जीवन दर्शन. संसार पाना हो, तो दौड़ लगाना ही पड़ती है और भगवान से मिलना हो, तो थोड़ा रुकना पड़ता है। इन दोनों के बीच की स्थिति है चलना। नए वर्ष में जब हमारे कदम प्रवेश के साथ फूट रहे हों इस बात पर विचार करिए कि यात्रा को केवल बाहर ही न रखें, भीतर की ओर मोड़ने की तैयारी भी हो। अब पूरा एक वर्ष चलना है। कितनी ही रुकावटें, कितने ही मोड़ आएंगे। गति रुकेगी नहीं, लेकिन गति मोड़ी जा सकती है। अपनी...