जीने की राह
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  • त्याग से भगवान नहीं मिलते
    कुछ लोग जो दुनियादारी में डूबे रहते हैं, उन्हें दुनिया बनाने वाले की फिक्र नहीं होती। धर्म क्या होता है, भगवान क्या हैं, हम परमात्मा से क्यों जुड़ें, इन सब बातों के बारे में कुछ लोग बिलकुल नहीं सोचते। जब जिंदगी में तनाव आता है, चाहा हुआ नहीं होता, तब ऐसे लोग थोड़ी फिक्र पालते हैं। जो ईश्वर को मानते हैं और संसार में भी रहते हैं, ऐसे लोगों को एक बड़ा भ्रम सताता है कि हमें इसमें संतुलन कैसे बैठाना है। हमेशा इस बात के लिए परेशान होते रहते हैं कि क्या ईश्वर को पाने के लिए दुनिया छोड़ दें या दुनिया में...
    04:35 AM
  • तेजस्विता से बनाएं प्रभावी व्यक्तित्व
    व्यक्तित्व को प्रभावी बनाने के लिए बाहर और भीतर से प्रयास करने पड़ते हैं। हमारा दिखना व्यक्तित्व को बाहर से प्रभावी बनाता है, लेकिन हमारा होना भीतर का विषय है। संसार हमें देखता है और परमात्मा की नजर हमारे होने पर होती है, क्योंकि भीतर जो हमारी गतिविधियां चल रही होती हैं, वैसे हम होते हैं। दिखते हम अलग हैं, होते कुछ और हैं। अगर अपने व्यक्तित्व को प्रभावी बनाना चाहते हैं तो हमें तेजस्वी जरूर होना चाहिए। तेज हमारे भीतर भरा हुआ है, हमें इसका सदुपयोग करना चाहिए। अपने भीतर के तेज को बाहर प्रकट करने के...
    March 30, 06:04 AM
  • आज दिव्यता का अनुष्ठान
    कुछ लोग मजबूरी में दोहरा जीवन जीते हैं और कुछ लोगों की आदत-सी बन गई है। प्रजेंटेशन महत्वपूर्ण होने से शोमैनशिप बढ़ गई है। दिखावा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। लोगों ने आवरण की चिंता पाल ली, आचरण में लापरवाह हो गए। आवरण नहीं, हमारा अंतस, हमारी अंतरात्मा महत्वपूर्ण है। इससे मनुष्यता को हुई क्षति में एक बड़ा नुकसान स्त्रियों को हुआ। भीतर-बाहर से एक रहना उनका मूल स्वभाव है, लेकिन प्रदर्शन के इस दौर में नारी भी आचरण पर टिक गई। योग से अंतस को जाना जा सकता है और इसका साधारण-सा प्रयोग है ध्यान। इसकी सरल विधि है...
    March 28, 05:18 AM
  • कामना को ईश्वर की ओर मोड़ें
    जरा-जरा सी बात पर तनाव आ जाना, दूसरों पर झल्लाहट उतारना आजकल ये लक्षण अधिकतर लोगों में देखे जा रहे हैं। काम और उसके परिणाम के प्रति अत्यधिक अपेक्षा तनाव का कारण है। चूंकि हम जीवन का अधिकतर समय संसार में गुजारते हैं, इसलिए संसार की सुख-सुविधाएं प्राप्त करना हमारा लक्ष्य हो जाता है। तौर-तरीके भी सांसारिक हो जाते हैं और उलझनें शुरू हो जाती हैं। हमें थोड़ा धार्मिक बने रहना होगा, क्योंकि धर्म एक बहुत अच्छी बात सिखाता है कि इच्छाओं का दमन नहीं करना चाहिए। यदि कोई धर्म यह कहे कि अपनी कामनाओं को दबा दो...
    March 27, 05:31 AM
  • आत्मविश्वास का स्रोत आत्मा
    कभी-कभी दुनिया में हम चारों तरफ से लाचार हो जाते हैं। कुछ ऐसी स्थितियां बन जाती हैं कि हम सबसे निराश होने लगते हैं। तब हमें समझाया जाता है कि आत्मविश्वास मत छोड़ना। चलिए, आज इसी पर बात करते हैं कि आत्मविश्वास होता क्या है। स्वामी विवेकानंद ने कहा है, हम विश्वास करें कि हम आत्मा हैं तो शक्ति, पवित्रता तथा वह सबकुछ जो श्रेष्ठ है, हमारे भीतर आ जाएगा। हमें अपनी आत्मा से साक्षात्कार करने के लिए उत्सुकता बढ़ा लेनी चाहिए खासतौर पर तब जब आप निराश हों। जब हम किसी समस्या का समाधान ढूंढ़ रहे होते हैं तो कई...
