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बिहार में 23 बच्चों का रक्तपात किन्तु उन्हें किसी ने नहीं मारा

कल्पेश याग्निक | Jul 20, 2013, 06:57AM IST
बिहार में 23 बच्चों का रक्तपात किन्तु उन्हें किसी ने नहीं मारा

'यह षड्यंत्र हो सकता है  हमारी सरकार गिराने का'


- पी.के. शाही, बिहार के शिक्षा मंत्री



'सरकार तुम चला रहे हो, न कि हम।
किसने रोका था चेक करने से?'


- लालू यादव, राजद प्रमुख


इस हादसे को सुनते ही महिलाएं रो पड़ीं। देश दहल उठा। बंगाल के अस्पताल से आई 100 बच्चों की मौत की भयावह खबर के डेढ़ साल बाद बिहार का मिड-डे मील हादसा सरकारी लापरवाही का निकृष्टतम शर्मनामा है। बल्कि हादसा क्यों, नरसंहार है यह। 23 बच्चों का रक्तपात। नीचे से लेकर ऊपर तक सभी दोषी। किंतु कौन मान रहा है दोष? और मानेगा भी क्यों? जब चुने हुए नेता इस रुदन में भी अपना राजनीतिक लाभ ढूंढ़ रहे हों। सत्ता पक्ष सारे लोकलाज को तार-तार कर अपना बचाव तो कम, विरोधी पक्ष पर कालिख अधिक फेंक रहा है।


तो विपक्ष के पास कैसा धैर्य? और कौन-सा गांभीर्य? वह उसी कालिख में कीच फेंटकर लौटा रहा है। केंद्र और राज्य के नेताओं के घृणित दावे, दांव और दलीलों का शोर, उन बच्चों की मौत के पीछे के सच को कमजोर करने, कुचलने और कलुषित करने की चिंघाड़ बना दिया गया। सारण के मशरक ब्लॉक से उठी मासूम चिताओं की धधकती लपटें किसी सरकारी और राजनैतिक लापरवाही को इसीलिए छू तक नहीं सकी हैं।


न कभी जला सकेंगी। क्योंकि दोष किसका है - यह कभी कोई न बता सकेगा। जांच आयोगों की आंच इतनी ठंडी होती है कि कई पूर्व जज उसकी 'बयार' में सकुशल विश्राम करते नजर आएंगे। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। सिवाय तबाह हुए, तबाह किए गए कमजोर, गरीब परिवारों के। उन्होंने अपने कलेजे के टुकड़ों को शिक्षित होने के लिए भेजा था। क्षत-विक्षत होकर लौटे। आंतें उस ज़हर से लड़ते-लड़ते अंतत: जान के रूप में बाहर आ गईं। बच्चे अस्पताल में जहरीले मध्यान्ह भोजन से संघर्ष कर, उबकाइयां ले रहे थे।


किंतु वास्तव में तो यह देश की दीनता, हीनता और पराधीनता पर उबकाई थी। सरकारें और इन्हें चलाने वाले अफसर व नेता इतने दीन हैं कि हमारे बच्चों को एक समय का खाना तक साफ-सुथरा नहीं दे सकते। हीन इतने कि बच्चों की मौत उन्हें राजनीतिक शह-मात का अवसर नजर आती है। और स्वाधीनता के साढ़े छह दशक के बाद भी ऐसा रक्तपात हो जाए - और एक मनुष्य भी दोष न माने, न दोषी पाया जाए - तो आम भारतीय पराधीन ही तो रहा। कहां है स्वतंत्रता? जीने तक की स्वतंत्रता नहीं।


खेतों और चूहों के लिए बनाए गए कीटनाशक के पराधीन है हमारे बच्चों का खाना। और ऐसे येलो फॉस्फोरस को खाने में मिलने देने वाले स्कूलों के पराधीन है हमारी शिक्षा।



अब सिलसिलेवार जांचना जरूरी है कि आखिर ये सब दोषी हैं, किंतु फिर भी दोषी नहीं, कैसे? खाना पकाने वालों से लेकर प्रधानाध्यापिका तक और नीतीश कुमार सरकार से लेकर मनमोहनसिंह सरकार तक - किसी ने कुछ नहीं किया, जो गलत हो। तो क्या इन बच्चों को किसी ने नहीं मारा? देखते हैं :



1. खाना पकाने वाली मंजू देवी और पन्नो देवी :
इन दोनों महिलाओं के जिम्मे था धरमसती प्राथमिक स्कूल के बच्चों का खाना पकाना। दोनों पर दुखों का पहाड़ वैसा ही टूटा है, जैसा अन्य बच्चों के परिवारों पर। मंजू ने अपने दोनों बेटे और एक बेटी - तीनों बच्चे इस त्रासदी में खो दिए। मंजू ने चखा था, जबकि बाकी सभी ने वही खाना खाया था। पन्नो के बच्चों के भी मरने की खबर आई थी - हालांकि पुष्टि नहीं हुई। मंजू ने तेल काला पड़ जाने की शिकायत की थी। प्रधानाध्यापिका ने कुछ न सुना।



2. प्रधानाध्यापिका मीना कुमारी राय :
इस त्रासदी का केंद्र बिंदु है मीना राय। फरार है। पहली तलाशी में पाया गया कि खाने की सारी सामग्री उसके ऑफिस में पड़ी थी। वहीं कीटनाशक का डिब्बा भी था। जो कुछ हुआ, यहीं हुआ। यह तो साफ है। ओपन एंड शट केस। किंतु संदिग्ध कड़ियां और हैं। खाद्यान्न मीना के घर पर इकट्ठा रहता, रखा जाता था। स्टोर रूम की जगह प्रधानाध्यापिका का घर। यही नहीं, जो खाद्यान्न-तेल वगैरह सप्लाई होता था, वह मीना के पति अर्जुन राय की दुकान से खरीदा जाता था। अर्जुन छपरा के राजद नेता ध्रुव राय का चचेरा भाई है। खुद भी राजद से जुड़ा है। पहली नजर में पुलिस मीना को ही आरोपी मान रही है। फरारी से इस संदेह को बल भी मिला है। अर्जुन भी गायब है।



किंतु कई तर्क-कुतर्क सामने आएंगे। मीना को नियमानुसार खाना परोसने से पहले चखना था। वो कहेगी - बिल्कुल चखा था। उसने संभवत: सिर्फ चावल चखे, सोया की सब्जी नहीं, जिसमें कीटनाशक था। चखा था, इसलिए दोष क्यों मानेगी? जांच क्यों नहीं करवाई? स्कूल निगरानी समिति ने नहीं की। खाद्यान्न घर में क्यों रखा? सरकार ने जगह नहीं दी। कीटनाशक खाद्यान्न के साथ रखा था? प्रधानाध्यापिका ने नहीं, किसी भृत्य ने रखा होगा। पति की दुकान से मिलावटी, खाद्य सामग्री क्यों सप्लाई ली? जिला प्रशासन तय करता है कहां से लें।


बाल विकास प्रोजेक्ट के अफसर जांचते हैं। स्कूल निगरानी समिति तय करती है। राशन दुकान सरकार आवंटित करती है। ये होंगे मीना के बचाव। यही बयान दस-बारह वर्ष तक चलेंगे जांच आयोग में। कुछ जल्दी भी हो सकते हैं। दोष सिद्ध नहीं होगा। कोई सिद्ध करना चाहेगा भी नहीं। उनके घर का कोई बच्चा जो शिकार नहीं हुआ है।



3. स्कूल निगरानी समिति :
वो कहेगी जांचते रहते थे। उस दिन 'हादसा' हो गया। बाकी सब ठीक-ठाक चल रहा था। मीना के पति की दुकान से ही सामग्री आती थी, इसलिए ज्य़ादा जांचने की जरूरत महसूस ही नहीं हुई। स्टोर के लिए ज़मीन जिला प्रशासन ने दी ही नहीं।



4. जिला प्रशासन :
समय-समय पर जांच करते हैं। यहां भी की थी। एक बार 'चूक' हो गई। इस स्कूल में, जो दुखद, दुर्भाग्यपूर्ण है। स्टोर के लिए सरकार को लिखा था। एक-एक करके बन रहे हैं। जिला प्रशासन का इसमें कोई दोष नहीं। मूल जिम्मेदारी शिक्षा विभाग की है।



5. शिक्षा मंत्री पी. के. शाही :
शिक्षा मंत्री तो इसे अपनी सरकार गिराने का सियासी षड्यंत्र बताकर किसी स्तर पर दोष मानने को तैयार ही नहीं है। शाही ने कहा है कि सभी जानते हैं कि प्रधानाध्यापिका का पति राजद का सक्रिय कार्यकर्ता है। राजद का नाम लिए बगैऱ वे कहते हैं कि षड्यंत्र तो पुलिस जांच में सामने आ ही जाएगा। स्टोर के बगैऱ ही कीटनाशक के साथ खाद्यान्न रखे जाने का दोष शाही केंद्र सरकार को देते हैं। फंड ही नहीं दिया।



