्थी जीवन समाप्त हो गया। लेकिन, ऐसा होता नहीं है। यदि जीवन के किसी भी पड़ाव पर कुछ निराश, थके हुए हों और लग रहा हो कि कुछ समस्याओं के समाधान नहीं मिल रहे तो सबसे पहले अपने आपको विद्यार्थी मानिए। कई प्रश्नों के उत्तर मिलने शुरू हो जाएंगे। अपने विद्यार्थी होने को उम्र के साथ बांटते हुए इस पर चिंतन करते रहिएगा। बचपन के विद्यार्थी के लिए...
March 30, 08:46 AM

लापरवाही और आलस्य से सावधान रहें

लापरवाही और आलस्य से सावधान रहें
आलस्य मैल और लापरवाही एक मूर्छा है। इन दो शब्दों को उस समय बहुत ठीक से समझिए जब नववर्ष में प्रवेश कर रहे हों। हम भारतीयों के लिए दो बार नया साल आता है- पहली जनवरी और गुड़ी पड़वा को जो कि आज है। इसमें क्या होता है और उसमें क्या होना चाहिए इस बहस को छोड़कर विचार यह कीजिए कि जब नए काल में प्रवेश कर रहे हों तो हमारे पास कुछ ऐसा होना चाहिए, जिससे कि आने वाले दिनों में अपने व्यक्तित्व को निखार सकें। आज नववर्ष में एक संकल्प लें कि अब हर दिन इस बात का आकलन करेंगे हमने दिनभर में ऐसा क्या किया कि अपने आपको सफल...
March 29, 07:16 AM

संस्कार से जुड़ी शिक्षा देगी सही नतीजे

संस्कार से जुड़ी शिक्षा देगी सही नतीजे
पढ़े-लिखे लोग यदि दुराचारी हों तो समाज के लिए घातक ही होंगे। रावण इसका सबसे बड़ा उदाहरण था। शिक्षा के इस दौर में पढ़ाई-लिखाई के बहुत प्रयास किए जा रहे हैं। आज पढ़ने वालों के सामने पहले जैसी चुनौतियां नहीं हैं। अब तो अवसर, साधन-सुविधाएं सबकुछ पर्याप्त होकर माता-पिता भी बच्चों को पढ़ाने को आतुर रहते हैं। लेकिन, यह भी तय है कि केवल शिक्षित बच्चे एक दिन समाज, राष्ट्र और खुद के लिए भी घातक सिद्ध होंगे। शिक्षा के सही परिणाम पाना हो तो उसे संस्कार से जोड़ना पड़ेगा। लंका कांड में श्रीराम समुद्र पार करने...
March 28, 07:28 AM
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