बस बहुत हुआ! अब और नहीं
हर्ष मंदर | Dec 22, 2012, 00:47AM IST

‘महिलाएं दुनिया का आखिरी उपनिवेश हैं’, यह कहना है भारत व दक्षिण एशिया में महिला अधिकारों तथा लैंगिक समानता की मुखर प्रवक्ता कमला भसीन का। वह कहती हैं, ‘दूसरे उपनिवेशों ने कम से कम अपनी औपचारिक आजादी तो हासिल कर ली, लेकिन महिलाएं इससे महरूम हैं। उनकी मेहनत करने की शक्ति, संसाधन और लैंगिक ताकत अभी भी पुरुषों की गुलाम है।’
अगले साल 14 फरवरी को दुनियाभर में एक अरब लोग महिलाओं की अधीनता और उन पर होने वाली हिंसा के खिलाफ सामूहिक आवाज उठाएंगे। आखिर एक अरब लोग क्यों? दुनिया की आबादी तकरीबन सात अरब है। इनमें से आधी महिलाएं व लड़कियां हैं।
एक आकलन के मुताबिक दुनियाभर में तकरीबन एक तिहाई महिलाएं व लड़कियां अपने घर, कार्यस्थल, सार्वजनिक जगहों व सड़कों पर हिंसा का शिकार होती हैं। इसका मतलब है कि एक अरब महिलाएं व लड़कियां अपने जीवन में हिंसा का शिकार हैं। यह ‘बिलियन राइजिंग’ इन एक अरब महिलाओं व लड़कियों के लिए अपनी चुप्पी तोड़ने और साथ मिलकर यह घोषित करने का एक मौका है कि ‘बस बहुत हुआ! अब और नहीं!’ और वे अकेले विरोध नहीं जताएंगी।
उम्मीद है कि लाखों पुरुष व लड़के भी उनके साथ होंगे, यह कहने के लिए कि उन्हें इनकी परवाह है, इन पर होने वाली हिंसा का विरोध करते हैं और इनके साथ कोई भेदभाव न हो। इस वैश्विक प्रतिरोध के लिए १४ फरवरी का दिन चुना गया, जिसे पारंपरिक तौर पर ‘प्रेम दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। कमला कहती हैं, ‘हम भी प्यार के पक्ष में हैं। न्याय आधारित प्रेम, समता आधारित प्रेम, गरिमा आधारित प्रेम..।’ उनका आगे कहना था कि प्रकृति विविधता चाहती है।
दुनिया में सात अरब मनुष्य हैं, लेकिन कोई भी दो व्यक्ति एक-समान नहीं दिखते, जुड़वां को छोड़कर। प्रकृति भेद पैदा करती है, लेकिन यह असमानता उत्पन्न नहीं करती। प्रकृति निर्धारित करती है कि चींटी हाथी से अलग है, लेकिन यह हाथी को किसी चींटी से श्रेष्ठ नहीं बनाती, न ही कोई ऊंचा पेड़ अपने इर्द-गिर्द उगी घास से श्रेष्ठ है। पद-व्यवस्था तो इंसान ने तैयार की है, जो इसके जरिए असमानता को जायज ठहराने की कोशिश करता है।
हमारी दुनिया वर्ग, जाति, नस्ल और क्षमता की असमानताओं से विभाजित है। लेकिन इन तमाम असमानताओं में संभवत: सबसे व्यापक- सबसे क्रूर, अमानवीय और परेशानीजनक असमानता लैंगिक असमानता है। महिलाओं व पुरुषों, लड़कों व लड़कियों में सामाजिक व सांस्कृतिक तौर पर कई तरह की असमानताएं लादी गई हैं। ये गहन असमानताएं खान-पान से लेकर शिक्षा, आजीविका, विश्राम तक जीवन के हर पहलू में देखी जा सकती हैं। घर से लेकर, कार्यस्थल और सार्वजनिक जगहों तक हर जगह पुरुष व महिला में भेद किया जाता है।
