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EXCLUSIVE: रामदेव-अन्‍ना की जुगलबंदी और टीम अन्‍ना के बिखराव की अंदर की कहानी

पुण्य प्रसून वाजपेयी | Apr 27, 2012, 10:33AM IST
 
 


रामदेव ने दस्तक दी और टीम अन्ना दोराहे पर पहुंच गई। पहले एकजुट नजर आ रही टीम अन्ना रामदेव के प्रवेश लेते ही जैसे बिखर गई। उसमें हर किसी की मंशा खुलकर सतह पर आ गई। रामदेव भी अपने गुणा-भाग के साथ संघर्ष का झोला उठाए हुए हैं। इसलिए जैसे ही अन्ना-रामदेव मुलाकात में जमीनी मुद्दे और जमीन के ऊपर खड़े वैचारिक मुद्दे टकराए तो दोनों को लगा कि उनकी सीमाएं ही उनकी ताकत हैं। रामदेव ने अपनी सीमा अपने भगवा वस्त्र से बांधी तो अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार की सत्ता को तोडऩे के लिए सत्ता से ही गुहार लगाने की अपनी सीमा तय कर ली। जैसे ही अन्ना ने अपनी सीमा तय की, टीम अन्ना के सदस्यों ने भी अपने-अपने संघर्ष की परिभाषा गढ़ ली।
 
रामदेव जानते हैं कि उनकी महाभारत कांग्रेस से है और इस महाभारत के लिए कोई अलग रामलीला मैदान बनाने का मतलब है दोबारा मात खाना। इसकी जगह भाजपा के मैदान पर खड़े होकर कांग्रेस को ज्यादा आसानी से मात दी जा सकती है। इसलिए, वह टीम अन्ना के इस फैसले के साथ खड़े हो ही नहीं सकते कि कांग्रेस-भाजपा दोनों से अलग अपना मंच बनाकर चुनाव मैदान में कूदा जाए। वजह यह कि जैसे ही संघर्ष का अलग रास्ता राजनीतिक दिशा में जाएगा, उसका सबसे अधिक घाटा भाजपा को हो सकता है, जबकि अन्ना-रामदेव के मिलेजुले गैर-चुनावी संघर्ष का राजनीतिक तौर पर सबसे ज्यादा लाभ भाजपा को ही होगा। इसलिए रामदेव ने टीम अन्ना की उस कड़ी को पकड़ा, जिसमें कांग्रेस के प्रति गुस्सा है। यह कमजोर कड़ी किरण बेदी निकलीं। दिल्ली का पुलिस कमिशनर न बन पाने का मलाल किरण बेदी को आज भी है और वह इसके लिए कांग्रेसी सत्ता के खेल को ही गुनाहगार भी मानती हैं। किरण बेदी के गुस्से को जगह भाजपा की छांव तले मिलती है। इसलिए रामदेव ने किरण बेदी के जरिए अन्ना हजारे के साथ बैठक तय की। पहली बार अन्ना हजारे के साथ परछाई की तरह रहने वाले अरविंद केजरीवाल इस बैठक में नहीं थे। फिर, रालेगण सिद्धि से लेकर हरिद्वार तक जिस तरह कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने इसी दौर में अन्ना और रामदेव के संघर्ष को मान्यता देते हुए अपनी बिसात बिछाई, उसका असर यह हुआ कि सियासत के प्यादे बनकर संघर्ष को समेटने की कोशिश शुरू हो गई। 
पहले रालेगण में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और तात्कालिन केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख ने बिसात बिछाई। हरिद्वार में भाजपा और संघ ने गोटियां बिछाईं। इस बीच दिल्ली में टीम अन्ना 14 केंद्रीय मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की चार्जशीट तैयार कर रही थी जिसमें सबसे पहला नाम विलासराव देशमुख का ही था। इससे रालेगण और पुणे में विलासराव की चौकड़ी सक्रिय हुई। उसने अन्ना को समझाया कि पहले महाराष्ट्र की लड़ाई लडऩी जरूरी है। महाराष्ट्र में लोकायुक्त की नियुक्ति होनी चाहिए। अन्ना के संघर्ष की नींव महाराष्ट्र में रही है तो उन्होंने ठीक उसी वक्त को महाराष्ट्र यात्रा के लिए समय दे दिया, जो वक्त दिल्ली में टीम अन्ना हिमाचल प्रदेश समेत देश यात्रा के लिए तय कर रही थी।
 
