जीने की राह

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  • ईश्वर को इंद्रियों का अर्पण सच्चा भोग
    सभी लोगों को किसी न किसी से लगाव होता है। कोई धन से, कोई पद से, कोई बच्चों से, कोई प्रतिष्ठा से तो किसी को दुर्गुणों से लगाव हो जाता है। यह अनुचित और गलत जुड़ाव हमें भटका देता है। नेता हो या नौकरशाह, उनका लगाव केवल अधिकार संपन्न होने से होता है। आम जनता को उदासीन रहने में बड़ा मजा आता है। हम मान लेते हैं कि हम सामान्य व्यक्ति हैं, कोई राष्ट्रीय या सामाजिक जिम्मेदारी क्यों उठाएं। यह सही है कि हम सामान्य लोग हैं, लेकिन खुद को इतना तैयार कर सकते हैं कि श्रेष्ठ नागरिक, मनुष्य बन जाएं। अध्यात्म में एक...
    August 27, 03:53 AM
  • गलत लोगों के प्र‌भाव से बचाता है योग
    आज की राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था ने लोगों को नागरिक तो बना दिया पर हम मनुष्य बनने में चूकते जा रहे हैं। कई बार हमें दूसरों की मदद लेनी पड़ती है और हो सकता है, जिससे हमारा संपर्क है वह व्यक्ति बहुत प्रभावशाली हो। ऐसे व्यक्ति का मूल्यांकन करने में हम चूकने लगते हैं, क्योंकि उसका प्रभामंडल हमारी सोच को कुंद कर देता है। हम इसी में खुश हो जाते हैं कि प्रभावशाली व्यक्ति हमारी मदद कर रहा है। ध्यान रखिएगा, ऐसे लोगों का मूल्यांकन करना बहुत जरूरी है। भले ही बाहर से न कर पाएं पर भीतर ही भीतर मूल्यांकन जरूर...
    August 26, 03:46 AM
  • दुर्गुणों से लड़ने में सक्षम बनने का पर्व
    दुर्गुण उस जमीन को खुरदुरा बना देते हैं, जिस पर चलकर मनुष्य को जीवन-यात्रा पूर्ण करनी होती है। इसलिए जिसके भीतर दुर्गुण आ जाएं, उसकी यात्रा में बाधाएं आएंगी। दुर्गुण तो तैयार ही बैठै रहते हैं। छिद्र दिखा कि प्रवेश किया। सवाल है कि दुर्गुणों से बचा कैसे जाए? गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है, जब-जब मेरे भक्त असुरक्षित होंगे, जब अधर्म हावी होगा, उन्हें मेरी जरूरत होगी, मैं अवश्य आऊंगा। तो क्या भगवान सचमुच आ जाते हैं? जिस काल में कृष्ण मौजूद थे उस समय भी महाभारत का युद्ध हो गया। उनके सामने ऐसे-ऐसे काम...
    August 25, 03:40 AM
  • गुरु की सत्ता से जुड़कर अहंकार मिटाएं
    जो लोग सत्ता पर लंबे समय तक बैठ जाते हैं, वे खड़े होना ही भूल जाते हैं। चलने का प्रयास करते हैं तो स्वयं नहीं चल पाते, दो-चार लोगों की मदद लगती है। सत्ता अपनी कीमत वसूलती है। सत्ता चाहे राजनीति की हो, परिवार की या किसी अन्य व्यवस्था की हो, थोड़ा सावधान रहना होगा। बाकी क्षेत्र में सत्ता पर बैठे लोग यदि बिगड़ जाएं तो उतना खतरा नहीं है, क्योंकि वहां दूसरे आपको उतारने को तैयार रहते हैं। किंतु जब धर्म क्षेत्र में सत्ता मिल जाए और उसका अहंकार आ जाए तो फिर पूरा जीवन ही बर्बाद हो जाता है। सत्ता भक्त की भी है...
