पति-पत्नी पर अनेक आदर्श वाक्य कहे गए हैं। किसी ने कहा है, एक ही गाड़ी के दो पहिये हैं। ऐसा तो हो सकता है, लेकिन ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू तो नहीं हैं। दोनों अलग-अलग सिक्के ही हैं और हर सिक्के का दूसरा पहलू संतान है। स्त्री-पुरुष दांपत्य बंधन में बंधते ही एक मंजिल की ओर साथ चल पड़ते हैं, लेकिन यह साथ बहुत दिनों तक नहीं रह पाता। इसके साझेपन में कई दरारें आनी शुरू हो जाती हैं। मजेदार बात यह है कि मंजिल एक ही होती है, मसलन दोनों चाहते हैं परिवार अच्छे से रहे, संतान श्रेष्ठ बने।
एक-दूसरे को सुखी रखें। इन सबके बाद भी दोनों एक-दूसरे से पर्याप्त दुखी रहते हैं। मंजिल पर...