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आखिर इस जुए की जरूरत क्या है?

 
Source: एम.जे. अकबर   |   Last Updated 01:12(20/11/11)
 
 
 
 
बायलाइन . उत्तरप्रदेश की जटिल पहेली के बीच एक सवाल है, जिसने मुझे बुरी तरह हैरान कर रखा है। आखिर क्यों राहुल गांधी ने अगले साल होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव के नतीजों को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है - वह भी पार्टी की नहीं, निजी प्रतिष्ठा का? आखिर क्यों उन्होंने अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को यूपी में दांव पर लगा दिया और ऊंची बाजी खेल दी, जबकि अवध की अनिश्चितता में अपने भविष्य का जुआ खेलने की कोई वास्तविक वजह भी उनके पास नहीं है?

कांग्रेस पार्टी ने उनसे ऐसी कोई मांग भी नहीं की है। वह तो प्रधानमंत्री के तौर पर उसी दिन उनका राजतिलक कर देगी, जिस दिन वे प्रतीक्षा कक्ष से शीर्ष कुर्सी तक जाने का फैसला कर लेंगे। यह उत्तरदायित्व उन्हें आनुवंशिक अधिकार से मिलता है, चुनावी अनुमोदन से नहीं। राहुल गांधी ने बिहार में पार्टी के चुनाव अभियान का नेतृत्व किया और नीतीश कुमार-भाजपा की बाढ़ में पार्टी डूब गई।

क्या इससे प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा कुछ कमजोर हुआ? नहीं। थोड़ी-सी देर के लिए मान लें कि यूपी के नतीजे भी ऐसे ही हतोत्साहित करने वाले रहते हैं। क्या इससे सहायकों-अनुचरों द्वारा ुउनके राज्यारोहण के लिए किए जाने वाले निरंतर गान पर विराम लग जाएगा? नहीं।

कांग्रेस के वर्तमान गणित में योग्यता की बजाय परिवार ज्यादा महत्वपूर्ण है। यदि प्रणब मुखर्जी के पास उपयुक्त गुणसूत्र होते, तो वे प्रधानमंत्री होते, और उस शख्स के सांचे में ढले होते, जिसकी वे हालिया भारतीय इतिहास में सबसे ज्यादा सराहना करते हैं- श्रीमती इंदिरा गांधी। लेकिन उनके पास वे गुणसूत्र नहीं हैं। बात खत्म।

जब मतदाता को प्रधानमंत्री राहुल गांधी के मूल्यांकन का मौका मिलेगा, तो वह इस आधार पर मूल्यांकन नहीं करेगा कि उन्हें मायावती के यूपी में कितने वोट
मले। वह इस आधार पर फैसला करेगा कि वे विरासत में प्राप्त संकटों को कैसे सुलझाते हैं, और 2012 में ऐसे संकट काफी होंगे।

जवाहरलाल नेहरू एकमात्र कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे, जिन्हें ताजपोशी से पहले चुनावी राजनीतिक संग्राम में परखा गया था - 1937 और 1946 के आम चुनावों में। पहली अधूरी जीत थी और दूसरी कड़वी कामयाबी। लालबहादुर शास्त्री जब जून 1964 में प्रधानमंत्री बने, उनके पास ऐसा कोई ट्रैक रिकॉर्ड नहीं था। न ही इंदिरा गांधी का था, जब जनवरी 1966 में उन्होंने उनकी जगह ली।

श्रीमती इंदिरा गांधी अपने पहले चुनावी परीक्षण में बुरी तरह विफल रही थीं। 1967 में अमृतसर से कोलकाता के बीच हर राज्य में कांग्रेस हारी। राजीव गांधी अक्टूबर 1984 में जब प्रधानमंत्री बने, तो वे पूरी तरह से बिना परखे थे। दो माह बाद उन्हें मिला भारी बहुमत उनके किसी वादे की वजह से कम और उनकी मां की शहादत के कारण ज्यादा था। पीवी नरसिंहराव ने कभी कुछ नहीं जीता - न 1991 में, जब चुनाव ही नहीं लड़ा, और न ही 1996 में, जब चुनाव तो लड़ा पर बुरी तरह हारे। डॉ. मनमोहन सिंह इसलिए प्रधानमंत्री नहीं बनाए गए, क्योंकि वे अपनी वक्तृत्व कला से भीड़ खींच सकते हैं।

