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जीने की राह
 
 
 
 

  • December 22, 12:45
     
    कुछ  काम अकेले हो ही नहीं सकते। सहयोगी की जरूरत पड़ती ही है। सहयोग जब महत्वपूर्ण हो जाए तो पार्टनरशिप शुरू हो जाती है। लोग व्यवसाय में भागीदारी इसलिए करते हैं कि योग्यता, परिश्रम व धन का बंटवारा एक-दूसरे को लाभ पहुंचा सके।   यह सारा मामला विश्वास पर टिका होता है।...
     

  • December 21, 12:09
     
    सक्षम व्यक्ति को भी संघर्ष करना पड़ता है। पहले सुनने में आता था कि संघर्ष का परिणाम सफलता है। परंतु अब तो लगता है कि ख्याति के बोनस में संघर्ष मिल जाता है।   छोटे का संघर्ष इस बात का है कि बड़ा कैसे बने। बड़े का संघर्ष इसलिए है कि बड़ा ही बना रहे। सफल, ख्यात और सक्षम...
     

  • December 20, 12:12
     
    अपना और पराया होना या मानना संसार की रीति है। रिश्तों और स्वार्थ के कारण यह भाव सभी में आ जाता है। आप किसी को कितना ही निकट ले आएं या स्वयं  को उसके बहुत करीब रख दें, फिर भी एक परायापन मौजूद रह ही जाता है। दूर से बहुत पास-पास दिखने वाले लोग भी कहीं न कहीं पराए से हैं।...
     

  • December 19, 01:06
     
    कई  लोग चलने से पहले थक जाते हैं, सोने से पहले सपने देखने लगते हैं, बोलने से पहले बोल जाते हैं और मारने से पहले ही मर जाते हैं।   जो पूरी तरह भौतिकता में जीते हैं, उनकी जिंदगी इसी प्रकार की हो जाती है। जबकि जिंदगी हर गतिविधि के साथ विश्राम की भी घोषणा करती है। एक...
     

  • December 18, 01:26
     
    जीवन  में कई महत्वपूर्ण शब्द हमें दूसरों से ही मिलते हैं। यदि इनके पीछे का अर्थ हम ठीक से पकड़ और समझ लें तो यह भविष्यवाणी की तरह साबित हो जाते हैं। कई बार तो इन शब्दों में जीवन-मृत्यु तक के संकेत होते हैं।   तुलसीदासजी मनोवैज्ञानिक ऋषि थे। सुंदरकांड में उन्होंने...
     

  • December 15, 12:58
     
    ईश्वर  जिन-जिन बातों को लेकर आश्चर्यचकित है, उनमें से एक है आदमी का भीतर और बाहर से अलग-अलग व्यक्तित्व का होना।   परमात्मा यह लगातार सोच रहा है कि मैंने इसे यह नहीं सिखाया था, पर यह इंसान कहां से सीख गया; मन, वचन और कर्म में भेद करना। इंसान सोचता कुछ और है, बोलता कुछ और...
     

  • December 14, 12:13
     
    नए  संसार में भौतिक उपलब्धियों के लिए जो संघर्ष करना पड़ता है, उसकी गति बहुत तेज होती है और बुद्धि के स्तर पर भ्रमपूर्ण स्थितियों के बैरियर आते रहते हैं।   महत्वाकांक्षी व्यक्ति अपने ध्यान को अनेक दिशाओं में दौड़ाता है। वह जीवन को खंड-खंड करके देखता है। इसमें एक...
     

  • December 13, 12:54
     
    मनुष्य  के भीतर का ‘मैं’ केवल अहंकार को प्रकट नहीं करता, लोभ को भी जाग़्रत करता है। ‘मैं’ जितना बलवान होता है, उतनी इस बात की इच्छा भी जाग जाती है कि संसार की बहुत सारी चीजें मुझे मिल जाएं।   संग्रह की भावना यहीं से शुरू होती है। ‘मैं’ को त्याग में रुचि नहीं...
     

  • December 11, 11:39
     
    परिवार  में रहने का एक सुंदर तरीका है या तो किसी के हो जाओ या किसी को अपना बना लो। ‘हम सब एक हैं’ यह हर परिवार का आदर्श वाक्य होना चाहिए और एक होने के लिए खुद को मिटना होता है।   आज कैलेंडर की तिथियों का एक अद्भुत संयोग है कि दिन, माह और वर्ष एक जैसे अंकों में दर्ज...
     

  • December 11, 05:44
     
    दुर्गुणों  का प्रमुख केंद्र मन होता है और यदि मन पर नियंत्रण पाना है तो सतत अभ्यास और वैराग्य जरूरी है। सुंदरकांड में जैसे-जसे रामजी लंका की ओर बढ़ते हैं, घटनाओं के अद्भुत संकेत आने लगते हैं। यह कांड दो भागों में बंटा है।   60 दोहों में से प्रथम 33 दोहों में हनुमानजी...
     

  • December 10, 04:49
     
    संसार  में रहना आना चाहिए बजाय संसार को छोडऩे की जिद के। अभी भी कुछ लोगों को यह गलतफहमी है कि परमात्मा को पाने के लिए संसार छोडऩा पड़ेगा।   स्वामी रामसुखदासजी कहा करते थे- जैसे कोई रसोई बनाता है, पर उसे रसोई बनानी नहीं आती, तो रसोई नहीं बनती। अगर उसे रसोई बनानी आती है,...
     

  • December 8, 12:12
     
    हम जब पूजा-पाठ करते हैं, किसी परमशक्ति से जुड़े होते हैं, तो भीतर से बिल्कुल साफ-सुथरे होने लगते हैं। जीवन को देखने की हमारी दृष्टि बदल जाती है, लेकिन जैसे ही हम अहंकार से जुड़ते हैं भीतर का साफ-सुथरापन खत्म हो जाता है। उसमें कई चीजों का मिश्रण होने लगता है।   हमारे...
     

  • December 7, 12:07
     
    इस वक्त हर क्षेत्र के बाजार में वस्तुओं की भरमार है। भरपूर सामग्रियां उपलब्ध हैं। ऐसा ही धर्म के क्षेत्र में भी हो गया है। साधु समाज में तो बाढ़ आ गई है। सुपात्र, पात्र और अपात्र का भेद करना मुश्किल हो गया है। भगवा वस्त्र को आवरण बना लिया गया है।   लगभग सभी धर्मो में...
     

  • December 6, 12:41
     
    सांसारिक जीवन में हम जो भी काम करते हैं, उसके पीछे एक बड़ी भावना रहती है कि सुख मिल जाए। हमारे भीतर की नैतिकता हमें सिखाती है कि जब स्वयं को सुख मिल जाए, तो फिर दूसरों को सुखी रखना आरंभ करें। कुछ समय तो हर मनुष्य इस नियम का पालन करता है, लेकिन सुख की चाहत इतनी प्रबल होने...
     

  • December 5, 12:06
     
    अपने आनंद को सबके बीच फैलाना भी एक कर्मयोग है। कर्मयोग के मामले में अध्यात्म एक संकेत करता है। जैसे ही आप कर्म से जुड़ते हैं, वह क्रिया आपको बाहर खींचती है और आप अपनी आत्मा के केंद्र से थोड़ा दूर जाने लगते हैं।   इसलिए जब भी कोई कर्म करें, अपने आप से जुड़े रहने का...
     
 
 
 
 
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