Home >> Abhivyakti >> Jeene Ki Rah
  • प्रज्ञा से होते हैं सदैव सही काम
    कठिन से कठिन काम स्वयं करना पड़े तो भी करना आसान है, लेकिन सरल से सरल काम भी यदि दूसरे से कराना पड़े तो कभी-कभी कठिन हो जाता है। यदि आप किसी व्यवस्था के प्रमुख हों और नीचे काम करने वालों को कोई आदेश दें तो चिंता बनी रहती है कि वे काम ठीक से करेंगे या नहीं। कुछ सीनियर लोग प्रोफेशनल लाइफ में यह कहते हुए पाए जाते हैं कि आजकल काम करवाना बहुत ही माथाफोड़ी का काम है। योग्य अधीनस्थ का मिल जाना सौभाग्य की बात है। सुग्रीव इस मामले में सौभाग्यशाली थे कि उनके पास हनुमानजी जैसे सचिव थे। हनुमानजी ने अपनी बुद्धि...
    07:57 AM
  • संतान से रिश्ते में आध्यात्मिकता जोड़ें
    अब जीवन में दूर जाकर अलग रहने के अवसर बढ़ते जा रहे हैं। शिक्षा हो या व्यापार अपने दायरे से बाहर निकलना ही पड़ता है। इसमें परिवार सबसे ज्यादा परेशान होता है। खासतौर पर इन दिनों माता-पिता जो अकेलापन महसूस कर रहे हैं, बच्चों का दूर जाना इसकी वजह है। हालांकि, इसमें दोनों की ही सहमति है । बच्चों के लालन-पालन में अनेक मौके आते हैं जब माता-पिता को अपनी संताने देखकर लगता है कि हम ऐसे चिड़चिड़े, जिद्दी और स्वार्थी बच्चों के माता-पिता क्यों हो गए। खुद पर शर्म करने के अवसर भी आते हैं। कुछ बच्चे हैं जो...
    September 1, 07:05 AM
  • आध्यात्मिक साधना को भी समय दें
    समय नहीं है इसका रोना सभी लोग रोते हैं। टाइम की कमी बताना फैशन सा हो गया है। चौबीस घंटे की अवधि में सामान्य रूप से हम 15-16 घंटे जागते हैं। इसी अवधि में हम सांसारिक काम सूचीबद्ध तरीके से करते हैं। इसी दौरान कुछ आध्यात्मिक कार्य भी पूरी योजना से किए जाएं। रूहानी मिशन के संत राजिंदरसिंहजी कहते हैं, दिनभर में दो काम ऐसे भी किए जाएं और वे हैं- भजन और सुमिरन। ये केवल कर्मकांड नहीं हैं। ऐसा न मानें कि इनको करने से हमारे सांसारिक कार्यक्रम बाधित हो जाएंगे। इन दोनों के जरिये हम अपना ध्यान बाहर की दुनिया से...
    August 30, 06:48 AM
  • जीवन में मौलिकता आवश्यक है
    इन दिनों सबकुछ दो भागों में बंट चुका है। अमीरी-गरीबी, सही-गलत, आस्तिक-नास्तिक और बंटते-बंटते शिक्षा भी बंट गई। अमीरों की शिक्षा अलग। गरीबों का पढ़ना-लिखना कुछ और बात है। इसी विभाजन ने शिक्षकों को भी बांट दिया। एक वे शिक्षक हैं जो स्कूल-कॉलेज में किताबों का कोर्स पूरा करा रहे हैं, जहां सिर्फ मार्कशीट और डिग्री का उद्देश्य पूरा किया जा रहा है। दूसरी शिक्षा कोचिंग सेंटर्स पर फल-फूल गई। कुछ शहर तो इन्हीं के नामों से जाने जा रहे हैं। एक जगह डिग्री की बात है और दूसरी जगह है कॅरिअर। यहां के शिक्षक भी...
    August 29, 07:32 AM
  • निर्भय होकर जीने में ही आनंद है
    अपने किए हुए के परिणाम को लेकर जागरुक रहें, लेकिन परेशान न हों। रिजल्ट आपके हित में आए इसकी इच्छा जरूर रखें, पर ऐसा न हो तो बहुत दुखी न हो। ये दुख कम हो सकता है इस भावना से कि हमारे अलावा इस ब्रह्माण्ड में ऐसी शक्ति है, जिसकी इच्छा चलती है। जैन संत सुधासागरजी व्यक्त करते हैं, जब कर्म उदय में आता है तो सुख की नींद नहीं सोने देता है। हम आज तो सुखी हैं, दूसरे क्षण वह सुख रहेगा कि नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। एक क्षण पहले कहा जा रहा था कि अयोध्या का राज श्रीराम के चरणों में समर्पित होगा। सूर्य जब डूबा तो ये...
    August 28, 07:13 AM
  • सेवाभाव जागने पर बढ़ जाती है ऊर्जा
    जब भीतर सेवाभाव जागता है, तो हमारी ऊर्जा भीतर ही भीतर बढ़ जाती है और कई गुना अधिक परिणाम देने लगती है बल्कि यूं कहें कि ऊर्जा नया रूप लेने लगती है, इसलिए जब भी कोई सेवाभाव करें; केवल दिमाग से न करें। उस सेवाभाव को हृदय तक ले जाएं, क्योंकि जो बहुमूल्य होता है वह हृदय में बसता है। हृदय तक जाते ही सेवा अपने लक्ष्य बदल लेती है, फिर वहां अहंकार काम नहीं करता। परहित की भावना जबर्दस्त रूप से जाग्रत हो जाती है। मस्तिष्क अपने आप संतुलित होने लगता है और कर्म में दिव्यता आने लगती है। ऐसे लोग हुए हैं, जिन्होंने...
