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जीने की राह
 
 
 
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  • January 12, 12:03
     
    कहते हैं कि ऊपर वाले ने जब इंसान को बनाया तो देखने के लिए दो आखें दीं। पर उसी के शरीर में तीसरी आंख से परमात्मा खुद देखता है। साथ में अवसर भी देता है कि यदि इंसान चाहे तो वह भी इस तीसरी आंख से देख सकता है।   बिना ज्योतिष शास्त्र पढ़े आप ज्योतिषी हो सकते हैं। बिना शब्दों...
     

  • January 9, 05:14
     
    यह बाजार में वस्तुओं और हमारे शरीर में बीमारियों का युग है। जेब में पैसा हो तो बाजार आपका। इसी तरह यदि शरीर स्वस्थ हो तो जीवन आपका है, वरना अस्वस्थ शरीर दूसरों का होकर रह जाएगा।   कभी यह डॉक्टरों के हवाले होगा, तो कभी देख-रेख करने वालों के। चलिए आज थोड़ी बात करें...
     

  • January 8, 12:12
     
    कुछ समझना हो तो दिमाग का उपयोग करना पड़ता है, सुनना हो तो कान लगाने पड़ते हैं और देखने के लिए आंखों से काम लेना पड़ता है। लेकिन समाज में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जहां इन तीनों के अभाव में काम लेना पड़ता है और वह है दिल से काम लेना।   कुछ लोगों की बातें दिल से ही समझ में...
     

  • January 7, 12:08
     
    संसार में रहते हुए कुछ व्यावहारिक नियम-कायदे और कानूनों का पालन करना पड़ता है। समाज में उसके संविधान के अनुसार जीना पड़ता है। यहां भावावेश से काम नहीं चलता। लेकिन अध्यात्म जगत में नियम बहुत बंधे हुए नहीं होते।   यहां का सारा मामला चलता है जागरूकता और होश से।...
     

  • January 5, 12:14
     
    सभी   अपनी संतानों को योग्य बनाना चाहते हैं। इसके लिए माता-पिता को बच्चों को रत्न की तरह तराशने की कला आनी चाहिए। आसपास के पत्थर हटाने आने चाहिए। खदान के पत्थर रत्न को छिपाए बैठे हैं। पत्थर हटे, रत्न निकला। लेकिन रत्न हाथ लग जाना ही काफी नहीं, उसकी कीमत तराशे जाने...
     

  • January 4, 01:17
     
    एक उम्र के बाद, एक ओहदे के बाद और एक दौर के बाद जीवन में इस बात की फिक्र छोड़ दें कि कोई आपका दुश्मन है। अपने विचारों को वहां से हटा लें, जहां हम सोचते हैं कि ऐसा करने से कोई मेरा शत्रु बन जाएगा।   शत्रु और शत्रुता का भाव खत्म होते ही मित्रता जन्म ले लेती है। अभी हमारे...
     

  • January 3, 12:41
     
    जैसे भौतिक दुनिया में हमें अपने शत्रुओं और प्रतिद्वंद्वियों का परिचय रहता है, उनसे खतरे का आभास होता है, उसी तरह आध्यात्मिक संसार में हमें दुर्गुणों से सावधान रहना होगा। जागरूक लोग दुगरुणों को प्रतिदिन मिटाते रहते हैं।   इनके सफाये के लिए वे लगातार सावधान रहते...
     

  • January 2, 01:40
     
    संसार में बाहर से पकड़ने की समझ आ जाए तो भी काम चल जाता है। यहां के रिश्ते भी ऊपरी होते हैं और वैसे ही निभाए जाते हैं। संसार में रहकर हम पूरी उम्र सतह पर गुजार सकते हैं। लेकिन यह तरीका परिवार में नहीं चलता।   गृहस्थी में तो गहराई ही उसकी सतह है। यहां जीवन अलग-अलग मिजाज...
     

  • December 31, 11:51
     
    नया वर्ष, नया समय, नए निर्णय, नए सपने और उन्हें पूरा करने के लिए नया उत्साह। इस एक तारीख के गर्भ में आने वाले तीन सौ चौसठ दिन की कहानियां छिपी हैं। इसलिए नए के उत्साह का मतलब केवल सक्रियता ही न समझी जाए।   यह पहली तारीख केवल दिमाग और शरीर को दौड़ाने में ही खर्च न कर दी...
     

  • December 31, 12:43
     
    समय जब बदलता है तो वह अपने साथ हमें एक घटना से दूसरी घटना में ले चलता है। हम पिछली और बदली घटनाओं में इतने रम जाते हैं कि समय को भूल ही जाते हैं।   हम जीवन में जो पाना चाहते हैं, उसमें स्वयं की और दूसरों की भूमिका पर ही ध्यान देते हैं। जबकि वक्त भी इसमें अपना पूरा दखल...
     

  • December 29, 12:38
     
    मानवीय संबंधों का जहां समर्पण, नियंत्रण, प्रदर्शन और परीक्षण होता है, उस कलापूर्ण क्षेत्र का नाम है गृहस्थी। यहां सुख मिलने के तयशुदा मापदंड नहीं हैं। पति-पत्नी दोनों के लिए सुख-साधन की समान स्थितियां हों, तो भी उनमें से एक दुखी, एक सुखी नजर आ सकता है। कोई नि:संतान है,...
     

  • December 28, 12:10
     
    मनुष्य के मन में निराशा और चिंताजनक लहरें उठना स्वाभाविक हैं। व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय अव्यवस्था के दृश्य कभी-कभी हताश कर जाते हैं। क्या होगा भविष्य में? क्या ऐसे ही चलता रहेगा? जैसे प्रश्न अच्छे-अच्छों को बीमार बना देते हैं। इस तरह का लगातार चिंतन...
     

  • December 26, 12:15
     
    सुख चाहने वाले लोगों को सुख के बारे में एक गहरी बात हृदय में उतारनी होगी। हम सुख को जितना चाहेंगे, सुख हमसे उतना दूर भागेगा। चाहत और सुख एक-दूसरे के विपरीत हैं। इसे पाने के प्रयास में ही हमने इसे अधिक खोया है। जो पहले से ही है, उसे हम पाने का प्रयास करते हैं, यह गलत है।  ...
     

  • December 25, 12:08
     
    हमें  इस बात के प्रति जागरूक रहना चाहिए कि हमारे पास कितनी स्मरणशक्ति है। विज्ञान ने शरीर को सुख-सुविधा व रक्षा भले ही दी है, लेकिन कुछ नैसर्गिक क्षमताओं को समाप्त भी कर दिया। साथ ही मनुष्य की चिंतन व स्मरण शक्ति भी कुंद कर दी।   सुंदरकांड में रावण इसी विज्ञान की...
     

  • December 24, 06:43
     
    किसी  भी जीवनशैली की सबसे ऊंची स्थिति है फकीराना अंदाज। हर धर्म के पास ऐसे फकीर-मिजाज लोग रहे हैं। बल्कि इस संत वृत्ति ने ही कुछ धर्मों को बचाकर रखा है। भारत ने इस प्रवृत्ति को सुंदर प्रबंधकीय तरीके से जोड़कर एक नाम दिया है, वह है संन्यास। तीन तरीके से यहां पहुंचा गया...
     
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