जीने की राह
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  • बाहर-भीतर जोड़ती हैं आंखें
    किसी को दिल की गहराई से महसूस करना हो तो उसके लिए आंखें बड़ी मदद करती हैं। मनुष्य शरीर की इंद्रियों में आंखें मुकुट की तरह हैं। परमात्मा ने आंसू निकलने के लिए ही आंखों का उपयोग किया, जो सुख और दुख दोनों में निकल आते हैं। भगवान के सामने यदि आप खड़े हों और परेशान हों तो आंसू निकल आते हैं। धन्यवाद देने गए हों तब भी अश्रु प्रवाहित होने लगते हैं। हृदय अपनी अभिव्यक्ति इन्हीं के माध्यम से करता है, इसीलिए आंखों का बहुत अच्छा उपयोग करना सीखिए। आनंद के क्षणों में जब हम नेत्र बंद कर लेते हैं तो इसका मतलब है...
    April 18, 06:01 AM
  • अहंकार में न बदले आत्मविश्वास
    खुद पर भरोसा अच्छी बात है। जब तक यह आत्मविश्वास का मामला होगा हितकारी रहेगा, लेकिन आत्मविश्वास को अहंकार में बदलने में देर नहीं लगती। जिन्हें अपने अलावा भगवान पर भरोसा है वे आस्तिक हैं और जिन्हें अपने ऊपर जरूरत से ज्यादा भरोसा है, वे नास्तिक कहलाते हैं। किंतु संभव है कि ये नैतिक हो और आस्तिक अनैतिक, इसलिए हम अहंकार को आधार बनाकर बात कर रहे हैं। अपने ऊपर ज्यादा भरोसा करने से अहंकार आएगा ही। नास्तिक कहते हैं परमात्मा का कोई अस्तित्व नहीं होता। ऐसे लोग प्रकृति में चार तत्व की कल्पना करते हैं।...
    April 17, 05:06 AM
  • शुरुआत विज्ञान के आधार पर करें
    अप्राप्त को प्राप्त करने की तीव्र आशा हर मनुष्य की कमजोरी है। सभी को सब नहीं मिलता। जब हम पूरी ताकत लगाते हैं कि हमें कुछ मिल जाए और यदि नहीं मिलता है तब इस स्थिति को लोग अलग-अलग ढंग से लेते हैं। कुछ भाग्य से जोड़कर बैठ जाते हैं, कुछ अपनी कमजोरी मान लेते हैं और कुछ बहुत ज्यादा निराश हो जाते हैं। फिर शुरू होता है ईर्ष्या का काम। हमें मिला नहीं और जिनके पास है उसे देखकर हमारा मन मचलने लगता है। अनियंत्रित और मचलता हुआ मन दो काम करवाता है। ईर्ष्या हमें डुबोती है और गलत रास्ते पर ले जाती है। मन की रुचि...
    April 16, 05:04 AM
  • योग से मृत्यु भी आनंददायी
    जन्म और मृत्यु किसी और के हाथ में है। आप चाहे इसे ईश्वर कह लें, माता-पिता या प्रकृति की घटना, लेकिन हमारे वश से बाहर है। हमारे हाथ में अगर कुछ है तो वह है जीवन। लेकिन अब तो जीवन पर भी अधिकार नहीं रह गया है। हम स्थितियों और व्यक्तियों से इतना बंध गए हैं कि बहुत कम लोग ही खुद की इच्छा से जीवन जी पाते हैं। कर्तव्य कहें या मजबूरी, जीवन का बड़ा हिस्सा दूसरों के लिए गुजर जाता है और एक दिन मृत्यु द्वार पर आ जाती है। मृत्यु पर हमारा वश नहीं चलता। तो क्या ऐसे ही समय बीत जाएगा। चलिए, एक प्रयोग किया जा सकता है। हम...
    April 15, 07:23 AM
  • वैराग्य का सही अर्थ जानिए
    वैराग्य शब्द भी बड़ा अनूठा है। भारतीय संस्कृति में जिन शब्दों की व्याख्या में लोग खूब भ्रम में पड़े हैं, उनमें से एक है वैराग्य। इसकी लोगों ने अपनी-अपनी व्याख्याएं कर रखी हैं। किसी ने कहा संपूर्ण त्याग का मतलब वैराग्य है। कोई कहता है अतिरिक्त संतोष वैराग्य है। किसी का मानना है अपना काम जितने में चल जाए, और अधिक की आकांक्षा न रहे, इसका नाम वैराग्य है। भजन-पूजन के क्षेत्र में तो इस शब्द को खूब उछाला जाता है। सुग्रीव भी ऐसा ही कर रहे थे। बात चल रही है किष्किंधा कांड की। सुग्रीव श्रीराम के सामने बालि...
