Home >> Abhivyakti >> Jeene Ki Rah
  • शोर बन सकता है शांति का कारण
    अत्यधिक वाचाल व्यक्ति से सामना हो जाए और वो हमसे कुछ न कुछ जवाब की उम्मीद करे, तो मौन रहना ही अच्छा जवाब होता है, क्योंकि वाचाल जवाब देने को कहते जरूर हैं, लेकिन गुंजाइश बिल्कुल नहीं छोड़ते। वे फिर अपनी ही बात कहने लगते हैं। कभी-कभी अपनी अयोग्यता को लोग शब्दों से ढंक देते हैं। ऐसे अवसर पर बिल्कुल विचलित न हों। बेकार में उन्हें महत्व देकर अपनी शांति भंग न करें। न सुनकर उनका तिरस्कार भी न करें। उनके शब्दों का शोर आपकी शांति का कारण बन सकता है। इसके लिए अध्यात्म में सुंदर प्रयोग है। ध्यान करने से...
    06:30 AM
  • दिल से आती है शब्दों में विनम्रता
    बातचीत में केवल शब्दों का महत्व नहीं होता, बल्कि चर्चा के विषय का स्पष्ट परिचय हो जाना उसे प्रभावी बनाता है। शब्दों में विनम्रता केवल जिह्वा की कसरत से नहीं आती, हृदय की भावुकता अपना काम करती है। शब्दों का संबंध हृदय से जोड़ने के प्रति कम ही लोग गंभीर होते हैं। किष्किंधा कांड में श्रीराम को परिचय देने के साथ अपनी समस्या का समाधान भी चाहिए था। राम समझ चुके थे हनुमान कोई अद्भुत व्यक्तित्व हैं, इसलिए परिचय देते हुए अपना संकट भी बता दिया। कोसलेस दसरथ के जाए। हम पितु बचन मानि बन आए। नाम राम लछिमन दोउ...
    September 30, 06:48 AM
  • परिजनों की रुचि पर ध्यान दीजिए
    परिवार में कभी-कभी हर सदस्य की इच्छा हो जाती है कि परिवार की कुछ गतिविधियां उसके अनुसार चलें। कुछ सदस्य जिद पर उतर आते हैं। जो सदस्य जिद्दी नहीं होते, थोड़े संवेदनशील होते हैं वे भीतर ही भीतर घुटने लगते हैं कि मेरी क्यों नहीं सुनी जाती। देखिए, हर सदस्य के भीतर गुण और दुर्गुण होते हैं। एक छत के नीचे रहना है तो इनसे तालमेल बैठाना ही होगा। न हम उनके व्यक्तित्व को बदल सकते हैं और न ही उनके लिए हमारे व्यक्तित्व को परिवर्तित किया जा सकता है, इसलिए जब तक वंश की कोई विशेष नीति आहत न हो रही हो और केवल रुचि का...
    September 29, 06:36 AM
  • उपलब्धियों व खुशी में संतुलन साधें
    एक तराजू जो दिखती नहीं है, पर होती सबके पास है। बीच-बीच में इसे अपने हाथ में लेकर कुछ बातें तौलते रहना चाहिए। एक पलड़े में उपलब्धियां और दूसरे पलड़े में खुशियां रखकर देखिए। पलड़ों पर असफलता और शांति भी रखकर देखें, क्योंकि असफलता के दौर में मनुष्य अधिक अशांत हो जाता है। अशांत तो वह सफलता के समय भी रहता है। हमारी व्यस्तता के क्षण दिल-दिमाग, घर-बाहर सब जगह घुस गए हैं। इतनी भी फुर्सत नहीं है कि तराजू में तौलकर देख लें कि जो किया जा रहा है उसमें नफा-नुकसान कितना है। आप व्यस्त होते हैं तो लोगों के साथ होते...
    September 27, 07:01 AM
  • अपने विश्वास से बनता है व्यक्तित्व
    हमने जीवन में जो कुछ भी पिछले समय में किया है, पाया है, खोया है वह सब इकट्ठा होकर हमारा विश्वास बन जाता है। फिर अपने बारे में जो विश्वास हमारा होता है, वैसे ही हम होने लगते हैं। यदि हमने घोर संघर्ष किया है और हम सफल हो गए, तो हमें अपने भीतर का लौह पुरुष प्रिय हो जाता है। हमें भरोसा होने लगता है कि हम कुछ भी कर सकते हैं। जब इसका उल्टा होता है, हम असफल हो चुके होते हैं, तो फिर हमारे भीतर बैठा कमजोर इंसान कहता है हमसे कुछ नहीं हो सकेगा। हम अपनी ही कमजोरियों की मिट्टी से अपने व्यक्तित्व की प्रतिमा गढ़ लेते...
    September 26, 06:27 AM
  • गरबा व्यक्तित्व का नहीं, अस्तित्व का उत्सव
    एक ही मामले में विज्ञान और धर्म सहमत हो जाते हैं और वह है शक्ति। धर्म जीवन ढूंढ़ता है और विज्ञान जीवन के कारण खोजता है। विज्ञान वस्तुओं को इतना उघाड़ता है कि उसका मूल स्वरूप ही समाप्त हो जाता है, जबकि धर्म विकृत को भी सुंदर बना देता हैै। विज्ञान की सारी खोज शक्ति के आस-पास है और परमात्मा ने भी समस्त क्रियाएं शक्ति के माध्यम से संचालित की हैं। वैसे तो तीन सौ पैंसठ दिन शक्ति मनुष्य के शरीर में बहती रहती है, लेकिन परमात्मा ने उसके ज्ञान के लिए नौ दिन विशेष रूप से तय किए हैं, जिन्हें नवराित्र कहा जाता...
