जीवन दर्शन.
विकास और प्रगति जैसे शब्द जब व्यावसायिक जीवन से जुड़ते हैं, तो इनमें एक लक्ष्य निर्धारित होता है। जब ये आध्यात्मिक जीवन से जुड़ते हैं, तो इनमें अंत नहीं होता, आरंभ और चलना ही होता है। आजकल प्रोफेशनल लाइफ में भी यही समझाया जा रहा है कि लक्ष्य पर पहुंचकर अंत नहीं मानें।
हर दिन लक्ष्य नए गढ़ना पड़ेंगे, इसलिए रुकें नहीं, चलते रहें। व्यावसायिक जीवन में एक बड़ी रुकावट है...