    April 14, 06:19 AM
  • धन कमाएं पर सेवाभाव भी हो
    इन दिनों जिन शब्दों के अर्थ को लेकर खूब भ्रम फैला हुआ है उनमें से एक शब्द है सेवा। जैसा भ्रम प्रेम को लेकर है, ऐसा ही सेवा के साथ हुआ है। सेवा में यदि त्याग न हो, तो वह सौदा बन जाती है और सौदा हानि-लाभ पहले देखता है। आज जिन लोगों को सेवा करते हुए देखा जाता है वे ज्यादातर सौदा ही कर रहे हैं। समाजसेवा के क्षेत्र में अहंकार काम कर रहा है। राजनीति में निजहित की कामना समा गई है। घर-परिवार की सेवा में मजबूरी की गंध आ रही है। सेवा को सही समझना हो, तो भक्ति के माध्यम से समझा जा सकता है। शास्त्रों में भक्ति के नौ...
    April 13, 05:32 AM
  • परिवार से चर्चा में आत्मीयता हो
    घर-परिवार में आपसी व्यवहार में वाणी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। बोलचाल के ढंग ने कई घरों को जोड़कर रखा और अनेक को तोड़ दिया। रिश्ते निभाने में शब्द अमृत भी बन सकते हैं और जहर भी। घर में बोले गए शब्द का बौद्धिक महत्व उतना नहीं है, जितना आत्मिक है। शब्दों में अक्ल भले ही न लगाएं, पर भावनाएं जरूर उड़ेलें, क्योंकि जब आप परिजनों से बात कर रहे होते हैं तो शब्दों के पीछे के अर्थ केवल शाब्दिक नहीं होते, उसमें अनुभूति भी होती है। आप हृदय से बोलें और सामने वाला हृदय से ही सुने। औपचारिकताओं का पुट कम से कम रखें।...
    April 11, 06:10 AM
  • ईश्वर से कीजिए गुरु की मांग
    हम कितने ही हुनरमंद हों, सक्षम हों, लेकिन कुछ परिस्थितियां ऐसी आ जाती हैं जो हमारी सीमा के पार रहती हैं। हम उनसे जूझ नहीं पाते तथा थकान और निराशा घेर लेती है। जैसे आप बहुत बड़े डॉक्टर, नौकरशाह या व्यवसायी हैं। खूब दक्ष हैं अपने काम में। बहुत प्रतिष्ठा है आपकी। आपको देखकर लोग कहते हैं ये चाहें जो कर सकते हैं, सफलता इनकी दास, अवसर इनके गुलाम हैं। धन हाथ का मैल है। किंतु आपके जीवन में कुछ अवसर ऐसे आते हैं, जब आपको लगता है कि हम कमजोर पड़ रहे हैं, किसी परमशक्ति की जरूरत है। खासतौर पर निजी जीवन में ऐसा हो...
    April 10, 06:28 AM
  • सुमिरन के जरिये ईश्वर से जुड़ें
    कभी इस पर ध्यान दीजिएगा कि खाली वक्त में हम क्या सोच रहे होते हैं। हमारे चिंतन में कौन लोग रहते हैं। काम करते समय भी दिमाग में कुछ और चल रहा होता है। गाड़ी चलाते वक्त अनेक इंसान दिमाग में से गुजर रहे होते हैं। आप पाएंगे कि शायद ही कोई ऐसा वक्त होता होगा, जिसमें सिर्फ हम अपने बारे में सोचते हैं, खुद से ही जुड़ते हैं। जैसे ही हम खुद से बात करने के लिए भीतर उतरते हैं, हमारे साथ कई लोग आ जाते हैं। बाहर से अकेले होने का मतलब है केवल हमारा शरीर और आस-पास कोई न रहे, जबकि भीतर से अकेले होने का मतलब है हम अपनी...
    April 9, 05:28 AM
  • भीतरी फाॅलोअप देता है शांति
    आधुनिक प्रबंधन में फालोअप का महत्व बढ़ता जा रहा है। लक्ष्य और ऊंचे होते जा रहे हैं। आदमी की इच्छाओं का गजब का विस्तार हुआ। इस फैलाव के बीच में यदि कुछ नहीं फैला है तो वह है चौबीस घंटे। इसी चौबीस घंटे में हमें ज्यादा से ज्यादा काम निपटाकर अधिक से अधिक लक्ष्य प्राप्त करना है, इसलिए फॉलोअप महत्वपूर्ण है। देशी भाषा में कहें तो पीछे पड़ जाना। इसकी जब अति हो जाती है, तब दोनों पक्ष दुखी हो जाते हैं। आपको फॉलोअप करना हो या कोई अापका फॉलोअप कर रहा हों, ऐसे में तनाव-चिड़चिड़ेपन से बचना चाहें तो इसे अपने ऊपर...
    April 8, 05:22 AM
  • सत्कर्म से मिलती है लोकप्रियता
    इस दौर में प्रसिद्धि पाना नशे की तरह हो गया है। पहले कुछ लोग थे जो परदे के पीछे होते थे और बाहर दृश्य का संचालन करते थे, लेकिन आज सभी मंच पर आना चाहते हैं। परदे के पीछे रहने को कोई तैयार नहीं है। ज्यादातर लोगों की आकांक्षा है कि कम करें, अधिक दिख जाए। बहुत ज्यादा लोग हमें जानने लगें। लोकप्रियता बीमारी बन गई है। आज इसी पर विचार करें कि लोकप्रियता क्यों जरूरी है? लोकप्रियता दो तरह की होती है। पहली आप कोशिश करके हासिल करते हैं और दूसरी आप कर्म कर रहे होते हैं और अपने आप मिल जाती है। हनुमान जयंती के दिन...
    April 7, 12:25 PM
  • आदत से न जिएं निजी जीवन
    अगर आपकी मेलजोल में रुचि है। मित्रों की बड़ी सूची आपके पास है। आप इस बात के लिए लोकप्रिय हैं कि संबंध बहुत अच्छे से निभाते हैं तो एक बात को लेकर सावधान हो जाइए। देखा जाता है कि मित्रों के लिए समर्पित ऐसे लोग जीवनसाथी के प्रति उदासीन या अनुचित व्यवहार करने लगते हैं। वे इसे स्वीकार भी नहीं करते, क्योंकि वे मानते हैं कि जैसे समर्पित और सक्रिय वे मित्रों के लिए हैं, ऐसे ही जीवनसाथी के प्रति भी हैं और यहीं भूल हो जाती है। आप स्त्री हों या पुरुष, अपने जीवनसाथी के प्रति व्यवहार के मामले में फर्क रखना...
    April 7, 12:21 PM
  • आदत से न जिएं निजी जीवन
    अगर आपकी मेलजोल में रुचि है। मित्रों की बड़ी सूची आपके पास है। आप इस बात के लिए लोकप्रिय हैं कि संबंध बहुत अच्छे से निभाते हैं तो एक बात को लेकर सावधान हो जाइए। देखा जाता है कि मित्रों के लिए समर्पित ऐसे लोग जीवनसाथी के प्रति उदासीन या अनुचित व्यवहार करने लगते हैं। वे इसे स्वीकार भी नहीं करते, क्योंकि वे मानते हैं कि जैसे समर्पित और सक्रिय वे मित्रों के लिए हैं, ऐसे ही जीवनसाथी के प्रति भी हैं और यहीं भूल हो जाती है। आप स्त्री हों या पुरुष, अपने जीवनसाथी के प्रति व्यवहार के मामले में फर्क रखना ही...
    April 6, 06:52 AM
  • सत्कर्म से मिलती है लोकप्रियता
    इस दौर में प्रसिद्धि पाना नशे की तरह हो गया है। पहले कुछ लोग थे जो परदे के पीछे होते थे और बाहर दृश्य का संचालन करते थे, लेकिन आज सभी मंच पर आना चाहते हैं। परदे के पीछे रहने को कोई तैयार नहीं है। ज्यादातर लोगों की आकांक्षा है कि कम करें, अधिक दिख जाए। बहुत ज्यादा लोग हमें जानने लगें। लोकप्रियता बीमारी बन गई है। आज इसी पर विचार करें कि लोकप्रियता क्यों जरूरी है? लोकप्रियता दो तरह की होती है। पहली आप कोशिश करके हासिल करते हैं और दूसरी आप कर्म कर रहे होते हैं और अपने आप मिल जाती है। हनुमान जयंती के दिन...
    April 4, 06:28 AM
  • बदलाव से डरें नहीं, लाभ उठाएं
    प्रकृति एक तयशुदा गति से परिवर्तन करती है। मनुष्य जब प्रकृति से जुड़ता है तो वह पहला काम करता है लाभ के लिए अपने तरीकों से प्रकृति की गति को कम करना, बढ़ाना या रोकना। जब प्रकृति असंतुलित होती है तो इसका दुष्परिणाम सबसे ज्यादा मनुष्य ही उठाता है। हम प्रकृति से छेड़छाड़ करते हैं, क्योंकि हमें सिखाया गया है तेजी से परिवर्तन करो और प्रकृति का स्वभाव है अपनी गति से चलने दो। बोया गया बीज अपने समय पर ही उगता है, लेकिन मनुष्य तुरंत उसे बड़ा पेड़ बनाना चाहता है। यह शीघ्रता हमें तनावग्रस्त कर देती है। इन...
