एंग्लो-जापानी मैत्री संधि
बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में ब्रिटेन और जापान के मध्य एक ऐतिहासिक समझौता हुआ था, जिसका मकसद सुदूर पूर्व में रूसी विस्तारवाद को रोकना और चीन व कोरिया में अपने आपसी हितों को संरक्षित रखना था। ३क् जनवरी 1902 को हुए इस समझौते के तहत तय किया गया था कि यदि दोनों में कोई भी देश किसी के साथ जंग लड़ता है तो दूसरा देश उससे तटस्थ रहेगा, लेकिन यदि एक से अधिक देश मिलकर उनमें से किसी के खिलाफ मिलकर मोर्चा खोलते हैं तो दूसरा देश अपनी पूरी शक्ति के साथ उसकी मदद के लिए आगे आएगा। इसी संधि की वजह से वर्ष 1904-05 के दौरान हुए रूस-जापान युद्ध में रूस का प्रमुख सहयोगी यूरोपीय देश फ्रांस चाहकर भी उसकी मदद नहीं कर सका। ब्रिटेन व जापान के इस गठजोड़ का दो बार वर्ष 1905 व 1911 में नवीनीकरण किया गया। इसी गठजोड़ के चलते प्रथम विश्वयुद्ध में जापान ने मित्र देशों की ओर से जंग लड़ी। हालांकि विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन अमेरिका के साथ करीबी संबंध बरकरार रखना चाहता था, जो प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में जापान का प्रबल प्रतिद्वंद्वी था। 1921-22 में हुई वॉशिंगटन कांफ्रेंस में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन व जापान के मध्य एक चतुष्कोणीय समझौता कायम होने के साथ ही यह संधि निष्प्रभावी हो गई।