    August 24, 05:18 AM
  • खुद को भीतर से ठीक कर आगे बढ़ें
    अंतरतम में झांककर अपनी कमजोरियां ठीक करने के लिए बनाए दर्पण भारतीय संस्कृति को ऋषि-मुनियों की बड़ी देन है। इन आईनों में एक है कथाएं। यदि ठीक से उनका अर्थ ग्रहण कर लें तो वे आईने का ही काम करेंगी। प्रसंग है किष्किंधा कांड का। अंगद दुखी हो चुके थे कि सीताजी की खोज के बिना लौटेंगे तो सुग्रीव मुझे जीवित नहीं छोड़ेंगे। उन्हें दुखी देख रामजी की सेना के वयोवृद्ध सदस्य जामवंत कुछ कथाएं सुनाते हैं। यहां तुलसीदासजी ने लिखा है- जामवंत अंगद दुख देखी। कहीं कथा उपदेस बिसेषी।। हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत...
    August 23, 04:44 AM
  • सरल रहकर सत्ता का सुख उठाएं
    सत्ता स्वभाव से ही नरभक्षी होती है। उस पर बैठने वाले को खा जाती है। शुरुआत से ही जमीर कुतरना शुरू करती है। इसीलिए जब कोई सत्ता पर बैठता है तो आचरण का संतुलन खो बैठता है। सत्ता केवल राजनीतिक सत्ता नहीं होती, जिसके लिए नेता जीवन दांव पर लगा देते हैं। सत्ता परिवार में मुखिया की भी हो सकती है, किसी व्यवस्था में नेतृत्व की भी हो सकती है और एक सबसे बड़ी सत्ता है आपके अपने होने की। इसमें आपको अपनी इंद्रियों पर राज करना पड़ता है। यह आंतरिक सत्ता है परंतु इतना ध्यान रखें कि हर सत्ता नरभक्षी है। निज मन ही...
    August 20, 04:40 AM
  • रोज खुद से जुड़ने का समय निकालें
    विपरीत समय में, संकट के दौर में जब घबराहट हो तो बहादुरी का मुखौटा ओढ़ लेना चतुराई मानी जाती है। कई लोग ऐसा ही करते हैं। जो परमात्मा में विश्वास करते हैं उनको एक बात सिखाई जाती है कि यदि केवल कर्मकांड करोगे तो बहादुरी मुखौटा ओढ़ने जैसी होगी, लेकिन यदि भक्ति करेंगे और अपनी भक्ति को योग से जोड़ेंगे तो फिर निर्भयता आपका स्वभाव बन जाएगी। बहादुरी और निर्भयता में बारीक फर्क है। बहादुर से बहादुर आदमी भी असफलता के डर से भरा रहता है, लेकिन जो निर्भय होता है उसे बहादुरी से कोई लेना-देना नहीं होता। बस, वह...
    August 19, 04:34 AM
  • प्रेम से जुड़ने का संदेश देने वाला पर्व
    जितने उत्सव और त्योहार हमारे देश में मनाए जाते हैं संभवत: किसी मुल्क में नहीं मनाए जाते। हमारे पूर्वज कुछ काम ऐसे कर गए हैं, जो हमारे डीएनए में उत्सव और त्योहार बनकर बह रहे हैं। हमें समझना चाहिए कि ये केवल हुड़दंग नहीं है। त्योहार हमें आपस में जोड़ते हैं और विश्राम के लिए पड़ाव देते हैं। आज व्यावसायिक जगत में इतनी चुनौतियां व प्रतिस्पर्द्धा हो गई है कि यदि शीर्ष पर पहुंचकर थक गए तो आप सफलता की दुनिया में भूतपूर्व ही नहीं, स्वर्गीय हो जाएंगे। कुछ लोगों के मन में तो यह बात बैठ गई है कि आगे बढ़ना है तो...
