जीने की राह
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  • संसार व ईश्वर के फर्क को समझें
    एक विरोधाभास सभी के जीवन में अपने-अपने ढंग से बना रहता है। जो लोग भगवान को मानते हैं वे पूरी ताकत संसार छोड़ने में लगा देते हैं। जिन्होंने अपनी सारी शक्ति संसार में झोंक दी है, उन्हें भगवान से परहेज शुरू हो जाता है। कुछ लोग दोनों को पकड़े हुए हैं, तो पूरा जीवन उलझन और भ्रम में पड़े रहते हैं बस इसी भ्रम के कारण भक्त भी तनाव में पाए जाते हैं, जबकि भक्ति और अशांति ये साथ नहीं हो सकते। अशांत चित्त से भक्ति हो ही नहीं सकती। ध्यान रखिए, संसार में रहना है, तो उसे पाने की कोशिश मत करिए, उसमें रहना ही उसे पाना है।...
    08:15 AM
  • सुखी रहना जन्मसिद्ध अधिकार
    बिना तैयारी के जीवन में कुछ भी न लाएं। यदि हम धन, पद, प्रतिष्ठा या परिवार चाहते हैं, तो इसके लिए तैयारी जरूर करें। यदि तैयार नहीं हैं तो हम अपरिपक्व होंगे और जो बातें हमारे जीवन में आने वाली हैं उनका उपयोग ठीक से नहीं कर पाएंगे। जिनसे सुख मिल सकता है वह दुख का कारण बन जाएंगे। तैयारी के लिए संकल्प लेना पड़ता है कि यदि धन आएगा तो हम तैयार हैं उसके सदुपयोग के लिए। हमारी इंद्रियां बहाना बनाने में माहिर हैं, लेकिन उन्हें नियंत्रित करने की तैयारी है तो जीवन में जो स्थितियां आ रही हैं उसमें वे दुरुपयोग...
    July 29, 03:36 AM
  • कर्म फल के प्रति आसक्ति न हो
    कर्म-योग बहुत श्रेष्ठ है, लेकिन इसमें जब परिणाम की आसक्ति जुड़ जाती है, तो वह इसे दूषित कर देती है। एक बात दिमाग मेें बिठा लें कि पूरे प्रयास के बाद भी जीवन में कुछ बातें अपने ही ढंग से होकर रहेगी। हमारा अधिकार शत-प्रतिशत कर्म पर है, शत-प्रतिशत परिणाम पाने में नहीं है। सही को पूरे प्रयास से करना चाहिए, लेकिन गहरे में यह स्वीकृति बनी रहे कि कुछ ऐसा होगा, जिस पर हमारा नियंत्रण नहीं रह पाएगा और उस समय विचलित न हों। स्वीकृति के इसी भाव को और अस्वीकृति की इसी दशा को आस्तिक और नास्तिक शब्द दिए गए हैं।...
    July 27, 03:14 AM
  • परिवार का पालन भी यज्ञ है
    सभी धर्मों के पास अपनी-अपनी पूजा पद्धति में कुछ विशेष क्रियाएं हैं। गिरजाघर की प्रेयर का अपना मतलब भी है। मस्जिद में पढ़ी गई नमाज भी अपने आप में संदेश है। गुरुद्वारे में जिस तरह से ग्रंथ-साहिब पढ़ा जाता है, उससे पूरी तरह नादब्रह्म प्रभावित हो जाता है। ऐसे ही हिंदू-धर्म में यज्ञ है। हवन सामग्री को कुछ मंत्रों के साथ विप्रगण प्रभावित करते हैं और अग्नि, हवन सामग्री, मंत्र और पुरोहित के सद्कर्म मिलकर पूरे वातावरण को शुभ और कल्याणकारी स्थिति से जोड़ते हैं। भारत के परिवारों में कोई न कोई वरिष्ठ...
    July 25, 03:34 AM
  • प्रेमपूर्ण रहना सुंदरता का प्रतीक
    किसी भी वस्तु का सौंदर्य केवल उसकी सजावट में नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग और समय रहते नष्ट होने के पहले ही उसके परिणाम ले लिए जाएं, इस बात में है। हम सभी सौंदर्य पसंद करते हैं। यदि हमको सौंदर्य से लगाव है तो छोटी से छोटी चीजों का सदुपयोग करना सीख जाएं। कपड़े उतारकर फेंकना, चप्पल-जूतों को बेतरतीब ढंग से रखना, भोजन झूठा छोड़ना, कार के दरवाजे को जोर से बंद करना और बेजान चीजों को लात मार देना। हम तो यह मानकर चलते हैं कि सामने वाली वस्तु बेजान है, लेकिन कहीं न कहीं हमारी यह क्रिया हमारे व्यक्तित्व को...
