छोटे-से स्टेशन से जुड़ी एक पुरानी याद

कॉलेेज की पढ़ाई के दौरान मेरी गर्मियों की ज्यादातर छुट्टियां देहरा में अपनी नानी के यहां ही गुजरती थीं। देहरा जाने के रास्ते में देओली नामक एक छोटा-सा स्टेशन पड़ता था, जहां से तराई के जंगल शुरू होते थे। हमारी रात्रिकालीन ट्रेन इस स्टेशन पर तड़के तकरीबन पांच बजे पहुंचती थी। उस वक्त लाइट की इतनी ज्यादा
व्यवस्था नहीं थी और स्टेशन पर दो-चार छोटे-छोटे बल्ब लट्टू की तरह टिमटिमा रहे होते। सुबह की मद्धिम रोशनी में रेलवे ट्रैक के चारों ओर पसरा घना जंगल साफ नजर आता। देओली स्टेशन पर सिर्फ एक प्लेटफॉर्म था, जिस पर स्टेशन मास्टर का ऑफिस तथा एक मुसाफिरखाना था।
मुझे समझ नहीं आता कि ट्रेन भला इस छोटे-से स्टेशन पर रुकती क्यों है! वहां से न तो कोई ट्रेन में चढ़ता नजर आता और न ही उतरता। इस वजह से प्लेटफॉर्म पर कोई कुली भी नहीं होता। इसके बावजूद ट्रेन पूरे दस मिनट यहां रुकती। इसके बाद एक घंटा बजता, गार्ड सीटी बजाता और ट्रेन छुक-छुक करती चल पड़ती। मैं कई बार सोचता कि देओली स्टेशन की दीवारों के पीछे आखिर है क्या। मुझे हमेशा इस जगह और इसके सुनसान प्लेटफॉर्म पर तरस आता, जहां कोई मुसाफिर नहीं आता था।
उस वक्त मेरी उम्र तकरीबन अठारह बरस की रही होगी। मैं नानी के यहां जा रहा था और हर बार की तरह ट्रेन देओली स्टेशन पर आकर रुकी। मैंने देखा कि प्लेटफॉर्म पर एक लड़की टोकरियां बेच रही है। वह एक सर्द सुबह थी और लड़की ने कंधों पर शॉल लपेटा हुआ था। वह नंगे पैर थी और उसके कपड़े भी पुराने लग रहे थे, लेकिन उसका चेहरा खिला हुआ था और चाल में एक नजाकत थी। उसके घने काले बाल और काली-काली आंखें एक खास आकर्षण पैदा करती थीं। वह मेरी खिड़की के पास आकर ठिठक गई। वह कुछ देर तक वहीं खड़ी रही और फिर आगे बढ़ गई। मैं टे्रन से नीचे उतरा और टी-स्टॉल की ओर बढ़ गया।
वह लड़की धीरे-से मेरे पास आई और बोली, 'क्या तुम एक टोकरी खरीदोगे? बांस की तानों से बनी ये टोकरियां काफी मजबूत हैं।Ó मैंने इनकार कर दिया। उसने मेरी आंखों में देखा और फिर पूछा, 'क्या वाकई तुम्हें टोकरी नहीं लेनी?Ó उसकी बात सुनकर मेरे मुंह से अचानक निकल गया 'ठीक है, एक टोकरी दे दो। और जेब से एक रुपए का सिक्का निकालकर उसके हाथ में थमा दिया। वह कुछ कहने ही वाली थी, तभी गार्ड ने सीटी बजा दी। वह कुछ बुदबुदाई जरूर, लेकिन उसका स्वर घंटे की तीव्र ध्वनि में दबकर रह गया। मैं दौड़कर अपने कंपार्टमेंट में चढ़ा और हमारी ट्रेन आगे बढऩे लगी। मैं जाते हुए उस लड़की को देख रहा था, जो वहां अकेली खड़ी मेरी ओर देखते हुए मुस्करा रही थी।