    March 26, 06:23 AM
  • वृद्धावस्था में चाहिए समर्पण
    बूढ़े और जवान लोगों मेें जिन-जिन बातों पर मतभेद होता है उनमें से एक है जीवनशैली। पुरानी पीढ़ी के लोग कुढ़ते रहते हैं कि नए बच्चे जिस ढंग से जिंदगी जी रहे हैं वह ठीक नहीं है। फिर विवाद आरंभ हो जाता है। हमें दोनों ही पीढ़ी को ठीक से समझना और समझाना होगा। कितने ही उपाय कर लीजिए, बुढ़ापा आता है तो जाता नहीं और जवानी लौटकर नहीं आती। दोनों का अपना महत्व है। जैन संत तरुणसागरजी अपने निराले ढंग से इसी बात को समझाते हैं। वृद्धावस्था को भुनभुनाते हुए नहीं, गुनगुनाते हुए जीया जाए। युवा अवस्था में केवल...
    March 25, 05:09 AM
  • भरोसा देता है गुरु का सान्निध्य
    हम जिनके सान्निध्य में रहते हैं, धीरे-धीरे उन्हीं जैसे होने लगते हैं, इसीलिए गुरु के सान्निध्य का महत्व है। गुरु कई रूपों में हमारे जीवन में आ सकते हैं। किष्किंधा कांड में श्रीराम सुग्रीव के जीवन में मित्र के रूप में आए थे, लेकिन काम गुरु का कर रहे थे। जब श्रीराम अपनी बात कह चुके तो सुग्रीव ने कहा और तुलसीदासजी ने लिखा - कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा।। दुंदुभि अस्थि ताल देखाए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए।। हे रघुवीर सुनिए, बाली महान बलवान और अत्यंत रणधीर है। फिर सुग्रीव ने...
    March 24, 05:35 AM
  • आज से हनुमत साधना का पर्व
    भारतीय संस्कृति में उत्सव और त्योहार केवल कर्मकांड के लिए नहीं बनाए गए हैं। इन्हें जीवन से जोड़ा गया है। जीवन के उतार-चढ़ाव मौसम की तरह होते हैं। आज से चैत्र नवरात्रा आरंभ हो रहा है। इसके साथ नव संवत्सर भी आ गया है, जिसका नाम है कीलक। जो बीता उसका नाम था प्लवंग। कीलक का अर्थ कील समझा जाए। कील दो काम करती है। दो वस्तुओं को जोड़ती भी है और छिद्र भी करती है। इस संवत्सर का यही स्वभाव है। यह व्यक्तियों को, परिस्थितियों को जोड़ेगा भी और साथ में छिद्र यानी घाव भी दे जाएगा। ज्योतिषियों के अनुसार इसके...
    March 21, 05:58 AM
  • मुफ्त के सौदों से सावधान रहें
    मुफ्त में कुछ भी मिले तो सावधान हो जाएं। अब सौजन्य सम्मान नहीं, अपराध बनता जा रहा है। हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में लगातार ऐसी घटनाएं घट रही हैं कि हमें यह तय कर लेना चाहिए कि यदि कोई मुफ्त में हमें कुछ भी दे तो बिल्कुल न लें। आप समझ रहे होंगे कि सौजन्य काम कर रहा है, लेकिन उसके पीछे दबे पांव अपराध आ रहा होगा। यह घोर लेन-देन का युग है। मनुष्य ने हर सांस में धंधा करने की कसम खा ली है। धन कहां से उगाया जाए, वसूला जाए सारी अक्ल इसी में झोंकी जा रही है, इसलिए अपने आप को समझाएं कि फ्री में मिल रही चीज जहर...
    March 20, 04:24 AM
  • मिलनसारिता आवश्यक गुण
    मजबूत से मजबूत किले में भी कोई दीवार कमजोर रह जाए, तो आक्रमण के दौरान पूरा किला उसकी कीमत चुकाता है। ऐसे ही हमारे व्यक्तित्व में कोई ऐसा छिद्र होता है, कमजोर नस होती है, जिसमें से दुर्गुण प्रवेश कर जाते हैं और कुछ लोग उस नस पर हाथ रखकर हमारा दुरुपयोग कर लेते हैं। एक कमजोरी होती है दूसरों से घुलने-मिलने में बहुत संकोच महसूस करने की। सामूहिक अवस्था में या तो कुछ लोग डर जाते हैं या असहज होकर भीतर ही भीतर परेशान रहते हैं। घुलना-मिलना एक गुण है। चाहे कितने ही और कैसे भी लोगों के बीच में हों, अपने आप को...
    March 19, 04:42 AM
  • अपने विवेक का अनादर न करें
    अनेक लोगों से मिलते-जुलते रहने से कभी-कभी हम अपना मूल स्वरूप भूलने लगते हैं। हम देखते हैं कि यदि निगेटिव विचारधारा के लोगों के साथ थोड़ा अधिक समय बिताया जाए तो हमारे भीतर भी नकारात्मकता उतरने लगती है। सार्वजनिक जीवन में मजबूरीवश लोगों का सान्निध्य लेना पड़ता है। तब हमारा विवेक ही हमारी रक्षा करेगा। वही हमें समझाता है कि दूसरों से कितना लेना और अपना क्या देना है। निवृत्त शंकराचार्य स्वामी सत्यमित्रानंद गिरिजी का कहना है यदि मानव का व्यवहार शुद्ध है तो परमार्थ शुद्ध है ही। व्यवहार को शुद्ध...
    March 18, 06:20 AM
  • अच्छा मित्र पाना बड़ी उपलब्धि
    अच्छा मित्र जीवन में बड़ी उपलब्धि है। आजकल लोगों को सिर्फ संबंधों में रुचि है। मित्रता का दायित्व कोई नहीं लेना चाहता। किष्किंधा कांड में श्रीराम मित्रों के लक्षण बता चुके थे। फिर उन्हेंं स्मरण आया कि कुमित्रों-मित्रों की परिभाषा भी बता दी जाए। वे कहतेे हैं कि कुमित्र कैसे होते हैं। तुलसीदासजी ने चौपाई लिखी है- आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई।। जाकर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई।। जो सामने तो बना-बनाकर कोमल वचन कहता है और पीठ-पीछे बुराई करता है। हे भाई, जिसका मन...
    March 17, 04:37 AM
  • भक्ति में भावना का बहुत महत्व
    थोड़ा-बहुत डर सभी को लगता है। प्रत्यक्ष भय से मनुष्य निपट भी ले, लेकिन एक अज्ञात भय सबको सताता है। भय से निपटने के लिए बहुत बड़ा बहादुर बनना आवश्यक नहीं है। जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरिजी इसे बहुत सुंदर ढंग से कहते हैं। भक्ति भय से नहीं, भावना से होती है। भक्ति एक तरह की क्रांति है जिंदगी को बदलने के लिए, इसलिए भक्त को भक्ति का भाव जानना आवश्यक है, अन्यथा वह धर्मभीरू बन जाता है। फिर उसे हर समय देवता के नाराज होने की आशंका होती है। चार तरह के भक्त होते हैं। एक, जो दुख से...
    March 16, 05:01 AM
  • सत्संग से बनाएं जीवन सार्थक
    ऐसे लोग हैं, जिनकी दिक्कत यह है कि समय कैसे बिताया जाए और दूसरा वह वर्ग है, जिसकी दिक्कत यह है कि समय कैसे निकाला जाए। दोनों ही लोग सत्संग से जरूर जुड़ें। सत्संग का अर्थ किसी महात्मा की कथा न समझ लें। सत्संग कई ढंग से किया जा सकता है। इसमें रुचि को संतुष्टि मिलती है। नई जानकारियां मिलती हैं और भ्रम दूर हो जाता है। हम मानसिक और आत्मिक रूप से कुछ ऐसी खोज में होते हैं, जो सत्संग में पूरी होती है। समय का सबसे अच्छा सदुपयोग यही है। इसके लिए किसी पंडाल में जाने की जरूरत नहीं है। सत्संग में कोई महात्मा या...
    March 14, 06:34 AM
  • महत्वाकांक्षा को योग-बल दें
    आज प्रबंधन के युग में महत्वाकांक्षी होना योग्यता मान ली गई है। सफलता प्राप्त करने के लिए महत्वाकांक्षी होना बुरा नहीं है। महत्वाकांक्षा जब तक प्रेरणा बनी रहे तब तक तो लाभकारी है, लेकिन हम भूल जाते हैं कि महत्वाकांक्षा के भीतर एक भावनात्मक आवेग होता है। आवेग और आवेश कैसा भी हो, भविष्य में दिक्कत देगा। दूसरों से प्रतिस्पर्धा करके इच्छित फल प्राप्त हो यह आज की प्रबंधकीय शैली है। जब ऐसा नहीं होता तो मनुष्य निराश हो जाता है या आशाहीन बन जाता है। महत्वाकांक्षा तीव्र आकांक्षा में बदल जाती है। जो...
    March 13, 05:40 AM
  • पितृ पुरुषों से आचरण शुद्धि
    हमारे बच्चों के पास हर विषय की जानकारी प्राप्त करने के साधन हैं। ऐसे में माता-पिता बच्चों को दो जानकारियां अपने स्तर पर देते रहें। परिवार के पितृ पुरुषों और देश के महापुरुषों की। उन्हें इनकी जीवनी से परिचित कराएं और प्रेरित करें कि वे इसे अपने जीवन से जोड़ें। सामान्य ज्ञान की परीक्षा में महापुरुषों की संक्षिप्त जानकारी मांगी जाती है। इसका संबंध परीक्षा पास करने से होता है। हालांकि, जीवन की असली परीक्षा में महापुरुषों की जीवनी काम आती है। वंश के पितृ पुरुषों ने भले ही कोई अद्भुत, अनूठा...
    March 12, 06:52 AM
  • अपने जीवन को प्रकृति से जोड़ें
    जीवन को कई दार्शनिकों ने कोरा कागज बताया है। इस पर जो लेखनी चलती है उसे परिस्थिति और विचार कहते हैं। जब दुख आता है तो जीवन के कागज पर लिखे ये बोल साफ होने लगते हैं और सुख आने पर ठीक से पढ़ने में आ जाते हैं। इसी बात को ऋषि-मुनियों ने अपने ढंग से समझाया है। जिस परिस्थिति में व्यक्ति का जन्म होता है; जिन विचारों के साथ उसका पालन-पोषण होता है, वह वैसा ही बन जाता है। हम देखते हैं कि विभिन्न धर्मों के लोगों की श्रद्धा और समर्पण शत-प्रतिशत रहता है। इस मामले में वे निर्दोष और ईमानदार होते हैं, लेकिन ऐसे लोग भी...
    March 11, 06:35 AM
  • मित्रता भी संपत्ति की तरह है
    मनुष्य जीवन में मित्रता भी संपत्ति के रूप में देखी गई हैै। श्रीराम ने दो लोगों से अद्भुत मित्रता की थी। वे थे सुग्रीव और विभीषण। इन दोनों के बीच में हनुमानजी महाराज थे। मित्र कैसे हों यह श्रीराम के संवादों से सीखा जा सकता है। सुग्रीव से चर्चा करते हुए श्रीराम ने कहा था- कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा।। एक, मित्र का धर्म है कि वह बुरे मार्ग से रोककर अच्छे मार्ग पर चलाए। दो, गुण प्रकट करे व अवगुण छिपाए। देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।। बिपति काल कर सतगुन नेहा।...
    March 10, 07:08 AM
  • मित्रता भी संपत्ति की तरह है
    मनुष्य जीवन में मित्रता भी संपत्ति के रूप में देखी गई हैै। श्रीराम ने दो लोगों से अद्भुत मित्रता की थी। वे थे सुग्रीव और विभीषण। इन दोनों के बीच में हनुमानजी महाराज थे। मित्र कैसे हों यह श्रीराम के संवादों से सीखा जा सकता है। सुग्रीव से चर्चा करते हुए श्रीराम ने कहा था- कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा।। एक, मित्र का धर्म है कि वह बुरे मार्ग से रोककर अच्छे मार्ग पर चलाए। दो, गुण प्रकट करे व अवगुण छिपाए। देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।। बिपति काल कर सतगुन नेहा।...
    March 10, 07:03 AM
  • स्वाध्याय से मिलती है शांति
    शिक्षा का केवल यही अर्थ नहीं है कि आदमी दो वक्त की रोटी कमाने के लायक हो जाए। धन तो बिना पढ़े-लिखे लोगों के जीवन में भी आ जाता है। दरअसल शिक्षा से मनुष्य पशु जैसी स्थिति से बाहर निकलकर मनुष्य बन जाता है। शास्त्रों कहा गया है कि विद्या मनुष्य का मानसिक संस्कार करती है। शिक्षा अर्जित करने के लिए विषय, परिश्रम और एकाग्रता की जरूरत पड़ती है। जिस संस्थान में आप शिक्षित हो रहे हैं उसका भी महत्व होता है। अच्छी शिक्षा के लिए ये चार बातें जरूरी हैं, लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। शिक्षा के साथ...
    March 9, 06:44 AM
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