    July 24, 02:53 AM
  • ऐसे हो जाते हैं हम व्यसनाधीन
    आपने जीवन में कुछ मित्र बनाए होंगे। संभव है कुछ शत्रु भी बनाए हों या कुछ लोग अपने आप शत्रु बन गए हों। कुछ ऐसे भी मित्र हो सकते हैं, जो पहले तो मित्र लगे और बाद में शत्रु जैसा व्यवहार कर रहे हैं। यह है बाहर की दुनिया का मामला। आइए, अब बात ऐसे मित्र की जो पहले मित्र है और बाद में शत्रु। इनका नाम है व्यसन मित्र। दुर्गुण मित्र बनकर बाद में जो दुश्मनी निकालते हैं, तब पछतावा होता है। तीन तरीके से मनुष्य व्यसन करता है। पहला, नशा करना। जैसे शराब, अफीम, गांजा, भांग का सेवन। इसका संबंध शरीर से है। दूसरा है कर्म का...
    July 23, 08:09 AM
  • जीवनशैली का प्राण है सत्संग
    विज्ञान ने सिद्ध किया है कि एक वस्तु यदि कुछ समय दूसरी वस्तु के पास रखी रह जाए, तो उनके गुण-दोष एक-दूसरे में उतर जाते हैं। ऐसा ही मनुष्यों के साथ भी है। आप किसी दुर्गुणी व्यक्ति के साथ समय बिताएंगे तो पाएंगे कि दुर्गुण आपके भीतर स्थान बना रहे हैं। इससे बचने के लिए अापको बहुत अधिक संयम की ताकत लगेगी। इसके उलट सद्गुणी व्यक्तियों के साथ रहें तो न चाहते हुए भी उनकी अच्छी बातें आपके भीतर प्रवेश करने लगेंगी। ध्यान दीजिए न चाहते हुए भी, इसीलिए हमारे यहां सत्संग का बड़ा महत्व है। इसमें जो संग शब्द है,...
    July 22, 02:48 AM
  • उत्तरकर्म को खारिज न करें
    अपनों को खोने का दर्द वे ही जानते हैं, जिन्होंने इसे भोगा है। प्रियजन के विरह के दुख में खुद को कैसे समझाया जाए? प्रसंग चल रहा है किष्किंधा कांड का। अपने पति बालि की मृत्यु के बाद रो रही तारा श्रीराम के समझाने पर शांत हुईं, तब भगवान शंकर पत्नी पार्वती से कहते हैं- उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं।। हे उमा, स्वामी श्रीरामजी सबको कठपुतली की तरह नचाते हैं। मनुष्य कठपुतली है। हमारी डोर उस परमपिता के हाथों में हैं। वो नचा रहा है, हम नाच रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि हमारी क्या भूमिका...
    July 21, 03:07 AM
  • स्वयं की मौलिकता से जुड़िए
    आपको न तो किसी की तरह होना है और न ऐसा कुछ करें कि किसी की तरह हीन रह जाएं। खुद को यह समझाइए कि आप आप हैं, जो परमात्मा की ऐसी कृति है जिसका चयन उन्होंने मनुष्य बनाकर किया है। अन्यथा वह किसी पशु की योनि भी आपको दे सकता था। अब जो श्रेष्ठता हमारे भीतर है उसका उपयोग करके हमें वह बनना है जो परमात्मा ने हमें बनाना चाहता है। दूसरों की नकल करके, दूसरों की तरह बन जाएं, ऐसा प्रयास ही हमें हमारी श्रेष्ठता से काट देता है। इस मामले में ईश्वर सचमुच अनूठा है कि उसने हर इंसान को अलग ढंग से बनाया है। सबके अपने-अपने...
    July 20, 04:00 AM
  • अपनी भक्ति को प्रकृति से जोड़ें
    हर व्यक्ति प्रकृति को अपने-अपने तरीके से नुकसान पहुंचाता है, क्योंकि जीवनशैली ही ऐसी है। अगर प्रकृति को बिल्कुल नुकसान न पहुंचाने की सोचें तो यह एकदम अव्यावहारिक दृष्टिकोण होगा। आप प्रकृति के साथ अपना भी नुकसान कर लेंगे। एेसे में जब भी प्रकृति से जुड़ें सोचें कि क्या करें कि इसे कम से कम नुकसान हो। आपका भी काम चलता रहे और प्रकृति को लाभ पहुंचा सकते हों तो यह बोनस होगा। कुछ बातें आसानी से की जा सकती हैं। जैसे प्लास्टिक का उपयोग न करें, वृक्ष को अकारण न काटें, स्वयं धुआं पैदा न करें, जल का...
