जीने की राह
Home >> Abhivyakti >> Jeene Ki Rah
  • भक्ति साकार से निराकार की यात्रा
    जब भी कोई काम करें उसमें दूसरों के अनुभव जरूर लेते रहिए। गायत्री परिवार के पितृपुरुष पं. श्रीराम शर्मा एक उदाहरण दिया करते थे। किसी निर्माणाधीन भवन की जब छत डाली जाती है तो नीचे बल्लियां लगाई जाती हैं। लकड़ी या टीन की चादरों का एक आधार बनाया जाता है और फिर छत भरी जाती है। निश्चित समय के बाद वो बल्लियां हटा ली जाती हैं, लेकिन आधार बना रहता है, क्योंकि वह मजबूत हो जाता है। आप जब कोई काम आरंभ करें तो आपको दूसरे के अनुभव, ज्ञान के सहारे की जरूरत होगी। वह सहारा बिल्कुल इसी तरह लें। जब आपको लगे कि आप...
    July 6, 07:10 AM
  • जीवन में भी रियाज बहुत जरूरी
    कला जगत में रियाज का बड़ा महत्व है। शिक्षा जगत और प्रबंधन में इसको पूर्वाभ्यास कहा गया है, लेकिन होमवर्क और रिहर्सल में बड़ा फर्क है। होमवर्क यानी शरीर को बाहर से सजाना और रिहर्सल यानी भीतर मानसिक रूप से साफ-सफाई करना। कला जगत से जुड़े लोग रियाज को जीवन का अंग बना लेते हैं। बिना रियाज के कलाकार खत्म हो जाता है। रिहर्सल कलाकार के प्राण हैं। आप कलाकार भले ही न हों और किसी व्यवसाय से जुड़े हों, लेकिन भीतर की रिहर्सल रोज कर सकते हैं, करना भी चाहिए। घर से निकलने के पहले कुछ मिनट के लिए अपने आप को...
    July 4, 06:30 AM
  • पैदल चलने को अपनी सांस से जोड़ें
    इतने वाहन हो गए हैं कि गांव के संकरे रास्ते, भी तरस गए हैं कि मनुष्य के पैर सीधे पड़ जाएं। कुछ तो समय की कमी है और कुछ परिश्रम का भाव जाता रहा है, क्योंकि ऐसा मान लिया जाता है कि पैदल चलने में मेहनत लगेगी। इस विचार के कारण लोगों का पैदल चलना बंद हो गया। जो लोग पैदल चल रहे हैं उनमें से बहुतों को तो डॉक्टर चलवा रहे हैं। पैदल चलना भी बीमारी का इलाज बना दिया गया है। कैलोरी प्रबंधन के कारण लोग पैदल चल रहे हैं। भूल ही गए कि पैदल चलने के और भी फायदे हैं। वाहन स्टेटस सिंबल बनते जा रहे हैं। हमारे तनाव के जितने...
    July 3, 06:54 AM
  • एकाग्रता से निकालें भीतरी संपत्ति
    पृथ्वी को मां क्यों कहा गया है? इसका उत्तर शास्त्रों ने बड़े सुंदर ढंग से दिया है। धरती और मां में एक बात समान है। दोनों के पास गर्भ है। गर्भ का अर्थ है कुछ महत्वपूर्ण जीवन संबंधी तत्व अपने भीतर समेटकर रखना। स्त्री के शरीर में गर्भाशय सृजन का केंद्र है। ऐसे ही पृथ्वी अपने भीतर सृजन का बहुत बड़ा केंद्र समेटे हुए है। ऊपर से तो पृथ्वी हमारे लिए भौतिक वस्तु ही होगी। जैसे-जैसे इसके भीतर उतरेंगे रासायनिक पदार्थ, धातुएं, तेल, गैस, जीवन से जुड़े बहुमूल्य तत्व सब मिल जाएंगे। ठीक ऐसा ही मनुष्य के भीतर है।...
    July 2, 07:47 AM
  • दया से ऊंचा होता है करुणा भाव
    व्यवस्थित लोग शरीर के लिए जो भी वस्तुएं उपयोग की जाती हैं उनका समय निश्चित करके चलते हैं। जैसे कपड़े शरीर पर कितनी देर रखने हैं। कुछ लोग हर दिन मोजे बदलते हैं। कुछ बदलने में इतने दिन लगाते हैं कि बदबू आने लगती है। हाथ की घड़ी रात को उतार दी जाती है। यह शरीर का एक अनुशासन है। हमें बिल्कुल स्पष्ट होता है कि शरीर के मामले में किस वस्तु को कितनी देर पकड़कर रखना है। एक प्रयोग करते रहिए। क्रोध को भी वस्तु ही मान लें और तय कर लें कि इसे कब लाना है और कब वापस भेजना है। जैसे धूप का चश्मा बिना धूप के उतारने...
    July 1, 08:16 AM
