Home >> Abhivyakti >> Jeevan Darshan
  • किसी नगर के युवा संतुलित भोजन को लेकर अत्यंत जागरूक हो गए। इस विषय पर वहां सभाएं होने लगी, गोष्ठियां बुलाई जाने लगीं। एक सभा में आहार पर अनेक लोगों ने भिन्न-भिन्न मत व्यक्त किए। एक युवक ने कहा, साबूत अनाज, फल और बीजों के साथ सम्यक आहार है। एक लड़की बोली, सब्जियां और फल एक-दूसरे के साथ मेल नहीं खाते। दूसरे युवक ने राय दी, दस दिन में एक दिन उपवास रखने से शरीर स्वस्थ रहता है। सभी की बातों में कुछ न कुछ सत्यता थी, लेकिन कोई किसी से सहमत नहीं था। तभी एक ज्ञानी पुरुष उस नगर में आए। संतुलित भोजन के विषय में उनकी...
    August 29, 07:38 AM
  • एक संत थे। उनकी मीठी व सरल वाणी सुनने वाले के हृदय में सीधे उतर जाती थी। भौतिकता से दूर संत के पास आकर लोगों को बहुत सुकून महसूस होता था। सायंकाल उनकी कुटिया के सामने के मैदान में बड़ी भीड़ उनकी प्रतीक्षा कर रही होती थी। उनके अमृत वचनों को हर कोई सुनना चाहता था। उन्हें प्रवचन हेतु बुलाया जाता। संत तो सहज थे, जो बुलाता उसके यहां चले जाते। एक बार किसी संपन्न व्यक्ति ने संत को प्रवचन हेतु अपने घर बुलाया। वह स्वयं कार लेकर संत को लेने आया। संत उसके साथ चल दिए। राह में कार चालक ने अचानक तेज हॉर्न बजाया...
    August 28, 07:14 AM
  • जब श्रीराम को कैकयी के कहने पर राजा दशरथ ने चौदह वर्ष का वनवास दिया तो सीता माता के साथ लक्ष्मण भी उनके साथ चलने को तैयार हो गए। प्रभु श्रीराम ने उन्हें मना किया, किंतु लक्ष्मण का तर्क था कि भाई की सेवा किए बिना वे नहीं रह सकते। अंतत: उनकी जिद के समक्ष श्रीराम को झुकना पड़ा और वे लक्ष्मण व सीताजी को लेकर वन में गए। कुटिया में जब भी श्रीराम सोते तो लक्ष्मण जागकर पहरेदारी करते। रात्रिकाल सभी के लिए शयनकाल होता है, किंतु लक्ष्मण श्रीराम व सीता माता की सतर्क रक्षक के रूप में सेवा करते थे। नींद को अपने...
    August 27, 06:16 AM
  • मध्य भारत में एक महात्मा रहते थे। जीवन का कोई भी पहलू उनके ज्ञान व अनुभव की गहराई से अछूता नहीं रहता था, इसलिए उनसे शिक्षा प्राप्त करने वाला लगभग हर दृष्टि से परिपूर्ण रहता था। एक दिन महात्मा ने अपने शिष्यों को नगर भ्रमण पर चलने के लिए कहा। शिष्य सहज ही तैयार हो गए, क्योंकि वे जानते थे कि कुछ सीखने को जरूर मिलेगा। भ्रमण पर निकले गुरु-शिष्यों ने राह में निर्माणाधीन मंदिर देखा। उस दिन वहां तीन मजदूर बाहर कार्य कर रहे थे, शेष मजदूर अंदर थे। महात्मा ने उनमें से एक मजदूर से पूछा, क्यों भाई! क्या कर रहे...
    August 26, 07:28 AM
  • एक आध्यात्मिक गुरु थे, जिनके कई सांसारिक अनुयायी थे। वे प्राय: अपनी तकलीफों-कष्टों का रोना रोते। हमेशा पड़ोसियों की तकलीफों को कम बताते और कहते कि उनके ही हिस्से में ज्यादा कष्ट क्यों आए हैं? अगर पड़ोसी जैसी तकलीफें उन्हें होतीं तो वे हंसते-हंसते सह लेते। गुरुजी ये शिकायतें सुन-सुनकर तंग आ गए थे। एक दिन उन्होंने सारे अनुयायियों को बुलाया और मौसंबी के छोटे कद के पेड़ के अास-पास इकट्ठा किया। उन्होंने सभी को पेंसिल, लिफाफा और कोरा कागज दिया। उन्होंने कहा कि सब अपनी तकलीफें, अपने कष्ट कागज पर लिखकर...
    August 25, 06:49 AM
  • महाभारत युद्ध शुरू होने के पहले अचानक युधिष्ठिर ने मुकुट-कवच उतारा, फिर अस्त्र-शस्त्र त्यागकर नंगे पैरों कौरव सेना की ओर चले गए। कौरवों को लगा कि युधिष्ठिर उनकी विशाल सेना से भयभीत होकर समर्पण कर रहे हैं। सबसे पहले वे द्रोणाचार्य के पास पहुंचे आैर चरणों में सिर रखकर बोले, गुरुदेव, प्रणाम! आप ही के विरुद्ध युद्ध की अनुमति चाहता हूं। अपने शिष्य का विनय भाव देखकर द्रोणाचार्य ने प्रसन्न होकर कहा, मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। तुम्हारी विजय हो। मैं तुम्हें अपनी पराजय का उपाय स्वयं बताता हूं।...