    August 18, 03:16 AM
  • खुद से जुड़ेंगे तो निराशा दूर होगी
    नक्शे से इमारत चले, वृक्ष चले निज लीला जीवन-यात्रा के लिए यह पंक्ति बड़े काम की है। हम में से बहुतों को स्पष्ट होगा कि हमारी मंजिल कहां है। इमारत की चाल नक्शे से हो तो इमारत अच्छी होती है। नक्शे से बाहर निकलकर इमारत बनाई जाएगी तो उसके कमजोर होने की आशंका बढ़ जाती है। किंतु वृक्ष के मामले में नक्शा काम नहीं करता। जमीन में उसकी जड़ें कितनी गहरी होंगी, तना कितना मोटा होगा, डालियां कहां-कहां बिखरेंगीं और फूल कैसे निकलेंगे यह उसकी निज लीला है। मनुष्य ने अपने हाथ वृक्ष पर भी डाल दिए और उसके समापन में जुट...
    August 17, 03:36 AM
  • परिवार के केंद्र में हो श्रीकृष्ण जैसा गुरु
    चौपड़ के खेल में कहावत है- जरूरी नहीं कि सारे पासे आपके हाथ में हों, जरूरी यह है कि आप बाजी कैसे चलते हैं। इसे यूं समझें कि संसाधन सीमित हो या कभी कोई साधन नहीं भी हो सकता है। ऐसे में हम किस-किस नीयत से निर्णय लेंगे यह महत्वपूर्ण है। कौरवों के पास सारे पासे थे, लेकिन बाजी पांडवों ने सही ढंग से चली, क्योंकि श्रीकृष्ण उनके साथ थे। श्रीकृष्ण यानी स्पष्ट चिंतन, सुदृढ़ निर्णय शक्ति और आत्म-विश्वास। श्रीकृष्ण का यह रूप हमारे भीतर उपस्थित है। बस, उघाड़ना भर है। श्रीकृष्ण जैसी उपलब्धि हमारे भीतर शिक्षा...
    August 13, 04:40 AM
  • हालात खराब हों तो भक्ति को बढ़ाएं
    जो लोग आशा में जी रहे हैं वे अब भी नारा उछालते हैं- भ्रष्टाचार का घड़ा या तो फूटेगा या फोड़ दिया जाएगा। पता नहीं ऐसा कब और कैसे होगा? भले लोग चिंतित हैं कि जिम्मेदार लोगों का भी आचरण बच नहीं पा रहा है। सरकारी व्यवस्था में चारों ओर बिगड़ी बनाने वालों की जमात फैल गई है। जो काम आसानी से न हो सके वह ये कराते हैं। जिन्हें भगवान पर भरोसा है वे अपनी भलाई को ऐसे भ्रष्ट आचरण से आहत न करें। जिस समय श्रीराम हुए, श्रीकृष्ण का दौर गुजरा, महावीर ने जो समय देखा, बुद्ध के समय जो परिस्थितियां थीं, नानक और मोहम्मद साहब भी...
    August 12, 05:04 AM
  • संयम बनाए रखकर चरित्र बचाएं
    नशा करने वाला व्यक्ति बड़ा हो या छोटा, अमीर हो या गरीब, पढ़ा-लिखा हो या निरक्षर, वह स्वयं के साथ दूसरों का भी नुकसान करता है। कहते हैं पता और पैगाम किसी दूसरे का भी हो, लेकिन फाड़ा तो लिफाफा ही जाएगा। इस तरह आदत और शराब मिलकर जब नशा बनता है तो नुकसान तो पीने वाले का ही होना है। पिछले कुछ दिनों की खबरें देखें तो पाएंगे कि शराब के नशे में किसी ने फुटपाथ पर सो रहे लोगों को रौंद दिया तो किसी ने दुष्कर्म किया। पहले लोग मौज-मस्ती के लिए नशा करते थे, अब 90 प्रतिशत अपराधी अपराध करने के पहले नशा करते हैं ताकि...