महिलाओं के काम और योगदानों को गंभीर रूप से कम करके आंका जाता है। महिलाओं के अवैतनिक घरेलू कामकाज का मूल्यांकन किया जाए तो यह सालाना तकरीबन 11 लाख करोड़ डॉलर तक बैठेगा। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) का अनुमान है कि महिलाएं दुनिया का ६६ फीसदी काम करती हैं और दुनिया की आय का महज दस फीसदी कमाती हैं। इस पर भी उनका दुनिया की संपदा के महज 1 फीसदी पर स्वामित्व है।
कमला के मुताबिक असमान भारत ज्यादातर असमान परिवारों में बसता है। ज्यादातर भारतीय भाषाओं में ‘हसबैंड’ का आशय ‘स्वामी’ के रूप में दिया जाता है, जोड़ीदार के रूप में नहीं। इनमें से 40 फीसदी ‘स्वामी’ जोड़ीदार अपनी बीवियों को पीटते हैं। कई परिवारों में अंतरंग स्थल वर्चस्व और हिंसा के गुप्त संग्रामस्थल हैं।
परिवारों की हिंसा आकस्मिक या संयोगिक नहीं होती। यह संरचनात्मक दोष है, क्योंकि समूचे इतिहास में हरेक दमनकारी और प्रभुत्वकारी व्यवस्था हिंसा और डर के शासन के जरिए ही कायम रखी गई है। जैविक तौर पर ऐसा कुछ नहीं जो पुरुष को महिला से श्रेष्ठ बनाता हो। वे भय और हिंसक तरीकों के जरिए महिलाओं पर अपना वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि महिलाएं उनकी ‘संपत्ति’ हैं, जिन्हें हिंसा के जरिए अधीन बनाकर रखा जा सकता है।
लड़कों की परवरिश ऐसे तौर-तरीकों से होती है, जो क्रूरता, आक्रामकता और हिंसा को पोषित करते हैं। यहां तक कि एक छोटे-से बालक के हाथ में बंदूक का खिलौना दिया जाता है। यदि वह गुड्डे-गुड़ियों के साथ खेलना चाहे, तो उस पर हंसा जाता है। महिलाओं को भयाक्रांत या अधीन बनाए रखने के लिए पुरुष बलात्कार जैसा बर्बर तरीका इस्तेमाल करने से बाज नहीं आते। कमला कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि सारे पुरुष बलात्कारी हैं, लेकिन हां तमाम बलात्कारी पुरुष जरूर हैं।
कमला की तरह नारी अधिकारों के ज्यादातर समर्थक दुनिया की तमाम बड़ी समस्याओं के मूल में वर्चस्ववादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को देखते हैं।
एक और नारीवादी लेखिका डेल स्पेंडर की टिप्पणी है- ‘नारीवाद ने कोई जंग नहीं लड़ी। किसी विरोधी को नहीं मारा। कोई राहत शिविर नहीं लगाए, किसी दुश्मन को भूखों नहीं मारा, कोई क्रूरता नहीं दिखाई। इसकी लड़ाई शिक्षा, मताधिकार और बेहतर कार्य-स्थितियों को लेकर रही है। सड़कों पर अपनी सुरक्षा के लिए, बच्चों की देखभाल के लिए, सामाजिक कल्याण के लिए .. रेप क्राइसिस सेंटरों के लिए, महिला को शरण देने के लिए, कानून में सुधार के लिए।’
इन्हीं सब कारणों के चलते 14 फरवरी 2013 को दुनियाभर में एक अरब पुरुष-महिलाएं, लड़के-लड़कियां इकट्ठे होकर अपने इस सामूहिक संकल्प की घोषणा करेंगे कि लैंगिक आधार पर दुनिया की आधी आबादी की इस अधीनता को खत्म किया जाए।
वे सड़कों पर रैली निकालेंगे, नाचेंगे, गाएंगे, नारेबाजी करेंगे, आत्मावलोकन करेंगे, शोक मनाएंगे और यह संकल्प लेंगे कि हमारी यह दुनिया इसमें रहने वाले तमाम लोगों (पुरुष व महिला) के लिए सुरक्षित व निष्पक्ष बने।
हर्ष मंदर
डायरेक्टर, सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज






