जीवन दर्शन

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  • हमारे मनोरथों की पूर्ति का सूत्र
    जन्म-मृत्यु को फकीरों ने रोग कहा है। परमात्मा का यशगान इस बीमारी की दवा है। दरअसल, मनुष्य के जीवन में रोग तब आता है जब वह शरीर का दुरुपयोग करता है। जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु होगी ही, लेकिन ठीक से नहीं समझ पाने के कारण ये दोनों बातें रोग की तरह जीवन में उतर जाती हैं। किष्किंधा कांड के समापन में एक दोहा है- भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिंजे नर अरु नारि। तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि।। श्री रघुवीर का यश भवरूपी रोग (जन्म-मरण) की अचूक दवा है। जो पुरुष-स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिरा के शत्रु...
    December 13, 03:16 AM