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जीवन दर्शन

सेवा के लिए संपूर्ण समर्पण जरूरी

यूरोप  के किसी द्वीप पर एक समय कोढ़ का रोग फैल गया था। वह द्वीप ‘कोढ़ियों के द्वीप’ के नाम से जाना जाने लगा था। स्वस्थ लोग वहां जाते ही नहीं थे, क्योंकि यह रोग संक्रामक माना जाता है। नतीजतन कोढ़ियों की स्थिति बहुत दयनीय हो गई थी। वे लोग जैसे-तैसे अपने दिन गुजार रहे थे। उनकी इस दुर्दशा को जब एक दयालु पादरी ने देखा, तो वह उनके बीच रहकर उनकी सेवा करने चला आया।     उसने अपनी दिनचर्या में कोढ़ियों से संबंधित सभी कार्य शामिल कर लिए। वह उनके घाव धोता, दवा लगाता, नहलाता, खाना खिलाता। कोढ़ियों के आत्मिक बल को बढ़ाने के लिए वह उन्हें धार्मिक पुस्तकें पढ़कर सुनाता। कोढ़ियों के...
 

युवती को बुद्ध ने दिखाई राह

एक  दिन भगवान बुद्ध का प्रिय शिष्य आनंद भिक्षाटन हेतु नगर पहुंचा। वहां किसी नदी पर पानी पीने के लिए रुका, तो देखा...

पिता की मदद पुत्र के काम आई

पंडित   रामप्रसाद निर्धन थे, किंतु अतिथि-सत्कार में बहुत अव्वल थे। पंडितजी जो भी कमाते, स्वयं पर कम खर्च करते और...
 
 
 

नींव के पत्थरों का सम्मान कीजिए

एक   बादशाह का सपना था कि वह एक भव्य मंदिर का निर्माण कराए। उसने अपने मंत्रियों के सहयोग से दक्ष कारीगरों को...

राजा के जीवन की दिशा बदल गई

किसी   राज्य में एक महिला संत थीं गौरीबाई। वे गांव के एक मंदिर में रहती थीं। उनका जीवन-लक्ष्य था- जनहित के काम...
 
 

और खबरें

 
 
 

  • May 17, 08:20
     
    उन   दिनों कानपुर में प्लेग फैला हुआ था। जिस घर में एक भी सदस्य प्लेगग्रस्त होता, समाज उसका बहिष्कार कर देता, क्योंकि लोग उसे संक्रामक रोग मानते थे। यहां तक कि परिवार के लोग ही अपने परिजन को त्यागने लगे। स्थिति यह हो गई थी कि प्लेग से मरने वालों का अंतिम संस्कार करने...
     

  • May 16, 09:04
     
    जापान  के एक युवक कागावा के मन में बचपन से ही दीन-दुखियों के प्रति बहुत संवेदना थी। उसने यह तय कर लिया था कि बड़ा होकर वह समाजसेवा करेगा। जब पढ़ाई समाप्त हो गई तो उसने अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य पीड़ितों की सेवा को माना। वह अशक्त, बूढ़े, बीमार, पिछड़े या रोगग्रस्त...
     

  • May 15, 08:57
     
    एक  समय की बात है कोई बुजुर्ग अपने समय का ख्यातनाम योद्धा था। वह किसी भी मुकाबले में पराजित नहीं हुआ था। उसने लड़कों को युद्ध कला की शिक्षा देना शुरू किया। वह उन्हें युद्ध कला में पूर्ण पारंगत करना चाहता था। उन्हीं दिनों एक युवा योद्धा काफी लोकप्रिय था। बेहतर से...
     

  • May 13, 07:02
     
    अमेरिका   में किसी समय दास प्रथा का प्रचलन था। नीग्रो जाति के लोग भेड़-बकरियों की तरह खरीदे व बेचे जाते थे। उनका जीवन मालिक की इच्छा व आदेश से संचालित होता था। अन्य अनेक लोगों के साथ अब्राहम लिंकन के प्रयासों से अमेरिका में दास प्रथा का अंत हुआ और नीग्रो जाति मुक्त...
     

  • May 11, 08:26
     
    द्वितीय विश्वयुद्ध की बात है। जर्मनी ने बेल्जियम को पराजित कर दिया था। इसके बाद जर्मन सैनिकों ने बेल्जियम के सैनिकों के साथ अत्यंत क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया। यह सब देखकर बेल्जियम के लोगों में जर्मनों के प्रति घोर घृणा का भाव आ गया। बेल्जियम की प्रसिद्ध समाजसेविका...
     

  • May 10, 07:54
     
    गांधीजी ने 1921 में अंग्रेजों के विरुद्ध ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ चलाया। अंग्रेजों और उनकी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया। आंदोलन देश भर में फैल गया था। बनारस की घटना है। आंदोलन से विद्यार्थी भी अछूते न रहे। एक दिन बनारस में कुछ विद्यार्थी ‘भारत माता की जय’ का नारा...
     

  • May 9, 07:27
     
    जातक कथाओं में इस कथा का उल्लेख है। एक ग्वाला प्रतिदिन अपनी गायों को चराने के लिए जंगल ले जाता था। उस झुंड में से एक गर्भवती गाय जंगल में ही छूट गई। अगले दिन जब ग्वाले ने उसे जंगल में खोजा, तो वह नहीं मिली। वास्तव में वह गाय एक शेरनी की मांद में रुक गई थी। शेरनी भी गर्भवती...
     

  • May 8, 07:49
     
    काफी समय पहले की बात है। किसी नगर में दो मित्र रहते थे। नाम थे- विजय और मोहन। व्यापार भी दोनों मिलकर करते थे। दोनों के परिवारों के मध्य काफी स्नेह था। दुर्भाग्य से व्यापार के संबंध में किसी बात को लेकर दोनों में विवाद हो गया। मोहन ने आपे से बाहर होते हुए कहा- ‘गधे के...
     

  • May 7, 12:06
     
    ऋषि उद्दालक ने विश्वजीत यज्ञ किया। यज्ञोपरांत दान देने की परंपरा है। उद्दालक ने ऋत्विजों को गायें दान में दीं और जिसने जो भी मांगा, उन्होंने वह दिया। उनके पास पुत्र नचिकेता भी बैठा हुआ था।   उसने देखा कि दान में वे वृद्ध गायें भी दी जा रही थीं, जिन्होंने दूध देना बंद...
     
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