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जीने की राह
 
 
 
 

  • March 25, 04:46
     
    भगवान  कहां मिलता है, यह खोज बड़ी पुरानी है। फिर विज्ञान के युग में तो ऐसा भी सवाल उठता है कि भगवान हैं भी या नहीं। रामसुख दासजी कहा करते थे- ईश्वर अनेक रूपों में व्यापक है, अचल है, ठोस है, सर्वत्र ठसाठस भरे हुए हैं, परंतु यह शरीर बिलकुल पोल है।   एक तरह से खोखला है और...
     

  • March 23, 02:44
     
    पूजा-पाठ खासतौर पर कर्मकांड की इन दिनों खिल्ली भी उड़ाई जाती है। घर में बुजुर्गों को पूजा-पाठ, दान आदि करते देखकर बच्चे विज्ञान और तर्क के झोंकों से उन्हें उड़ाने का भी खूब प्रयास करते हैं। नई पीढ़ी हर बात में तर्क, विज्ञान और व्यावहारिकता देखती है, ऐसा होना भी चाहिए।...
     

  • March 22, 01:25
     
    चारों तरफ चुनौतियां हैं। एक से निपटो, उससे पहले दूसरी तैयार रहती है। संसार, संपत्ति, स्वास्थ्य की समस्याओं का निदान तो फिर भी मनुष्य ढूंढ़ लेता है। यहां समाधान न भी मिले तो सहनशक्ति से काम चल जाता है, पर संतान के मामले में आई चुनौती अच्छे-अच्छों को तोड़ जाती है।  ...
     

  • March 21, 02:24
     
    पढ़ने की आदत छूट जाने के खतरे अब सामने आने लगे हैं। नई पीढ़ी तो पूरी तरह फैंटेसी में जीने की तैयारी के साथ है। पहले पढ़ते समय चित्त को गहराई तक स्पर्श किया जाता था। किताबों के अक्षर आंखों से उतरकर भीतर दिल की गहराई तक जाते थे।   पाठक दौड़ने-चलने की जगह बहता था। यह एक...
     

  • March 20, 01:12
     
    जिस तरह से हम अपने बाहरी दायित्वों के लिए बंटे हुए हैं, उसी तरह उसकी व्यवस्था अपने भीतर भी जमानी पड़ेगी। हम कार्यस्थल, घर-परिवार और नितांत निजी जीवन में अपने-अपने स्तर पर सक्रिय रहते हैं। कभी खुश, तो ज्यादातर परेशान ही रहते हैं।   हमारी परेशानी का कारण है हमारी भीतरी...
     

  • March 19, 06:29
     
    जीवन में चीजों का महत्व उनके जाने के बाद ही पता चलता है। दरअसल मनुष्य स्वयं को जब बहुत बड़ा मानने लगता है, तब अपने आसपास की कीमती वस्तुओं को भी तुच्छ समझने लगता है। रावण के जीवन से विभीषण चल दिए थे। रावण को लग रहा था मैंने विभीषण को त्याग दिया। लेकिन वास्तविकता यह थी कि...
     

  • March 18, 12:06
     
    यह   सवाल कई बार उठाया जाता है कि जब सब कुछ परिश्रम, पढ़ाई-लिखाई, धन कमाना आदि हमें ही करना है तो फिर ईश्वर इसमें क्या करेगा? क्या जरूरत है जिंदगी में भगवान की। खासतौर पर नई पीढ़ी के मन में यह बात जरूर उठती है।   यह सही भी है कि सब कुछ हमें ही करना है। धन कमाने में भी...
     

  • March 16, 01:15
     
    किया हुआ कभी व्यर्थ नहीं जाता, बल्कि हमारा किया हुआ किसी न किसी रूप में हमारे सामने आता जरूर है। अच्छा, अच्छे के रूप में और बुरा, बुरे के रूप में। कबीरदासजी एक किस्सा सुनाया करते थे-चोर चोराई टूंबरी, गाडै़ पानी मांहि। वह गाड़ै तो ऊछलै, करनी छानी नांहि।। किसी चोर ने...
     

  • March 15, 04:27
     
    पुरुषों से स्त्रियों के मामले में जब भी बात की जाए तो उनका जवाब होता है कि स्त्रियां सुरक्षित तो हो सकती हैं पर स्वरक्षित नहीं। पुरुष सुरक्षित और स्वरक्षित दोनों हो सकता है।   वह मानकर चलता है कि हम अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकते हैं और इसीलिए स्त्रियों से श्रेष्ठ हैं।...
     

  • March 14, 06:19
     
    इस समय जिंदगी बहुत तेजी से बदल रही है। सामान्य रूप से कहा जाता है कि आज के मनुष्य ने सोचना कम कर दिया है और करने पर टिक गया है। लेकिन ऐसा है नहीं। आज आदमी के भीतर सबसे अधिक उथल-पुथल किसी चीज ने की है तो वह है विचार।   आचार्य महाप्रज्ञ ने विचारों को तीन श्रेणियों में...
     

  • March 13, 03:47
     
    जब   भी किसी साहित्य को पढ़ें तो केवल शब्द न उठाएं। उन शब्दों के पीछे की समझ को भी उठाएं। शब्द आपको कुछ बातों का जवाब तो दे देंगे, लेकिन समझ यदि आ गई तो हमारी चेतना जाग्रत होगी। शब्द हमें जानकारियों के मामले में समर्थ बना देंगे। लेकिन समझ हमें प्रज्ञा दे जाएगी।  ...
     

  • March 12, 01:40
     
    मनुष्य को अपनी उम्र के बढ़ने के साथ जीवन के घटने का अंदाज होना चाहिए, क्योंकि हर जन्मदिन उम्र का आंकड़ा लेकर आता है तो जीवन का हिस्सा लेकर जाता भी है।   यह बात मृत्यु तक लोग समझ नहीं पाते। रामकथा में विभीषण का उदाहरण देखें - वे अपनी अच्छाई से रावण और राक्षसों की...
     

  • March 11, 12:08
     
    चीजों को याद रखना सामान्य रूप से मस्तिष्क का काम है। लेकिन जब याद रखी जा रही बातें सुख और दुख से जुड़ जाएं, तब यह खोज करनी चाहिए कि इसका केंद्र मस्तिष्क की जगह मन भी हो सकता है। मन का स्वभाव है बातों को याद रखना। वह हर स्मरण को सुख और दुख से जोड़ देता है।   उदाहरण के तौर...
     

  • March 9, 02:33
     
    लोभ की वृत्ति ने मनुष्य को उचित-अनुचित के विवेक से दूर कर दिया है। कम परिश्रम में ज्यादा से ज्यादा पाने की इच्छा इंसान पर बुरी तरह से हावी हो गई है। लोभ की इसी ललक ने मनुष्य को हिंसा के कार्यों में भी अव्वल स्थान पर ला दिया है। लोभ से पैदा हुई मनुष्य की इस हिंसावृत्ति का...
     

  • March 8, 12:43
     
    ब्रह्मचर्य शब्द सामान्य रूप से अविवाहित अवस्था से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यदि यह समझ लिया जाए कि  ब्रह्मचर्य अवस्था से अधिक जीवनशैली है, तो इसका उपयोग विवाहित जीवन में भी किया जा सकता है।   शादी के बाद अधिकांश संबंध शरीर से जोड़कर देखे जाते हैं। इसीलिए जब...
     
 
 
 
 
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