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जीवन दर्शन
 
 
 
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  • October 14, 12:15
     
    जीवन दर्शन.. बात उस समय की है, जब आजादी की जंग जोर पकड़ रही थी। एक बालक अपने घर से दूर एक शहर के छात्रावास में रहकर पढ़ाई कर रहा था। उसके माता-पिता अत्यंत निर्धन थे। घर की आमदनी से अधिक खाने वालों की संख्या थी। फिर भी बच्चे की पढ़ाई की ललक को देखते हुए माता-पिता जैसे-तैसे उसे 8 रुपए फीस व अन्य खर्चो के लिए भेज देते हैं। बालक घर की दयनीय आर्थिक स्थिति से परिचित था। वह अपने पैरों पर खड़ा...
     

  • October 13, 12:19
     
    एक बार गोरक्षण सभा के एक प्रचारक आर्थिक अनुदान हेतु स्वामी विवेकानंद के पास आए। स्वामीजी ने प्रचारक से पूछा - आप लोगों की सभा का उद्देश्य क्या है? प्रचारक महोदय बोले - हम देश की गोमाताओं को कसाइयों से बचाते हैं। हमने देश के अनेक स्थानों पर गोशालाएं स्थापित की हैं। जहां दुर्बल, रोगग्रस्त गायों का पालन-पोषण किया जाता है। स्वामीजी ने पूछा - सभा की आय कैसे होती है? प्रचारक ने कहा -...
     

  • October 12, 12:12
     
    गौतम बुद्ध संन्यास ग्रहण कर चुके थे और उन्होंने अपना जीवन दूसरों की सेवा तथा जनकल्याण को समर्पित कर दिया था। गौतम बुद्ध अनेक स्थानों की यात्रा करते और अपने अनमोल उपदेशों से लोगों का नैतिक जीवन सुधारने का प्रयास करते। बुद्ध अनेक कथाओं और उदाहरणों के माध्यम से अपनी बात जनता के समक्ष रखते, जो सीधे उसके हृदय में उतर जाती। स्वयं अपना जीवन भी गौतम बुद्ध ने इतना आदर्श बना लिया था कि...
     

  • October 11, 12:08
     
    घटना उस समय की है, जब रंगून में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में भर्ती के लिए लोगों की लंबी कतार लगी थी। हर कोई चाहता था कि नेताजी की फौज में शामिल होकर उनके साथ देशहित में कार्य करे। नेताजी का व्यक्तित्व और कार्य शैली थी ही इतनी आकर्षक और जबर्दस्त। नेताजी सुभाषचंद्र ने इस अपार जनसमूह को भारत की आजादी के आंदोलन से जुड़ने की प्रेरणा देता उद्बोधन मंच से दिया। जनता ने बड़े...
     

  • October 10, 12:09
     
    काफी समय पहले की बात है। एक बालक अत्यंत ज्ञानी और संस्कारित था। वह सदा दूसरों को अच्छी शिक्षा देता और स्वयं भी वैसा ही आचरण करता था। उसे कभी भी किसी ने किसी से विवाद करते नहीं देखा और वह व्यर्थ बातों में कभी अपना समय नष्ट नहीं करता था। या तो वह बालक अध्ययन और चिंतन-मनन में लगा रहता या किसी असहाय की सहायता करता दिखता। एक दिन शाम के समय वह नदी के किनारे बैठा था। ठंडी-ठंडी हवा का आनंद...
     

  • October 8, 12:15
     
    बात उन दिनों की है, जब वर्ष 1922 में काकीनाड़ा में कांग्रेस पार्टी द्वारा खादी प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था। देशभर से लोग वहां आते थे और प्रदर्शनी का समुचित लाभ उठाते थे। प्रदर्शनी में प्रवेश हेतु कांग्रेस ने 2 आने का टिकट रखा था, जो अंदर जाने के इच्छुक व्यक्ति को खरीदना होता था। प्रदर्शनी के द्वार पर एक दुबली-पतली-सी दिखाई देने वाली स्वयंसेविका तैनात थी, जो किसी को टिकट दिखाए बिना...
     

  • October 7, 12:34
     
    हजरत अली के पास एक नौकर था। एक दिन उसने कोई गंभीर भूल की तो हजरत अली ने उसे डांट दिया। नौकर ने अपनी गलती मानकर उसे सुधारने के स्थान पर इस बात को दिल पर ले लिया और नाराज होकर नौकरी छोड़ दी। वह हजरत अली का घर छोड़कर चला गया। कुछ दिनों बाद हजरत अली जब मस्जिद में नमाज पढ़ने गए तो वह नौकर भी चुपचाप उनके पीछे-पीछे वहां पहुंच गया और अवसर देखकर उसने तलवार निकालकर उन पर वार कर दिया। हजरत अली को...
     

  • October 6, 12:14
     
    औरंगजेब के मन में साम्राज्य विस्तार की बहुत लिप्सा थी। इसी के चलते वह अनेक राज्यों पर अपनी विशाल सेना व मजबूत साधनों के बल पर कब्जा जमा लेता था। उसकी सेना में लगभग पांच लाख सैनिक थे, जो विभिन्न प्रकार के शस्त्रास्त्रों से लैस थे। एक बार औरंगजेब ने आनंदपुर पर चढ़ाई कर दी। गुरु गोविंदसिंह के पास मात्र १क् हजार खालसा वीर थे। फिर भी उन्होंने शाही सेना का डटकर मुकाबला किया। सत्य और...
     

