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जीवन दर्शन
 
 
 
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  • January 16, 02:33
     
    संत  राबिया की प्रभु-भक्ति विख्यात है। वे मन, आत्मा व प्राण से ईश्वर का स्मरण करती रहतीं और प्राणिमात्र को प्रभु की रचना मानकर सेवा कार्यो में लगी रहतीं। एक रात जब राबिया सो रही थीं, तभी उनके घर में एकचोर घुस आया।   उसे राबिया के घर कोई धन-संपत्ति तो मिलनी नहीं थी।...
     

  • January 15, 01:00
     
    एक  खूंखार डाकू था अंगुलिमाल। वह लोगों को मारकर उनकी अंगुलियां काट लेता और उनकी माला बनाकर अपने गले में पहनता था। इसी कारण उसका नाम अंगुलिमाल पड़ा।   उन दिनों कौशल में राजा प्रसेनजित का शासन था। अंगुलिमाल के आतंक ने प्रसेनजित को भी त्रस्त कर रखा था। वे समझ नहीं पा...
     

  • January 14, 12:32
     
    नदी  किनारे एक साधु कुटिया बनाकर रहता था। वह बड़ा कर्मशील था। उसे भिक्षावृत्ति पसंद नहीं थी। आजीविका के लिए वह गांव के बच्चों को पढ़ाया करता था। एक दिन जब वह आत्मचिंतन कर रहा था, तो उसे विचार आया कि जब भगवान सभी का कर्ता है, तो आदमी को कर्म क्यों करना चाहिए? कर्म करने...
     

  • January 12, 12:06
     
    एक परोपकारी व्यापारी था। वह अपने द्वार से कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाता था। एक दिन उसकी हवेली पर एक आदमी आया।   उसके पास एक पर्चा था, जिसे वह बेचना चाहता था। उस पर्चे पर लिखा था- 'सदा न रहे। अब तक वह जिन भी लोगों के पास गया था, उन्होंने उसे 'मूर्ख' कहकर वह पर्चा...
     

  • January 9, 05:14
     
    महावीर  स्वामी अपने साधना-काल में एक निर्जन स्थान पर ध्यानमग्न बैठे थे। उसी स्थान पर एक यक्ष का वास था। यह बात महावीर को ज्ञात नहीं थी। वे तो वहां पहुंचे और शांत वातावरण देखकर ध्यानमग्न हो गए।   उस समय यक्ष वहां नहीं था। रात होने पर जब वह आया, तो अपने स्थान पर एक...
     

  • January 7, 11:36
     
    एक  समय की बात है। कानपुर में गंगा के किनारे बैठकर एक भिखारी भीख मांगा करता था। भिक्षा में उसे जो कुछ भी मिलता, उससे ही वह अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। उसके हाथ में एक कटोरा होता था, जिसे वह हर आने-जाने वाले के सामने बढ़ा देता।   जिसे जो डालना होता, वह डाल देता,...
     

  • January 7, 12:06
     
    गौतम बुद्ध अपने भ्रमण के दौरान किसी गांव में ठहरे थे। एक आदमी बहुत दिनों से उनसे मिलना चाह रहा था। एक दिन उसे बुद्ध से मिलने का मौका मिल गया। वह उन्हें प्रणाम कर बोला- 'भंते! आप तीस साल से लोगों को शांति, सत्य और मोक्ष की बात समझा रहे हैं, किंतु यह बताइए कि ऐसे कितने लोग...
     

  • January 5, 12:18
     
    बात  उन दिनों की है, जब महात्मा गांधी नौआखाली में थे। चूंकि देश के स्वातंत्र्य आंदोलन के वे प्रणेता थे, इसलिए समाज के हर वर्ग से लोग उनसे मिलने आया करते थे। इन्हीं में एक वर्ग था- प्रेस। गांधीजी जहां भी जाते, अखबार वाले वहां पहुंच ही जाते थे। जब पत्रकार उनसे...
     

  • January 4, 12:58
     
    सदियों  पहले एक राजा था, जो बहुत अभिमानी था। वह एक विशाल राज्य का अधिपति था। उसका खजाना धन से भरा था। उसके पास स्वर्ण निर्मित महल थे और एकबहुत बड़ी सेना थी।   नौकर-चाकर सदैव उसकी सेवा में तैनात रहते और चापलूस सभासद उसके घमंड को हवा देते रहते। एक दिन राजा के दरबार में...
     

  • January 3, 12:39
     
    एक व्यक्ति अपने जीवन से बहुत निराश हो गया था। उसे ऐसा लगता था कि वह इतनी बड़ी इस दुनिया में बिल्कुल अकेला है।   उसे कोई नहीं चाहता, वह किसी से प्यार पाने के काबिल नहीं है। ऐसा सोच-सोचकर वह सदैव दुखी रहता था। जब वसंत का मौसम आया और चारों ओर फूल खिल गए। तरह-तरह के फूलों के...
     

  • January 2, 01:37
     
    भूदान  आंदोलन के प्रणोता आचार्य विनोबा भावे से एक महिला मिलने आई। वह बोली- मैं बहुत दुखी हूं, मेरा पति शराबी है। रोज शराब पीकर मुझे अपशब्द कहता है और कभी-कभी मारपीट भी करता है। मेरा जीवन उसने नर्क बना दिया है।   विनोबाजी ने उससे पूछा- जब वह शराब पीता है, तब तुम क्या...
     

  • December 31, 11:52
     
    उर्दू  की किसी पाठच्यपुस्तक में गांधीजी ने इस कहानी का उल्लेख किया था - पैगंबर साहब के निधन के कुछ वर्षो बाद अरबी और रूमियों में जोरदार लड़ाई हुई। दोनों ओर के कई योद्धा मारे गए। बहुत से घायल हुए।   शाम होने पर दोनों ओर के लोग अपने साथियों व परिजनों की खोज-खबर लेते...
     

  • December 31, 12:42
     
    दक्षिण भारत में एक संत हुए हैं जिनका नाम था मध्वाचार्य। मध्वाचार्य के अनेक शिष्य थे। उन शिष्यों में एक का नाम था - कनकदास। साधु कनकदास आला दर्जे के संत थे। ज्ञान और विनम्रता की वे प्रतिमूर्ति थे।   एक दिन मध्वाचार्य के कुछ शिष्य इस विषय पर परस्पर चर्चा कर रहे थे कि...
     

  • December 29, 12:25
     
    किसी नगर में एक सेठ रहता था। उसके तीन लड़के थे। सेठ ने एक दिन विचार किया कि ज्ञानार्जन के लिए उन्हें नगर के बाहर किसी योग्य शिक्षास्थली पर भेजा जाए। उसने अनुभवी लोगों से विचार-विमर्श कर तीनों को एक अच्छे शिक्षक के पास भेज दिया। कई सालों बाद जब तीनों अध्ययन कर लौटे, तो...
     

  • December 28, 12:04
     
    राजा जनक राजा होने के बावजूद राजपाट में आसक्ति नहीं रखते थे। लोभ-मोह से वे कोसों दूर रहते थे। विनम्रता उनके स्वभाव में थी। इस कारण वे सदैव अपने दोषों को देखकर उन्हें दूर करने की कोशिश करते थे। आत्मशोधन व आत्मालोचन उनकी प्रकृति में था।    एक बार वे नदी के किनारे...
     
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