दूसरों के केवल गुण ही देखिए
पं. विजयशंकर मेहता
| Dec 26, 2012, 00:15AM IST
सुख चाहने वाले लोगों को सुख के बारे में एक गहरी बात हृदय में उतारनी होगी। हम सुख को जितना चाहेंगे, सुख हमसे उतना दूर भागेगा। चाहत और सुख एक-दूसरे के विपरीत हैं। इसे पाने के प्रयास में ही हमने इसे अधिक खोया है। जो पहले से ही है, उसे हम पाने का प्रयास करते हैं, यह गलत है।
जैसे शरीर में आंख, कान, हाथ, पैर आदि जब पहले से ही हैं तो इन्हें और क्या, कैसे पाया जा सकेगा? इनका उपयोग हो सकता है। ऐसे ही सुख हमारा स्वभाव है। हर मनुष्य के लिए आसान नहीं है कि वह स्वयं के स्वभाव पर केंद्रित हो जाए, दूसरों पर न टिके। घर-परिवार, दुनियादारी में दूसरों पर टिकना ही पड़ता है। तब एक प्रयोग करते रहिए।
दूसरों पर टिकने का अवसर आए या मजबूरी हो जाए तो उनके सिर्फ गुण ही देखिए। इस विचार को मन में रखिए कि हमारे आसपास के लोग बड़े उपकारी, सेवाभावी, प्रसन्न मन, निर्दोष और स्वर्गीय प्रकृति के हैं। दूसरों में से चुन-चुनकर गुण उठाइए।
भीतर जब दूसरों के अवगुणों का चिंतन शुरू हो तो उसे तत्काल विराम दें। इससे हमारी आंतरिक मलिनता दूर होगी। दूसरे के भीतर का अच्छा सोचते-सोचते अचानक वह खूबियां हमारे भीतर भी आने लगती हैं। यह एक प्रकार का विचार संक्रमण है, जो हममें सकारात्मक बदलाव लाता है।
प्रज्ज्वलित दीपक की समीपता और साहचर्य हमारे अंतरदीप के भी प्रकाशित होने की संभावना को प्रबल करेगा। यहीं से हमें अपने स्वभाव पर लौटने में सुविधा मिलेगी, हमारा वास्तविक सुख क्या है, यह हम जान जाएंगे। यह आवागमन देखते ही देखते एक दिन आनंद में बदल जाएगा।






