जीने की राह
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  • संयुक्त परिवार जैसा है भारत
    भारत आदर्श संयुक्त परिवार है। संयुक्त परिवार को बचाने वालों ने दो काम किए थे। एक, प्रत्येक सदस्य के स्वभाव का अध्ययन किया और उसे उसी छत के नीचे जीने की स्वतंत्रता दी। दो, त्याग सिखाया। धीरे-धीरे संयुक्त परिवारों के जुड़ाव का तीसरा कारण आया- आर्थिक गतिविधि। एक ही व्यापार-व्यवसाय के कारण जुड़े रहे, लेकिन धन के अपने दोष हैं। जिस धन से संयुक्त परिवार जुड़े रहे, वही धन उन्हें तोड़ता भी गया। भारत के साथ भी यही हुआ। यहां अनेक जाति, धर्म के लोग हैं। सबके अपने-अपने काम हैं, लेकिन फिर भी आए दिन अशांति,...
    February 11, 04:16 AM
  • बेटियों का चुनौतियों से परिचय कराएं
    बेटे-बेटी के लालन-पालन में भेद नहीं होना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार तो यह पाप है। इस संसार की जो पहली पांच संतानें हुई थीं, उनमें से तीन बेटियां थीं। मनु-शतरूपा हिंदू संस्कृति के अनुसार मनुष्यों के पहले माता-पिता थे और उनसे जो मैथुनि सृष्टि निर्मित हुई उसमें दो पुत्र- उत्तानपाद और प्रियव्रत तथा तीन बेटियां -आकुति, देवहुति और प्रसूति ने जन्म लिया था। समझदार माता-पिता अब दोनों को एक जैसा पाल रहे हैं, लेकिन इसी के साथ एक जागरूकता और आनी चाहिए। लालन-पालन में भेद न करें, लेकिन दोनों के सामने जो भविष्य...
    February 10, 04:44 AM
  • अनुचित से बचाती है हनुमान चालीसा
    कुसंग तो करना ही नहीं चाहिए, लेकिन सतर्कता बरतें कि सदैव समझदार और योग्य लोग साथ रहें। ऐसे में दो फायदे होते हैं, एक तो वे हमें सही सलाह देते हैं और दूसरा गलत करने से रोक लेते हैं। उनके पास यह कला होती है कि किसी बड़े अहंकारी व्यक्ति को भी सही बात समझा दे। सुग्रीव श्रीराम का काम भूल चुके थे। प्रवर्षण पर्वत पर श्रीराम और लक्ष्मण द्वारा सुग्रीव के प्रति क्रोध व्यक्त करने के प्रसंग में तुलसीदासजी ने पंक्ति लिखी, इहां पवनसुत हृदयं बिचारा। राम काजु सुग्रीवं बिसारा।। इहां शब्द का अर्थ है यहां...
    February 9, 03:18 AM
  • लोगों में ईश्वर देखें, भेदभाव दूर होगा
    भेदभाव की समस्या वर्षों से चली आ रही है। इसे लेकर युद्ध हुए, तब भी और अब भी। भेदभाव का अंतिम परिणाम हिंसा ही होता है। धर्म के क्षेत्र में भी भेदभाव ने पर्याप्त घुसपैठ कर रखी है, लेकिन बहुत बारीकी से देखें तो किसी भी धर्म के अवतार हों, शास्त्र हों या शीर्ष पुरुष हों, उन्होंने भेदभाव का खंडन किया है। परमपिता परमात्मा भाव का भूखा होता है, इसलिए उसकी दृष्टि में भेद होता ही नहीं है। जाति का भेद, धन के आधार पर भेद, पद के आधार पर भेद और स्त्री-पुरुष का भेद। इसके कई रूप हैं। शरीर में काम के अनुसार अंगों में...
    February 6, 04:10 AM
  • भीतरी तैयारी से हटाएं बाहरी रुकावटें
    बहुत कम लोग होंगे जो संपूर्ण रूप से स्वस्थ हैं। मुझे तो लगता है कि ऐसे लोग शायद ही हों जो कह सकें, मैं बीमार नहीं हूं। कुछ बीमारियां ऐसी हैं जिनका इलाज डॉक्टर के पास नहीं है। ऐसी बीमारियों का इलाज आपको स्वयं करना है। यदि यह सीख गए तो आपको अपने जीवन की कुछ यात्राएं बड़ी आसान लगने लगेंगी। जैसे हम एक यात्रा पर निकले हैं, सफल हो जाएं, ख्यात बन जाएं, बड़े दिखने लगें, लोग हमें नोटिस करें, हमें सम्मान दें। इस यात्रा पर लगभग सभी निकले हैं। किसी ने कोई रूप दे दिया तो किसी ने कोई और रूप। ध्यान रखिए, यदि आप ऐसी...
    February 4, 05:39 AM
  • दो स्तरों पर जीवन को देखना ही धर्म
    राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्र में जब मतभेद होते हैं तो लोग मानकर चलते हैं कि ऐसा तो होगा ही, क्योंकि यहां सबके स्वार्थ और निजहित जुड़े रहते हैं। किंतु जब धार्मिक व्यक्ति विवाद में आते हैं तो लोगों की टिप्पणियां आक्रामक हो जाती हैं। यह कहना बड़ा आसान हो जाता है कि जिनके भरोसे लोग जीवन की शांति ढूंढ़ने निकले हैं वे ही लड़ रहे हैं, लेकिन धर्म के क्षेत्र में बहुत कुछ अनदेखा है। धर्म का मतलब ही है दो स्तरों पर जीवन को देखना। एक जो दिख रहा है और दूसरा जो नहीं दिख रहा। समाज और राजनीति दिख रहे पर चलती है और...
    February 3, 04:09 AM
  • क्रोध के सही उपयोग में ही फायदा
    हम लोग दूसरों की कई बातों से परेशान हो जाते हैं, लेकिन कभी-कभी अपनी कुछ बातों से भी दिक्कत में आ जाते हैं। मुझसे कई लोग कहते हैं कि हम अपने गुस्से से बड़े परेशान हैं। क्रोध कर तो लेते हैं पर बाद में पछताते हैं। दुर्गुणों के साथ ऐसा ही होता है। पता नहीं उनमें क्या आकर्षण होता है। हमें लगता है हमने उनका उपयोग किया, परंतु असल में वे हमारा उपयोग कर लेते है। आज अगर क्रोध की चर्चा करें तो हमें समझना होगा कि किष्किंधा कांड में श्रीराम ने क्रोध का जैसा उपयोग किया वैसा हम भी करें। सुग्रीव से श्रीराम दुखी भी...
    February 2, 04:17 AM
  • भीतर के महात्मा की सुनें, भला होगा
    हमारे मनुष्य होने में तीन बातें शामिल हैं। पहली, शरीर। उसके भीतर एक मन और फिर आत्मा। इसकी समझ जितनी परिपक्व होगी मनुष्य जीवन उतना ही गौरव और आनंद देता जाएगा। यदि शरीर पर टिककर जीवन बिताते हैं तो सफल तो होंगे पर घोर अशांत रहेंगे। मन पर हम बात करते रहे हैं। चलिए, आज आत्मा पर चलते हैं। आत्मा यानी हमारी अपनी पहचान जो हम हैं। इसके एक ओर परमात्मा है और दूसरी ओर एक महात्मा है। जैसे ही भीतर उतरे, हमें तीन चीजें मिलेंगी- महात्मा, आत्मा और परमात्मा। आत्मा तक पहुंच गए तो परमात्मा मिलना मुश्किल नहीं है,...
    January 30, 03:07 AM
  • अद्‌भुत परिणाम देंगी ये पांच बातें
    जब भी आप परिश्रम से कोई बड़ा काम करते हैं तो कुछ लोग आपके साथ होते हैं जो आपके सहयोगी होते हैं, अधीनस्थ या वरिष्ठ होते हैं। प्रबंधन की दृष्टि से आपको जो करना है कीजिए, लेकिन अध्यात्म की दृष्टि से पांच काम जरूर कीजिएगा। एक, काल यानी काम करने के समय का महत्व समझें, क्योंकि काल भी अपने हानि-लाभ मौके से पहुंचाता है। मसलन, यदि घूमना हो तो सबसे ज्यादा लाभकारी सुबह का ही समय है। दो, आपके साथ जो लोग काम कर रहे हैं, उनके बाहरी परिश्रम, योग्यता की जानकारी के साथ मनोवैज्ञानिक रूप से उनका स्तर क्या है यह मालूम...
    January 28, 09:12 AM
  • दुख सहने की, परिश्रम करने की सबकी अपनी सीमा होती है।
    दुख सहने की, परिश्रम करने की सबकी अपनी सीमा होती है। किंतु कुछ लोग अति कर देते हैं। अति हर बात की बुरी है परंतु येे लोग तर्क देते हैं कि हमारी सीमा ऐसी है। तो अपनी सीमा और अति में बारीक फर्क समझें। यदि क्षमता की सीमा में काम करें तो आपकी सफलता अद्भुत होगी। यदि सफलता के बाद आप आनंदित नहीं हैं तो कोई न कोई अज्ञात पीड़ा आपको सता रही है। मानकर चलिए कि आपकी सीमा अति में बदल गई जो अपने आप में बीमारी जैसी है। बुद्ध को जब बुद्धत्व प्राप्त हुआ तो उनके संपर्क में वे लोग भी आए जो उन्हें पहले से जानते थे। कुछ...