देहरा पहुंचने के बाद मैं दूसरी चीजों में खो गया और उसकी स्मृतियां धुंधली हो गईं। दो महीने बाद जब मैं वापस लौटने लगा, तो एक बार फिर मुझे उस लड़की की याद हो आई। टे्रन के देओली स्टेशन पहुंचने पर मेरी नजरें उसे तलाशने लगीं। उसे प्लेटफॉर्म पर आते देख मैं अद्भुत रोमांच से भर गया। मुझे देख वह हौले-से मुस्कराई और टी-स्टॉल के पास आकर खड़ी हो गई। एक पल को मेरे मन में ख्याल आया उसे ट्रेन में अपने साथ बिठा लूं और दूर ले जाऊं। मैंने उसके हाथ से टोकरियां लीं और जमीन पर रख दीं। इसके बाद मैंने उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा- 'मैं दिल्ली जा रहा हूं।Ó इस पर वह बोली, 'लेकिन मैं कहीं नहीं जा सकती।Ó तभी गार्ड ने सीटी बजा दी। मैंने उससे कहा, 'मैं फिर आऊंगा। क्या तुम यहीं मिलोगी?Ó उसने स्वीकृति में सिर हिलाया। इसके बाद मैं दौड़कर ट्रेन में चढ़ गया।
इस बार मैं उसे नहीं भूला। कॉलेज की परीक्षाएं खत्म होते ही मैंने जल्दी-से अपना सामान पैक किया और देहरा के लिए निकल पड़ा। टे्रन जैसे-जैसे देओली के नजदीक पहुंच रही थी, मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। ट्रेन के देओली पहुंचने पर मैंने प्लेटफॉर्म पर चारों ओर देखा, लेकिन मुझे वह कहीं नजर नहीं आई। उसे न पाकर मैं काफी निराश हो गया। मैं स्टेशन मास्टर के पास पहुंचा और उनसे पूछा, 'क्या आप उस लड़की को जानते हैं, जो यहां टोकरियां बेचा करती थी?स्टेशन मास्टर ने इनकार में सिर हिला दिया। मैंने स्टेशन के पिछवाड़े में रेलिंग के पास जाकर भी देखा, लेकिन मुझे वहां सिर्फ एक आम का पेड़ और जंगल की ओर जाती पगडंडी ही नजर आई। तब तक ट्रेन स्टेशन से निकलने लगी थी और मैं किसी तरह भागते हुए अपने कंपार्टमेंट में पहुंचा और मायूस होकर अपनी सीट पर बैठ गया। नानी के यहां भी मेरा ज्यादा मन नहीं लगा और जल्द ही मैंने वापसी की ट्रेन पकड़ ली। वापसी में भी देओली स्टेशन पर वह कहीं नजर नहीं आई। मैंने तय किया कि मैं एक दिन अपनी जर्नी ब्रेक कर इस कस्बे में रुकूंगा और उस लड़की को तलाशूंगा, जिसकी गहरी काली आंखों ने मेरा दिल चुरा लिया था।
अपनी इसी सोच के साथ मैं अपने कॉलेज की अंतिम वर्ष की पढ़ाई के दौरान खुद को दिलासा देता रहा। गर्मियों में देहरा जाते वक्त तड़के सुबह जब टे्रन देओली पहुंची, तो मेरी नजरें एक बार फिर उस लड़की को तलाशने लगीं। मैं अपनी यात्रा को बीच में रोक एक दिन देओली में रुकने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। मुझे लगता है कि मैं डर गया। मैं यह खोजने से डर गया कि उस लड़की के साथ वास्तव में क्या हुआ। मुझे लगा कि हो सकता है वह देओली में न हो, हो सकता है उसकी शादी हो गई हो, हो सकता है कि वह बीमार हो गई हो और ....।
बहरहाल, उसके बाद से मेरा न जाने कितनी बार देओली स्टेशन से गुजरना हुआ और हर बार मैं खिड़की से इस उम्मीद में बाहर झांक लेता हूं कि शायद मुझे वह मुस्कराता चेहरा फिर नजर आ जाए।




