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जीवन दर्शन
 
 
 
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  • May 2, 08:41
     
    ब्रिटिश   राज में भारत में किसी स्थान पर मैरी नाम की एक मृदुभाषी और सेवाभावी नर्स थी। किंतु कुछ अतिवादी लोग मैरी केरोमन कैथोलिक होने केकारण उससे घृणा करते थे। वे उसे राह पर चलते हुए परेशान करते। कोई पत्थर मारता, तो कोई फब्ती कसता, किंतु मैरी इस ओर कभी ध्यान नहीं...
     

  • May 1, 07:51
     
    एक   पहलवान कुश्ती लड़ता और हमेशा जीतता था। किंतु उसके पिता का विचार था कि उसे अपने परिवार की खेती-बाड़ी में भी हाथ बंटाना चाहिए। कुछ समय बाद गांव से कुश्तियों का चलन समाप्त हो गया। अब पहलवान की कमाई बंद हो गई। उसने किसी और स्थान पर जाकर पहलवानी से पैसा कमाने का...
     

  • April 30, 07:48
     
    अवध   के नवाब आसफुद्दौला दयालु थे। दो फकीरों ने भी उनकी दानशीलता के विषय में सुन रखा था। दोनों यह गाते हुए भिक्षा मांगते थे- ‘सबका मालिक है वह मौला। सबके दुख हरेगा मौला।’ एक दिन एक फकीर ने दूसरे से कहा- ‘हमें इस तरह मांगते हुए बरसों बीत गए, किंतु हमारे कष्ट दूर...
     

  • April 29, 05:54
     
    किसी गांव में एक निर्धन ब्राह्मण अपने वृद्ध पिता, नेत्रहीन मां और पत्नी के साथ रहता था। ब्राह्मण लोगों के घरों में पूजा-पाठ कराकर अपना जीवन-यापन करता था। ईमानदार होने के कारण वह किसी से अधिक पैसे नहीं लेता था।   ब्राह्मण देवी का बड़ा भक्त था। एक दिन देवी ने उस पर...
     

  • April 27, 07:37
     
    संत रैदास की उत्कृष्ट भक्ति जग विख्यात है। वे अपना कार्य करते हुए ईश-स्मरण करते रहते थे। उन्होंने कभी अपना काम छोड़कर ईश्वर को नहीं भजा। उनके लिए उनका काम ही भगवान की पूजा थी। अनेक लोग उनकी भक्ति का यह स्वरूप देखकर उनका उपहास भी उड़ाते थे, किंतु रैदास लगन से अपने काम...
     

  • April 26, 05:58
     
    गौतम बुद्ध उन दिनों संन्यासी नहीं हुए थे। उनका नाम सिद्धार्थ था। एक राजकुमार के रूप में सिद्धार्थ तनिक भी अहंकारी नहीं थे। वे सभी से स्नेहपूर्वक मिलते, बातचीत करते। जहां किसी को कष्ट में देखते, तत्काल सहायता हेतु तत्पर हो जाते। सिद्धार्थ का चचेरा भाई था - देवदत्त।...
     

  • April 25, 08:38
     
    नोआखाली   में गांधीजी की पदयात्रा चल रही थी। जब गांधीजी पदयात्रा करते हुए देवीपुर ग्राम पहुंचे, तो वहां उनका भव्य स्वागत किया गया। पूरे गांव में ध्वजा, तोरण व पताकाओं से सजावट की गई थी। यह देखकर गांधीजी को बहुत पीड़ा हुई, क्योंकि गुलाम भारत की दयनीय दशा के चलते...
     

  • April 24, 06:38
     
    महमूद   नामक एक ईरानी व्यापारी था। एक बार उसने एक बड़ी दावत दी। आधी रात तक महमूद के घर दावत चलती रही। भीड़भाड़ में एक चोर हवेली में आकर छिप गया। महमूद ने उसे देख लिया, किंतु कुछ नहीं बोला।   जब सभी मेहमान चले गए, तब महमूद ने नौकरों को दो व्यक्तियों के लिए खाना लगाने का...
     

  • April 23, 01:33
     
    सिखों के शासनकाल में एक सूबा था मुलतान। वहां के दीवान थे सावनमल। वे अत्यंत न्यायप्रिय थे। अत: मामलों का न्यायोचित निराकरण होता था और प्रजा उनसे संतुष्ट बनी रहती थी। एक बार दीवान साहब के पास एक विधवा महिला आई और उसने बताया कि पति के न रहने पर उसके रिश्तेदारों ने उसकी...
     

  • April 22, 06:57
     
    बात उन दिनों की है, जब भारत में आजादी पाने के लिए पुरजोर प्रयास किए जा रहे थे। गर्म दल अपने तरीके से और नर्म दल अपनी शैली में कर्मरत था।   उद्देश्य दोनों का एक ही था - आजादी। इस दौर में स्वतंत्रता-संग्राम सेनानियों के लिए जेल जाना किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं होता था। ये...
     

  • April 20, 04:03
     
    वीर बालक ने पाया वीरोचित सम्मान बंगाल के शासक नवाब सरफराज खां बिहार दौरे पर थे। जब वे राजधानी मुर्शिदाबाद की ओर लौटने लगे तो उनके सेनापति अलीवर्दी खां ने पूरी सेना के साथ भागीरथी नदी के किनारे पर आकर पड़ाव डाला। वह नवाब को खत्म कर तख्त छीनने के इरादे से आया था।   जब...
     

  • April 19, 07:10
     
    गौतम बुद्ध ने जिस दिन से संन्यास ग्रहण किया, उसी दिन से स्वयं को संपूर्ण समाज के कल्याण हेतु समर्पित कर दिया था। संन्यास पथ पर निरंतर चलते हुए उन्हें गया में निरंजना नदी के किनारे ज्ञान की प्राप्ति हुई। उनके पवित्र जीवन उद्देश्य को लाखों लोगों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण...
     

  • April 18, 06:39
     
    वाराणसी   का राजा ब्रह्मदत्त शंकालु प्रवृत्ति का था। एक बार उसे अपने पुत्र पर ही संदेह हो गया कि वह उसकेविरुद्ध षड्यंत्र रच रहा है। उसने पुत्र को उसकी पत्नी सहित राज्य से निकाल दिया। पिता के इस कटु व्यवहार से आहत पुत्र के स्वभाव में भी कठोरता आ गई। वह दूसरे राज्य में...
     

  • April 17, 05:29
     
    त्रेता युग में सम्राट रघु की बड़ी प्रतिष्ठा थी। ‘दान’ उनकी दिनचर्या का अहम हिस्सा था। उनकी यह ख्याति त्रिलोक में फैल गई थी। एक दिन राजा रघु दरबार में बैठे थे कि दरबान ने किसी ऋषिकुमार के आने की सूचना दी।   राजा रघु ने उन्हें दरबार में सादर ले आने का आदेश दिया।...
     

  • April 16, 06:34
     
    दादाभाई  नौरोजी को किसी मुकदमे केसिलसिले में लंदन जाना था। संयोग से बाल गंगाधर तिलक को भी वहां कुछ काम था। सो, दोनों ने साथ ही जाने का कार्यक्रम बनाया। जब नौरोजी व तिलक लंदन पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि लंदन में ठहरने का खर्च अधिक था।   कम खर्च केउद्देश्य से दोनों ने...
     
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