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जीने की राह
 
 
 
 

  • December 22, 12:06
     
    जीने की राह.. बुद्धिमान व्यक्ति जब ऊंचा उठता है, अपनी बुद्धि को परिष्कृत करता है, तब वह प्रज्ञावान कहलाता है। प्रज्ञा बुद्धि का परिष्कृत रूप है। लेकिन संसार में रहते हुए इन दोनों के बीच एक और स्थिति है, जिसे समझ कहा गया है। आध्यात्मिक भाषा में विवेक शब्द इसके आसपास है। बुद्धिमान व्यक्ति में समझ न हो तो वह एक ही भूल को बार-बार करता है, लेकिन यदि समझ है तो पहली बात यह होगी कि वह भूल ही...
     

  • December 21, 12:16
     
    जीने की राह.. जीवन में कुछ चीजें कभी खत्म नहीं होतीं, बल्कि नई-नई शक्लों में सामने आती रहती हैं। इनमें से एक है - समस्या। इसके छोटे-बड़े दो रूप होते हंै। दरअसल यदि आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो व्यक्ति की समझ, सहनशीलता के अनुसार समस्या छोटी या बड़ी होती है। किसी एक व्यक्ति के लिए जो समस्या जीवनभर का बोझ बने, वही समस्या दूसरे के लिए चुटकी में निपटाए जाने वाली हो सकती है। समस्याओं को...
     

  • December 20, 12:36
     
    जीने की राह.. परिवारों में आपसी तनाव का एक बड़ा कारण यह है कि सदस्य एक-दूसरे को उनके अधिकार का समय नहीं दे पा रहे हैं। पति-पत्नी के बीच मतभेद का मनोवैनिक कारण भी यही है कि ये दोनों जब एकांत में साथ में होते हैं, तब भी साथ नहीं होते। दोनों के बीच तन होता है, धन होता है और जन भी होते हैं यानी दूसरे लोग भी, लेकिन मन नहीं होता। दोनों साथ होते हैं, लेकिन दोनों के ही मन कहीं दूर भाग रहे होते हैं।...
     

  • December 19, 12:43
     
    जीने की राह.. दूसरों के रोजी-रोटी कमाने के साधनों को देखकर किसी के भी मन में प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक है। अपने जॉब से संतुष्टि न होना एक अंतरराष्ट्रीय कायदा-सा बन गया है। इसीलिए लोग दूसरे की कमाई के साधन पर नजर रखते हैं। उसे मिल रहा है तो हमें क्यों नहीं? यह दृश्य तब और दुखी करने वाला बन जाता है, जब लोगों की निगाह धर्म तंत्र से जुड़े हुए लोगों की आमदनी पर पड़ती है। हमारे देश में यह भी...
     

  • December 17, 12:25
     
    जीने की राह.. गलती हर इंसान से होती है। शायद ही किसी का दावा सच हो कि उसने कभी कोई गलती नहीं की। गलती के साथ दो बातें हैं, एक की जाती है जानते हुए भी और दूसरी हो जाती है। जानकर की हुई गलती लापरवाही है और अनजाने में हुई गलती एक भूल। दुनिया में समझदार बनने के जितने तरीके हैं, उनमें से एक है गलती करना। बड़े से बड़े समझदार गलती करके ही अक्लमंद बने हैं। हर गलती एक सबक है और दुबारा गलती न करना...
     

  • December 16, 12:37
     
    जीने की राह.. समय के साथ दो बातें हमेशा ध्यान रखी जाएं, उसका आना और जाना। आते हुए समय की चुनौती को समझा जाए और गुजरते हुए वक्त के नुकसान को पकड़ा जाए। भारतीय संस्कृति ने तो समय को भी काल रूप में देव माना है। उसमें प्राण जैसी अनुभूति दी है। समय को जीवनरूप में स्वीकार कर मान दिया है। आज का काम आज किया जाए, यह सिर्फ कहावत नहीं है, पूरा जीवन दर्शन है। कबीर ने अपनी एक पंक्ति में ‘पल में परलय’...
     

  • December 15, 12:23
     
    जीने की राह.. धन जीवन में आने पर जो भी चीजें लाता है, दो बातें जरूर कर जाता है। दौलत बाहर की भीड़ और भीतर का अकेलापन भी देती है। धनवान लोग अपने बाहरी जीवन में अकेले कम ही रहते हैं। धन कमाने के लिए दूसरे जरूर चाहिए। यही दृश्य खर्च के साथ भी है। अत्यधिक खर्च की वृत्ति भी अपने आसपास भीड़ बढ़ाने का ही कार्यक्रम है। रुपया-पैसा तीन बातों पर असर करता ही है। स्वास्थ्य, तृष्णा और दुगरुण। अधिक...
     

  • December 14, 12:09
     
    जीने की राह..हमें मनुष्य जीवन मिला है। यह मजबूरी नहीं, गौरव की बात है। बहुत सारे लोगों का जीवन बीत जाता है और वे अपने इंसान होने की गरिमा को स्पर्श ही नहीं कर पाते। उनकी क्रिया ही नहीं, विचार और वाणी भी नपुंसक रह जाते हैं। उनकी भूमिका स्थापित होना तो दूर, वे धरती पर बोझ ही रह जाते हैं। अभी ऐसा कोई राष्ट्रीय परिदृश्य नहीं है कि आपको सामान्य रूप से स्वयं का बलिदान देना पड़े, लेकिन कम-से-कम...
     