    September 25, 06:15 AM
  • सोने से पहले शांत होने का सूत्र
    आजकल सभी ने छोटी-बड़ी पद-प्रतिष्ठा हासिल कर ली। लोग कुख्याति को भी लोकप्रियता मान रहे हैं। जिसे देखो वो ऊंचा उठने के चक्कर में है और इसीलिए अधिकांश लोगों के आस-पास या तो उनके अधीनस्थ हैं या उनके आदेश पर काम करने वाले कर्मचारी। हम अधीनस्थों को आदेश देने के इतने आदी हो जाते हैं कि जो काम व्यक्तिगत रूप से हमें करने चाहिए हम उनके लिए भी दूसरे के हाथ-पैरों पर टिक जाते हैं और इसीलिए जब हम शांति की खोज में निकलते हैं तो हमारी यही डिपेंडेंसी बाधा बन जाती है। दूसरों को निर्देश देना वैसे भी आसान है, पर क्या...
    September 24, 05:39 AM
  • शब्द कीमती हैं, सावधानी से खर्च करें
    किसी से जब हमारी पहली भेंट हो रही हो और सामने वाला व्यक्तित्व बहुत ही प्रभावशाली हो, तो हम दो तरह से रिएक्ट करते हैं। या तो हम स्वयं को कमजोर समझने लगते हैं या खुद को महान बताने लगते हैं। हनुमानजी, श्रीराम का परिचय पूछते हुए ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, जिनसे श्रीराम का मान बढ़े। यही हमें सीखना है। किष्किंधा कांड में हनुमानजी के प्रश्नों को तुलसीदासजी ने ऐसे लिखा है : जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार। की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।। आप जगत् के मूल कारण और सपूर्ण लोकों के स्वामी स्वयं...
    September 23, 06:09 AM
  • मेडिटेशन से परिवार में लाएं शांति
    दूसरे पर राज करने की इंसान की जन्मजात आदत होती है। दूधमुंहा बच्चा भी अपना अधिकार जताने से पीछे नहीं हटता। इसे धीरे-धीरे नियंत्रित करना चाहिए। लोगों से संबंध खराब होने यहीं से शुरू होते हैं कि हम उनकी स्वतंत्रता को अपने नियंत्रण में लेना चाहते हैं। सबका अपना प्रभाव होता है। हम उसी प्रभाव पर अपना शक्ति प्रदर्शन शुरू करते हैं। यह झंझट सबसे ज्यादा होती है पति-पत्नी के बीच। विवाह होते ही दोनों की आंतरिक इच्छा होती है कि सामने वाला सीमित हो जाए उसके दायरे में। हम एक-दूसरे को बांध लें। हम तो उड़ लें,...
    September 22, 07:33 AM
  • रोज की गतिविधियों में नवीनता लाएं
    इस दौर में बदलाव से जुड़े रहना ही बुद्धिमानी है। हमारी दिनचर्या में कुछ काम ढर्रे में बदल जाते हैं। इन कामों को हम क्यों कर रहे हैं, इसका कोई जवाब नहीं होता। ये काम धीरे-धीरे आदत बन जाते हैं, जो दो तरह की होती हैं। एक नुकसान पहुंचाती है और दूसरी वह जिसमें न लाभ है, न हानि। बस, करने के लिए किए जा रहे हैं। ऐसे में हमारी ऊर्जा भी अज्ञात दिशा में बहने लगती है। हमारे पास ऊर्जा का असीम भंडार है, लेकिन उसका सद्पयोग न करें, तो वह सीमित हो जाता है, इसलिए अपने दैनिक ढर्रे को बदलते रहिए। डाइनिंग टेबल पर अपना स्थान...
    September 20, 07:08 AM
  • बाधाएं दूर करनी हों तो एकांत साधिए
    क्या हम यह जानते हैं कि हमारे पास आज जो कुछ भी है अमीरी या गरीबी, शिक्षा या निरक्षरता, सुख या दुख यह सब कहां से आया और कहां जाएगा? ज्यादातर लोग इससे परिचित नहीं हैं। वे तो सिर्फ भोग रहे हैं। न तो इसके मूल की फिक्र है और न ही इसके परिणाम की चिंता। थोड़ा विचार करिए, ऐसी बातें जब जीवन में आती हैं तो कोई न कोई जरूर इनकी शुरुआत का बिंदु होता है और कहीं न कहीं जाकर इन्हें समाप्त भी होना है। इन दोनों छोरों से हम जितना अधिक परिचय कर लेंगे, उतना ही इन्हें भोगते समय आनंद उठा पाएंगे। इन छोरों को ढूंढ़ने के लिए हमेें...
    September 19, 07:01 AM
  • हर स्थिति को सहजता से स्वीकारें
    हमारा सोचना और फिर प्रतिक्रिया करना, इस पर हमारी खुशी या परेशानी टिकी रहती है। कुछ घटनाओं पर आपका वश नहीं रहता, वे घटकर ही रहेंगी। गुरु नानकदेव की यह घोषणा बड़ी गजब की है कि आपका जो नजरिया है वैसी ही आपकी दुनिया बन जाएगी, इसलिए कुछ बातों को सहज रूप से स्वीकार करें, लेकिन हम स्थितियों से उलझने लगते हैं। हम हमेशा चाहते हैं कि हालात हमारे अनुकूल रहें। अध्यात्म कहता है कि हम बाहर की स्थिति से भीतर बिल्कुल विचलित न हों। हम बाहरी स्थितियों और व्यक्तियों को देखकर अपने भीतर के अस्तित्व को भी बदलने लगते...
    September 18, 07:42 AM
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