एक गणतंत्र का सशक्त होता जनतंत्र
Source: मार्क टुली | Last Updated 00:11(26/01/12)
एक गणतंत्र के तौर पर भारत दुनियाभर में लगातार मजबूत हो रहा है। बीते 62 साल के दौरान अगर भारत की कोई सबसे अहम कामयाबी है, तो वह यह है कि यहां लोकतंत्र बना हुआ है। यह कोई छोटी-मोटी कामयाबी नहीं है। लोकतंत्र के बने रहने से ही आज देश विकास की राह पर है।
पड़ोसी देशों की अनिश्चितता को देखते हुए भारतीय लोकतंत्र की कामयाबी बेहद अहम पहलू है। देश की ताकत को मापने के लिए सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर पहले नजर जाती है। सामाजिक तौर पर भारत के लोग अब कहीं ज्यादा खुशहाल हुए हैं।
लोगों की आमदनी बढ़ी है। देश में मिडिल क्लास का नया तबका उभरकर सामने आया है। विदेशों में भारतीय प्रोफेशनलों की मांग बढ़ी है। अब दुनिया के किसी भी कोने में भारतीयों को हीन भाव से नहीं देखा जा रहा है। हर जगह भारतीय श्रम कौशल की मिसाल दी जाती है।
आज दुनियाभर में भारतीय अर्थव्यवस्था को मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है। जीडीपी के नजरिए से भारत दुनिया के पहले तीन देशों में गिना जा रहा है। आर्थिक उदारीकरण की नीतियों से भारत की प्रति व्यक्ति आय में इजाफा हुआ है। गरीबी कम हुई है। भारत में उद्योग-धंधों का विस्तार हुआ है।
गौर करने वाली बात यह है कि इस विकास की अहम वजह अंदरूनी ग्रोथ रही है। यही वजह है कि जब दुनिया की तमाम आर्थिक ताकतें चरमराती दिखीं, तमाम आशंकाओं के बावजूद भारत की जीडीपी की विकास दर कम नहीं हुई। इस आर्थिक तरक्की के चलते ही वैश्विक परिदृश्य में भारत का कद बढ़ा है।
पहले इसकी गिनती विकासशील देशों में होती थी, लेकिन अब इसका राजनीतिक महत्व अमेरिका और यूरोपीय देशों की नजरों में बढ़ा है। लेकिन इन सबके दौरान हुआ यह है कि मार्केट इकोनॉमिक्स और सोशल इकोनॉमिक्स में देश संतुलन नहीं साध सका है। यही वजह है कि देश में विकास की बयार एक समान रफ्तार में सभी लोगों तक नहीं पहुंच सकी है। एक ओर आर्थिक नीतियों से पैसा बनाने वाले लोग तेजी से बढ़ रहे हैं तो समाज के अधिकांश तबके के लिए मुसीबतें भी बढ़ी हैं।
इन मुसीबतों को दूर करने के लिए सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी योजनाएं सभी लोगों तक पहुंचें। हर किसी को उनका लाभ मिले। हाल की महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना इस दिशा में एक उल्लेखनीय कदम रहा है। इस इकलौते कार्यक्रम के जरिए अब देश के आम आदमी के पास पैसा पहुंच रहा है। खाद्य सुरक्षा कानून के आने से भी देश की गरीब जनता का भला होगा, लेकिन हमें यह देखना होगा कि जब तक हर आदमी को काम नहीं दिया जाएगा, तब तक मुश्किलें बनी रहेंगी।
मौजूदा समय में भारत के सामने महंगाई और आर्थिक मुद्दे ही समस्याएं नहीं हैं, इनके अलावा अंदरूनी समस्याएं भी मौजूद हैं। देश के ज्यादातर हिस्सों से जिस तरह नक्सलवाद से जुड़ी खबरें सामने आ रही हैं, वे देश की अखंडता के लिए एक खतरा हैं। सरकार को इस मामले में गंभीरता के साथ सूझबूझ भी दिखानी होगी, क्योंकि यह महज नक्सलवाद का मामला नहीं है। यह उन लोगों का भी मसला है, जिनको अब तक अपना हक नहीं मिल पाया है। शोषितों और वंचितों को सत्ता में भागीदारी दिलाने की कोशिश करनी होगी। उनको मुख्यधारा से जोड़ना होगा। यहां भी मसला विकास का आम लोगों तक नहीं पहुंच पाना है।
इसके अलावा उत्तर-पूर्व में भी अलगाववादी तत्वों की सक्रियता हाल के दिनों में बढ़ी है, उस हिस्से से भी संपर्क बढ़ाने की जरूरत है। उपेक्षा करने पर यहां संघर्ष की स्थिति बढ़ सकती है। दरअसल विकास की योजनाएं तभी आम लोगों तक पहुंच पाएंगी, जब देश में शासन चलाने की ईमानदारी और पेशेवर नजरिए वाला सिस्टम आएगा।
इस देश में आधे से ज्यादा समस्याएं तो बाबूगीरी वाले सिस्टम की देन हैं। सिस्टम में भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर मौजूद है। अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते देशभर में एक भ्रष्टाचार विरोधी माहौल जरूर बना है, लेकिन हमें यह समझना होगा कि बस एक कानून के बन जाने से इतनी विकराल समस्या का हल नहीं निकल आएगा। हमें संस्थागत भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए लगातार प्रयास करने होंगे।
बुनियादी नागरिक सुविधाओं का अभाव 62 साल बीतने के बाद भी समस्या के तौर पर बना हुआ है। अभी भी देश में ऐसे अनेकानेक हिस्से हैं, जहां बिजली, पानी और सड़क का संकट बना हुआ है। भारत को अब इन समस्याओं को दूर करने की योजना पर अमल करना होगा। इसके बाद आम लोगों तक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच और शिक्षा का प्रचार भी सुनिश्चित करना होगा।
इसके बाद आम लोगों के रोजगार और उद्योग-धंधों की सीमा को विस्तार देने की जरूरत भी है। इन अंदरूनी समस्याओं को निपटाने के लिए जरूरी है कि भारत को अपनी आबादी को कुशल मानव संसाधन के रूप में बदलना होगा। यह सब तभी कारगर ढंग से हो पाएगा, जब इस देश की शासन प्रणाली को दुरुस्त किया जाएगा। इनके अलावा एक पहलू और है।
भारत के अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंध सहज नहीं हैं। उसके पीछे सबसे बुनियादी वजह तो यही है कि पड़ोसी देशों की तुलना में भारत काफी बड़ा देश है, लिहाजा इसकी छवि वर्चस्व और दबदबे वाली बन गई। हालांकि समय के साथ पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों में एक सहजता जरूर आ रही है, लेकिन एक मुल्क के तौर पर भारत को हमेशा सजग रहने की जरूरत है। सामरिक दृष्टिकोण से भारत की गिनती परमाणु शक्ति संपन्न देशों में होती है, लेकिन इसकी मुश्किलें तभी कम होंगी, जब वह अपने पड़ोसी देशों का विश्वास हासिल कर पाएगा। - लेखक वरिष्ठ पत्रकार और बीबीसी, नई दिल्ली के पूर्व चीफ ऑफ ब्यूरो हैं।