    January 23, 05:26 AM
  • योग करने वाले  कभी त्रस्त नहीं होंगे
    आइए, आज फिर बोलने की क्रिया को योग से जोड़ते हुए आगे चलें। आप जान चुके हैं कि तीन चरण में बोलने की क्रिया योग से जुड़ सकती है। पहला चरण होगा नाभि से बोलना। इसके लिए मंत्रोच्चार करें। मंत्र नाभि से निकलें तो शब्द भी नाभि से बोलने का अभ्यास बढ़ जाएगा। अपने प्रिय और अंतरंग लोगों से शब्द नाभि से ही निकालें। आप पाएंगे आप भी शांत हैं और आसपास का वातावरण भी। दूसरा चरण है कंठ से बोलना। इसका प्रयोग तब कीजिए जब आप मित्रों, रिश्तेदारों और ऐसे लोगों के बीच हों जो आपके अपने हैं। कंठ से बोलने के अभ्यास के लिए...
    January 22, 07:59 AM
  • पंचतत्वों का आलिंगन देगा स्वास्थ्य
    दुनिया भी अजीब-अजीब ढंग के अलग-अलग दिवस मनाती है। कहते हैं आज का दिन आलिंगन का दिन है। इसे हग-डे कहा गया है। बात सुनने में अजीब लगती है पर कुछ लोगों का आग्रह है कि एक-दूसरे को गले लगाइए। उद्देश्य यही है कि वे दूरियां जो भेदभाव बढ़ाती हैं, मिटा देनी चाहिए। किंतु गले लगाने की कल्पना मन में वासना भी जगा सकती है और यहीं से इसके अर्थ बदल जाते हैं। गले लगने के कई अर्थ हैं। शरीर में कंठ का अपना महत्व है। कई बार कहते हैं मुसीबत गले पड़ गई। मौत को भी गले लगा लिया जाता है। वरमाला भी गले में डाली जाती है, इसलिए...
    January 21, 04:21 AM
  • बोलते समय शब्द नाभि से निकालें
    व्यस्तता के इस दौर में जिन्हें शांति की तलाश हो उन्हें जीवन को योग से जोड़ना चाहिए। किंतु बहुत व्यस्त लोग योग के समूचे अनुशासन को नहीं पाल पाते, इसीलिए यहां मैंने दिनचर्या के साथ योग जोड़ने का प्रस्ताव रखा है। आप कितने ही व्यस्त हों, छह काम अवश्य करेंगे- सोना, उठना, खाना, पीना, सुनना और बोलना। पांच जीवन चर्याओं व योग पर हम चर्चा कर चुके हैं, अब छठी की चर्चा चल रही है- बोलना। हम समझ चुके हैं कि बोलने के पहले मौन बड़ा जरूरी है, इसलिए दिनभर में बोलने के बीच में मौन के मौके चुराते रहें। मौन का मतलब है विचारों...
    January 20, 03:54 AM
  • मौन साधें तो शब्द प्रभावशाली होंगे
    संवाद में एकाध शब्द जरूर ऐसा होना चाहिए, जो उस संवाद के प्राण हों, अर्थपूर्ण हों। किष्किंधा कांड में श्रीराम ने सुग्रीव के प्रति नाराजगी व्यक्त करते हुए लक्ष्मण से कहा था,जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहं काली।। कल उस मूर्ख सुग्रीव को मारूंगा। इस कल शब्द को कहकर श्रीराम ने बड़े गहन अर्थ दे दिए, जिसको लक्ष्मण भी नहीं समझ पाए। उनका कहना था मारना है तो आज ही मारिए, कल क्यों? लक्ष्मण युवा थे, आवेश में थे और श्रीराम धैर्य के प्रतीक हैं, इसीलिए श्रीराम के शब्दों में अद्भुत धैर्य छिपा है।...
    January 19, 05:50 AM
  • भीतर ऊर्जा हो तो शांत होना आसान
    पुराने जमाने में कहावत थी, बिना बिचारे जो कहे, सो पाछे पछताए। बुजुर्ग कहते थे कि जब भी बोलना हो सोचकर बोलिए। सिर्फ बोलने के लिए मत बोलिए। योग से जोड़ने के क्रम में हमारी अंतिम क्रिया है बोलना। हम बोले गए शब्दों के साथ अपनी बहुत सारी ऊर्जा खत्म करते हैं। बहुत सारे लोग तो जान ही नहीं पाते कि वे क्या बोल रहे हैं। बोलना हमारी जरूरत होना चाहिए, परंतु बोलना हमारी आदत हो गया है। कुछ तो बिना बोले रह ही नहीं सकते। हर विषय, हर स्थिति, हर व्यक्ति और हर विचार पर टिप्पणी करना उनकी आदत में आ जाता है। वे भूल जाते हैं...
