राजा नमि राजर्षि हो गए थे। उनकी इच्छा थी कि राजपाट छोड़कर योग-साधना में लीन हो जाएं। उनकी यह इच्छा जानकर एक देवदूत उनके पास आया और उन्हें राजा के कर्तव्यों का हवाला देकर कहने लगा- हे राजन, तुम्हें अपने महल की रक्षा के लिए मजबूत दरवाजे, बुर्ज, खाई और तोपखाना आदि बनाकर ही साधु होना चाहिए।
यह सुनकर नमि राजर्षि बोले - हे देवपुरुष, मैंने एक नगर बनाया है। उसके चारों ओर श्रद्धा, तप और संयम की दीवार बनाई है। रक्षा के लिए मन, वचन और काया की एकरूपता की खाई भी बनाई है। अत: संसार के दोष छल-कपट, काम, क्रोध, माया, मोह और लोभ भी मेरी बनाई खाइयों को लांघकर मेरी आत्मा में प्रविष्ट नहीं हो सकते।...