प्रिय अन्ना! मैं यह पत्र किसी खुशामदी चीयरलीडर या निराशावादी पत्रकार के रूप में नहीं, बल्कि आप ही की तरह गौरव की भावना से भरे एक भारतीय के रूप में लिख रहा हूं। सबसे पहले तो मैं इस बात के लिए आपकी सराहना करना चाहूंगा कि आप भ्रष्टाचार की समस्या को राष्ट्रीय मंच पर ले आए हैं।
आप महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए दो दशक से भी अधिक समय से अथक परिश्रम कर रहे हैं, लेकिन चूंकि दिल्ली रालेगण सिद्धि से बहुत दूर है, शायद इसीलिए टीवी चैनलों ने आपके योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया था। हमने एक माह पहले एक ओपिनियन पोल कराया था, जिसमें पता चला था कि पश्चिमी महाराष्ट्र के एक गांव के फकीरनुमा योद्धा यानी आपकी तुलना में लोग योगगुरु बाबा रामदेव के बारे में ज्यादा जानते थे।
बहरहाल, अब यह स्थिति बदल चुकी है। अब देश का बच्चा-बच्चा आपको जानता है। आपने सरकार को झुकने को विवश किया है और लाखों भारतीयों को प्रेरित किया है कि वे सड़कों पर उतरें और आवाज उठाएं। आपने पूरी दुनिया के सामने राजनीतिक वर्ग को बेनकाब कर दिया, जो कि एक गंभीर नैतिक संकट के दौर से गुजर रहा है। आपने उन लोगों को सशक्त किया, जो खुद को न्यू इंडिया की चकाचौंध में कहीं गुमा हुआ महसूस कर रहे थे।
आप एक ऐसे वक्त परिवर्तन और आशा के प्रतीक बने, जब घोटाला संस्कृति देश की चेतना को आहत कर रही थी। आपने यह भी दिखाया कि मराठा, जो वर्ष 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद से ही दिल्ली से दूर रहे हैं, आज भी राष्ट्रीय राजधानी में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं। लेकिन हर लड़ाई में एक क्षण ऐसा आता है, जब हमें ठहरना पड़ता है। शायद, वह समय अब आ रहा है।
आप कहते हैं कि गांधी आपकी प्रेरणा के स्रोत हैं, लेकिन उन्होंने कभी दवाइयां लेने से इनकार करते हुए आमरण अनशन नहीं किया था। गांधी के लिए उपवास आत्मशुद्धीकरण का एक साधन था। वे कहते थे कि उपवास गुस्से की भावना के तहत नहीं किया जाना चाहिए।
हां, यह सच है कि आज सड़कों पर आक्रोश है। ऐसा लगता है जैसे दशकों से सुलग रहा कोई ज्वालामुखी फट पड़ा है और सड़कों पर लावा फैल गया है। आपकी विलक्षणता इस बात में निहित है कि आपने भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन-मन में पैठे गुस्से को शांतिपूर्वक एक सशक्त भ्रष्टाचाररोधी कानून के लिए दृढ़ निश्चय में बदल दिया।
लेकिन अब वास्तविक खतरा यह है कि कहीं एक शांतिपूर्ण व अहिंसक आंदोलन, अगर संविधान निर्माता डॉ आंबेडकर के शब्दों का उपयोग करें, जो उन्होंने आमरण अनशन के लिए कहे थे, ‘अराजकता के व्याकरण’ से आंदोलित न हो जाए। पिछले 48 घंटों में इस बात के कुछ संकेत मिले हैं।
सांसदों के बंगलों का घेराव एक आकर्षक प्रदर्शन जरूर हो सकता है, लेकिन इससे ‘सब नेता चोर हैं’ किस्म की राजनीति विरोधी लफ्फाजी को भी बढ़ावा मिलेगा, जिससे संसदीय लोकतंत्र में हमारे विश्वास को और ठेस पहुंच सकती है। टीम अन्ना के कुछ सदस्यों ने कुछ अवसरों पर जिस भाषा का उपयोग किया, उसकी विवेकपूर्ण संवाद की स्थिति में उपेक्षा ही की जानी चाहिए।
अतिरंजनापूर्ण न्यूज चैनलों और लोकप्रियतावादी सहयोगियों ने मीडिया में जिस किस्म के उन्माद की स्थिति निर्मित की, वह बड़ी आसानी से एक वास्तविक जनआंदोलन को जनाक्रोश के अशालीन प्रदर्शन में बदलकर रख सकता है। इससे आपके संघर्ष की श्रमसाध्य विश्वसनीयता को क्षति भी पहुंच सकती है।
रामलीला मैदान मुंबई का आजाद मैदान नहीं है और न ही वह रालेगण सिद्धि की चौपाल है। यह स्थानीय स्तर पर शराबबंदी का आंदोलन भी नहीं है। यहां कई एजेंडा सामने हैं, जिन पर नारेबाजी की नहीं, बल्कि दक्षतापूर्ण बातचीत करने की जरूरत है। मुंबई की सड़कों पर गैंगस्टर अबू सलेम की पूर्व गर्लफ्रेंड मोनिका बेदी को अन्ना टोपी पहने कवायद करते देखने के बाद आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष के एक प्राइम टीवी तमाशे में बदलकर रह जाने के क्या खतरे हैं।
यह सच है कि कोई भी आंदोलन तब तक समाप्त नहीं हो सकता, जब तक कि उसके प्राथमिक लक्ष्य न अर्जित कर लिए जाएं। यदि टीम अन्ना का यह लक्ष्य है कि उनकी इच्छाओं के अनुरूप जनलोकपाल बिल पास हो जाए तो यह एक अधिकतम स्थिति होगी, जिस पर रातोंरात सहमति का निर्माण करना आसान नहीं होगा।
स्वयं महात्मा गांधी अक्सर ‘समझौते के सौंदर्य’ की बात कहते थे। निश्चित ही यह अपने आपमें एक बड़ी उपलब्धि है कि आपने एक अड़ियल सरकार को लोकपाल बिल पर फुर्ती से कदमताल करने को विवश किया और उसने आपके कई प्रस्ताव माने, लेकिन दशकों से अटके हुए किसी बिल को चंद ही दिनों में बिना किसी अनवरत व समावेशी संवाद प्रक्रिया के पारित करने का प्रयास नुकसानदेह साबित हो सकता है।
हां, मैं यह समझ सकता हूं कि विश्वसनीयता गंवा चुकी उस सरकार में आपका ज्यादा भरोसा नहीं है, जिसने महज दस दिन पूर्व दंभ व मूर्खता का परिचय देते हुए पहले आपके मानमर्दन की कोशिश की, फिर आपको गिरफ्तार कर लिया और अब आपके आदर्शवाद को सलाम कर रही है। निश्चित ही आप सरकार के रवैये से आहत हुए हैं।
यह क्षण यह दिखाने का है कि आपका दिल सरकारी बंगलों में रहने वाले लोगों के संकीर्ण दिमागों से कहीं बड़ा है। यह प्रतिष्ठा से अधिक व्यावहारिकता का क्षण है। मिसाल के तौर पर सरकार को इसके लिए राजी क्यों नहीं किया जा सकता कि वह छह या आठ सप्ताह में संशोधित लोकपाल बिल के लिए संसद का एक विशेष सत्र आहूत करे, ताकि एक नया और सुविचारित कानून पूरे देश के लिए दिवाली की भेंट साबित हो?