विलासराव देशमुख के निशाने ने दोहरा काम किया। अन्ना ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को निशाने पर लेकर जैसे ही लोकायुक्त का सवाल उठाया, वैसे ही दिल्ली में देशमुख यह कहते हुए सक्रिय हुए कि उनके कार्यकाल में कभी भ्रष्टाचार का मामला इस तरह नहीं उठा। फिर, अन्ना ने दिल्ली पहुंचकर 14 मंत्रियों की उस फाइल को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया, जिसमें पहला नाम देशमुख का था। तय हुआ था कि अन्ना इस फाइल को सार्वजनिक करके प्रधानमंत्री से जवाब मांगेगे कि जब उनके मंत्रिमंडल में 14 भ्रष्टाचार के आरोपी मंत्री हैं तो फिर जिम्मेदारी कौन लेगा। लेकिन नाम जारी नहीं हुए तो सबसे ज्यादा राहत मनमोहन सिंह को मिली और सबसे होशियार खिलाड़ी के तौर पर देशमुख का कद भी बढ़ा।
दूसरी तरफ भाजपा और संघ के वरिष्ठ और प्रभावी नेताओं ने रामदेव को राजनीति का यह ककहरा पढ़ाया कि उंगलियों के मिलने से मुठ्ठी बनती है और संघर्ष पैना होता है। अलग-अलग राह पकडऩे से उंगली टूट सकती है और संघर्ष भोथरा साबित होता है।
 
रामदेव समझ गए कि उनका संगठन दवाई बेचने और योग सिखाने वालों के जमघट से आगे जाता नहीं, लेकिन संघ का संगठन राजनीतिक दिशा देने में माहिर है। इस तरह राजनीतिक कवायद की जगह जागृति फैला कर कांग्रेस और केंद्र सरकार को देश भर में कठघरे में खड़ा करने का फैसला हुआ। अन्ना को भी उस चुनावी रास्ते पर जाने से रोकने की बात हुई, जिस पर वे निकल पड़े तो भाजपा का समूचा लाभ घाटे में बदल सकते हैं। यह पूरा खेल टीम अन्ना की कोर कमेटी की बैठक में कुछ इस तरह खुला कि हर सदस्य एक दूसरे पर शक करने लगा।
 
अन्ना ने हिमाचल प्रदेश में राजनीतिक कवायद चलाने का विरोध किया, किरण बेदी ने रामदेव की लाइन पकड़ी और चुनाव मैदान में कूदने का खुला विरोध किया। काजमी ने लड़ाई को अपने राजनीतिक मुनाफे का हथियार बनाया। वे मुलायम सिंह यादव के साथ दिल्ली से लखनऊ सफर करते रहे हैं। चूंकि मुलायम के खिलाफ भी टीम अन्ना लगातार दस्तावेज जुटा रही है जिसके विरोध का नया तरीका बैठक में किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल के टकराव को मोबाइल में रिकार्ड कर किया। यह भी खुला कि कोर कमेटी के एक कवि सदस्य भाजपा के उन मुख्यमंत्रियों को बचाने में लगे रहे, जिनके खिलाफ टीम अन्ना मोर्चा खोलना चाहती है। 
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री निशंक और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए काम करने वाले इस सदस्य पर 'दलाली' करने के आरोप भी लगे। असल में इस बैठक ने टीम अन्ना के उस सच को सामने ला दिया, जो जनलोकपाल के आंदोलन के दौर में अपने आप बनते गया। जिसने मंच संभाला, जिसने तिरंगा थामा, जो सरकार से बातचीत के लिए निकले, वे सभी कोर कमेटी के सदस्य बन गए और देश भर में टीम अन्ना का चेहरा भी। चूंकि देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों के आक्रोश का कोई चेहरा इससे पहले था नहीं। हर शहर में बनते जंतर-मंतर और वहां जमा होते लोग वैसे ही संघर्ष करने वाले फौजी थे, जिनका अपना कोई चेहरा होता नहीं।  
चेहरा बनने की इस कवायद में हर कोई संघर्ष करता तो दिखा, लेकिन एक वक्त के बाद जब चेहरे बड़े हो गए और संघर्ष छोटा, तो किसी ने अपने संघर्ष की सौदेबाजी की, किसी ने संघर्ष को राजनीतिक औजार बना लिया। जो आखिरी कतार संघर्ष को करते रहना चाहती है उसके सामने अब दो ही रास्ते हैं। एक वह अन्ना के हर संघर्ष (चाहे महाराष्ट्र तक ही सीमित क्यों न हो) में अपने आप को खपा दें या फिर संघर्ष के ऐसे रास्ते तैयार करे, जहां संघर्ष के मुद्दों के जरिए राजनीतिक विकल्प का सवाल इस तरह खड़ा करे कि अन्ना को भी देश के लिए दिल्ली लौटना पड़े।
(लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं)  
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