    July 18, 03:21 AM
  • एकतरफा दोस्ती से मुक्ति बेहतर
    रिश्तों से हटकर जिम्मेदारी निभाने के लिए यदि कोई संबंध है तो वह है मित्रता। दायित्व बोध का दूसरा नाम दोस्ती है। दोस्ती दो तरफा होती है। यदि किसी एक को दोस्ती निभानी पड़ रही है तो ऐसी मित्रता से मुक्ति पा लेनी चाहिए। पहले मित्रता दो कारणों से बनती थी। समान स्वभाव हों और एक-दूसरे के काम आने की स्थिति हो, तो लोग आपस में मित्र बन जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। इसलिए यदि लगे कि व्यस्तता और जिम्मेदारियों के कारण आपको मित्रता बदलनी या समाप्त करनी पड़ सकती है, तो बहुत अच्छे ढंग से खूबसूरत मोड़ पर जाकर उसको...
    July 17, 03:37 AM
  • भय जगाता है मनुष्य के अंदर का पशु
    जानवर व भय का बड़ा गहरा संबंध है। जानवर बलशाली होते हैं इसलिए मनुष्य पर हावी हो जाते हैं, लेकिन वे मूलरूप से मनुष्य से डरते हैं। जानवरों की जीवनशैली ही ऐसी है कि जंगल में कोई कानून नहीं होता। जो बलशाली हैं वे कमजोर को खा जाते हैं। अब बात करते हैं मनुष्य की। जब-जब मनुष्य अंदर से भयभीत होगा, उसके अंदर का जानवर सक्रिय हो जाएगा। हर मनुष्य में थोड़ा-सा अंश पशु का होता ही है। मनुष्य के भीतर का पशु एकांत में और खासतौर पर जब मनुष्य काम-पीड़ित होता है तब जाग जाता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है आप यदि शांति से...
    July 16, 07:51 AM
  • अकेलेपन को आनंद में एेसे बदलें
    आदमी जब दुखी होता है तब अकेलापन महसूस करता है और जब अकेला पड़ जाए तो दुख ओढ़ लेता है। हमारे भीतर यह क्षमता है कि हम अकेले रहने से घबराएंगे नहीं, बल्कि अपने भीतर से प्रसन्नता निकाल लेंगे। मैं ऐसे अनेक लोगों को जानता हूं जो भीड़ से घिरे हैं, प्रतिष्ठित हैं, लोकप्रिय हैं, लेकिन भीतर से बिल्कुल खाली और अकेले हैं। यदि उन्हें बाहर से कभी अकेला रहना पड़ जाए तो न सिर्फ टूट जाते हैं, बल्कि भटक जाते हैं। यदि पुरुष हैं तो अकेलापन मिटाने के लिए किसी गैर-स्त्री की तलाश में निकल जाते हैं। कई स्त्रियां भी किसी...
    July 15, 07:54 AM
  • जैसी दृष्टि वैसा नजर आता है संसार
    संसार बुरा तब लगता है जब हमारा मन इसे बुरी दृष्टि से देखता है। मन का स्वभाव दुख पकड़ने का है। संसार को कैसे देखा जाए इसके लिए श्रीराम किष्किंधा कांड में बालि की रोती हुई विधवा तारा को समझाते हैं। इस वार्तालाप पर तुलसीदासजी चौपाई लिखते हैं - तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया।। छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।। तारा को व्याकुल देखकर श्रीरघुनाथजी ने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया (अज्ञान) हर ली। उन्होंने कहा - पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु इन पांच तत्वों से यह शरीर रचा...
    July 14, 07:00 AM
  • वर्तमान में जीकर जीवन को जानें
    जीवन में कुछ बातों को स्वीकार करना ही पड़ता है। आप मजबूरी के साथ स्वीकार करेंगे तो परेशानियां बढ़ जाएंगी। आप स्वेच्छा से स्वीकार करेंगे तो परेशानियां वही रहेंगी, लेकिन आप कम परेशान होंगे। ऐसी अनेक परिस्थितियां बनती हैं, जिन्हें स्वीकार करना ही पड़ता है। इसे समय से जोड़ दीजिए। जैसे जो वक्त बीत जाता है उसका सुख हो या दुख, आप लौटाकर नहीं ला सकते। उसे भुलाने की कोशिश करिए, क्योंकि जो आने वाला है वो अभी आप तक नहीं पहुंचा है, इसलिए जो हमारे हाथ में बचता है वो होता है वर्तमान। अपने वर्तमान को सुधारने...
