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जीने की राह
 
 
 
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  • September 13, 12:07
     
    जीने की राह.. आजकल सारे संबंध लेन-देन पर ही आधारित हो गए हैं। मुफ्त में कोई किसी से बात भी नहीं करता। बाहर की दुनिया में आदमी खूब प्रोफेशनल हो जाए, यह बात तो समझ में आती है, लेकिन आजकल तो लोग घरों में भी रिश्ते तोल-मोलकर बनाने लगे हैं। बाप-बेटे, भाई-भाई, पति-पत्नी, सौदे की तरह रिश्ते निभा रहे हैं, बोझ की तरह ढो रहे हैं, जबकि अध्यात्म कहता है कि कम से कम घर-परिवार में तो जब दो लोग मिलें तो...
     

  • September 12, 12:09
     
    परिवार का निर्माण यदि केवल समाज और कुल-धर्म निभाने के लिए किया जाए तो उसमें कर्तव्य की भावना अधिक रहेगी, लेकिन प्रेम और हार्दिकता का अभाव होगा। ऐसे परिवारों में पति-पत्नी के रिश्ते जब केवल फर्ज के नाम पर होते हैं धर्म की आज्ञा मानकर पूरे किए जाते हैं, वंश की प्रतिष्ठा का विचार रहता है तो उसमें से फिर स्नेह चला जाता है और मजबूरी हावी हो जाती है। यदि परिवारों में सदस्य एक-दूसरे के लिए...
     

  • September 10, 12:05
     
    अधिक लाभ का लोभ स्थूल वस्तुओं में रस पैदा कर देता है। बेकार की वस्तुओं का संचय करने की आदत पड़ जाती है। बेशक यह काम इंद्रियों की चतुरता से होता है, लेकिन इंद्रियों की कामुकता भी बढ़ती जाती है। हमारे शरीर में शक्ति के कई बिंदु होते हैं। भोग और विलास इन बिंदुओं पर प्रहार करके वहीं से शक्ति को सोखने लगते हैं। इसलिए कोशिश की जाए कि पहले तो शक्ति को समझें, फिर शक्ति के केंद्रों को जानें...
     

  • September 9, 12:09
     
    आजकल माता-पिता की एक बड़ी चिंता यह है कि बच्चे जिन लोगों के साथ उठ-बैठ रहे हैं, क्या वह संगति ठीक है? कुसंग कॅरियर के लिए बड़ा खतरा है। वैसे माना तो यह जाता है कि बच्चों को कुसंग से बचाया जाए, लेकिन सच तो यह है कि बड़े-बड़े भी कुसंग में फंस जाते हैं। हालांकि उम्र ज्यादा होने की वजह से वे अपने कुसंग को छुपा लेते हैं। कुसंग से हर उम्र में बचना चाहिए। कुसंग का यह अर्थ न समझा जाए कि बुरे,...
     

  • September 8, 12:08
     
    एक समय था जब लोग घर में अधिक समय गुजारते थे। उसके मुकाबले अपने दफ्तर, व्यवसाय के स्थल पर कम समय देते थे। फिर एक समय आया, जितना समय परिवार को, उतना ही व्यवसाय को मिलने लगा। लेकिन अब ज्यादा से ज्यादा समय नौकरी-व्यवसाय में जाने लगा और बचा हुआ समय घर में दिया जाने लगा है। ताज्जुब नहीं कि आने वाले समय में दफ्तर ही घर में आ जाए। कुल मिलाकर वक्त की हर कटौती घरवालों के खाते में से ही होती है।...
     

  • September 7, 12:05
     
    जब भी किसी पुराने शास्त्र, विचार, सिद्धांत पर बात करनी हो, शब्द नए होने चाहिए, एकदम ताजे। भले ही भाव, अर्थ वही हों, जो हजारों साल पहले रहे होंगे। जैसे रुपए-पैसे भी लगातार चलते हुए घिस जाते हैं, वैसे ही शब्द भी कुट-पिट जाते हैं। शब्दों को ताजा रखने के लिए कम बोलने का प्रयोग करें। अधिक बोलने से शारीरिक शक्ति का ही नुकसान नहीं होता, बल्कि शब्दों की ताकत भी क्षय होती है। अधिक बोलने का सीधा...
     

  • September 6, 12:07
     
    अत्यधिक व्यावहारिकता के युग में जब सारे संबंध लेन-देन, तेरे-मेरे पर टिके हों, ऐसे में जड़ वस्तुओं में भी संवेदना दिख जाती है। वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है कि वृक्षों को कुल्हाड़ी की आहट महसूस हो जाती है। बरसते पानी से वृक्ष मस्त होने लगते हैं। जड़ वस्तु भी अपनी संवेदनशीलता नहीं छोड़ती, जबकि हम मनुष्य होने के बाद भी संवेदनहीन होते जा रहे हैं। संवेदनाएं बचाने के लिए भीतरी जप भी...
     