    August 27, 06:15 AM
  • मित्र को सलाह देने में सावधानी बरतें
    भयभीत मनुष्य न सिर्फ सोचने-समझने की शक्ति खो देता है, बल्कि अपने आस-पास के वातावरण भी दूषित कर देता है। वह तो हिम्मत हारता ही है, साथ वालों की हिम्मत भी तोड़ देता है। तुलसीदासजी ने किष्किंधा कांड में श्रीराम और हनुमान की पहली मुलाकात के दृश्य के आरंभ में लिखा है, तहं रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा।। अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना।। वहां ऋष्यमूक पर्वत पर मंत्रियों सहित सुग्रीव रहते थे। अतुलनीय बल की सीमा श्रीरामचंद्रजी और लक्ष्मणजी को आते देखकर, सुग्रीव...
    August 26, 07:26 AM
  • दान में परहित को प्राथमिकता दें
    धन के दुरुपयोग की लंबी शृंखला है, लेकिन हमारे शास्त्रों ने धन के सदुपयोग की भी सुंदर व्यवस्था बताई है। यह हो जाए तो दौलत कमाना भी पूजा बन जाएगा। गायत्री परिवार के पितृपुरुष आचार्य श्रीराम शर्मा कहा करते थे, दान की परंपरा से करुणा और दया के आधार पर सच्चा साम्यवाद स्थापित किया जा सकता है। दान की प्रक्रिया में दाता और लेने वाले के मध्य सौहार्द बना रहता है, इसके विपरीत छीन-झपट कर दूसरे की संपत्ति अन्य को दिलवाने की चेष्टा से लाया हुआ साम्यवाद स्थायी नहीं रहता। उसका टिकाव हिंसा पर होता है। समाज में...
    August 25, 06:46 AM
  • जीवन के विविध रूपों की रक्षा करें
    क्या हम जानते हैं कि मनुष्य होने पर हमारे उद्देश्य क्या हैं? अपने जीवन के लक्ष्य को न जानना बहुत बड़ी भूल है। जूनापीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरिजी अपने शब्दों के लालित्य के साथ कहते हैं, जीवन को सुधारने की शुरुआत मनुष्य किसी भी समय कर सकता है। भूतकाल में हमने कुछ गलतियां कीं, उनके दुष्परिणाम भी भुगत लिए, लेकिन अब यह तय करें कि इन गलतियों को नहीं दोहराएंगे और जीवन को बेहतर बनाएंगे। भूलों को सुधारने के मामले में हम व्यक्तिगत गलतियों तक ही सीमित रहते हैं। व्यापक सोच परिवार और आस-पास के जीवन को...
    August 23, 07:35 AM
  • विचारों में है स्वर्ग-नर्क की उत्पत्ति
    हरेक का स्वर्ग-नर्क परमात्मा ने लगभग उसी के हाथ में सौंप रखा है। इन लोकों की भौगोलिक स्थिति के शोध में जाएंगे तो उलझ जाएंगे। ये तो जीतेजी जीवन के दो हालात हैं। निवृत्त शंकराचार्य स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि ने कहा है, जो विषय का अनुरागी है, वही बंधन में है और विषयों से विरक्ति ही मुक्ति है। घोर नर्क किसे कहते हैं? अपने शरीर का दुरुपयोग ही घोर नर्क है। स्वर्ग-पद क्या है? तृष्णा का नाश। तृष्णा यानी चाहत की अति आसक्ति। तृष्णा के मिटने की स्थिति आ जाए और विवेक जाग्रत हो जाए, तो वह व्यक्ति जीते जी स्वर्ग...
    August 22, 07:03 AM
  • पूर्ण कर्म ही ध्यान में जाने का मार्ग
    बिना कर्म किए कोई भी नहीं रह सकता। जो लोग शांति की खोज में हैं उन्हें अपने कर्म के मूल और परिणाम दोनों पर सजगता बनाए रखनी होगी, क्योंकि शांति-अशांति के भ्रूण कर्म में बसे हुए हैं। आर्ट ऑफ लिविंग के प्रणेता श्रीश्री रविशंकरजी ने इस पर सुंदर विचार व्यक्त किया है। हर मनुष्य के हाथ कुछ न कुछ करना चाहते हैं। कर्म करने की जो एक तरंग, शक्ति, सामर्थ्य हमारे भीतर है, उसको दिशा देने की बात महत्वपूर्ण है। हमारी जो चेतना है, उसमें रजोगुण भी है, उसको जो दिशा देंगे तो वह उसी दिशा में बहने लगेगी। अगर सतोगुण या...
    August 21, 07:14 AM
  • घातक है सर्वत्र धन की महत्ता
    धन कमाने की चाहत यदि समय पर नियंत्रित न की जाए, तो मनुष्य को निर्दयी बना देती है, क्योंकि दौलत के राजपथ पर अनेक मोड़ ऐसे आते हैं जहां आपको कुटिल, निर्दयी और शैतानी वृत्ति का सहारा लेना पड़ सकता है। जैसे वाहन चलाते समय मोड़ पर हम गाड़ी के सभी यंत्रों का उपयोग बदल देते हैं। मसलन स्पीड, ब्रेक, गियर आदि, लेकिन बाद में फिर सामान्य हो जाते हैं। हालांकि, कुछ लोग धन कमाने के मामले में सदैव निर्दयी ही बने रहते हैं। धन की आसक्ति न सिर्फ निजी जीवन को, बल्कि हमारे अन्य जीवन को भी दुखी कर देती है। संत रविशंकर...
    August 20, 06:56 AM
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