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जो बाद में सोवियत रूस के लिए जी का जंजाल बन गई

 
Source: Agency   |   Last Updated 00:30(05/12/11)
 
 
 
 
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भास्कर पीडिया..सोवियत रूस ने सत्तर के दशक में अफगानिस्तान के साथ एक मैत्री संधि की थी, जो बाद में उसे बहुत भारी पड़ी। 5 दिसंबर 1978 को नूरू मोहम्मद तराकी की अगुआई वाली अफगान कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार के साथ हुई इस संधि के तहत अगले बीस साल तक दोनों देशों के मध्य ‘दोस्ती व सहभागिता’ की बात कही गई थी।

संधि के जरिए रूस ने आर्थिक सहभागिता के अलावा अफगानिस्तान को सैन्य सहायता का भरोसा भी जताया था। हालांकि इससे सोवियत रूस के हित नहीं सध सके। अफगानिस्तान में उस वक्त गृहयुद्ध के हालात थे। सितंबर १९७९ में अफगान कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों ने तराकी को सत्ता से बेदखल करते हुए उनकी हत्या कर दी।

इसके बाद दिसंबर में सोवियत रूस ने अफगानिस्तान में अपनी सेनाएं भेजते हुए ऐसी सरकार स्थापित की, जो उनके हिसाब से ज्यादा मुफीद थी।

हालांकि कई लोग इसे ‘रूस का वियतनाम’ भी कहते हैं, क्योंकि वहां के गृहयुद्ध से जूझने के लिए उसे लगातार अपना पैसा, हथियार और मानव संसाधन वहां झोंकने पड़े। हालात संभलते न देख आखिरकार रूसी राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव ने दस साल बाद वहां से अपनी सेनाएं हटाना शुरू कर दिया।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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