    April 3, 03:30 AM
  • सहज व्यवहार से कम क्रोध
    अलग-अलग लोगों से बातचीत करते समय विषय की प्रस्तुति भले ही बदल जाए, लेकिन मुखौटा न ओढ़िए। हमें पता भी नहीं चलता और हम अपने चेहरे पर मुखौटा ओढ़ना शुरू कर देते हैं। मित्रों से बात करेंगे तब हमारे चेहरे के भाव कुछ और होंगे। बॉस या अधीनस्थ से बात करेंगे तब हमारे मुखौटे का ढंग बदला हुआ होता है। पत्नी से, पति से या बच्चों से चर्चारत होने पर हम लोगों की आदत सी हो गई है मुखौटा ओढ़कर बात करने की। जहां गंभीर नहीं होना है, वहां गंभीर हो जाते हैं। जहां मुस्कुराने की इच्छा नहीं है, वहां हंसने लगते हैं और धीरे-धीरे यह...
    April 2, 06:00 AM
  • सद्कर्मों के लिए है जीवन
    जीवन में बिना कर्म किए हम रह ही नहीं सकते। इसलिए क्रिया मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक साथ रहती है। हममें और पशुओं में फर्क ही यह हो जाता है कि कर्म मनुष्य भी करेगा, लेकिन व्यवस्थित होकर। और यही उसकी पहचान है। कर्म के पीछे जो विचार काम करता है, यह मनुष्य की उपलब्धि है। इस संसार को जिस ढंग से भगवान ने बनाया है, उसमें मनुष्य को सद्कर्म करने के लिए बहुत सारे अवसर दिए हैं। अगर अवसर नहीं दिए होते तो मनुष्य भी आरोप लगा सकता है कि हम क्या करें? शास्त्रों में तो लिखा है कि परमात्मा इतना पूर्ण है कि तुम पूर्ण में...
    April 1, 06:00 AM
  • त्याग से भगवान नहीं मिलते
    कुछ लोग जो दुनियादारी में डूबे रहते हैं, उन्हें दुनिया बनाने वाले की फिक्र नहीं होती। धर्म क्या होता है, भगवान क्या हैं, हम परमात्मा से क्यों जुड़ें, इन सब बातों के बारे में कुछ लोग बिलकुल नहीं सोचते। जब जिंदगी में तनाव आता है, चाहा हुआ नहीं होता, तब ऐसे लोग थोड़ी फिक्र पालते हैं। जो ईश्वर को मानते हैं और संसार में भी रहते हैं, ऐसे लोगों को एक बड़ा भ्रम सताता है कि हमें इसमें संतुलन कैसे बैठाना है। हमेशा इस बात के लिए परेशान होते रहते हैं कि क्या ईश्वर को पाने के लिए दुनिया छोड़ दें या दुनिया में...
    March 31, 04:35 AM
  • तेजस्विता से बनाएं प्रभावी व्यक्तित्व
    व्यक्तित्व को प्रभावी बनाने के लिए बाहर और भीतर से प्रयास करने पड़ते हैं। हमारा दिखना व्यक्तित्व को बाहर से प्रभावी बनाता है, लेकिन हमारा होना भीतर का विषय है। संसार हमें देखता है और परमात्मा की नजर हमारे होने पर होती है, क्योंकि भीतर जो हमारी गतिविधियां चल रही होती हैं, वैसे हम होते हैं। दिखते हम अलग हैं, होते कुछ और हैं। अगर अपने व्यक्तित्व को प्रभावी बनाना चाहते हैं तो हमें तेजस्वी जरूर होना चाहिए। तेज हमारे भीतर भरा हुआ है, हमें इसका सदुपयोग करना चाहिए। अपने भीतर के तेज को बाहर प्रकट करने के...
    March 30, 06:04 AM
  • आज दिव्यता का अनुष्ठान
    कुछ लोग मजबूरी में दोहरा जीवन जीते हैं और कुछ लोगों की आदत-सी बन गई है। प्रजेंटेशन महत्वपूर्ण होने से शोमैनशिप बढ़ गई है। दिखावा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। लोगों ने आवरण की चिंता पाल ली, आचरण में लापरवाह हो गए। आवरण नहीं, हमारा अंतस, हमारी अंतरात्मा महत्वपूर्ण है। इससे मनुष्यता को हुई क्षति में एक बड़ा नुकसान स्त्रियों को हुआ। भीतर-बाहर से एक रहना उनका मूल स्वभाव है, लेकिन प्रदर्शन के इस दौर में नारी भी आचरण पर टिक गई। योग से अंतस को जाना जा सकता है और इसका साधारण-सा प्रयोग है ध्यान। इसकी सरल विधि है...
    March 28, 05:18 AM
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