    July 13, 06:49 AM
  • वासनाओं का रूपांतरण कीजिए
    इंद्रियों के सदुपयोग को दुरुपयोग में बदलने का नाम वासना है। चूंकि वासना का संबंध इंद्रियों यानी हमारी आंख, नाक, कान, हाथ, पैर, मल-मूत्र की दो इंद्रियां, मुख, त्वचा, कंठ से होता, वह इन सबसे जुड़ जाती है। तब मनुष्य वासनाओं को दुश्मन समझने लगता है, इसलिए वासनाएं बाहर से आएं और इंद्रियों से मिलें तो हम सावधान हो जाएं। इन्हें परमात्मा की ओर मोड़ दिया जाए। फकीरों ने कहा है, वासना खत्म नहीं की जा सकती, इन्हें संस्कारित किया जा सकता है। परिष्कृत किया जा सकता है। इन्हें उस दिशा में मोड़ा जा सकता है, जो जीवन...
    July 11, 06:58 AM
  • ईश्वर को पाने का साधन है गृहस्थी
    चाहने पर सबसे सरलता से भगवान मिलता है और सबसे कठिनाई से दुनिया मिलती है। परमात्मा को पाने के लिए बहुत कठिन प्रयास नहीं करने पड़ेंगे, लेकिन संसार चाहते हैं तो खूब परिश्रम करना पड़ेगा, क्योंकि संसार में गतिरोध, उलझनें और कुटिलताएं हैं। सवाल उठता है कि क्या गृहस्थी में भगवान मिल जाएंगे? कुछ लोग सोचते हैं कि घर-गृहस्थी छोड़नेे पर ही भगवान मिलेंगे और यहीं से गड़बड़ शुरू हो जाती है। जिस दुनिया को भगवान ने बनाया उसे वे क्यों छुड़वाएंगे? साधु-संतों ने कहा है कि गृहस्थी वह केंद्र है, जहां रहकर परमात्मा...
    July 10, 07:08 AM
  • अहंकार घटाने के लिए काम बदलें
    लोग इस बात को लेकर परेशान रहते हैं कि हमारी नई पीढ़ी के बच्चे आलसी हो गए हैं। यदि इन्हें इस उम्र में भी घर के कामों की कुछ जिम्मेदारियां नहीं सौंपी तो जिस उम्र में सचमुच इन्हें काम करना पड़ेगा, उसके लिए ये मानसिक रूप से तैयार नहीं हो पाएंगे। जैसे दफ्तरों में काम का न सिर्फ बंटवारा होता है, बल्कि एक का काम दूसरे को और दूसरे का काम पहले को दिया जाता है ताकि सब लोग सभी कामों में दक्ष हो जाएं। ऐसा घरों में भी होना चाहिए। घर के पुरुष कुछ काम वह करें जो स्त्रियां करती आ रही हैं। घर की महिलाओं को भी यह अवसर...
    July 9, 07:00 AM
  • ईश्वर पर भरोसा देता है शांति
    परेशान कोई नहीं होना चाहता, लेकिन लगभग सभी परेशान रहते हैं। जब कभी परेशान हों तो सबसे पहले देखिए कि परेशानी किस मार्ग से आ रही है। संसार से जो परेशानी आती है उन पर हमारा नियंत्रण उतना नहीं होता। दूसरा हिस्सा हमारा व्यक्तित्व है, जो शरीर, मन और आत्मा से बना है। दिक्कतों को हम सबसे पहले शरीर से झेलते हैं। सावधानी रखें तो इन्हें शरीर से ही विदा किया जा सकता है। शरीर ऐसा द्वार है, जिसमें कई ताले और कई दरवाजे हैं। शरीर के दरवाजे बंद न हों इसमें मन की रुचि होती है। उससे आने वाली समस्याओं का चिंतन, उनके...
    July 8, 06:29 AM
  • भ्रांति दूर होने पर संभव सहज विदाई
    संसार में झंझट तब शुरू होती है जब हम इस वास्तविक संसार से हटकर भ्रम की दुनिया बसा लेते हैं। यदि हम जन्म व मृत्यु को ठीक से समझ लें तो हम वास्तविक संसार और अपनी भ्रांतियों से बनाए हुए संसार का अंतर समझ लेंगे। प्रसंग चल रहा है बालि के निधन का। मरते-मरते उसने जितने प्रश्न पूछे, श्रीराम ने सभी के उत्तर दिए। जब बालि ने प्राण छोड़े तो तुलसीदासजी ने विशेषरूप से यह चौपाई लिखी- राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग। सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग।। श्रीरामजी के चरणों में दृढ़ प्रीति करके...
    July 7, 06:01 AM
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