    August 23, 07:33 AM
  • निर्धनता से तंग आकर किसी गरीब ब्राह्मण ने भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए कठोर व्रत किया। शंकरजी ने उसे स्वप्न में दर्शन देकर कहा, वृंदावन में सनातन गोस्वामी के पास जाकर उनसे पारस पत्थर मांगो, उससे तुम्हारी निर्धनता दूर हो जाएगी। जब वह सनातन गोस्वामी से मिला तो उसे पारस पत्थर उनके पास होने पर शंका हुई, क्योंकि, उनके तन पर मात्र एक जीर्ण धोती और दुपट्टा था। फिर भी उसने गोस्वामीजी को अपनी निर्धनता के बारे में बताते हुए पारस पत्थर मांगा। गोस्वामीजी बोले, एक दिन जब मैं यमुना में स्नान कर लौट रहा...
    August 22, 07:06 AM
  • एक युवक ने स्वामी विवेकानंद से गीता का ज्ञान कराने का निवेदन किया। स्वामीजी ने कहा,पहले छह माह फुटबॉल खेलो। क्षमता के अनुसार निर्धनों और लाचारों की मदद करो। फिर मेरे पास आना, मैं तुम्हें गीता-ज्ञान दूंगा। युवक काे लगा कि स्वामीजी उसे टाल रहेे हैं। उसने स्वामीजी से पूछा, गीता धार्मिक ग्रंथ है, उसे सीखने के लिए यह सब क्यों जरूरी है? स्वामीजी ने कहा, गीता वीरजनों और त्यागी व्यक्तियों का महाग्रंथ है, इसलिए जो वीरत्व और सेवाभाव से भरा होगा, वही गीता के गूढ़ श्लोकों का रहस्य समझ पाएगा। युवक ने गीता...
    August 21, 07:20 AM
  • ब्रिटिश लेखक मार्क रदरफोर्ड ने अपने बचपन की घटना लिखते हुए बताया था कि संकटपूर्ण स्थिति में व्यक्ति की सोच और व्यवहार कैसा होना चाहिए? वस्तुत: उन्होंने स्वयं के उदाहरण से आदर्श उपस्थित किया। जब रदरफोर्ड 13-14 वर्ष के थे तो उन्हें तैरने का बहुत शौक था। वे कई बार नदी में तैरकर अपना शौक पूरा करते थे। एक दिन वे समुद्र के किनारे बैठे हुए थे। दूर समुद्र में एक जहाज लंगर डाले खड़ा था। न जाने क्यों रदरफोर्ड के मन में यह इच्छा हुई कि जहाज तक तैरकर जाएं। चूंकि रदरफोर्ड तैरना जानते थे, अत: अपनी इच्छा पूर्ण करने...
    August 20, 06:59 AM
  • एक संत अपने पास आने वाले हर व्यक्ति को परिजन मानकर व्यवहार करते थे। सुबह तीन घंटे वे मौन रहते थे और इस दौरान कोई लोकोपकारी कार्य करते थे। समीप के नगर का सेठ के सामने जब किसी ने संत की बहुत प्रशंसा की तो वह उनके दर्शन करने आया। उसने सोचा, मैंने बहुत समय माया में व्यतीत कर दिया, अब संत कृपा से कुछ भक्ति भी कर लेनी चाहिए। नगर सेठ घोड़े पर बैठकर संत के आश्रम की ओर चला। राह में उसे एक व्यक्ति दिखा, जो मार्ग में उग आईं बेतरतीब झाड़ियां काट रहा था। सेठ ने उससे पूछा कि संत की कुटिया किधर है? उस व्यक्ति ने संकेत से...
    August 19, 07:31 AM
  • अयोध्या में हनुमान निरंतर श्रीराम की सेवा में रहते थे। यह देखकर भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न ने माता सीता से इसकी शिकायत की, क्योंकि वे भी बड़े भाई की सेवा करना चाहते थे। उनकी अनुमति से समस्त सेवाओं की एक सूची बनाकर जिम्मेदारी तय कर दी गई। जब हनुमानजी प्रात: सरयू में स्नान करने गए तो तीनों भाइयों ने श्रीराम के समक्ष यह सूची रखी। श्रीराम ने देखा कि सूची में हनुमान का नाम नहीं है। वे माजरा समझ गए और मुस्कराते हुए सूची पर स्वीकृति के हस्ताक्षर कर दिए। स्नान करके जब हनुमान प्रभु की सेवा करने चले तो...
    August 18, 07:06 AM
  • किसी शहर में एक व्यापारी ने अपने व्यापार को परिश्रम से खूब बढ़ाया, लेकिन उसे अपनी सफलता पर खूब अहंकार था। वह कटु वाणी बोलता और स्वयं के आगे किसी को कुछ नहीं समझता। वह प्राय: लोगों की परिस्थिित सुने-समझे बगैर उनके विषय में गलत सोच बना लेता और अनर्गल कह बैठता। उसकी बुद्धमति पत्नी ने अनेक बार उसे समझाने का प्रयत्न किया, किंतु व्यापारी का अहंकार चरम पर था, इसलिए उसमें कोई सुधार नहीं आया। उसी दौरान व्यापारी के पड़ोस में एक परिवार रहने आया। उस परिवार में पति-पत्नी और उनकी बेटी थी। परिवार शांत मिजाज था।...
    August 14, 05:01 AM
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