  • September 5, 07:49
     
    श्रेष्ठता जीवन में कई तरीकों से और कई रूप में आती है। बस उसे ग्रहण कर उपयोग करने की कला हमें आनी चाहिए। शिक्षा जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धि है। जीवन में अच्छा शिक्षक मिलना सौभाग्यपूर्ण है। भारत की धरती पर शिक्षा के साथ एक आयाम और जुड़ता है और वह है संस्कार। अपने छात्र होने को शिष्य में बदलना होगा, तब संस्कारों का महत्व समझ में आएगा। छात्र में जब समर्पण जागे तो शिष्य भाव आएगा और शिष्य...
     

  • September 4, 12:01
     
    इस समय कोई भी गरीब नहीं रहना चाहता। हर आदमी इतना धन कमाना चाहता है कि उसकी मूलभूत आवश्यकताएं तो पूरी हो ही जाएं साथ ही मौज-मस्ती के लिए भी थोड़ा-बहुत धन बच जाए। हर एक की मूलभूत सुविधाओं की परिभाषा अलग-अलग हो गई है। शिक्षा का भी एक बड़ा उद्देश्य धन कमाना रह गया है। अब तो लगता है पढ़ाई-लिखाई और धन-दौलत एक-दूसरे का पर्याय हो गए हैं। अच्छी शिक्षा हो और ठीक-ठाक धन न मिले तो भी दुख जाग जाता...
     

  • September 3, 12:04
     
    जीवन गोपनीय महात्म्य से भरा हुआ है। जितनी गहराई में जाएंगे, उतनी ही इसकी महिमा समझ में आएगी। इसकी महत्ता को समझने के लिए गहन प्रयास करने होते हैं। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो बेचैनी हमें घेरेगी। इसलिए जिंदगी के प्रताप को प्रगट होने दें, उसके लिए जमकर प्रयास करें। सारे समाधान इसी में छुपे हैं। जब कभी हम परेशान हों तो एक प्रयोग करें। यदि आप पुरुष हैं तो भीतर उतरकर अपने अंदर के...
     

  • September 2, 12:28
     
    आजकल दुनियादारी की दौड़ में धीमे चलने वालों को नासमझ, थका हुआ और कमजोर माना जाता है। यह चीजों को तेजी से लपकने का वक्त है, लेकिन याद रखा जाए भौतिक रूप में विलंब असफलता का कारण हो सकता है। साथ ही बहुत अधिक तेजी कब हमें हिंसक बना दे, पता नहीं लगता, क्योंकि तेज दौड़ने वाले लोग हर हालत में सफलता चाहते हैं। जरा भी असफलता मिली तो मन में यह विचार आता है कि दौड़ कुछ कम थी और इसलिए वह पूरे जोश से...
     

  • September 1, 12:18
     
    बुद्धि को लगातार तराशना पड़ता है। जो लोग यह कार्रवाई ठीक से करते हैं, वे बुद्धिमान कहे जाते हैं। बाहर की दुनिया जीतने के लिए भी बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है और भीतर के संसार को पाने के लिए भी। बुद्धू शब्द बुद्ध शब्द के आसपास है। बुद्ध होना एक स्थिति है। जिन्हें बोध हो गया, वह बुद्ध है और इस मामले वे बुद्ध हैं कि जब एक बार भीतर उतर गए तो बाहर की दुनिया व्यर्थ लगने लगती है। ऐसे निस्पृह...
     

  • August 31, 12:08
     
    विवाह का एक आध्यात्मिक अभिप्राय भी होता है। दांपत्य को सामाजिक दृष्टि से ही न देखा जाए। पति-पत्नी होना स्त्री-पुरुष के लिए कोई शारीरिक कृत्य मात्र नहीं। इस रिश्ते में आध्यात्मिक अनुभूतियां जितनी गहन होंगी, रिश्ता उतना ही आनंददायक हो जाएगा। आज के दौर में सर्वाधिक मतभेद और आंतरिक तनाव इसी रिश्ते में देखा जा रहा है। आदमी दांपत्य के सुख से भी ऊब गया है और दुख से भी। जिन लोगों को...
     

  • August 30, 12:20
     
    ऋषि-मुनियों ने जिसे तप कहा है, आज उसे अनुशासन कहा जा सकता है। अनुशासन एक सुव्यवस्था है। हनुमानजी अत्यधिक सुव्यवस्थित देवता हैं। सीताजी की खोज के लिए जब वे लंका पहुंचते हैं तो एक-एक भवन में ढूंढ़ने पर सीताजी नहीं मिलतीं। तभी उन्हें विभीषण का घर दिखता है। तुलसीदासजी ने सुंदरकांड में लिखा है - भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहं भिन्न बनावा।। फिर एक सुंदर महल दिखाई दिया। उसमें...
     

  • August 29, 12:04
     
    हमारे भीतर कुछ दैवीय शक्तियां विराजित हैं। बाहरी रूप से धन, पद, प्रतिष्ठा और समूह का बल काम आता है, लेकिन भीतर एक ही बल काम आता है और वह है मनोबल। इसे समझना और पकड़ना पड़ता है। हम मनोबल के मामले में जितने स्पष्ट होंगे, उतने ही अपनी सफलता को भ्रष्टाचार से मुक्त रख सकेंगे। इस समय हमारे देश ने ऐसी आंधी को देखा भी है। ईमानदार लोगों को अपने मनोबल पर लगातार काम करना चाहिए। दरअसल भ्रष्ट और...
     
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