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सरहद पार की एक आवाज

 
Source: खुशवंत सिंह   |   Last Updated 00:02(03/09/11)
 
 
 
 
लाहौर का फिरोज संस बुकस्टोर इस शहर का सबसे बड़ा किताबघर है। एक बार अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान मैं इस बुकस्टोर पर पहुंचा। बुकस्टोर में एक बड़ा-सा हॉल उर्दू और अंग्रेजी की किताबों से पटा पड़ा था। मैंने उस्ताद दामन की कविताओं की एक किताब खरीदी, जिसमें उनके पंजाबी अशआर उर्दू में थे।

बुकस्टोर में इंग्लैंड और अमेरिका में प्रकाशित अनेक अंग्रेजी किताबें भी थीं। लेकिन वहां भारत में प्रकाशित एक भी किताब न थी। मुझे बहुत हैरत हुई, क्योंकि अंग्रेजी में लिखने वाले सभी पाकिस्तानी लेखकों की किताबें भारत में न केवल छपती हैं बल्कि उनका एक अच्छा-खासा पाठक वर्ग भी है।

मैंने बुकस्टोर के मैनेजर से इसकी वजह पूछी। उसने स्वीकारा कि बुकस्टोर में भारतीय प्रकाशकों की किताबें बेचना सरकार की नीति के विरुद्ध है। मैंने उससे पूछा : ‘आखिर ये दुश्मनी कब तक चलेगी?’ उसके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था।

मैंने उसे बताया कि पंजाबी अदब की एक आला शख्सियत ने महज चंद पंक्तियों में एक पीपुल्स रिपब्लिक होने के पाकिस्तान के दावे की पोल खोल दी थी। उस शख्सियत का नाम था उस्ताद दामन और उन्होंने लिखा था:
जिधर देखो सिगरेट पान
जिंदाबाद मेरा पाकिस्तान
जिधर देखो कुलचे नान
जिंदाबाद मेरा पाकिस्तान
पाकिस्तान दिया
मौजां ही मौजां
चारे पासे
फौजां ही फौजां।

उस्ताद दामन को उनकी हुकूमत ने कई दफे जेल भेजा, लेकिन उनके प्रशंसकों की तादाद कभी कम न हुई। उनके प्रशंसकों में पंडित नेहरू भी शामिल थे। उन्होंने दामन के सामने प्रस्ताव रखा था कि वे भारत की नागरिकता स्वीकार लें, लेकिन दामन ने इस प्रस्ताव के लिए उनका शुक्रिया अदा करते हुए कहा था कि वे लाहौर छोड़ना नहीं चाहते।

मृत्यु से पहले उन्होंने इच्छा जताई थी कि उन्हें उस कब्रस्तान में दफनाया जाए, जहां सूफी कवि माधोलाल और शाह हुसैन भी दफन हैं। उनकी इच्छा कबूल की गई और आज उनकी कब्र उसी कब्रस्तान में है। मैं उनकी कब्र पर आदरांजलि अर्पित करने गया था। उनकी कब्र पर जो कुतबा (समाधि लेख) लिखा था, उसे मैं नोट कर लाया। यह कुतबा उस्ताद दामन ने स्वयं के लिए लिखा था:
सरसरी नजर मारी जहां अंदर
ते जिंदगी वर्क उठाल्या मैं
दामन कोई ना मिल्या रफीक मैंनूं
ते चल्या मैं
यानी मैंने दुनिया पर एक सरसरी नजर डाली और जिंदगी के पृष्ठों को पलटाकर देखा, लेकिन दामन को वहां कोई दोस्त नजर न आया, लिहाजा वह अपनी राह चल पड़ा।

मुझे उस्ताद दामन की याद हाल ही में प्रकाशित उनकी एक जीवनी के कारण आई। यह किताब पंजाबी में है और इसके लेखक हैं जयतेग सिंह अनंत। किताब का शीर्षक है बेनियाज हस्ती : उस्ताद दामन। इसे कनाडा की पंजाबी अदबी संगत ने छापा है।

और हां, आज उस्ताद दामन की सालगिरह भी है। वे 3 सितंबर 1911 को लाहौर में चौक मतिदास में जन्मे थे। उनके वालिद थे मियां मीर बख्श। 3 दिसंबर 1984 को वे चल बसे। आज उस्ताद होते तो पूरे सौ बरस के होते।

इंडिया अगेंस्ट करप्शन:

मीलों तक जहां भी जाती निगाह
लोगों का हुजूम आता नजर।
यह जनसमूह उमड़ा था
अन्ना का समर्थन करने
यकीनन कहीं कुछ गड़बड़ है।
हजारों लोग कहते हैं
एक स्वर में :
‘एक दो तीन चार
बंद करो ये भ्रष्टाचार’
उन्हें शिकायत है कि इस मुल्क में
कुछ नहीं हो सकता
घूस खिलाए बगैर।
उन्हें शिकायत है
लूट-खसोट की इस तहजीब से।
लेकिन यकीनन वे गलत हैं
क्योंकि देश तो तरक्की कर रहा है
तकरीबन दहाई की विकास दर से।
सत्ता में हैं वे
जिन्हें सरकार चलाना बखूबी आता है
बसपा सपा भाजपा राकांपा
सभी विरोध में एकजुट।
ऐसे में कैसे सच हो सकती हैं
भ्रष्टाचार की दंतकथाएं।
भले ही उमड़े हों लाखों लोग विरोध में
कहीं कुछ गलत होगा यकीनन
उनके इस प्रतिरोध में!
(सौजन्य : कुलदीप सलिल, दिल्ली)
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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