यूपी में कुछ सीट ज्यादा या कम मिलने से क्या साबित होगा? आम चुनाव की चाल प्रादेशिक चुनावों से बिल्कुल जुदा होती है। मायावती को 2007 में शानदार जीत मिली थी, पर 2009 में वे कांग्रेस के पीछे फिसल गईं। उप्र में कांग्रेस को 2009 में जितनी लोकसभा सीटें मिलीं, 2007 में उससे कम विधानसभा सीटें मिली थीं। 2012 के संग्राम को तय करने वाले कारक 2007 से बिल्कुल अलग होंगे। यूपी 1989 में कांग्रेस के हाथ से निकल गया था और वह अभी तक नहीं खोज पाई है कि एक जमाने में दुर्जेय मानी जाने वाली उसकी पकड़ से यह राज्य कैसे फिसल गया। लखनऊ की तुलना में दिल्ली कांग्रेस के ज्यादा करीब है।

वॉर रूम में महीन रणनीतियां बनाने के लिए राहुल गांधी ने महंगे विशेषज्ञों की फौज खड़ी कर दी है। जनसंख्या विशेषज्ञों को किसी चीज की कमी नहीं है। यह निवेश व्यक्तिगत है, वे इस अभियान के सेनापति हैं। दूसरे संदर्भ में 2012 के यूपी के चुनाव में कांग्रेस लखनऊ की सत्ता पर अपनी हुकूमत का जायज दावा कर सकती थी। लेकिन इसके उलट, यूपी के प्रभारी महासचिव दिग्विजय सिंह सरीखे उनके सलाहकार बता रहे हैं कि 403 में से महज 60 सीटें हासिल करने को वे अपनी ‘जीत’ मानेंगे। यह भयावह भोलापन है।

यूपी की इस बेमेल ‘हाइप’ के पीछे एक ही कारण है : राहुल के लिए उस ‘उछाल’ की रचना करना, जो उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान होने के लिए वजन का काम करे। लेकिन राहुल गांधी को किसी कृत्रिम बढ़ावे की दरकार नहीं है। डॉ. मनमोहन सिंह बार-बार दोहरा चुके हैं कि वे जिस दिन चाहें, आ सकते हैं, उनके लिए दरवाजा खुला है।

कांग्रेस को सत्ता में बनाए रखने वाले गठबंधन के सहयोगी क्या यूपी के नतीजों का बेकरारी से इंतजार कर रहे हैं, ताकि जान सकें कि वे अपनी किस्मत युवा उत्तराधिकारी के भरोसे छोड़ सकते हैं या नहीं? नहीं। शरद पवार और करुणानिधि इतने कमजोर हैं कि मध्यावधि चुनाव का जोखिम नहीं उठा सकते। उनके पास अपनी आपत्तियों को निगलकर समूहगान में शामिल होने के अलावा कोई चारा नहीं।

कोई वस्तुपरक कारण नहीं है, पर हां, एक व्यक्तिपरक कारण हो सकता है। सफलता के लिए यह बेचैनी क्या राहुल गांधी की अपनी असुरक्षा का संकेत है? क्या यह खुद अपने और राजनीतिक तबके के सामने यह साबित करने की बलवती इच्छा है कि अब वे परिपक्व हो चुके हैं और अब उन्हें अपने पिता की स्मृति या मां की छाया की जरूरत नहीं रही?

राहुल जिस युवा उम्र में हैं, संदेह उसमें स्वाभाविक ही है। तब तो और भी जब आपके सीवी में कोई बड़ी प्रोफेशनल सफलता दर्ज न हो। लेकिन उनके पास सलाहकार हैं, जिनका काम है आगे ले जाने वाली सबसे सुरक्षित राह बताना, न कि निर्थक जोखिम के जरिए अपने नेता के संदेहों को खुराक देना।

अगर चीजें सही दिशा में जाती हैं, तो राहुल गांधी को वह हासिल होगा जो उनके लिए तय था। अगर वे गलत चली जाती हैं, तो अंग्रेजी की एक कहावत के मुताबिक उनके हाथ में जली हुई तीली का काला हिस्सा रह जाएगा। - लेखक द संडे गार्जियन के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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