  • December 13, 12:07
     
    जीने की राह.. जरा-सी गलतफहमी जीवनभर के संबंधों को खराब कर देती है। लोगों के बीच संघर्षपूर्ण स्थिति में भी संबंध मधुर बने रहें, ऐसा प्रयास भी एक बड़ी सेवा है। कुछ लोग दूसरों के संबंधों में बिगाड़ लाने में ही रुचि रखते हैं। पीठ पीछे एक-दूसरे को एक-दूसरे की गलत जानकारी देकर यह काम आसानी से किया जाता है। दूसरों के संबंध सुधारने या मधुर बनाए रखने में हमारी भूमिका कैसी हो, यह हनुमानजी से...
     

  • December 12, 12:18
     
    किताबें विचार देती हैं। शास्त्र बनते ही किताबें विचार और सिद्धांत दोनों देती हैं, लेकिन बिना परीक्षण के सिद्धांत स्वीकार न किए जाएं। सिद्धांत व विरोधाभास एक सिक्के के दो पहलू हैं। विचार अपने साथ मतभेद लाते हैं। शास्त्रों में प्रमाणों के अर्थ देश, काल, परिस्थिति में बदल भी जाते हैं। केवल मान्यताओं के आधार पर उन्हें उपयोगी नहीं माना जा सकता। धर्म और शास्त्र का गहरा संबंध है।...
     

  • December 10, 12:06
     
    जीने की राह.. आजकल दोस्त मिलना मुश्किल हो गया है और मित्रता भी एक धंधा बन गई है। जिस उम्र में मित्र बनते हैं, वह उम्र पढ़ाई-लिखाई और कॅरियर के इतने दबाव में है कि हर संबंध बस लेन-देन का जरिया हो गया है। एक प्रयोग करें, बाहर की दुनिया में अगर दोस्त नहीं बन पा रहे हों और जो पुराने थे, वे वक्त के बही-खाते में जमाखर्च हो गए हों या सब अपनी-अपनी दुनिया में उलझ गए हों तो अब दोस्ती घर में की जाए।...
     

  • December 9, 12:34
     
    जीने की राह.. परमात्मा किस रूप में हैं, यह एक पुरानी बहस है। आदमी नास्तिक हो या आस्तिक, एक सीधा-सा जवाब है कि परमात्मा एक कायदा है, ईश्वर एक नियम है, भगवान एक अनुशासन है। जो इसके अनुसार चलेगा, उसे सत्परिणाम मिलेंगे और जो इसे तोड़ेगा, वो भुगतेगा भी। भगवान इतने व्यवस्थित हैं कि सही और गलत दोनों तरह के लोगों ने उनका भरपूर लाभ उठाया है। कुछ लोग भगवान की आड़ में उनके कंधे पर चढ़कर या उनको ही...
     

  • December 8, 12:49
     
    जीने की राह.. ललक, लालसा और तीव्र इच्छा होने में कोई बुराई नहीं है। कभी-कभी उद्देश्य की पूर्ति और लक्ष्य पर पहुंचने के लिए ये ऊर्जा का काम करते हैं। धन, पद और देह के लिए ये तीन चीजें पीछे रहती हैं। खतरा तब शुरू होता है, जब ये बदलकर तृष्णा का रूप ले लेती हैं। तृष्णा का सीधा अर्थ है अकारण और अनुचित भूख तथा उसकी पूर्ति के लिए भीतर से अशांत हो जाना। लगन हो, लालसा हो, फिर धन कमाया जाए तो कोई...
     

  • December 7, 12:38
     
    जीने की राह.. अपनी जिंदगी के मालिक हम खुद हैं, लेकिन ज्यादातर मौकों पर हम दूसरों से संचालित होते हैं। बहुत अधिक चिंता इस बात की न की जाए कि लोग हमारे बारे में क्या कह रहे हैं, लेकिन परिवार और समाज के जो सामान्य नियम हैं, हम उनका भी उल्लंघन न कर जाएं। दूसरों की परवाह न की जाए, इसका यह अर्थ नहीं है कि हम स्वच्छंद और स्वेच्छाचारी हो जाएं। जिस समय हम अपने भीतरी होश में जीते हैं, उस समय हम समझ...
     

  • December 6, 12:40
     
    जीने की राह.. इस समय हमारे परिवारों में जो-जो चीजें बदली हैं, उनमें से एक बातचीत के केंद्र भी बदल गए। निकट से निकट के लोग भी काम पूर्ति की बात करते हैं। अगर बातचीत थोड़ी लंबी हो जाए तो झगड़ा शुरू हो जाता है। सब अपनी-अपनी हांकना चाहते हैं, कोई दूसरे को सुनने को तैयार ही नहीं हैं। बोलना भी एक कला है। चूंकि हम लगातार दिन भर बोलते हैं, इसलिए भूल ही जाते हैं कि कैसे बोला जाए। वाणी परिवारों...
     
 
 
 
 
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