अमीर की गरीबी सिद्ध की इब्राहीम ने
Bhaskar News
| Jan 24, 2013, 23:22PM IST
इब्राहीम आदम बलख के बादशाह थे। वे प्रजा के हितों का बहुत ध्यान रखते थे। स्वयं संपूर्ण राज्य में घूमते और पता लगाते कि कहीं किसी को कोई कष्ट तो नहीं है। प्रजा भी अपने इस नेकदिल बादशाह का बहुत सम्मान करती थी।
कुछ सालों के राजपाट के बाद इब्राहीम का मन विरक्त हो गया। उन्होंने सब कुछ त्यागकर फकीरी का मार्ग अपना लिया और एक सामान्य कुटिया में रहने लगे। चूंकि प्रजा के मन में उनके प्रति अत्यधिक आदर था, इसलिए लोग उनसे मिलने आते रहते थे। एक बार एक संपन्न व्यक्ति उनसे मिलने आया और हजार अशर्फियों की थैली उन्हें भेंट की। इब्राहीम ने उसकी ओर देखा और बोले- ‘मुझे यह नहीं चाहिए। मैं गरीब की एक कौड़ी भी नहीं चाहता।’
धनी बोला- ‘मैं गरीब नहीं हूं, बहुत अमीर हूं।’ इब्राहीम ने कहा- ‘माना कि तुम्हारे पास बहुत पैसा है, किंतु यह बताओ कि पैसे पाने की तुम्हारी इच्छा पूरी हो गई या अभी भी बनी हुई है?’ धनी कुछ अचरज जताते हुए बोला- ‘यह बड़ा विचित्र प्रश्न है।
आप तो जानते हैं कि पैसे कमाने की इच्छा किसी की कभी पूरी नहीं होती। मेरे मन में भी यह इच्छा बनी हुई है और मैं निरंतर पैसे कमा भी रहा हूं।’ तब इब्राहीम ने उसे समझाया- ‘अमीर होते हुए भी और पैसा पाने की इच्छा जिसकी बनी रहे, उसे मैं सबसे गरीब मानता हूं, क्योंकि वह सदा पैसे का अभाव ही महसूस करता है। इसलिए अपनी अशर्फियां ले जाओ। मुझे इनकी कोई आवश्यकता नहीं है।’
उनकी बात सुनकर धनी को अपनी सोच पर ग्लानि हुई और वह उनसे क्षमा मांगकर वहां से चला गया। सार यह है कि अधिक से अधिक पाने की लालसा व्यक्ति को अमीर तो बना देती है, किंतु सुखी नहीं, क्योंकि सुख धन से नहीं, संतोष से आता है।








