जीवन दर्शन
Home >> Abhivyakti >> Jeevan Darshan
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व तब की मैसूर रियासत में एक बड़े संत का आश्रम था। वे बड़ा ही सहज जीवन जीते थे। उनके प्रवचन बड़े सारगर्भित होते और उनमें इशारों-इशारों में जीवनोपयोगी मूल्यवान बातें बताई गई होती थीं। वे विचार व कर्म में एकता की अनुपम मिसाल थे, क्योंकि उनके विचारों व प्रवचन की सादगी उनके जीवन में भी देखी जा सकती थी। सुबह तड़के जाग जाते और स्नान करते। थोड़ी दोपहर ढलने पर प्रवचन देते। लोगों का मार्गदर्शन करते। शाम होने पर मंदिर में डूबकर प्रार्थना करते। जब उनकी उमर ढलने लगी तो शरीर की...
    07:04 AM
  • पंडित जवाहरलाल नेहरू जब प्रधानमंत्री थे, तब की घटना है। एक बार वे कुंभ मेले में गए। स्वाभाविक रूप से मेले में भारी भीड़ थी। उनके आने की खबर पहले ही फैल जाने के कारण भीड़ अौर बढ़ गई थी। उनकी लोकप्रियता ही ऐसी थी। पंडित नेहरू की कार इस अपार जनसमूह के मध्य धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। जब लोगाें ने देखा कि उनके प्रिय प्रधानमंत्री मेले में आए हैं, तो उन्होंने प्रसन्न होकर पंडित नेहरू की जय के नारे लगाने शुरू कर दिए। सभी के मन में पंडित नेहरू को पास से देखने और उनसे मिलकर हाथ मिलाने की ललक थी। नेहरू भी सभी का हाथ...
    October 29, 06:49 AM
  • स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों की बात है। कैम्बलपुर में आयोजित सभा में पंडित मदनमोहन मालवीय जैसे ही बोलने के लिए उठे, श्रोताओं में से एक बुजुर्ग मुस्लिम सज्जन ने खड़े होकर कहा, मालवीय साहब! क्या आप एक मुसलमान भाई की दरख्वास्त कबूल करेंगे? मालवीयजी बोले, जी, बिल्कुल, फरमाइए। बुजुर्ग सज्जन ने कहा, तो फिर एक मुसलमान भाई अर्ज करता है कि आप यहां तकरीर न करें। उनकी बात सुनते ही सभा में सन्नाटा खिंच गया, किंतु मालवीयजी ने अत्यंत सहजता से कहा, भाइयो! आज मैं आपकी खिदमत में बहुत जरूरी बात करने आया था, किंतु हमारे...
    October 28, 06:36 AM
  • विख्यात क्रांतिकारी भगतसिंह अपनी दयालुता के कारण भी जाने जाते हैं। निर्धनों के प्रति उनके हृदय में अपार दया थी और यदि कोई गरीब मदद के लिए उनके पास आता तो वे मदद करने का यह मौका कभई नहीं छोड़ते थे। उन्होंने स्वयं भी गरीबी को भोगा था, इसलिए अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार आने के बाद वे गरीबों की मदद करने लगे। भगतसिंह के परिवार के पास कुछ खेत थे। उनमें काम करने वाले मजदूर निर्धन थे। भगतसिंह उनसे मालिक-नौकर वाला व्यवहार नहीं रखते थे। उनके साथ बराबरी का व्यवहार करते और उनके संकट की घड़ी में उनके साथ कंधे...
    October 27, 05:55 AM
  • ब्रह्मपुर के पास गांव में मुन्नासिंह बादशाह रहते थे। वे गृहस्थ थे, किंतु आचरण संत जैसा था। सभी से प्रेम करते और अपने में मग्न रहते। परिवार का पेट पालने के लिए खेत में पसीना बहाते और जो रुखी-सूखी मिलती वह खा लेते। उनके घर यदि अतिथि आ जाता तो अपने हिस्से का भोजन भी उसे खिला देते। संगीत में गहरी रुचि के चलते उनके घर में प्राय: भजनों का आयोजन होता था। संगीत रसिक उनके घर पर जुट जाते थे। एक बार रानीसागर की वेश्या ने उन्हें भजन सुनाने के लिए आमंत्रित किया। मुन्नासिंह इतने पवित्र हृदय सहज इंसान थे कि...
    October 25, 06:49 AM
  • युक्तेश्वर गिरि के शिष्य थे योगानंद। अपने गुरु से आशीर्वाद लेकर वे अमेरिका में आयोजित धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए द सिटी ऑफ स्पार्टा जहाज में बैठे। सहयाित्रयों को उनकी यात्रा का उद्देश्य पता लगा तो उन्होंने उनसे व्याख्यान देने का आग्रह किया, ताकि उनके ज्ञानयुक्त विचारों से वे लाभान्वित हो सकें। योगानंद ने अपने विचारों को अंग्रेजी में व्याख्यान देने के लिए एक कड़ी में पिरोने का प्रयास किया, क्योंकि सभी श्रोता अंग्रेजी ही जानते थे, लेकिन न जाने क्यों वे विचारों को अंग्रेजी में सुसंगत...
    October 23, 06:16 AM
