एक विलक्षण रंग-परंपरा के तीन वटवृक्ष
देवेश वर्मा
| Mar 28, 2012, 00:09AM IST

ये तीनों विभूतियां रंगमंच की जान और शान बनकर रहीं और इनके अवदान को नाट्य इतिहास में भुलाया नहीं जा सकता। तीनों ने अपने तईं अलग-अलग रंगों से रंगमंच को नवाजा। हबीबजी यानी बाबा यदि लोकनाट्य के बहाने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने वाले रहे तो बी. वी. कारंत ने संगीत और यक्षगान को अपने नाटकों की जान बनाया। पणिक्करजी ने संस्कृत नाटकों का वैभव जगाए-जुगाए रखा।
हबीबजी से मेरी सबसे ज्यादा मुलाकातें भोपाल में उनके घर पर हुईं। जब वे इंदौर आते, तो घर पर खाना खाने अवश्य आते थे। वे कहा भी करते थे - इंदौर में देवेश के घर पर ही अच्छा खाना खाने को मिलता है। ऐसा नहीं है कि वे कहीं और नहीं जाते थे। यहां भी वे अक्सर दूसरी जगहों पर ठहरते और भोजन लेते थे।
उनसे लंबी बातचीत के दौरान अक्सर वे नाटकों के साथ-साथ हंसी-मजाक की बातें भी बताया करते थे। उन्होंने मुझे बताया था कि एडिनबर्ग फेस्टिवल 1982 के दौरान ‘चरणदास चोर’ को फ्रिंज फस्र्ट अवॉर्ड मिला था। उस समय और उसके बाद भी जर्मनी में एक फेस्टिवल के दौरान जब वे ‘चरणदास चोर’ पेश कर रहे थे और पहली बार उसका परिचय दे रहे थे, तभी वहां के आयोजकों ने कह दिया इसकी कोई जरूरत नहीं, नाटक लोगों को समझ में आ रहा है। छत्तीसगढ़ी भाषा में खेला जाने वाला नाटक जर्मन दर्शकों के मन पर छाप छोड़ रहा था, यह बात मुझे चकित करने वाली लगी।
बी. वी. कारंत मेरे दस साल के मुंबई प्रवास के दौरान 1987 में मेरे घर पर रुके थे। उन्हें मेरे छोटे भाई अखिलेश के चित्रों की पहली प्रदर्शनी का उद्घाटन करना था। तब दो रातों तक उनके साथ नाटक को लेकर लंबी बातचीत हुई थी। कारंतजी ने कहा था कि नाटकों में संगीत का वैभव जगाए रखना बहुत ही मुश्किल होता है।
बैकग्राउंड म्यूजिक अच्छे नाटक की जान कहा जाता है और मैं इसी तरह काम करने में विश्वास करता हूं। वे हिंदी के प्रति बहुत प्रेम और संजीदगी रखते थे। रामकृष्ण हेगड़े उनके अच्छे मित्र थे और कहा करते थे कि भाई तुम यहीं रहो और काम करो, लेकिन कारंतजी ने हमेशा यही कहा कि मैं हिंदी के लिए काम करना चाहता हूं। मेरी रुचि हिंदी नाटकों के प्रति ही सबसे ज्यादा है। भोपाल में रंगमंडल के माध्यम से कारंतजी ने रंगमंच के क्षेत्र में मौलिकता से दीप्त अभूतपूर्व काम किया था।
के. एन. पणिक्कर से मेरी मुलाकात उज्जैन में कालिदास समारोह के दौरान हुई थी। वे स्वप्नवासवदत्तम एंड दूतवाक्यम नाटक लाए थे। 1996 में उन्हें कालिदास सम्मान से भी नवाजा गया था। उन्होंने एक खास बातचीत में मुझे बताया था कि मैं स्थानीय (मलयालम) भाषा में नाटक इसलिए लिखना पसंद करता हूं, क्योंकि स्थानीय भाषा की वजह से ही सबसे ज्यादा दर्शक जुड़ते हैं।
उन्होंने कुट्टीअट्टम के ज्ञाता माधव चक्यार की जीवनी पर फिल्म भी रुचिवश बनाई थी। पणिक्करजी भी बाबा यानी हबीबजी और कारंतजी के समान ही ज्ञानवान और बेहद सरल स्वभाव के व्यक्ति हैं। इन तीनों नाट्यकारों के बेहद सरल स्वभाव और नाट्यकर्म के प्रति उनकी गंभीरता आज भी मुझे रोमांचित करती है। रंगमंच आज भी अगर मजबूती से अपना अस्तित्व बचाए हुए है तो इन्हीं विभूतियों के कारण।