शाही कांग्रेस, भाजपा को भी राजद के साथ-साथ सलाह देते हैं कि बच्चों की मौत पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। खुद वे करते चले जा रहे हैं। राष्ट्रीय धिक्कार का सामना कर रहे हैं शाही, किंतु दोष लेशमात्र भी मानने को तैयार नहीं।



6. राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव :
इस त्रासदी को लेकर लगातार राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में लगे लालू अपनी ही शैली में बोल रहे हैं। उनका कहना है कि भले ही प्रधानाध्यापिका का पति उनकी पार्टी का हो। हमारे तो लाखों समर्थक हैं - किस-किस को पकड़ेंगे? सरकार दोषी है। दोष मान नहीं रही।



7. बिहार की नीतीश सरकार :
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को फ्रैक्चर हो गया है और वे त्रासदी वाले मशरक ब्लॉक के गांव नहीं जा सके हैं - लेकिन विरोधी इसे भी मुद्दा बनाए हुए हैं। नीतीश सरकार इस दोष को लेने को एक पल भी तैयार नहीं है। वह तो उल्टे उस पत्र का प्रचार कर रही है जो केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय से एक हफ्ते पहले ही उसे मिला था। पत्र में मंत्रालय ने बिहार सरकार की मिड-डे मील योजना लागू करने के बाद किए सुधारों की तारीफ की थी। नीतीश सरकार हादसे को बड़ा दुखदायी मानती है, लेकिन कहती है कि यह अपवाद है, दोहराव नहीं होने देंगे।



8. केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री एमएम पल्लम राजू :
केंद्र सरकार इसे पूरी तरह राज्य सरकार और स्थानीय समिति का जिम्मा और दोष मानती है। सबसे पहले वह इस बात को खारिज करती है कि उसने स्टोर के लिए कुछ नहीं दिया। राजू उल्टे दोष मढ़ते हैं कि बिहार के लिए 65 हजार स्टोर-कम-किचन मंजूर किए जा चुके हैं। लेकिन वह 44 हजार ही बना पाया है। केंद्र सरकार इसकी जांच क्यों नहीं करती?  करती रहती है। किन्तु जिम्मा राज्य, जिला और स्थानीय लोगों का ही है।



यह तो इतनी भयावह घटना है। छोटी भी बात हो, तो भी कोई दोष मान ले, यह असंभव ही है। या जिन पर दोष सिद्ध करने का जिम्मा है, वे पूरी ईमानदारी, पूर्ण सच के साथ दोष सिद्ध करने का अपना कर्तव्य निर्वहन करें, असंभव ही है। किंतु मानना ही होगा। सिद्ध करना ही होगा।


 


दरअसल, हम सब अपनी-अपनी तरह से, अपना-अपना बिहार चला रहे हैं। किसी भी दोषी को इसलिए डर नहीं लगता चूंकि उसे पता है कि कुछ नहीं होगा। मौत के दोषी प्रधानाध्यापिका या उसका पति हो ; फिर आसान जिंदगी जीते दिखाई देंगे। उन्हें पकड़ कर कमजोर धाराओं में कठघरे में खड़े करने वाले पुलिस अफसर तरक्की पा जाएंगे। स्कूल निगरानी समिति के सदस्य किसी राज्य समिति में तकरीर करते दिखेंगे। जिला प्रशासन के अफसर राज्य में सचिव बनेंगे। न राज्य सरकार पर फर्क पड़ेगा न केंद्र सरकार पर। शाही फिर चुनाव जीतेंगे। हम ही जितवाएंगे। राजू को भी चुनेंगे। बिहार भी बंगाल बन जाएगा। नीतीश ममता हो जाएंगे। वहां 100 बच्चों की जानें गईं थीं तो सारे उप चुनाव जीते। यहां 23 बच्चे गए हैं - तो तय है, वैसी विजय मिलेगी।



दोष तो बेचारे बच्चों का है। गरीब बच्चों का। वोट बैंक जो नहीं हैं। कुछ इसलिए नहीं होगा। सारे देश का खून खौलता है, किंतु बिहार रक्तपात किसी नेता-अफसर का रक्तचाप तक नहीं बढ़ाता।
(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)



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