    August 11, 05:03 AM
  • बुढ़ापे का सौंदर्य है आंतरिक प्रसन्नता
    कहते हैं बुढ़ापे में सौंदर्य चला जाता है। शरीर की बात करें तो यह बिल्कुल सही है। जिस्म का नूर कोई नहीं बचा सकता। चाहे जितनी देखभाल शरीर की कर लो। आज तुलसीदासजी की जयंती है, जिनका लिखा श्रीरामचरित मानस भारतीयों के जीवन की आचार-संहिता बन गया। घर-घर में इतनी पैठ शायद ही किसी और साहित्य की हुई होगी। उन्होंने जो बातें हमें सिखाई हैं उनमें एक बड़ी बात यह है कि बुढ़ापे का सौंदर्य आंतरिक प्रसन्नता है। लोग वृद्धावस्था में भगवान को पाने से ज्यादा भुनाने का प्रयास करते हैं। किंतु तुलसी कहते हैं...
    August 10, 04:02 AM
  • विराम में ही शांति और भय से मुक्ति है
    राजनीति में अंतिम परिणाम सत्ता ही माना जाता है और भक्ति में अंतिम परिणाम है भय मुक्ति। राजनीति की बात तो समझ में आती है। मौजूदा नेता तो सत्ता के लिए ही हैं। किंतु भक्ति के क्षेत्र में भी कुछ लोग चूक रहे हैं। भक्त को भय-मुक्त रहना चाहिए, क्योंकि उसकी पीठ पर भगवान का हाथ रहता है। सबसे बड़ा भय होता है अज्ञात का भय और भक्त इसी से मुक्त रहता है। इसे किष्किंधा कांड के प्रसंग से समझते हैं। स्वयंप्रभाजी के कहने पर आंख बंद करने वाले वानरों ने जब आंखें खोलीं तो खुद को समुद्र तट पर पाया, लेकिन निराशा हाथ लगी।...
    August 9, 03:48 AM
  • संघर्ष में धैर्य रखना ही शिव का विषपान
    जब अपनों से संघर्ष करना पड़े तो सबसे बड़ी ताकत होती है आंतरिक प्रसन्नता। अपनों से संघर्ष में अच्छे-अच्छे टूट जाते हैं। सभी को कभी न कभी अपनों से संघर्ष करना पड़ता है। इसके लिए पहली ताकत जुटाएं आंतरिक प्रसन्नता के रूप में। भीतर से खूब प्रसन्न रहिए, शायद स्वजन शत्रु में नहीं बदलेंगे। वे आकर आपसे जुड़ जरूर सकते हैं। जानवरों में मनुष्य को सबसे ज्यादा डर लगता है सांप से। कोई हिंसक जानवर मनुष्य को इतना भयभीत नहीं करता। इसका कारण है सांप की अज्ञात उपस्थिति और दूसरा उसका जहरीला होना। सपने में शेर आ...
    August 6, 04:21 AM
  • मौन साधने से ऊर्जावान हो जाते हैं शब्द
    बरसते पानी में यदि छाते की छड़ किसी और ने थाम रखी हो तो आपका भीगना तय है। छाते को सबसे अच्छा वही पकड़ और संभाल सकता है, जो भीगने से बचने के लिए उसका उपयोग करना चाहता हो। ऐसे ही जिंदगी में कई बार हम अपने बचाव या सुरक्षा के प्रमुख साधनों की कमान दूसरों को सौंप देते हैं और परेशान होते हैं। दूसरों को हमें क्या और कितना देना है इसकी समझ कायम रखें। इसी समझ की कमी के कारण हम कुछ महत्वपूर्ण चीजें भी दूसरों को पकड़ा देते हैं जैसे प्रभावी शब्द। हम अपने कई महत्वपूर्ण शब्द दूसरों पर खर्च कर देते हैं। दिनभर में...