  • October 5, 12:23
     
    यह घटना उन दिनों की है, जब भारत के गृह मंत्री लालबहादुर शास्त्री थे। शास्त्रीजी की सादगी सर्वविदित है। वे स्वयं पर अथवा अपने परिवार पर तनिक भी अनावश्यक खर्च नहीं करते थे और उनका रहन-सहन बिल्कुल आम लोगों जैसा ही था। राष्ट्र के अति महत्वपूर्ण पद पर आसीन होने के बावजूद उन्होंने कभी अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं किया। एक बार उनके इलाहाबाद स्थित निवास के मकान मालिक ने उनसे मकान...
     

  • October 4, 12:19
     
    फ्रांस का सम्राट नेपोलियन विद्वतजनों एवं कलाकारों का बड़ा सम्मान करता था। उसके पास ऐसे व्यक्ति जब भी आते, पर्याप्त सत्कार व सम्मान पाकर ही जाते। नेपोलियन के मंत्री भी इस नियम का समुचित पालन करते। एक बार नेपोलियन का दरबार लगा हुआ था। विभिन्न श्रेणियों के लोगों से वह भेंट कर रहा था। इन्हीं लोगों में एक चित्रकार भी था, जो अत्यंत निर्धन था। नेपोलियन ने उस चित्रकार की ओर कोई विशेष...
     

  • October 3, 11:12
     
    फ्रांस का सम्राट नेपोलियन विद्वतजनों एवं कलाकारों का बड़ा सम्मान करता था। उसके पास ऐसे व्यक्ति जब भी आते, पर्याप्त सत्कार व सम्मान पाकर ही जाते। नेपोलियन के मंत्री भी इस नियम का समुचित पालन करते। एक बार नेपोलियन का दरबार लगा हुआ था। विभिन्न श्रेणियों के लोगों से वह भेंट कर रहा था। इन्हीं लोगों में एक चित्रकार भी था, जो अत्यंत निर्धन था। नेपोलियन ने उस चित्रकार की ओर कोई विशेष...
     

  • October 3, 12:27
     
    जब हमारा देश पराधीन था, तब अंग्रेजों ने संपूर्ण राष्ट्र में शिक्षा के क्षेत्र में भी अपना वर्चस्व कायम कर लिया। हर ओर अंग्रेजी स्कूलों की भरमार थी। संस्कृत, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं लगभग सिमटती जा रही थीं। इनका महत्व कम होकर अंग्रेजी भाषा की प्रमुखता होने लगी थी। गांधीजी सहित प्रमुख भारतीय नेता इस स्थिति से काफी परेशान और चिंतित थे और इसीलिए देश की जनता को राष्ट्रभाषा हिंदी...
     

  • October 1, 12:06
     
    परचुरे शास्त्री कुष्ठ रोगी थे। गांधीजी उन पर अत्यधिक स्नेह रखते थे। इसलिए उन्हें शास्त्रीजी की सेवा करने में भी कोई हिचक नहीं होती थी। गांधीजी उनके घाव धोते, उन पर दवाई लगाते और उनकी मालिश भी करते थे। लोक में प्रचलित आमधारणा के अनुसार उनके मन में कभी यह ख्याल तक नहीं आता था कि कुष्ठ छूत का रोग है और यह उन्हें भी हो सकता है। कभी शास्त्रीजी उन्हें मना भी करते, तो गांधीजी दोगुने वेग...
     

  • September 30, 12:15
     
    जीवन दर्शन.. बालक जगदीश को जब उसकी मां ने यह सूचना दी कि उसके प्राध्यापक प्रफुल्लचंद राय को कैंसर हो गया है तो वह सहसा विश्वास ही नहीं कर पाया। उन्हें वह अपना प्रेरणास्रोत मानता था और प्रेम से उन्हें प्रफुल्ल दा कहकर बुलाता था। प्रेसीडेंसी कॉलेज के प्राध्यापक प्रफुल्लचंद राय एक दिन कॉलेज जा रहे थे। अचानक उन्होंने देखा कि दो बच्चे सड़क पार कर रहे थे और सामने से आ रही कार का उन्हें...
     

  • September 29, 12:07
     
    जीवन दर्शन.. एक बार एक विद्यालय में प्रधानाचार्य द्वारा परीक्षाफल घोषित किया जा रहा था। परीक्षाफल की घोषणा के बाद एक बच्चे ने प्रधानाचार्य से कहा - Rसर! मैं अनुत्तीर्ण नहीं हो सकता। प्रधानाचार्य को क्रोध आ गया। उन्होंने उसे डांटते हुए कहा - Rक्या मैं झूठ बोल रहा हूं कि तुम अनुत्तीर्ण हो? प्रधानाचार्य की डांट सुनने के बावजूद वह लड़का यह मानने के लिए तैयार नहीं हुआ कि वह अनुत्तीर्ण...
     
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