उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के वूलगूल्गा की सिख बसाहटों के बारे में मुझे काफी पहले से पता है। वूलगूल्गा के सिख मूलत: केले और नाशपातियों की खेती करते हैं। वे इतने समृद्ध हैं कि अपने निजी एयरक्राफ्ट से खेतों में कीटनाशक का छिड़काव करते हैं।
वे प्रमुखत: दो समुदायों में विभाजित हैं और उनके अलग-अलग गुरुद्वारे हैं। मैंने उनके साथ वूलगूल्गा में एक शाम बिताई थी और यह देखकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ था कि शाम की अरदास के बाद वे गुरु के लंगर का आयोजन करते हैं।
पिछले कुछ दशकों में सिखों की संख्या ऑस्ट्रेलिया के अन्य क्षेत्रों में भी बढ़ी है।
खासतौर पर मेलबोर्न में। मेलबोर्न के सिख समुदाय के सबसे उल्लेखनीय व्यक्तियों में से एक हैं सरदार दया सिंह। ६क् साल के सरदार दया सिंह रागी हैं और उनका जन्म मलयेशिया में हुआ था। उनके पिता एक गुरुद्वारे के ग्रंथी थे, लेकिन बाद में वे रागी बन गए।
दया सिंह ने मात्र तीन वर्ष की उम्र से ही अपने पिता के साथ सबद-कीर्तन करना शुरू कर दिया था और यह दौर १५ वर्षो तक चला। फिर वे अकाउंटिंग की पढ़ाई करने इंग्लैंड चले गए। वर्ष १९८१ से वे मेलबोर्न में रह रहे हैं। उनकी तीन पुत्रियां हैं। दया सिंह सर्वधर्म समभाव में विश्वास रखते हैं और वे कहते हैं कि उन्होंने नितनियम से भी पहले फजर की नमाज सीख ली थी। उनकी तीनों पुत्रियां उनके साथ सबद-कीर्तन करती हैं। उन्होंने अपनी एक पुत्री का नाम जमील रखा है, जबकि शेष दो के नाम हैं : हर्शेल और पर्वेरी।
मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्हें कभी ऑस्ट्रेलिया में किसी तरह के नस्लभेद का अनुभव हुआ? उन्होंने कहा हां, ऑस्ट्रेलिया में नस्लभेद है, लेकिन वह तो पूरी दुनिया में है। लेकिन उनके कीर्तन जत्थे में गोरे ऑस्ट्रेलियाई भी शामिल हैं। ऑस्ट्रेलियाइयों ने उनके साथ हमेशा अच्छा व्यवहार किया है। वे कहते हैं कि जब वे इंग्लैंड में थे, तब ब्रितानियों का व्यवहार भी उनके साथ अच्छा ही था। उन्हें कभी किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा।
जिस शाम दया सिंह से मेरी भेंट हुई थी, तब वे बहुत अच्छे मूड में थे। वे एक ऊंचे तगड़े सरदार हैं और मैंने उनके जितने ताकतवर सरदार कम ही देखे हैं। मैंने उनसे वूलगूल्गा के सरदारों और उनके गुरुद्वारों के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि अभी तक यहां दो गुरुद्वारे थे, लेकिन अब गुरुद्वारों की संख्या बढ़कर तीन हो गई है।
फिर उन्होंने कहा कि हमारे बारे में कहा जाता है कि जहां एक सिख होता है, वहां केवल एक सिख होता है, जहां दो सिख होते हैं, वहां सिंघ सभा होती है और जहां तीन सिख होते हैं, वहां रोला-रप्पा होता है। इतना कहकर उन्होंने जोर का ठहाका लगाया, जो आज भी मेरे कानों में गूंज रहा है।
एक्सरे से परे
एक्सरे मशीनें किसी भी सूटकेस या अन्य बैगेज के भीतर रखी चीजें दिखा सकती हैं और इस वजह से वे कस्टम अधिकारियों के लिए बेहद काम की साबित होती हैं। लेकिन कुछ जगहें ऐसी होती हैं, जहां तक एक्सरे किरणों भी नहीं पहुंच पातीं। ‘द प्राइवेट आई’ पत्रिका के कॉलम ‘फनी ओल्ड वर्ल्ड’ में मैंने ऐसी ही एक रोचक रिपोर्ट पढ़ी।
रिपोर्ट के मुताबिक अब तस्कर अपने शरीर में ऐसी जगहों पर ड्रग्स को छुपाकर ले जाने लगे हैं, जहां तक एक्सरे किरणों नहीं पहुंच पातीं। लेकिन जाहिर है कि इस तरह वे बहुत अधिक मात्रा में तस्करी नहीं कर पाते। इस कारण कई मजेदार स्थितियां भी निर्मित हो जाती हैं।
बैंकॉक में एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान ड्रग एडिक्ट्स के लिए सेंट्रल करेक्शनल इंस्टिट्यूट के सोरासित चोंगचारोन ने बताया कि हाल ही में एक सेल इंस्पेक्शन के दौरान अधिकारियों ने कुछ संदिग्धों को अपनी जगह पर खड़े होकर जोरों से उछलने को कहा ताकि यदि उन्होंने कहीं भी ड्रग की कोई पुड़िया छुपाकर रखी हो तो वह नीचे गिर पड़े।
एक संदिग्ध के शरीर के भीतर से ड्रग तो नहीं, लेकिन एक मोबाइल फोन जब्त हुआ और वह भी तब, जब अचानक उस फोन पर किसी का कॉल आया और उसकी घंटी बजने लगी।
अलविदा का गीत
दुनिया में सैकड़ों कवियों ने अलविदा के गीत लिखे होंगे। उम्र की सांझ में जीवन को अलविदा कहने के संबंध में भी सैकड़ों गीत हैं। लेकिन इन सभी गीतों में टेनिसन का विदा गीत सर्वश्रेष्ठ है। ‘क्रॉसिंग द बार’ नामक वह कविता भुलाए नहीं भूलती। अभी मेरे पास वह कविता नहीं है, लेकिन अपनी याददाश्त के आधार पर मैं उसे यहां प्रस्तुत कर रहा हूं
सूर्यास्त और सांझ का सितारा
एक स्पष्ट संकेत है मेरे लिए
किंतु कोई न करे विलाप
कोई न गाए शोकगीत
जब मैं निकल जाऊंगा
एक लंबी यात्रा पर।
झुटपुटा और सांझ की घंटियां
अंधेरे की चादर बिछी हुई
क्षितिज से क्षितिज तक
किंतु कोई न हो उदास
कोई न गाए विदागीत
जब मैं निकल जाऊंगा
एक अनंत यात्रा पर।