    January 16, 04:28 AM
  • भीतर आए शब्दों से खुद को जोड़ें
    हम चर्चा कर रह हैं श्रवण यानी सुनने की क्रिया को योग से जोड़ने पर।कल हमने बात की थी कि सुनकर जिन शब्दों को भीतर रोकना है उनके प्रति थोड़ा होशपूर्ण रहा जाए। जब किसी से बातचीत कर रहे हों तो ऐसे सुनें जैसे कान से नहीं, रोम-रोम से सुन रहे हैं। जितने शब्द काम के हैं, उन्हें सांस के साथ भीतर रोक लीजिए। अभी जब हम शब्द सुनते हैं तो सांस अलग और शब्द अलग चल रहे होते हैं। आप सदैव ऐसा प्रयोग नहीं कर पाएंगे, पर कुछ समय और कुछ व्यक्तियों के साथ इस अभ्यास को करिए। उदाहरण के तौर पर जीवन-साथी, माता-पिता या बच्चों के साथ...
    January 14, 06:58 AM
  • शब्दों के प्रति होश ही श्रवण योग
    मनुष्य कान से सुनता है। यह एक सामान्य स्थिति है। किंतु पूरा शरीर ही कान बन जाए, सुनने का असली मजा तब ही है। इन दिनों हमारी चर्चा चल रही है कि जीवन की सहज क्रियाओं से योग को कैसे जोड़ा जाए। हमने सोना, उठना, खाना, पीना इन पर चर्चा की। अब गौर करेंगे सुनने और बोलने पर। आप बिना सुने नहीं रह सकते। कभी-कभी तो जो नहीं सुनना चाहते हैं, वह सुनना पड़ता है और जो सुनना चाहते हैं, वह सुनाई नहीं पड़ता। कान श्रवण इंद्री मानी गई है। सुनने की क्रिया को योग से जोड़ने के तीन चरण हैं। यूं तो हम एक साथ पूरा ही सुनते हैं, लेकिन...
    January 13, 03:57 AM
  • पवित्र चित्त से सुनने में ही आनंद
    अगर सुनना ठीक हुआ तो बोलना भी अच्छे से हो सकेगा। एक अच्छे वक्ता को अच्छा श्रोता भी होना चाहिए, क्योंकि जब हम कुछ सुन रहे होते हैं तो बहुत कुछ ऐसा चूक जाते हैं, जो महत्वपूर्ण है और बहुत बार बिना काम के शब्दों को अपने भीतर उतार लेते हैं। दोनों स्थितियोंं में ही नुकसान है। हम वही सुनना चाहते हैं, जो हमें पसंद है। तर्क से खारिज करना, छिद्रान्वेषण करना बुद्धि का स्वभाव है। अगर बुद्धि एकाग्र नहीं है तो सुने जा रहे शब्द बेकार में आहत होते रहेंगे। फिर मन को शून्य करिए, क्योंकि मन भागता बहुत है। बोलने वाले...
    January 9, 04:33 AM
  • बुद्धि, मन और चित्त लगाकर सुनें
    योग की एक सांसारिक परिभाषा यह भी है कि अपने किए हुए और जीए हुए का मूल्यांकन करना। सामान्य स्थिति में जो हम कर रहे हैं और जिसे हम जी रहे हैं, इसका विश्लेषण करते हैं। या तो अतीत में गिर जाते हैं या भविष्य में छलांग लगा लेते हैं। योग आपको वर्तमान पर रोकता है और वर्तमान में टिककर जब भी कोई चिंतन किया जाए, गतिविधि से जोड़ा जाए तो वह अपने आप में ध्यान की ही प्रक्रिया है। इसी को साधारण भाषा में एकाग्रता भी कहते हैं। एकाग्रता को ध्यान की बहन भी कहा जा सकता है। हल्की सी छाया का नाम भी दे सकते हैं। आज जब...
    January 8, 05:28 AM
  • जल, भ्रमण और स्मरण की शाम
    आजकल व्यस्त लोग झल्लाकर कहते हैं, सांस लेने की तो फुर्सत नहीं है, खाने-पीने के लिए कहां से समय निकालें? और इसीलिए वे गलत तरीके से भोजन करते हैं और अनुचित ढंग से पानी पीते हैं। देखिए, समय उतना ही लगना है, लेकिन थोड़ा-सा संयम साध लें, नियम बना लें तो आपको जल पीने के साथ योग का लाभ मिल जाएगा। हम समझ चुके हैं कि सदैव बैठकर पानी पीएं और पानी पीते समय आंख बंद रखकर यह विचार करें कि आप केवल पानी नहीं पी रहे, इस समय आप अपने रोम-रोम में ऑक्सीजन उतार रहे हैं। प्राणायाम से हम पूरी तरह प्राणतत्व के साथ ऑक्सीजन लेते...
    January 7, 04:36 AM