  • पंडित जवाहरलाल नेहरू पर्यावरण के प्रति अत्यंत जागरूक थे। उनकी दृष्टि में पेड़-पौधे संवेदनशीलता में मानव से कम नहीं होते। उन्हें भी हर्ष और विषाद होता है। फिर सबसे ऊपर तो यह कि वे हमें प्राणवायु देते हैं। हमारा जीवन उन्हीं पर निर्भर होता है, इसलिए उनकी रक्षा करना हमारा परम दाियत्व है। नेहरू ने अपने घर के उद्यान के लिए माली रखा था, किंतु वे स्वयं भी व्यक्तिगत रुचि लेकर उद्यान व्यवस्थित रखते थे। एक दिन नेहरू उद्यान में टहल रहे थे। तभी उन्हें कुल्हाड़ी चलने की आवाज सुनाई दी। उन्होंने पाया कि माली...
    October 22, 06:52 AM
  • मकर संक्रांति का अवसर था। सनातन धर्म महासभा का सम्मेलन होने वाला था। पंडित मदनमोहन मालवीय को व्याख्यान हेतु आमंत्रित किया गया था। हजारों लोग सम्मेलन स्थल पर इकट्ठा हो गए थे। महामना मालवीयजी की ओजभरी वाणी का आकर्षण सभी को था और व्याख्यान देने की उनकी शैली भी बहुत आकर्षक थी। जनता उन्हें हार्दिक श्रद्धा के साथ सुनती थी। पंडितजी िनयत समय पर सम्मेलन में आए और अपना व्याख्यान देना आरंभ किया। इस सम्मेलन के आयोजन में बाधाएं खड़ी कर इसे असफल करने की इच्छा रखने वाले कुछ शरारती तत्व भी वहां मौजूद थे।...
    October 21, 06:06 AM
  • बरसों पहले की बात है। लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों की कुछ मांगें थीं, जो लंबे समय से विश्वविद्यालय प्रशासन के पास लंबित थीं। धीरे-धीरे छात्रों में असंतोष पनपने लगा। वे चाहते थे कि उनकी मांगों पर शीघ्रातिशीघ्र विचार कर फैसला लिया जाए। एक दिन विश्वविद्यालय के भीतर कांग्रेस के मंत्रियों एवं अन्य प्रतििष्ठत हस्तियों की बैठक चल रही थी। जब छात्रों को यह मालूम पड़ा तो वे एकमत होकर विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर धरना देकर बैठ गए। उन्होंने जोर-जोर से सरकार के विरुद्ध नारे लगाने शुरू कर दिए। छात्र...
    October 20, 06:43 AM
  • वीर सावरकर को राजद्रोह के आरोप में दो आजन्म कारावासों की सजा सुनाई गई थी। अंडमान जेल में उन्हें सवेरे उठते ही कोल्हू चलाना पड़ता। कोल्हू में नारियल की गरी पड़ते ही वह इतना भारी चलता कि बलिष्ठ शरीर के बंदी भी उसकी 20 फेरियां करके रोने लगते थे। कोल्हू के डंडे को हाथ से उठाकर आधे रास्ते तक चला जाता और उसके बाद का आधा गोला पूरा करने के लिए डंडे पर लटकना पड़ता, क्योंकि तब तक हाथों की शक्ति समाप्त हो चुकी होती थी। जब कोल्हू में काम करते हुए सावरकर प्यास के मारे बेहाल हो जाते, तो उन्हें पानी नहीं दिया जाता और...
    October 18, 07:21 AM
  • विद्यालय में इतिहास की कक्षा चल रही थी। अध्यापक बच्चों को पाठ लिखा रहे थेे, किंतु एक छात्र चुपचाप बैठा हुआ था और लिख नहीं रहा था। थोड़ी देर बाद अध्यापक ने बोलते-बोलते पूरी कक्षा पर निगाह डाली, तो उन्हें उस छात्र पर शंका हुई। उन्होंने पास जाकर देखा तो पाया कि वास्तव में उसने अपनी कॉपी पर कुछ भी नहीं लिखा था। अध्यापक को क्रोध आ गया। उन्होंने उससे न लिखने का कारण पूछा तो वह बोला, गुरुजी! आपने जो कुछ भी लिखाया है, वह मुझे अक्षरश: याद है, इसलिए मैं नहीं लिख रहा हूं। जवाब सुनकर अध्यापक का क्रोध और बढ़ गया।...
    October 17, 07:34 AM
  • घटना उन दिनों की है, जब बगदाद में खलीफा उमर का शासन था। वे अपनी प्रजा के सच्चे अर्थों में संरक्षक थे। उनके राज में कभी प्रजा अत्याचार का शिकार नहीं हुई। खलीफा नेकदिल और इंसाफ पसंद व्यक्ति थे। नियमों का पालन उनकी प्रजा से लेकर हर खास अधिकारी तक होता था। वे स्वयं भी नियमों के पाबंद थे। अनुशासनप्रियता उनके स्वभाव में थी। एक बार उन्हें शिकायत मिली कि राज्य में शराबियों का उत्पात बढ़ रहा है। खलीफा नैतिक मूल्यों को लेकर भी अत्यंत सजग थे। उन्होंने अपने राज्य के शराबियों की शराब की लत छुड़ाने के लिए...
    October 16, 05:46 AM
विज्ञापन
 
 

बड़ी खबरें

 
 

रोचक खबरें

 

बॉलीवुड

 
 

जीवन मंत्र

 
 

स्पोर्ट्स

 

बिज़नेस

 

जोक्स

 

पसंदीदा खबरें