  • अंगद का चरित्र भरोसे का प्रतीक
    शिक्षा के विस्तार के इस युग में ज्यादातर बच्चे अपने माता-पिता से अधिक पढ़े-लिखे होते हैं। पहले भी संतानें अपने माता-पिता से अधिक पढ़ जाती थीं, लेकिन उस समय घर-परिवार में संस्कार सहजता से उपलब्ध थे, इसलिए बच्चे अपने माता-पिता को सम्मान देने में सहज थे। आज परिवारों का ढांचा बदल गया है। अब बदले माहौल में माता-पिता होने का अर्थ भी बदल गया है। संस्कारों के अभाव में अधिक पढ़े-लिखे बच्चे मान लेते हैं कि हमारे माता-पिता को हमसे कम समझ है, जबकि उन्हें यह समझना होगा कि माता-पिता को जानकारी कम होगी, लेकिन समझ...
    June 30, 06:38 AM
  • सांस से बढ़ाएं सकारात्मकता
    कुछ कर्म शरीर के लिए किए जाते हैं, जिनका परिणाम शरीर पर होता है। जैसे बहुत परिश्रम के बाद विश्राम करें तो सबसे ज्यादा लाभ शरीर को मिलता है। कुछ काम अपना परिणाम आत्मा तक पहुंचाते हैं। कथा-सत्संग, पूजा-पाठ ये आत्मा से संबंधित कर्म हैं। हमारा एक कृत्य ऐसा है, जिसका संबंध मन से है और वह है सांस लेना। हम ध्यान न भी दें, तो भी हमारा सांस लेना और छो़ड़ना चलता रहता है। अधिकतर लोगों को दिनभर में ध्यान भी नहीं आता कि सांस भी ली जा रही है। इसमें बाधा आने पर ही श्वसन-क्रिया का ध्यान आता है। सांस का सबसे ज्यादा...
    June 29, 07:44 AM
  • बीमारी से बचाए आहार शुद्धि
    हम खाने के लिए कमाते हैं या कमाने के लिए खाते हैं। हमारे बड़े-बूढ़े यह सवाल कई बार हमसे पूछते हैं। इससे नई पीढ़ी के बच्चे चिढ़ जाते हैं कि हमें खाने-पीने के मामले में क्यों टोका जाता है। 60-70 वर्ष की उम्र में आने वाली व्याधियां 30-40 की उम्र में ही दरवाजा खटखटाने लगती हैं। उधर शरीर को 14-15 घंटे काम करना है। कुल-मिलाकर एक बीमारी मिटाने के लिए दूसरी पाली जाती है, इसलिए पकड़ भोजन से ही बनाई जाए। ऋषि-मुनियों की बात शत-प्रतिशत सही थी कि अन्न जीवन को संचालित करता है। जब भी हम भोजन करते हैं एक भाग मल-मूत्र बन जाता...
    June 27, 06:39 AM
  • चेतना के जरिये मन का लाभ उठाएं
    विज्ञापनों ने व्यवसाय करने वालों को तो मुनाफा पहुंचाया और ग्राहकों को भी सही जानकारी मिल गई। परंतु विज्ञापन, वस्तु के चयन में मनुष्य के चिंतन में से तर्क-विवेक को खा गए। अध्यात्म की भाषा में इसको कहते हैं आपको क्या करना है, यह दूसरे तय कर रहे हैं। अपने ऊपर से आपका नियंत्रण चला गया। जैसे विज्ञापन तय करते हैं कि आप किससे मुंह धोएंगे, क्या पहनकर चलेंगे। कई बार तो आप सुंदर हैं यह भी विज्ञापन तय करता है। आपकी मौलिकता को खाने-पीने के बाद विज्ञापन जो डकार लेता है वह आपके लिए सत्य बन जाता है।...
    June 26, 06:05 AM
  • मन को खराब चिंतन से बचाएं
    दिनभर हमारा शरीर सक्रिय रहता है और मन के भागने का तो कोई हिसाब है ही नहीं। दोनों साथ दौड़ रहे हैं तो एक-दूसरे को कैसे देख सकेंगे? जब रात को हम सोने जाएं उस स्थिति में शरीर को शिथिल होना ही है और यही वह मौका होता है जब हम अपने मन पर ठीक से काम कर सकेंगे। दिनभर में यदि मन ने कोई अच्छे काम किए हैं तो उसकी सराहना, प्रशंसा जरूर की जाए और जब गलत कामों में मन ने रुचि ली है तब उसे धिक्कारने में भी न चूकें। यदि डांट का ढंग सही रहा तो मन आज्ञाकारी बन सकता है। इसके लिए उसे बुरे चिंतन से बचाते रहना होगा। पहले जिन गलत...
    June 24, 06:46 AM
  • समय रहते बच्चों को ईश्वर से जोड़ें
    नई पीढ़ी के सामने कई विषयों में भ्रम है। उनमें से एक यह है कि जीवन में किस स्तर तक भौतिकता से जुड़ें और कितना आध्यात्मिकता में उतरें। पहले के वक्त में संसार इस रूप में नहीं था तो लोग चुपचाप ध्यान-कर्म कर लेते थे। उनकी स्वीकृतियां सहज होती थीं। अब बच्चे देहरी के पार निकलते हैं तो दुनिया अलग ढंग से उन्हें आकर्षित करती है, जो कई बार विद्रोह का कारण बन जाता है। किंतु नई पीढ़ी को अध्यात्म यानी परमात्मा से जोड़ना उन्हीं के हित में होगा, क्योंकि शांति आधुनिकता से तो नहीं मिल सकती। आधुनिकता दोषपूर्ण...
    June 23, 06:51 AM
  • जो जितनी गहराई में, उतना सफल
    जब हम योग से जुड़ते हैं, सफलता का एक नया अर्थ सामने आता है। यहां अपने आपको पा लेना ही सफलता है। संसार में जो जितनी ऊंचाई पर है, वह उतना ही सफल है। अध्यात्म कहता है, जो जितना गहराई में है वह उतना सफल है। योग का आठवां चरण समाधि है। इसका अर्थ है पूरी तरह से अपने में ठहर जाना। अपने भीतर ठहरने के लिए भीतर के सात शरीरों में विचरण करना होगा। इन्हें सात चक्र भी कहा गया है। मेरूदंड के ठीक नीचे मल-मूत्र की इंद्रियों के ऊपर पहला चक्र है मूलाधार, जो हमारा भौतिक शरीर है। जीवन-ऊर्जा यहीं पड़ी है। अब हम इस जीवन...
    June 20, 06:23 AM
  • धारणा कमजोर तो योग में बाधाएं
    योग में सीधे छलांग न लगाएं। तसल्ली से आठ चरण पार करें। हम आज छठवें चरण में हैं, जिसे धारणा नाम दिया है। ऋषि उपमन्यु ने श्रीकृष्ण को बताया था कि योग में दस बाधाएं भी आती हैं। आलस्य, तीक्ष्ण व्याधियां, प्रमाद यानी असावधानीवश योग न करना, स्थान-संशय - यह है या नहीं इस प्रकार का ज्ञान, अनावस्थित चित्तता - चित्त की अस्थिरता। अश्रद्धा, भ्रांति दर्शनम्, दुख, दौर्मनस्य - इच्छा पर आघात पहुंचने से मन में जो क्षोभ होता है और विषय लोलुपता - विचित्र विषयों में जो सुख का भ्रम है। ये बाधाएं दूर कर लें तो छह...
    June 18, 07:05 AM
  • प्रत्याहार से नियंत्रित होती हैं इंद्रियां
    योग के एक-एक चरण यदि ठीक से चलें तो यह वह परिणाम देगा कि हम बाहर की दुनिया की उपलब्धि तो प्राप्त कर ही लेंगे, भीतर से भी पूरी तरह शांत, प्रसन्नचित्त और आनंदित भी रहेंगे। हमें भीतर-बाहर से जोड़ने का काम करती हैं इंद्रियां। योग का पांचवां चरण है प्रत्याहार। हमारी इंद्रियों को अपनी आसक्ति से हटाकर भीतर केंंद्रित करना यानी इंद्रिय रूपी घोड़ों को नियंत्रित करना है। पांच कर्मेंद्रियां- हाथ, पैर, मल-मूत्र की दो इंद्रियां व कंठ और पांच ज्ञानेंद्रियां- आंख, नाक, कान, त्वचा और जीभ हैं। रूप, गंध, शब्द, स्पर्श...
    June 17, 06:14 AM
  • प्राणायाम जीवन की सर्वोत्तम कला
    योग से क्या मिलता है? स्वास्थ्य ठीक रहता है, हम स्वयं को पा लेते हैं और इन सबसे महत्वपूर्ण है ईश्वर के दर्शन हो जाते हैं। किष्किंधा कांड में बालि ने श्रीराम के दर्शनों को लेकर कहा, सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं। जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुंक पावहीं।। श्रुतियां नेति-नेति कहकर निरंतर जिनका गुणगान करती रहती हैं तथा प्राण और मन को जीतकर एवं इंद्रियों को विषयों के रस से सर्वथा नीरस बनाकर मुनिगण ध्यान में जिनकी कभी कभी झलक पाते हैं, वे ही प्रभु आप साक्षात मेरे सामने प्रकट...
    June 16, 06:15 AM
  • योगासन से काबू में आती हैं इंद्रियां
    जन्म व मृत्यु जानवर और मनुष्य दोनों में होती है। मनुष्य जानवर से इसी मामले मेें अलग है कि वह इन दोनों के बीच घट रहा जीवन दो दृष्टि से देख सकता है- एक भौतिक और दूसरी आध्यात्मिक। नाम-दाम-पद-प्रतिष्ठा अर्जित करने के तरीके, ये सब भौतिक दृष्टि के मामले हैं। इस दृष्टि से तो संसार की सब वस्तुओं को प्राथमिकता दी जाएगी। अधिकतकर लोग पूरी उम्र इसी दृष्टि पर टिके रहते हैं। उनका भौतिक सुख कब भोग में और भोग कब रोग में बदल जाता है, पता ही नहीं लगता। जीवन की दूसरी दृष्टि है आध्यात्मिक। इसका संबंध आठ चरणों के योग...
    June 15, 06:12 AM
  • खुद को जानने में ही स्थायी शांति
    इसी स्तंभ में हम चर्चा कर चुके हैं कि ऋषि उपमन्यु से श्रीकृष्ण ने योग पर कुछ प्रश्न पूछे थे। उपमन्युजी ने बताया था कि पांच प्रकार के योग हैं। 1. मंत्र योग-जप के माध्यम से मंत्र बोलने की मन की वृत्ति। 2. स्पर्श योग- मन की वही वृत्ति जब प्राणायाम को प्रधानता दे। 3. भाव योग- स्पर्श योग जब मंत्र के स्पर्श से भी रहित हो जाए। 4. अभाव योग- संपूर्ण विश्व का जो रूप है वह भी विलीन हो जाए। 5. महायोग- जब मन की वृत्ति शिवमय हो जाए। आठ चरण में से दूसरा चरण है नियम। ये भी पांच प्रकार के हैं - शौच, संतोष, तप, जप (स्वाध्याय) और...
    June 13, 06:07 AM
  • मन में दुर्भावना आना भी हिंसा
    शरीर के साथ दो बातें जुड़ी हैं - मन और आत्मा, इसीलिए चिकित्सा विज्ञान के साथ-साथ अध्यात्म से जुड़ना भी जरूरी है। इसके लिए योग बहुत आवश्यक है। ऋषि पतंजलि ने योग के आठ चरण किए हैं - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इस स्तंभ में हम आठ चरण चलेंगे। आज पहले चरण का बीज बोएं ताकि आठवीं स्थिति में सुफल का वृक्ष हमें मिले। विराट को पाने की इच्छा ही योग है, इसलिए आने वाले आठ दिनों में बहुत उत्साह से भर जाएं। शिवपुराण के अनुसार श्रीकृष्ण महात्मा उपमन्यु से मिलने गए। कृष्ण न स्वयं...
    June 12, 06:22 AM
  • मन को काबू करने के चार सूत्र
    दूसरों को सुखी देखकर जब हम सुखी और दूसरों के दुख में संवेदनाओं के साथ हम शामिल हो जाएं और उसे दूर करने का प्रयास करें तो शांति मिलने लगेगी। किंतु इससे मन बेचैन होने लगता है, क्योंकि मन और शांति की दुश्मनी है। उसके मालिक के अशांत रहने पर ही मन की सुरक्षा है। मन का विस्तार होने लगे और हृदय संकुचित हो जाए तो जीवन में अशांति आएगी ही। मन पर काम करने के लिए चार बातों से गुजरिए। पहली- हमारे अनुकूल या इच्छा के अनुसार कोई काम हो जाए और यदि वह शुभ है तो रोम-रोम प्रसन्नता से भर जाए। खुश रहने का मौका मत चूकिए।...
    June 11, 07:20 AM
  • योग से संभव है होशपूर्ण विदाई
    मृत्यु को लेकर मानव की बहुत जिज्ञासा रही है। बड़े-बड़े शास्त्र रचे गए हैं। यह दुनिया की सर्वाधिक अदृश्य शक्ति है। उसका प्रदर्शन उसके अलावा कोई नहीं देख सकता, लेकिन इसे महसूस करने की तैयारी की जा सकती है। अंतिम समय में होश और अहसास ठीक रहे तो इसे ही मृत्यु का दर्शन माना जाएगा। जिन्हें मौत को जानने में रुचि हों वे शरीर, मन और आत्मा पर एक साथ काम करेंगे। चिकित्सा विज्ञान शरीर की जानकारी देगा। योग मन से परिचय कराएगा और भक्ति यानी उपासना आत्मा तक पहुंचाएगी। मैं डॉ. मधुसूदन बारचे की पुस्तक पढ़ रहा...
    June 10, 07:00 AM
विज्ञापन

बड़ी खबरें

रोचक खबरें

बॉलीवुड

जीवन मंत्र

स्पोर्ट्स

जोक्स

पसंदीदा खबरें