    August 5, 04:23 AM
  • लक्ष्य प्राप्ति में आत्मा का भी योगदान हो
    किसी चील के मुंह में बोटी या किसी पक्षी के मुंह में रोटी हो और उसे उड़ता हुआ देखें तो लगता है यह बहुत दूर जा रहा है। बस, मनुष्य का भाग्य ऐसा ही हो गया है। कभी-कभी तो लगता है, कौन उड़ा ले जाता है हमारे भाग्य को हमसे? खूब प्रयास करते हैं, कोई कसर नहीं छोड़ते, योग्य भी हैं फिर भी वह क्यों नहीं मिल पाता जो मिलना चाहिए। जब ऐसा लगता है तो हम निराश होने लगते हैं। एक बारीक कारण देखें तो पाएंगे इस समय हम लोग बहुत अधिक भागने लगे हैं। भागते-भागते भी सबकी इच्छा होती है छलांग लगा लें। कुछ तो हमेशा उड़ने की कोशिश में...
    August 4, 07:20 AM
  • विज्ञान का लाभ लें, अस्तित्व से न कटें
    जिंदगी बालों की तरह नहीं है, जो किसी कंघी से सुलझ जाए। बालों का गुच्छा भी जब उलझ जाए तो कंघी काम करना बंद कर देती है। जीवन या तो बहुत सरल है या बहुत जटिल। यह सरलता या जटिलता इस पर निर्भर है कि आप किसके सहारे जिंदगी को समझने का प्रयास कर रहे हैं। अनपढ़ के हाथ में शास्त्र दे दिया जाए तो वह मतलब ढंग से नहीं समझ पाता। ठीक ऐसा ही जीवन के साथ है। मनुष्य जन्म मिल तो गया है, लेकिन जो अनाड़ी हैं, लापरवाह हैं वे इसका दुरुपयोग करेंगे। कुछ तो इतना दुरुपयोग कर लेते हैं कि जीवन को ही कोसने लगते हैं। सहज मिली यह...
    August 3, 06:33 AM
  • भीतर स्थायी शांति ही आत्मज्ञान
    पिछले दिनों कुछ लोगों ने मुझसे पूछा कि आत्मज्ञान क्या होता है? यह जिन्हें प्राप्त होता है उनका आचरण कैसा होता है? जब लोग भक्ति से आगे बढ़कर मेडिटेशन करने हैं तो उनकी अनुभूतियों में परिवर्तन आने लगता है। कई लोगों को आंखें बंद करने पर दृश्य दिखते हैं, थोड़ी दृष्टि बदलती है। वे सोचते हैं यह क्या हो रहा है? आइए, आत्मज्ञान को रूपक से समझें। किष्किंधा कांड में जब हनुमानजी वानरों को पानी पिलाने गुफा में ले जाते हैं तो वहां स्वयंप्रभा नाम की देवी मिलती हैं जो श्रीराम की भक्त थीं। जब उन्हें पता चलता है कि...
    August 2, 06:05 AM
  • व्यवहार कुशल होने के सात तरीके
    जीवन में कभी-कभी आपको आक्रामक होना पड़ता है। इसका मतलब है आपमें भरपूर जोश हो, लेकिन जोश और जज्बा विवेक से दूर भी ले जाता है, इसलिए जरूरत पड़ने पर आक्रमक हों परंतु साथ में व्यवहार कुशल भी हों। पिछले दिनों मैं एक मिलिट्री स्कूल में व्याख्यान देने गया तो वहां जवानों की ट्रेनिंग देखी। उसमें कुछ ड्रील तो दांतों तले उंगली दबा लेने जैसी थी। इन्स्ट्रक्टर से मैंने पूछा आपको नहीं लगता कि इन लोगों से अत्यधिक शारीरिक श्रम करवाया जा रहा है? उन्होंने कहा, हम इन्हें आक्रामक बनाना चाहते हैं। फिर कहा कि हम...
    July 30, 04:03 AM